“UNSC पर गुटेरेस की चोट: क्या अब टूटेगा 5 देशों के वीटो का साम्राज्य?”
BRICS Summit में UN महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के बहुध्रुवीय विश्व और UNSC सुधार पर जोर का विश्लेषण। जानिए भारत, Global South, वीटो शक्ति और बदलती वैश्विक व्यवस्था पर इसका क्या असर होगा।
1945 की व्यवस्था पर 2026 का सवाल
By- Chaudhary Sudhir Talyan
नई दिल्ली में होने वाला BRICS शिखर सम्मेलन केवल राष्ट्राध्यक्षों की तस्वीरों, औपचारिक घोषणाओं और कूटनीतिक शिष्टाचार का मंच नहीं है। इस बार इसके केंद्र में एक ऐसा प्रश्न है जिसे दुनिया लंबे समय से टालती रही है—क्या 1945 में बनाई गई वैश्विक सत्ता-व्यवस्था आज की दुनिया का प्रतिनिधित्व करती है?
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का BRICS मंच पर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार पर जोर इसी असुविधाजनक सवाल को सामने लाता है।
दुनिया बदल चुकी है। आर्थिक ताकत का भूगोल बदल चुका है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की भूमिका बदल चुकी है। चीन विश्व की सबसे बड़ी शक्तियों में है, भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति में निर्णायक शक्ति बन रहा है, अफ्रीकी देशों की सामूहिक आवाज मजबूत हो रही है और BRICS अपने पुराने पांच देशों के दायरे से काफी आगे निकल चुका है।
लेकिन वैश्विक शासन की सबसे शक्तिशाली संस्था अभी भी मूलतः उसी राजनीतिक ढांचे में फंसी हुई है, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाया गया था।
यही विरोधाभास अब असहनीय होता जा रहा है।
सुरक्षा परिषद या पुराने शक्ति-संतुलन की चौकी?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन—वीटो शक्ति रखते हैं।
यह व्यवस्था उस समय बनी थी जब दुनिया का राजनीतिक नक्शा आज से बिल्कुल अलग था।
उस समय भारत स्वतंत्र राष्ट्र नहीं था। अफ्रीका का बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक शासन के अधीन था। एशिया और अफ्रीका के करोड़ों लोगों की आवाज अंतरराष्ट्रीय निर्णय व्यवस्था में लगभग अनुपस्थित थी।
आज वही दुनिया नहीं है।
भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। चीन वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक शक्ति है। अफ्रीकी महाद्वीप की जनसंख्या और संसाधन विश्व राजनीति में निर्णायक महत्व रखते हैं। लैटिन अमेरिका भी वैश्विक आर्थिक और कूटनीतिक समीकरणों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फिर सवाल सीधा है—संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी संरचना अभी भी इतनी संकीर्ण क्यों है?
यदि विश्व व्यवस्था बदल गई है, तो उसका संचालन करने वाली संस्थाएं क्यों नहीं बदलीं?
यही वह प्रश्न है जिसे अब केवल भारत या कुछ विकासशील देश नहीं उठा रहे। संयुक्त राष्ट्र का शीर्ष नेतृत्व भी इसे वैश्विक शासन की विश्वसनीयता से जोड़ रहा है।
बहुध्रुवीयता का मतलब क्या है?
बहुध्रुवीयता को केवल अमेरिका के सामने चीन और रूस की शक्ति खड़ी करने के रूप में देखना गंभीर भूल होगी।
बहुध्रुवीयता का वास्तविक अर्थ है—दुनिया में निर्णय लेने की शक्ति कुछ सीमित देशों के हाथ में केंद्रित न रहे।
एक ऐसी व्यवस्था जिसमें एशिया, अफ्रीका, यूरोप, लैटिन अमेरिका और अन्य क्षेत्रों की आवाज वैश्विक फैसलों में वास्तविक वजन रखे।
लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है।
बहुध्रुवीय दुनिया अपने आप में न्यायपूर्ण दुनिया नहीं होती।
कई शक्तियों का होना शांति की गारंटी नहीं है। यदि बड़ी शक्तियां केवल अपने प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में लग जाएं तो बहुध्रुवीयता भी टकराव का नया मैदान बन सकती है।
इसलिए असली लक्ष्य होना चाहिए—
बहुध्रुवीयता के साथ मजबूत बहुपक्षवाद।
सिर्फ शक्तियों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं। नियमों की निष्पक्षता भी बढ़ानी होगी।
BRICS क्यों महत्वपूर्ण हो गया है?
BRICS की शुरुआत पांच देशों के आर्थिक सहयोग मंच के रूप में हुई थी। लेकिन समय के साथ इसका राजनीतिक महत्व तेजी से बढ़ा है।
आज इसमें एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका से जुड़े कई बड़े देश शामिल हैं।
इस विस्तार ने BRICS को एक अलग राजनीतिक वजन दिया है।
यह अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं है। यहां Global South की आर्थिक, राजनीतिक और संस्थागत आकांक्षाएं भी अभिव्यक्त हो रही हैं।
यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव का BRICS मंच पर बहुध्रुवीयता की बात करना प्रतीकात्मक घटना से कहीं अधिक है।
यह दो अलग-अलग प्रक्रियाओं का मिलन है—
BRICS का विस्तार और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग।
भारत के लिए असली अवसर
भारत के लिए यह सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है।
लेकिन भारत को इस मांग को केवल “भारत को सीट चाहिए” तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
इसका दायरा कहीं बड़ा होना चाहिए।
भारत को कहना चाहिए कि मुद्दा केवल भारत का प्रतिनिधित्व नहीं है। सवाल यह है कि दुनिया की विशाल आबादी और Global South की राजनीतिक इच्छा का प्रतिनिधित्व कहां है?
अफ्रीका को स्थायी प्रतिनिधित्व क्यों नहीं?
लैटिन अमेरिका को स्थायी प्रतिनिधित्व क्यों नहीं?
एशिया का प्रतिनिधित्व कुछ सीमित शक्तियों तक क्यों?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या वीटो व्यवस्था स्वयं लोकतांत्रिक है?
यही वह बिंदु है जहां भारत की आवाज अधिक व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटा सकती है।
वीटो: शक्ति का सबसे बड़ा असंतुलन
संयुक्त राष्ट्र की लोकतांत्रिक वैधता पर सबसे कठिन प्रश्न वीटो शक्ति से जुड़ा है।
सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोक सकते हैं, भले ही संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश सदस्य उसका समर्थन करें।
यानी एक ऐसी व्यवस्था है जहां एक देश की असहमति सैकड़ों करोड़ लोगों के हित से जुड़े अंतरराष्ट्रीय निर्णय को रोक सकती है।
यह व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शक्ति राजनीति का परिणाम थी।
लेकिन आज सवाल उठना स्वाभाविक है:
क्या 21वीं सदी में भी वैश्विक सुरक्षा का निर्णय 20वीं सदी के युद्ध-विजेताओं की संरचना से होना चाहिए?
यही प्रश्न UNSC सुधार को इतना संवेदनशील बनाता है।
सुधार की राह में सबसे बड़ी दीवार
समस्या यह नहीं है कि दुनिया सुधार नहीं चाहती।
समस्या यह है कि सुधार से सबसे अधिक प्रभावित वही देश होंगे जिनके पास बदलाव रोकने की सबसे अधिक शक्ति है।
स्थायी सदस्यता बढ़ाने का प्रश्न है।
नई सीटों को वीटो मिलेगा या नहीं—यह प्रश्न है।
अफ्रीका के प्रतिनिधित्व का प्रश्न है।
क्षेत्रीय संतुलन का प्रश्न है।
परिषद का आकार कितना हो—यह भी विवादित है।
और अंततः संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बदलाव की आवश्यकता होगी।
इसलिए केवल राजनीतिक बयान से सुधार नहीं होगा।
इसके लिए लंबी और कठिन कूटनीतिक लड़ाई चाहिए।
चीन और भारत: BRICS की आंतरिक परीक्षा
BRICS जितना बड़ा हो रहा है, उसके भीतर उतने ही विविध हित दिखाई दे रहे हैं।
भारत और चीन इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं।
दोनों Global South की भूमिका बढ़ाने की बात करते हैं। दोनों बहुध्रुवीयता का समर्थन करते हैं। दोनों पश्चिमी प्रभुत्व वाली वैश्विक संस्थाओं में बदलाव की आवश्यकता स्वीकार करते हैं।
लेकिन दोनों के रणनीतिक हित हमेशा समान नहीं हैं।
सीमा विवाद, व्यापार, तकनीक, क्षेत्रीय प्रभाव और हिंद-प्रशांत की राजनीति दोनों देशों के बीच अविश्वास पैदा करते हैं।
इसलिए भारत के सामने चुनौती यह है कि वह BRICS को चीन-केंद्रित संगठन बनने से रोके, लेकिन चीन के साथ टकराव को BRICS की कार्यक्षमता पर हावी भी न होने दे।
यह बेहद कठिन संतुलन है।
रूस और पश्चिम का टकराव भी BRICS को प्रभावित करेगा
यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक राजनीति को गहरे रूप से विभाजित किया है।
रूस के लिए BRICS पश्चिमी प्रतिबंधों और पश्चिम-केंद्रित आर्थिक व्यवस्था के प्रभाव को कम करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
लेकिन भारत की रणनीति अलग है।
भारत रूस के साथ अपने पुराने संबंध बनाए रखते हुए अमेरिका और यूरोप के साथ भी रणनीतिक तथा आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ा रहा है।
इसलिए भारत BRICS को किसी सैन्य या वैचारिक anti-Western alliance में बदलने का इच्छुक नहीं होगा।
भारत की प्राथमिकता अधिक व्यावहारिक है—रणनीतिक स्वायत्तता।
यही कारण है कि BRICS का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह पश्चिम के विरुद्ध गठबंधन बनने से बचकर वैश्विक शासन सुधार के मंच के रूप में अपनी भूमिका कितनी मजबूत करता है।
केवल UNSC नहीं, IMF और World Bank भी सवालों के घेरे में
गुटेरेस के संदेश का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि वैश्विक संस्थागत सुधार केवल सुरक्षा परिषद तक सीमित नहीं है।
विश्व वित्तीय व्यवस्था में भी प्रतिनिधित्व और शक्ति के सवाल उठते रहे हैं।
IMF और World Bank जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका और निर्णय लेने की शक्ति को लेकर लंबे समय से असंतोष रहा है।
एक देश को राजनीतिक रूप से बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सकता है, लेकिन वैश्विक वित्तीय संस्थानों में उसकी प्रभाव क्षमता अलग अनुपात में हो सकती है।
यहीं BRICS की आर्थिक पहल महत्वपूर्ण बनती है।
New Development Bank जैसे संस्थान यह संकेत देते हैं कि विकासशील देश अपने वित्तीय सहयोग के लिए अतिरिक्त संस्थागत विकल्प चाहते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि मौजूदा संस्थाओं को खत्म कर दिया जाए।
मुद्दा यह है कि वैश्विक वित्तीय शासन में अधिक न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व हो।
क्या BRICS डॉलर को चुनौती देगा?
इस प्रश्न पर सबसे अधिक राजनीतिक शोर होता है, लेकिन वास्तविकता अधिक जटिल है।
BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, भुगतान प्रणालियों और वित्तीय सहयोग पर चर्चा हो सकती है।
लेकिन एक साझा BRICS मुद्रा बनाना या डॉलर को तत्काल हटाना बेहद कठिन परियोजना है।
अलग-अलग देशों की:
- मौद्रिक नीतियां,
- मुद्रास्फीति,
- पूंजी नियंत्रण,
- वित्तीय बाजार,
- बैंकिंग प्रणालियां
एक जैसी नहीं हैं।
इसलिए अधिक यथार्थवादी रास्ता यह है कि BRICS धीरे-धीरे वैकल्पिक भुगतान और वित्तीय व्यवस्था विकसित करे।
बहुध्रुवीय वित्तीय व्यवस्था का अर्थ जरूरी नहीं कि डॉलर समाप्त हो जाए।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि दुनिया में वित्तीय विकल्प बढ़ें।
Global South की सबसे बड़ी समस्या प्रतिनिधित्व से आगे है
यहां BRICS और संयुक्त राष्ट्र की बहस को जमीन से जोड़ना जरूरी है।
अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अनेक देशों के लिए समस्या केवल UNSC की सीट नहीं है।
उनके सामने कर्ज, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, जलवायु वित्त, रोजगार, स्वास्थ्य, तकनीकी असमानता और विकास के लिए पूंजी की कमी जैसी समस्याएं हैं।
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यदि वैश्विक संस्थागत सुधार केवल शक्तिशाली देशों के लिए नई कुर्सियों का बंटवारा बन गया तो Global South को वास्तविक लाभ नहीं मिलेगा।
सुधार का अर्थ होना चाहिए—
निर्णय प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व + वित्तीय न्याय + विकास के अवसर + तकनीकी पहुंच + अंतरराष्ट्रीय कानून की समानता।
यही व्यापक एजेंडा BRICS को सार्थक बना सकता है।
https://politicsinsightindia.com/india-brics-global-power-shift
क्या बहुध्रुवीय दुनिया ज्यादा लोकतांत्रिक होगी?
यह मान लेना भी खतरनाक होगा।
बहुध्रुवीय व्यवस्था का एक खतरा यह है कि दुनिया कई शक्ति-केंद्रों में बंट सकती है और छोटे देश बड़ी शक्तियों के बीच खिंच सकते हैं।
यदि अमेरिका एक ध्रुव है, चीन दूसरा, रूस तीसरा और अन्य शक्तियां अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र बनाती हैं, तो दुनिया अधिक स्वतंत्र होने के बजाय कई प्रतिस्पर्धी ब्लॉकों में बदल सकती है।
https://politicsinsightindia.com/kerala-anchor-aparna-kurup-fir-threats-muslim-scholar-remarks
इसलिए बहुध्रुवीयता का अंतिम परीक्षण यह नहीं होगा कि कितनी बड़ी शक्तियां मौजूद हैं।
परीक्षण यह होगा कि क्या छोटे और मध्यम देशों के पास भी स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है?
यदि नहीं, तो सत्ता का विकेंद्रीकरण केवल पुराने प्रभुत्व की जगह नया प्रभुत्व पैदा करेगा।
भारत को क्या करना चाहिए?
भारत को BRICS सम्मेलन में पांच स्पष्ट प्राथमिकताएं आगे बढ़ानी चाहिए।
1. UNSC reform को Global South agenda बनाना
भारत की स्थायी सदस्यता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे व्यापक प्रतिनिधित्व के प्रश्न से जोड़ना अधिक प्रभावी होगा।
2. अफ्रीका की मांगों का समर्थन
यदि भारत Global South की आवाज बनना चाहता है तो अफ्रीकी प्रतिनिधित्व के सवाल को केंद्रीय स्थान देना होगा।
3. BRICS को anti-Western bloc बनने से रोकना
भारत को स्पष्ट करना चाहिए कि बहुध्रुवीयता किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अधिक संतुलित वैश्विक शासन के पक्ष में है।
4. वित्तीय संस्थाओं में सुधार
IMF, World Bank और अन्य वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज बढ़ाने की मांग मजबूत करनी चाहिए।
5. घोषणाओं से आगे बढ़ना
हर BRICS सम्मेलन में नई घोषणाएं होती हैं। असली सवाल है कि कितनी घोषणाएं वास्तविक संस्थागत बदलाव में बदलती हैं।
अब दुनिया को बयान नहीं, परिणाम चाहिए।
सबसे कठोर सवाल
नई दिल्ली में दुनिया के बड़े नेता एकत्र होंगे।
भव्य मंच होगा।
घोषणाएं होंगी।
साझा बयान जारी होगा।
लेकिन उसके बाद असली परीक्षा शुरू होगी।
क्या UNSC reform पर कोई ठोस समयसीमा बनेगी?
क्या Global South को केवल भाषणों में सम्मान मिलेगा या निर्णय प्रक्रिया में शक्ति भी?
क्या आर्थिक सहयोग वास्तविक परियोजनाओं तक पहुंचेगा?
क्या BRICS अपने भीतर मौजूद मतभेदों के बावजूद साझा एजेंडा बना सकेगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या संयुक्त राष्ट्र स्वयं उस दुनिया को स्वीकार करने के लिए तैयार है जो उसके बाहर पहले ही बदल चुकी है?
निष्कर्ष: अब सुधार का प्रश्न टाला नहीं जा सकता
BRICS में गुटेरेस का संदेश एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है।
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विश्व व्यवस्था अब एक ही शक्ति-केंद्र के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की संरचना अभी भी पुराने शक्ति-संतुलन की छाया में है।
यही विरोधाभास वैश्विक व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर कर रहा है।
भारत के लिए यह अवसर है, लेकिन उससे भी अधिक यह जिम्मेदारी है।
भारत को केवल अपनी स्थायी सीट की मांग नहीं करनी चाहिए। उसे ऐसी वैश्विक व्यवस्था की मांग करनी चाहिए जिसमें एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और विकासशील दुनिया को वास्तविक राजनीतिक तथा आर्थिक प्रतिनिधित्व मिले।
BRICS का भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि वह घोषणाओं का मंच बनकर रह जाता है या वैश्विक शासन के वास्तविक पुनर्गठन की शक्ति बनता है।
और संयुक्त राष्ट्र के सामने भी विकल्प स्पष्ट है।
या तो वह बदलती दुनिया के अनुरूप खुद को बदले—
या फिर दुनिया उसके बाहर नए संस्थागत रास्ते तलाशती रहेगी।
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1945 की दुनिया समाप्त हो चुकी है। सवाल यह है कि क्या उसकी संस्थाएं भी यह स्वीकार करने को तैयार हैं?
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