प्रधानमंत्री और गृहमंत्री संसद से क्यों दूर? सवालों से बच रही सरकार या विपक्ष का दबाव—लोकतंत्र के सामने बड़ा संकट
प्रधानमंत्री और गृहमंत्री संसद में सीधे सवालों का सामना क्यों नहीं कर रहे? 2026 के मानसून सत्र में छात्र प्रदर्शन, पुलिस कार्रवाई और संसदीय गतिरोध ने सरकार की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जानिए सत्ता, विपक्ष और लोकतंत्र के इस टकराव का पूरा विश्लेषण।
Writer- Ch. Sudhir Taliyan
प्रधानमंत्री और गृहमंत्री संसद में क्यों नहीं आ रहे थे? क्या सरकार विपक्ष से डर रही थी, या फिर संसद को जवाबदेही का मंच मानने की बजाय राजनीतिक प्रबंधन का मंच बना दिया गया है?
भारतीय लोकतंत्र में संसद केवल एक इमारत नहीं है। यह वह जगह है जहां सत्ता को अपने फैसलों का हिसाब देना पड़ता है, जहां विपक्ष सवाल पूछता है, जहां सरकार को अपने दावों के पीछे तथ्य रखने पड़ते हैं और जहां जनता की आवाज सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बनती है।
लेकिन 2026 के मानसून सत्र ने इस बुनियादी लोकतांत्रिक अवधारणा पर ही एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है।
जब देश के युवाओं पर पुलिस कार्रवाई के आरोप लग रहे थे, जब पैलेट गन के इस्तेमाल की खबरें सामने आ रही थीं, जब विपक्ष लगातार गृह मंत्री से जवाब मांग रहा था और जब संसद के भीतर प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री की मौजूदगी को लेकर सवाल उठ रहे थे—तब सत्ता के सबसे शक्तिशाली चेहरे सदन में सीधे जवाब देने से क्यों दूर दिखाई दिए?
और इससे भी बड़ा सवाल है—
अगर सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं था, तो जवाब देने में इतनी देर क्यों हुई?
यह सवाल केवल विपक्ष का नहीं है। यह लोकतंत्र का सवाल है।
कहानी 20 जुलाई से शुरू होती है
20 जुलाई 2026 को संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ। उसी दिन दिल्ली में छात्रों का एक बड़ा प्रदर्शन संसद की ओर बढ़ा। प्रदर्शन परीक्षा और NEET से जुड़े मुद्दों को लेकर था।
संसद सत्र के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद परिसर में मीडिया को संबोधित करते हुए सदन में सार्थक चर्चा और सुचारु कार्यवाही की अपील की। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी प्रधानमंत्री ने संसद को सुचारु रूप से चलाने, सार्थक चर्चा करने और देश को आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया।
बात सुनने में बहुत अच्छी थी।
लेकिन उसी दिन बाहर सड़क पर जो हुआ, उसने संसद के भीतर की राजनीति को आने वाले तीन सप्ताह के लिए बदल दिया।
छात्र प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई हुई। बाद में कई मीडिया रिपोर्टों में प्रदर्शनकारियों को पैलेट से चोट लगने की बात सामने आई। The Indian Express ने रिपोर्ट किया कि CRPF की जांच में RAF के एक जवान द्वारा सात पैलेट राउंड चलाए जाने और उनमें से पांच के प्रदर्शनकारियों को लगने की जानकारी सामने आई। कम-से-कम तीन लोगों के अस्पताल में इलाज की खबर भी सामने आई।
यहां से मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रहा।
यह बन गया—
राजनीतिक जवाबदेही का सवाल।
सवाल सीधा था: आदेश किसका था?
लोकसभा में विपक्ष ने गृह मंत्री अमित शाह से सीधे जवाब मांगा।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि छात्रों के खिलाफ अत्यधिक बल का इस्तेमाल हुआ और गृह मंत्री की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
दूसरी तरफ सरकार और भाजपा ने इन आरोपों को चुनौती दी तथा विपक्ष पर राजनीतिक लाभ के लिए घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगाया।
लेकिन यहां एक बात महत्वपूर्ण है।
किसी आरोप को गलत साबित करने का सबसे मजबूत तरीका क्या है?
जवाब।
संसद में जवाब।
दस्तावेजों के साथ जवाब।
जांच की रिपोर्ट के साथ जवाब।
आदेश की श्रृंखला सामने रखकर जवाब।
कौन अधिकारी मौके पर था?
किसके आदेश पर बल प्रयोग हुआ?
किस परिस्थिति में पैलेट गन इस्तेमाल हुई?
क्या नियमों का पालन हुआ?
कितने लोग घायल हुए?
किस अधिकारी ने अनुमति दी?
क्या किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई हुई?
इन सवालों के जवाब देश को चाहिए थे।
लेकिन राजनीतिक बहस इस बात में उलझ गई कि गृह मंत्री सदन में आएं या नहीं।
सरकार के लिए असली परेशानी सवाल नहीं, जवाब का रिकॉर्ड है?
यही वह जगह है जहां सरकार की रणनीति पर गंभीर सवाल उठते हैं।
संसद के बाहर कोई मंत्री बयान देता है तो वह राजनीतिक बयान होता है।
संसद में दिया गया बयान संसदीय रिकॉर्ड का हिस्सा बनता है।
संसद में कही गई बात विपक्ष के सवालों के सामने आती है।
वह भविष्य में बहस, समिति, जांच और सार्वजनिक विमर्श का आधार बन सकती है।
इसलिए संसद में जवाब देना केवल “एक भाषण” देना नहीं है।
यह जवाबदेही स्वीकार करना है।
यही कारण है कि किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए संसद सबसे कठिन मंच भी होती है और सबसे जरूरी मंच भी।
और यहीं से सवाल पैदा होता है—
अगर सरकार अपने पक्ष को लेकर इतनी आश्वस्त थी, तो वह संसद में उसी आत्मविश्वास के साथ क्यों नहीं उतरी?
प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति ने सवाल और बड़ा कर दिया
गृह मंत्री का संबंध सीधे गृह मंत्रालय और पुलिस-व्यवस्था से है। इसलिए विपक्ष की मांग का केंद्र अमित शाह बनना स्वाभाविक था।
लेकिन प्रधानमंत्री की भूमिका अलग है।
प्रधानमंत्री पूरे मंत्रिमंडल के राजनीतिक प्रमुख हैं।
हर पुलिस कार्रवाई पर प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत रूप से जवाब देना संवैधानिक बाध्यता नहीं है।
यह बात साफ होनी चाहिए।
लेकिन राजनीति केवल संवैधानिक बाध्यता से नहीं चलती।
राजनीतिक जवाबदेही भी लोकतंत्र का हिस्सा है।
जब देश में युवाओं का आंदोलन राष्ट्रीय मुद्दा बन जाए, जब संसद में लगातार हंगामा हो, जब विपक्ष प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की अनुपस्थिति को मुद्दा बनाए और जब सरकार की छवि पर सवाल उठने लगें, तब प्रधानमंत्री की संसद में सक्रिय उपस्थिति राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।
यही कारण है कि प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति ने विपक्ष को एक आसान राजनीतिक हथियार दे दिया।
सवाल यह बन गया—
“प्रधानमंत्री देश के युवाओं के सवाल सुनने संसद में क्यों नहीं हैं?”
सरकार कहेगी—विपक्ष संसद चलने नहीं देता
सरकार के पास इसका अपना मजबूत तर्क है।
विपक्ष लगातार विरोध करता रहा। सदन में नारेबाजी और हंगामे के कारण कार्यवाही बाधित हुई।
12 अगस्त को अमित शाह ने खुलकर कहा कि सरकार छात्रों के प्रदर्शन सहित सभी मुद्दों पर विस्तृत चर्चा के लिए तैयार है। उन्होंने विपक्ष को लंबी चर्चा की चुनौती दी और कहा कि सरकार सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है।
यहीं सरकार का सबसे बड़ा राजनीतिक बचाव खड़ा होता है:
“हम चर्चा के लिए तैयार हैं, विपक्ष चर्चा नहीं चाहता।”
सरकार ने यह भी कहा कि यदि विपक्ष औपचारिक रूप से चर्चा का प्रस्ताव दे तो वह लंबे समय तक बहस करने और सवालों के जवाब देने के लिए तैयार है।
यह सरकार का वैध राजनीतिक तर्क है।
लेकिन इसमें एक बड़ा “लेकिन” है।
तीन सप्ताह बाद जागी जवाबदेही?
यहां सरकार की आलोचना सबसे ज्यादा जरूरी हो जाती है।
अगर गृह मंत्री वास्तव में हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार थे, तो यह पेशकश सत्र के अंतिम दिनों में क्यों आई?
संसद का सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ।
विवाद उसी दिन शुरू हो गया।
विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा।
सदन में कई दिनों तक गतिरोध रहा।
और 12 अगस्त को—यानी सत्र समाप्त होने से ठीक पहले—गृह मंत्री ने कहा कि वे 24 घंटे तक बहस के लिए तैयार हैं।
लोकतंत्र में सवाल केवल यह नहीं होता कि—
“आप जवाब देने को तैयार हैं या नहीं?”
सवाल यह भी होता है—
“आपने जवाब देने में इतना समय क्यों लगाया?”
अगर जवाब पहले दिन दिया जा सकता था, तो अंतिम दिनों तक इंतजार क्यों?
अगर सरकार के पास तथ्य थे, तो उन्हें पहले सप्ताह में सदन में क्यों नहीं रखा गया?
अगर कोई छिपाने वाली बात नहीं थी, तो राजनीतिक धुंध को तीन सप्ताह तक क्यों बढ़ने दिया गया?
यह वही सरकार है जो “मजबूत नेतृत्व” की बात करती है
भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी लंबे समय से निर्णायक नेतृत्व रही है।
मजबूत सरकार।
मजबूत प्रधानमंत्री।
त्वरित निर्णय।
कड़ा प्रशासन।
स्पष्ट संदेश।
लेकिन मजबूत नेतृत्व की असली परीक्षा तब नहीं होती जब तालियां बज रही हों।
मजबूत नेतृत्व की असली परीक्षा तब होती है जब सवाल कठिन हों।
जब युवा नाराज हों।
जब विपक्ष आक्रामक हो।
जब मीडिया सवाल पूछ रहा हो।
जब पुलिस कार्रवाई विवाद में हो।
जब संसद का माहौल प्रतिकूल हो।
तब नेता को सामने खड़ा होना पड़ता है।
यही लोकतंत्र है।
सत्ता के लिए सबसे सुरक्षित जगह मंच नहीं, जवाबदेही है।
“विपक्ष हंगामा कर रहा था”—यह सरकार की पूरी जिम्मेदारी खत्म नहीं करता
यहां सरकार की एक आम राजनीतिक दलील पर भी सवाल करना जरूरी है।
मान लिया कि विपक्ष हंगामा कर रहा था।
मान लिया कि विपक्ष सदन को बाधित कर रहा था।
मान लिया कि विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दा उछाल रहा था।
फिर भी सरकार की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।
क्योंकि सरकार के पास बहुमत है।
सरकार के पास संसदीय प्रबंधन है।
सरकार के पास संसदीय कार्य मंत्री है।
सरकार के पास सदन में बहुमत है।
सरकार के पास अपने तथ्य हैं।
सरकार के पास मंत्री हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण—
सरकार के पास सत्ता है।
इसलिए हर असफल संसदीय दिन का दोष केवल विपक्ष पर डाल देना आसान राजनीतिक उत्तर हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक उत्तर नहीं।
विपक्ष भी दूध का धुला नहीं
सरकार की आलोचना का मतलब विपक्ष को प्रमाणपत्र देना नहीं है।
विपक्ष की भी जिम्मेदारी है।
यदि विपक्ष को पुलिस कार्रवाई पर सवाल हैं, तो उसे चर्चा में जाना चाहिए।
अगर गृह मंत्री कह रहे हैं कि वे सवालों का जवाब देंगे, तो विपक्ष को सवालों की सूची लेकर सदन में जाना चाहिए।
अगर सरकार गलत है तो उसे संसद के रिकॉर्ड पर गलत साबित करना चाहिए।
नारे संसद की जगह नहीं ले सकते।
हंगामा संसदीय बहस का विकल्प नहीं है।
लेकिन यहां सरकार से भी सवाल है—
क्या सरकार सचमुच चर्चा चाहती थी या ऐसी चर्चा चाहती थी जिसमें राजनीतिक नुकसान पहले ही नियंत्रित किया जा सके?
यह अंतर महत्वपूर्ण है।
देर से आया “24 घंटे का ऑफर” क्या राजनीतिक पलटवार था?
12 अगस्त का अमित शाह का प्रस्ताव दो तरह से देखा जा सकता है।
सरकार कहेगी:
“देखिए, हम इतने पारदर्शी हैं कि 24 घंटे तक चर्चा को तैयार हैं।”
विपक्ष कहेगा:
“तीन सप्ताह तक जवाब नहीं दिया और अब सत्र खत्म होने से पहले 24 घंटे की चर्चा का प्रस्ताव देकर अपनी छवि बचाई जा रही है।”
दोनों राजनीतिक narratives हैं।
लेकिन पत्रकारिता और लोकतंत्र का काम इनमें से किसी एक को आंख बंद करके स्वीकार करना नहीं है।
सवाल यह होना चाहिए—
किसके पास तथ्य हैं?
कौन उन्हें सार्वजनिक रिकॉर्ड पर रखने को तैयार है?
किसके पास जांच रिपोर्ट है?
कौन आदेश की श्रृंखला स्पष्ट करेगा?
किसके पास पुलिस कार्रवाई का दस्तावेजी रिकॉर्ड है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या संसद ने इन सवालों पर पर्याप्त समय दिया?
अगर जवाब “नहीं” है, तो लोकतंत्र हार गया।
सबसे शर्मनाक स्थिति क्या है?
सबसे शर्मनाक स्थिति यह नहीं कि सरकार और विपक्ष में मतभेद है।
लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है।
सबसे शर्मनाक स्थिति तब होती है जब:
सरकार कहे—विपक्ष चर्चा नहीं चाहता।
और
विपक्ष कहे—सरकार जवाब नहीं देना चाहती।
और दोनों के बीच संसद का समय बीत जाए।
यानी जनता देखती रहे।
टैक्सपेयर पैसा खर्च करता रहे।
सांसद हंगामा करते रहें।
मंत्री आरोप लगाते रहें।
विपक्ष आरोप लगाता रहे।
और अंत में—
सवाल वहीं का वहीं रह जाए।
यही हुआ तो फिर संसद किसलिए है?
संसद कोई राजनीतिक रंगमंच नहीं
संसद में भाषण देने का उद्देश्य वायरल वीडियो बनाना नहीं है।
संसद का काम है—
सवाल पूछना।
जवाब लेना।
कानून बनाना।
सरकार की जांच करना।
नीतियों की समीक्षा करना।
जनता की आवाज दर्ज करना।
लेकिन यदि संसद केवल सत्ता के विधेयक पारित करने और विपक्ष के विरोध प्रदर्शन का मंच बन जाए, तो लोकतांत्रिक संस्था धीरे-धीरे अपनी आत्मा खो देती है।
यही खतरा 2026 के मानसून सत्र ने सामने रखा है।
एक और असुविधाजनक सवाल—क्या सरकार को कठिन सवालों से डर लगता है?
यह आरोप लगाना कि प्रधानमंत्री या गृह मंत्री “डर गए”, तथ्य के बिना उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल पूछना पूरी तरह उचित है।
अगर डर नहीं है तो सामना क्यों नहीं?
अगर आरोप झूठे हैं तो खंडन क्यों नहीं?
अगर पुलिस कार्रवाई उचित थी तो पूरा रिकॉर्ड सामने क्यों नहीं?
अगर पैलेट गन का इस्तेमाल नियमों के अनुसार हुआ तो सरकार स्पष्ट रूप से क्यों नहीं बताती कि किस परिस्थिति में हुआ?
अगर आदेश गृह मंत्रालय से नहीं था तो आदेश की वास्तविक श्रृंखला संसद में क्यों नहीं बताई जाती?
और अगर विपक्ष गलत है—
तो सरकार उसे संसद में तथ्यात्मक रूप से ध्वस्त क्यों नहीं करती?
यही वह जगह है जहां लोकतंत्र की ताकत दिखती है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा।
पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका पहुंची और 30 जुलाई को अदालत ने घायल प्रदर्शनकारियों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित करने का निर्देश दिल्ली सरकार को दिया।
इसका मतलब यह नहीं कि अदालत ने पुलिस को दोषी ठहरा दिया।
ऐसा निष्कर्ष निकालना गलत होगा।
लेकिन यह जरूर बताता है कि मामला इतना गंभीर था कि न्यायपालिका के सामने भी आया।
ऐसी परिस्थिति में संसद में विस्तृत जवाबदेही और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
असली सवाल: आदेश किसने दिया?
संसद में किसी भी गंभीर जांच की शुरुआत एक सरल प्रश्न से हो सकती थी:
20 जुलाई को क्या हुआ?
फिर:
किस अधिकारी ने क्या आदेश दिया?
इसके बाद:
कौन-सा बल इस्तेमाल किया गया?
फिर:
क्या पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति थी?
फिर:
किसे चोट लगी?
और अंत में:
जिम्मेदारी किसकी है?
यह कोई असंभव सवाल नहीं है।
सरकार के पास प्रशासनिक रिकॉर्ड है।
पुलिस के पास रिकॉर्ड है।
CRPF के पास रिकॉर्ड है।
घटना की जांच हुई है।
मीडिया रिपोर्टें उपलब्ध हैं।
अदालत के सामने भी मामला आया है।
https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
तो फिर संसद में पूर्ण पारदर्शिता क्यों नहीं?
प्रधानमंत्री की चुप्पी का राजनीतिक अर्थ
राजनीति में कभी-कभी चुप्पी भी बयान होती है।
जब प्रधानमंत्री किसी विषय पर नहीं बोलते, तो राजनीतिक विरोधी उस चुप्पी की अपनी व्याख्या करते हैं।
यह जरूरी नहीं कि वह व्याख्या सही हो।
लेकिन सरकार को यह समझना चाहिए कि लोकतंत्र में perception भी राजनीतिक तथ्य बन जाता है।
यदि युवाओं के खिलाफ कार्रवाई का मुद्दा राष्ट्रीय बहस बन जाए और प्रधानमंत्री उस पर संसद में सीधे संवाद न करें, तो विपक्ष के लिए narrative तैयार हो जाता है।
और वह narrative है—
“सत्ता सवालों से दूर है।”
सरकार चाहे तो इसे गलत साबित कर सकती है।
एक ही रास्ता है—
संसद में आकर जवाब देना।
लोकतंत्र में “बहुमत” जवाबदेही का लाइसेंस नहीं
यह बात विशेष रूप से याद रखने की जरूरत है।
बहुमत सरकार बनाने के लिए होता है।
बहुमत सवालों से बचने के लिए नहीं होता।
बहुमत कानून पास करने के लिए होता है।
बहुमत आलोचना खत्म करने के लिए नहीं होता।
https://politicsinsightindia.com/new/gen-alpha-activism-up-school-children-protest-for-fans-water
बहुमत विपक्ष को खत्म करने का अधिकार नहीं देता।
और विपक्ष का विरोध भी सरकार को काम करने से रोकने का लाइसेंस नहीं देता
लोकतंत्र की खूबसूरती इसी संतुलन में है।
यह सिर्फ मोदी बनाम राहुल गांधी नहीं है
पूरे विवाद को यदि केवल नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी बना दिया जाए तो असली मुद्दा गायब हो जाएगा।
यह मामला किसी एक नेता की राजनीतिक जीत-हार से कहीं बड़ा है।
यह सवाल है—
भारत के युवाओं का।
परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का।
पुलिस की जवाबदेही का।
https://politicsinsightindia.com/new/upi-bill-2026-merchant-consumer-government-mdr-analysis
“UPI की कीमत कौन चुकाएगा—व्यापारी, उपभोक्ता या सरकार?”nt-mdr-analysis
संसद की गरिमा का।
सरकार की पारदर्शिता का।
विपक्ष की जिम्मेदारी का।
और अंततः—
लोकतंत्र में नागरिक की आवाज का।
सरकार के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष नहीं, जवाबदेही से दूरी है
सरकारें विपक्ष से लड़ सकती हैं।
मीडिया को जवाब दे सकती हैं।
सोशल मीडिया पर narrative बदल सकती हैं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सकती हैं।
लेकिन जनता के सवालों से हमेशा नहीं बच सकतीं।
क्योंकि सवाल आखिरकार लौटते हैं।
आज छात्र पूछ रहे हैं।
कल किसान पूछेंगे।
परसों बेरोजगार युवा पूछेंगे।
फिर टैक्स देने वाला नागरिक पूछेगा।
और लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला नागरिक सरकार का दुश्मन नहीं होता।
वह लोकतंत्र का मालिक होता है।
अब सरकार को क्या करना चाहिए?
यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता में विश्वास करती है तो उसे राजनीतिक बयानबाजी से आगे जाना चाहिए।
उसे 20 जुलाई की घटना पर:
-
पूरी तथ्यात्मक रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए;
-
बल प्रयोग की अनुमति और आदेश की श्रृंखला स्पष्ट करनी चाहिए;
-
पैलेट गन के इस्तेमाल से जुड़े रिकॉर्ड सामने रखने चाहिए;
-
घायल छात्रों के संबंध में आधिकारिक आंकड़े जारी करने चाहिए;
-
यदि कोई अधिकारी नियमों से बाहर गया तो जिम्मेदारी तय करनी चाहिए;
-
और संसद में विस्तृत बहस के लिए वास्तविक समय देना चाहिए।
विपक्ष को भी:
-
चर्चा में भाग लेना चाहिए;
-
आरोपों को दस्तावेजों के साथ रखना चाहिए;
-
नारेबाजी की जगह सवाल पूछने चाहिए;
-
और यदि सरकार जवाब देती है तो उसके जवाबों की तथ्यात्मक जांच करनी चाहिए।
यही लोकतंत्र है।
और आखिर में प्रधानमंत्री से एक सीधा सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मानसून सत्र की शुरुआत में स्वयं कहा था कि संसद में सार्थक चर्चा और सुचारु कार्यवाही होनी चाहिए। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी यह संदेश दर्ज है।
"अब अंध आज्ञाकारिता का समय नहीं रहा": Gen Z, RSS और भारत के लोकतंत्र की नई वैचारिक परीक्षा
तो फिर जनता पूछ सकती है:
जब संसद में सबसे कठिन सवाल खड़े हुए, तब उस सार्थक चर्चा को नेतृत्व कौन देगा?
क्या प्रधानमंत्री केवल सत्र के उद्घाटन पर संसद के बाहर संदेश देने के लिए हैं?
क्या गृह मंत्री केवल तब सामने आएंगे जब सत्र समाप्त होने में एक-दो दिन बाकी हों?
क्या छात्रों के सवालों का जवाब राजनीतिक प्रेस कॉन्फ्रेंस और आरोप-प्रत्यारोप से मिलेगा?
या संसद में तथ्य रखे जाएंगे?
निष्कर्ष: संसद की कुर्सियां खाली नहीं, जवाबदेही खाली दिख रही है
2026 का मानसून सत्र एक बहुत कड़वा आईना हमारे सामने रख गया है।
एक तरफ सरकार है, जो कहती है—
“हम चर्चा के लिए तैयार हैं।”
दूसरी तरफ विपक्ष है, जो कहता है—
“पहले जवाब दो।”
और बीच में जनता है, जो पूछ रही है—
“आखिर जवाब देगा कौन?”
संसद में बहुमत सरकार के पास है।
विपक्ष के पास सवाल हैं।
जनता के पास अधिकार है।
लेकिन अगर सरकार और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी राजनीतिक रणनीति में इतने उलझ जाएं कि मूल सवाल ही गायब हो जाए, तो यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना होगी।
सरकार के लिए यह समझना जरूरी है कि संसद से दूरी राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक रूप से हमेशा सुरक्षित नहीं।
प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से सवाल पूछना सरकार का अपमान नहीं है।
यह लोकतंत्र की प्रक्रिया है।
और सरकार का जवाब देना उसकी कमजोरी नहीं है।
यह उसकी ताकत का प्रमाण है।
इसलिए अब समय आ गया है कि सत्ता यह तय करे कि वह संसद को केवल कानून पारित करने की जगह मानती है या वास्तव में जनता के प्रति जवाबदेही का सर्वोच्च राजनीतिक मंच भी मानती है।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक दृश्य वह नहीं जब विपक्ष सरकार के खिलाफ नारे लगाता है।
सबसे खतरनाक दृश्य वह है जब—
सवाल मौजूद हों, सत्ता मौजूद हो, संसद मौजूद हो—लेकिन जवाब मौजूद न हो।
और 2026 के मानसून सत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि संसद के दरवाजे खुले रहे, कैमरे चलते रहे, बयान आते रहे, आरोप लगते रहे—लेकिन जिन सवालों के जवाब के लिए जनता संसद की ओर देख रही थी, वे सवाल फिर भी हवा में लटके रहे।
सरकार मजबूत होने का दावा करती है।
तो फिर मजबूत सरकार का सबसे आसान प्रमाण दीजिए—
सवालों से मत भागिए।
संसद में आइए।
रिकॉर्ड पर जवाब दीजिए।
और अगर आरोप झूठे हैं, तो उन्हें तथ्यों के साथ वहीं खत्म कीजिए।
क्योंकि लोकतंत्र में असली ताकत पुलिस की बैरिकेडिंग, बहुमत की संख्या या राजनीतिक प्रचार में नहीं होती।
असली ताकत उस दिन दिखाई देती है, जब सत्ता असहज सवालों के सामने भी सिर ऊंचा करके कहती है—पूछिए।
और जनता इंतजार कर रही है कि वह दिन कब आएगा।
Get every story on your phone
Join our channel and never miss an update.
What's Your Reaction?