जब पंखे और पानी के लिए भी बच्चों को सड़क पर उतरना पड़े, तो यह केवल स्कूल की नहीं, शासन की विफलता है

उत्तर प्रदेश में पंखे, स्वच्छ पेयजल और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर स्कूली बच्चों के आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था और सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पढ़िए 'Gen Alpha Activism' पर तथ्य, विश्लेषण और लोकतंत्र, शिक्षा तथा शासन पर इसका व्यापक प्रभाव।

जब पंखे और पानी के लिए भी बच्चों को सड़क पर उतरना पड़े, तो यह केवल स्कूल की नहीं, शासन की विफलता है

उत्तर प्रदेश के एक सरकारी विद्यालय से उठी आवाज़ ने पूरे देश से एक सवाल पूछा है—क्या भारत में अब बच्चों को भी अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए आंदोलन करना पड़ेगा?

लेखक- चौधरी सुधीर तालियान

कभी किसान अपनी फसल के दाम के लिए धरने पर बैठते हैं। कभी युवा नौकरी और परीक्षा में पारदर्शिता के लिए सड़कों पर उतरते हैं। कभी महिलाएँ सुरक्षा के लिए प्रदर्शन करती हैं। लेकिन अब यदि कक्षा 6 से 12 तक के बच्चे पंखे, पीने के पानी और साफ शौचालय की मांग लेकर स्कूल का गेट बंद कर दें, तो यह केवल एक स्थानीय घटना नहीं रहती। यह शासन व्यवस्था के स्वास्थ्य की रिपोर्ट बन जाती है।

फतेहपुर के सर्वोदय इंटर कॉलेज के छात्रों ने जो किया, वह किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का आंदोलन नहीं था। वे किसी वैचारिक बहस के लिए नहीं निकले थे। उनकी मांगें इतनी साधारण थीं कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में उन्हें मांग भी नहीं कहा जाना चाहिए। स्वच्छ पानी, चलने वाले पंखे, सुरक्षित बिजली, साफ शौचालय, बेंच और पुस्तकालय—ये अधिकार हैं, उपकार नहीं।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना

जब सरकारें हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन करती हैं, डिजिटल भारत की बात करती हैं और विश्वस्तरीय शिक्षा के दावे करती हैं, तब उसी देश के सरकारी विद्यालयों में बच्चे गर्मी से बेहाल बैठने को मजबूर हों, यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि नीति और क्रियान्वयन के बीच की गहरी खाई को दिखाता है।

किसी भी सरकार का पहला दायित्व नागरिकों को न्यूनतम सार्वजनिक सेवाएँ देना है। विद्यालयों में बुनियादी सुविधाएँ उसी दायित्व का हिस्सा हैं। यदि इन सुविधाओं के लिए बच्चों को घंटों धरना देना पड़े और उसके बाद ही प्रशासन लिखित आश्वासन दे, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—क्या व्यवस्था केवल विरोध की भाषा ही समझती है?

क्या शिकायतें सुनने की व्यवस्था खत्म हो चुकी है?

रिपोर्टों के अनुसार छात्रों का कहना था कि वे पहले भी कई बार अपनी समस्याएँ बता चुके थे, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। यदि यह सही है, तो सबसे गंभीर प्रश्न यही है कि शिकायत दर्ज करने और उसका समाधान करने वाली संस्थागत व्यवस्था कहाँ थी।

लोकतंत्र में आंदोलन अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं।

जब बच्चे सीधे प्रदर्शन का रास्ता चुनते हैं, तो यह संकेत है कि उन्हें नियमित संवाद से समाधान मिलने का भरोसा नहीं रहा।

यह सरकार विरोध नहीं, जवाबदेही की मांग है

किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन आलोचना और विरोध का उद्देश्य व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए।

इस घटना में छात्रों ने न तो हिंसा की, न सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया और न किसी पर हमला किया। उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी। यही लोकतांत्रिक संस्कृति है।

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यदि प्रशासन ने बाद में उनकी कई मांगें स्वीकार कर लीं, तो इससे यह भी स्पष्ट होता है कि समस्याएँ वास्तविक थीं और उनका समाधान संभव था। सवाल केवल इतना है कि समाधान पहले क्यों नहीं हुआ?

"विकसित भारत" की शुरुआत कक्षा से होती है

विकास की असली परीक्षा संसद भवन, एक्सप्रेसवे या बड़े निवेश सम्मेलन नहीं हैं।

विकास की पहली परीक्षा यह है कि—

  • क्या हर बच्चे को पीने का स्वच्छ पानी मिलता है?
  • क्या हर कक्षा में गर्मी से बचाने के लिए पंखा चलता है?
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  • क्या शौचालय उपयोग योग्य हैं?
  • क्या बच्चों को सम्मानजनक वातावरण में पढ़ने का अवसर मिलता है?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर "नहीं" है, तो विकास के बड़े दावों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

जनरेशन अल्फा का संदेश

आज के बच्चे इंटरनेट और सूचना के युग में बड़े हो रहे हैं। वे अपने अधिकारों को समझते हैं। वे देखते हैं कि संविधान क्या कहता है और सरकारें क्या वादा करती हैं। इसलिए वे पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक सवाल पूछते हैं।

इसे अनुशासनहीनता कहना आसान है, लेकिन शायद यह नागरिक चेतना का नया रूप है।

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एक लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब उसके नागरिक—चाहे वे छोटे ही क्यों न हों—शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का साहस रखते हों।

सरकार के लिए सबक

इस घटना को केवल "एक स्कूल का मामला" मानकर भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी।

यदि देशभर के सरकारी विद्यालयों में समय-समय पर स्वतंत्र आधारभूत सुविधा ऑडिट हो, शिकायतों का समयबद्ध निवारण हो और विद्यालय प्रबंधन समितियों को अधिक जवाबदेह बनाया जाए, तो ऐसी नौबत आने की संभावना कम हो सकती है।

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लोकतंत्र की सफलता इस बात में नहीं कि विरोध को कितनी जल्दी शांत किया गया, बल्कि इस बात में है कि विरोध की आवश्यकता ही क्यों पड़ी।

निष्कर्ष

जब छोटे-छोटे बच्चे पंखे, पानी और सम्मानजनक शिक्षा के लिए सड़क पर उतरते हैं, तो यह उनकी नहीं, व्यवस्था की परीक्षा होती है।

सरकारों का मूल्यांकन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उस कक्षा से होना चाहिए जहाँ एक बच्चा बैठकर पढ़ता है।

यदि उस कक्षा में हवा नहीं है, पानी नहीं है और सुनवाई नहीं है, तो सबसे पहले उसी व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता है—क्योंकि एक ऐसे देश का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता जहाँ बच्चों को किताबों से पहले विरोध प्रदर्शन सीखना पड़े।

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