CJI पर सवाल उठाए तो Convocation ही रद्द! NLSIU में आखिर किस बात का डर?
CJI की मौजूदगी के विरोध के बीच NLSIU का 2026 Convocation रद्द हुआ। जानिए छात्र विरोध, NALSAR विवाद और ‘कॉकरोच मानसिकता’ पर उठे बड़े सवाल।
By- Ch. Sudhir Taliyan
NLSIU का रद्द हुआ दीक्षांत समारोह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, लोकतांत्रिक चेतना की परीक्षा है
12 सितंबर 2026 को बेंगलुरु में एक ऐसा दृश्य होना था, जिसकी कल्पना हर कानून विद्यार्थी वर्षों तक करता है। काले गाउन में सजे युवा, हाथों में डिग्री, सामने बैठे माता-पिता और शिक्षकों की आंखों में गर्व—एक लंबी शैक्षणिक यात्रा का सार्वजनिक उत्सव।
लेकिन वह मंच अब नहीं सजेगा।
National Law School of India University यानी NLSIU ने 2026 का अपना वार्षिक दीक्षांत समारोह रद्द कर दिया है। विश्वविद्यालय ने आधिकारिक कारण बताया—“unavoidable circumstances।” विद्यार्थियों की डिग्रियां हालांकि सुरक्षित हैं और उन्हें बिना समारोह के प्रदान किया जाएगा।
कागज पर कहानी इतनी ही है।
लेकिन कागज के पीछे एक दूसरी कहानी है—असहमति की, संस्थागत शक्ति की, छात्रों की आवाज की और उस मानसिकता की, जो सवाल पूछने वाले को नागरिक नहीं बल्कि परेशानी समझने लगती है।
यहीं “कॉकरोच” वाला रूपक बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
कॉकरोच से हमारा सामान्य व्यवहार क्या होता है? वह दिखाई दिया नहीं कि उसे हटाने की कोशिश शुरू। उससे बातचीत नहीं होती। उसकी बात सुनने की जरूरत नहीं समझी जाती। वह सिर्फ एक “nuisance” है—ऐसी चीज जिसे व्यवस्था से बाहर कर देना चाहिए।
दुर्भाग्य से जब यही सोच इंसानों, खासकर सवाल पूछने वाले युवाओं पर लागू होने लगे, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ता है।
कहानी एक दूसरे विश्वविद्यालय से शुरू हुई
NLSIU विवाद को समझने के लिए कुछ सप्ताह पीछे जाना होगा।
हैदराबाद के NALSAR University of Law में छात्रों और Bar Council of India के बीच एक विवाद सामने आया। रिपोर्टों के अनुसार 2026 graduating batch से जुड़े कुछ विद्यार्थियों के advocate enrolment को लेकर BCI की ओर से कठोर कार्रवाई की गई। बाद में यह आदेश वापस लिया गया और BCI Chairman की ओर से माफी भी मांगी गई।
लेकिन तब तक एक बड़ा प्रश्न जन्म ले चुका था।
क्या किसी regulatory authority की आलोचना करने वाले विद्यार्थियों के professional भविष्य को प्रभावित किया जा सकता है?
यह सवाल सिर्फ NALSAR तक सीमित नहीं रहा।
कानून पढ़ने वाले युवाओं ने इसे अपने पेशे और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर देखा। NLSIU के छात्रों और alumni के एक बड़े समूह ने NALSAR के विद्यार्थियों के समर्थन में आवाज उठाई। रिपोर्टों के मुताबिक 700 से अधिक current students, graduating students और alumni ने संयुक्त statement पर हस्ताक्षर किए।
यह संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं थी।
यह बताती थी कि campus में बेचैनी वास्तविक थी।
विरोध का मतलब विद्रोह नहीं होता
यहां भारतीय सार्वजनिक जीवन की एक पुरानी बीमारी सामने आती है—असहमति को विद्रोह समझ लेना।
किसी निर्णय की आलोचना करना निर्णय लेने वाली संस्था का अपमान नहीं है।
किसी पदाधिकारी से सवाल पूछना उस पद की संवैधानिक गरिमा को खत्म नहीं करता।
किसी निमंत्रण पर आपत्ति जताना राज्य के खिलाफ युद्ध नहीं है।
लोकतंत्र में dissent का अर्थ व्यवस्था को नष्ट करना नहीं, बल्कि व्यवस्था को उसकी सीमाओं की याद दिलाना है।
कानून के छात्र अगर यही सवाल नहीं पूछेंगे तो कौन पूछेगा?
वे संविधान पढ़ते हैं। वे judicial review पढ़ते हैं। वे fundamental rights पढ़ते हैं। वे executive power की सीमाएं पढ़ते हैं। वे natural justice और due process पढ़ते हैं।
फिर वास्तविक जीवन में जब कोई संस्थागत निर्णय सामने आता है, तो उनसे केवल सिर झुकाकर स्वीकार करने की उम्मीद क्यों की जाए?
कानून की पढ़ाई और स्वतंत्र सोच
किसी law school की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसके कितने विद्यार्थी बड़ी law firms में पहुंचे।
असली सफलता यह है कि वहां से निकलने वाला युवा सत्ता के सामने खड़ा होकर पूछ सके—
“क्यों?”
“किस कानून के तहत?”
“क्या प्रक्रिया उचित थी?”
“क्या दूसरे पक्ष को सुना गया?”
“क्या शक्ति का इस्तेमाल proportionate था?”
यही प्रश्न न्याय व्यवस्था को जीवंत रखते हैं।
यदि कानून की कक्षा में dissent को constitutional value बताया जाए और campus में वही dissent असुविधा बन जाए, तो शिक्षा और व्यवहार के बीच खतरनाक दूरी पैदा होती है।
छात्रों को केवल कानून याद कराने से कानून का शासन मजबूत नहीं होगा।
उन्हें कानून पर सवाल करना भी सिखाना होगा।
CJI का मुद्दा व्यक्ति से बड़ा है
NLSIU के Chancellor और भारत के Chief Justice के रूप में CJI सूर्यकांत की भूमिका इस विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।
छात्रों की आपत्ति को केवल “CJI का विरोध” कहना सुविधाजनक है, लेकिन अधूरा है।
असल मुद्दा यह है कि विद्यार्थी अपने दीक्षांत समारोह में उपस्थित होने वाले प्रमुख व्यक्तियों को लेकर अपनी असहमति व्यक्त करने का अधिकार रखते हैं या नहीं।
यहां एक बुनियादी अंतर समझना चाहिए।
सम्मान और सहमति एक ही चीज नहीं हैं।
किसी संवैधानिक पद का सम्मान किया जा सकता है, जबकि उस पद से जुड़े किसी निर्णय की आलोचना भी की जा सकती है।
लोकतंत्र में व्यक्ति और संस्था की आलोचना के बीच भी अंतर होता है। कठोर प्रश्न पूछना व्यक्तिगत शत्रुता नहीं है।
अगर हर आलोचना को व्यक्तिगत अपमान समझ लिया जाए, तो सार्वजनिक जीवन में स्वस्थ बहस की गुंजाइश ही समाप्त हो जाएगी।
CJI से बातचीत—एक सकारात्मक संकेत
इस विवाद का एक उल्लेखनीय पहलू यह भी है कि छात्रों के प्रतिनिधियों और CJI के बीच बातचीत हुई।
रिपोर्टों के अनुसार कुछ graduating students ने CJI से मुलाकात की और काफी समय तक बातचीत हुई।
यह घटना बताती है कि संवाद संभव था।
यही लोकतांत्रिक रास्ता होना भी चाहिए।
एक तरफ विद्यार्थी अपनी बात रखें।
दूसरी तरफ संस्था अपना पक्ष समझाए।
फिर दोनों पक्ष एक-दूसरे को सुनें।
जरूरी नहीं कि बातचीत के बाद दोनों की राय समान हो जाए।
लोकतंत्र का उद्देश्य समान राय पैदा करना नहीं है।
उद्देश्य यह है कि अलग राय रखने वाले लोग बिना भय के एक-दूसरे के सामने अपनी बात रख सकें।
फिर convocation तक बात क्यों पहुंची?
रिपोर्टों के अनुसार छात्रों के बीच यह विकल्प रखा गया कि CJI की मौजूदगी में समारोह आयोजित किया जाए या फिर कार्यक्रम रद्द होने की स्थिति स्वीकार की जाए। विद्यार्थियों के बीच voting भी हुई।
बाद के घटनाक्रम में public invitation को लेकर मतभेद सामने आया।
यहीं तनाव फिर बढ़ गया।
एक वर्ग के लिए यह महज औपचारिकता थी।
दूसरों के लिए सार्वजनिक रूप से निमंत्रण देना अपनी पहले व्यक्त की गई आपत्ति से पीछे हटना था।
दोनों दृष्टिकोणों के बीच अंतर मामूली नहीं था।
यही वह जगह थी जहां संस्थागत संवाद को और गहरा होना चाहिए था।
लेकिन अंततः विश्वविद्यालय ने समारोह रद्द कर दिया।
और इस तरह जिस दिन छात्रों की उपलब्धि का उत्सव होना था, वह दिन एक व्यापक संस्थागत बहस का प्रतीक बन गया।
‘कॉकरोच’ मानसिकता की असली समस्या
अब उस मानसिकता पर लौटिए।
जब कोई शक्तिशाली व्यक्ति आलोचना करने वाले को “कॉकरोच” की तरह देखने लगता है, तो वह असल में उसे इंसान और नागरिक के रूप में नहीं देख रहा होता।
वह उसे एक obstacle मान रहा होता है।
ऐसी सोच का अगला कदम संवाद नहीं, removal होता है।
सवाल का जवाब नहीं, सवाल करने वाले पर कार्रवाई होती है।
असहमति का समाधान नहीं, असहमति को खत्म करने की कोशिश होती है।
यही authoritarian psychology का मूल खतरा है।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
लोकतंत्र को सबसे ज्यादा नुकसान हमेशा किसी बड़े भाषण से नहीं होता।
कई बार वह छोटे-छोटे व्यवहारों से कमजोर होता है—जब कोई अधिकारी आलोचना सुनना बंद कर देता है, जब संस्था सवाल पूछने वाले विद्यार्थी को परेशानी मान लेती है, जब पद की गरिमा को व्यक्ति की आलोचना से ऊपर रख दिया जाता है।
छात्रों की हर बात सही हो, यह भी जरूरी नहीं
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
विद्यार्थी गलत हो सकते हैं।
उनका आकलन अधूरा हो सकता है।
उनकी प्रतिक्रिया भावनात्मक हो सकती है।
https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
वे किसी घटना का दूसरा पक्ष नहीं जानते हों, यह भी संभव है।
लेकिन इन संभावनाओं से उनका बोलने का अधिकार खत्म नहीं हो जाता।
लोकतंत्र में freedom of expression का अर्थ यह नहीं कि हर कही गई बात सही होगी।
इसका अर्थ है कि गलत बात का जवाब बेहतर तर्क से दिया जाएगा।
यदि छात्र गलत हैं तो उन्हें तथ्य बताइए।
यदि उनका आरोप गलत है तो प्रमाण रखिए।
यदि उनका निष्कर्ष अनुचित है तो उसका खंडन कीजिए।
लेकिन सवाल पूछने की आदत को ही बीमारी मान लेना समाधान नहीं है।
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सबसे बड़ी विडंबना
इस पूरे प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि विवाद उन्हीं विद्यार्थियों के बीच हुआ जो कानून सीख रहे हैं।
उन्होंने संविधान के अधिकारों को किताबों में पढ़ा होगा।
उन्होंने judicial accountability पर चर्चाएं की होंगी।
उन्होंने institutional checks and balances पर बहस की होगी।
उन्होंने यह भी पढ़ा होगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई संस्था आलोचना से ऊपर नहीं होती।
और अब वही सिद्धांत उनके अपने जीवन में परीक्षा बनकर सामने आ गया।
शायद यही विश्वविद्यालय की वास्तविक शिक्षा है।
कक्षा में पढ़ाया गया संविधान तब तक अधूरा है जब तक विद्यार्थी उसे अपने आसपास के जीवन में पहचानना न सीखें।
समारोह चला गया, सवाल रह गया
NLSIU के विद्यार्थियों को अंततः उनकी डिग्रियां मिलेंगी।
उनकी मेहनत व्यर्थ नहीं जाएगी।
उनका career नहीं रुकेगा।
लेकिन 2026 का convocation उनके लिए हमेशा एक अलग अर्थ रखेगा।
उन्हें याद रहेगा कि जिस दिन उन्हें मंच पर होना था, उस समय campus में एक बहस चल रही थी—क्या संस्थागत शक्ति के सामने विद्यार्थी की असहमति की जगह है?
यह प्रश्न केवल NLSIU का नहीं है।
यह हर विश्वविद्यालय का प्रश्न है।
हर लोकतंत्र का प्रश्न है।
हर उस संस्था का प्रश्न है जो जनता की सेवा करने का दावा करती है।
और इसका उत्तर बेहद सरल होना चाहिए:
हां, असहमति की जगह है।
क्योंकि विश्वविद्यालय अगर प्रश्न पूछने की जगह नहीं रहेगा, तो वह केवल डिग्री बांटने वाली संस्था बन जाएगा।
और कानून का विश्वविद्यालय यदि सत्ता से सवाल करने का साहस नहीं देगा, तो उसकी सबसे चमकदार डिग्री भी अधूरी होगी।
आखिरी बात
एक मजबूत लोकतंत्र वह नहीं जिसमें लोग शक्तिशाली पदों के सामने खड़े होकर केवल तालियां बजाएं।
मजबूत लोकतंत्र वह है जिसमें कोई युवा खड़ा होकर कह सके—
“मैं असहमत हूं।”
और सामने बैठा शक्तिशाली व्यक्ति जवाब दे—
“ठीक है। बताइए क्यों।”
यही संवाद सभ्यता है।
https://politicsinsightindia.com/education-cess-ka-hisab-government-schools-badhaal
यही संवैधानिक संस्कृति है।
यही लोकतंत्र है।
छात्रों को कीड़े-मकौड़े की तरह देखने वाली मानसिकता चाहे किसी भी रूप में आए, उसका विरोध जरूरी है। क्योंकि जब सवाल पूछने वाला इंसान दिखाई देना बंद हो जाता है और केवल “समस्या” दिखाई देने लगती है, तभी लोकतांत्रिक पतन की शुरुआत होती है।
NLSIU का समारोह रद्द हो गया।
लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है।
क्या हम ऐसे कानूनविद तैयार करेंगे जो सत्ता को देखकर चुप हो जाएं—या ऐसे नागरिक जो संविधान हाथ में लेकर सत्ता से पूछ सकें: “आपके पास इसकी वजह क्या है?”
यही 2026 के इस विवाद की सबसे बड़ी सीख है।
लोकतंत्र को तालियों की जरूरत कम होती है; उसे असहमति की आवाज ज्यादा चाहिए।
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