“रोजगार मेला या बेरोजगारी पर पर्दा? युवाओं को नियुक्ति-पत्र नहीं, भविष्य चाहिए”
रोजगार मेले और स्थायी रोजगार के बीच अंतर समझिए। नियुक्ति-पत्रों के आंकड़ों से आगे भारत में बेरोजगारी, informal employment, educated youth unemployment और गुणवत्तापूर्ण रोजगार की वास्तविक चुनौती का विश्लेषण।
रोजगार मेला या रोजगार का भ्रम?
नियुक्ति-पत्रों के उत्सव से आगे बढ़कर सरकार को बताना होगा—युवाओं के लिए स्थायी भविष्य कहाँ है?
By- Chaudhary Sudhir Talyan
भारत में बेरोजगारी पर बहस अब एक अजीब मोड़ पर पहुंच गई है। सरकार के मंच पर नियुक्ति-पत्रों की संख्या दिखाई जाती है और देश से अपेक्षा की जाती है कि वह इसे रोजगार-सृजन की तस्वीर मान ले। कैमरों के सामने युवा नियुक्ति-पत्र ग्रहण करता है, तालियां बजती हैं, भाषण होते हैं और रोजगार की एक सफल कहानी सामने रख दी जाती है। लेकिन मंच से उतरने के बाद वही सवाल फिर खड़ा रहता है—भारत की अर्थव्यवस्था कितनी नई, टिकाऊ और सम्मानजनक नौकरियां पैदा कर रही है?
19 सितंबर 2026 को आयोजित 20वें रोजगार मेले में 45 स्थानों पर 51,000 से अधिक नियुक्ति-पत्र वितरित किए गए। सरकार के अनुसार अक्टूबर 2022 से अब तक रोजगार मेलों के माध्यम से लगभग 12.75 लाख नियुक्ति-पत्र दिए जा चुके हैं। यह उन युवाओं के लिए निश्चित रूप से महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिन्हें नियुक्ति मिली है। लेकिन नियुक्ति-पत्रों की संख्या को पूरे देश में पैदा हुए नए रोजगार के बराबर मान लेना आर्थिक तस्वीर को जरूरत से ज्यादा सरल बना देना होगा।
रोजगार मेला मूलतः भर्ती की व्यवस्था है। वह उपलब्ध पदों और उम्मीदवारों को जोड़ता है तथा नियुक्ति प्रक्रिया को गति देता है। वह अपने आप कारखाना नहीं लगाता, निवेश नहीं करता, बाजार में मांग नहीं पैदा करता और नई आर्थिक गतिविधि शुरू नहीं करता। इसलिए रोजगार मेले और रोजगार-सृजन को एक ही चीज समझना नीति की दृष्टि से गंभीर भूल होगी।
भारत की वास्तविक रोजगार समस्या कहीं ज्यादा गहरी है।
ILO और Institute for Human Development की India Employment Report 2024 ने भारतीय श्रम बाजार की जिस तस्वीर को सामने रखा, वह किसी सरकारी समारोह से अधिक महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के workforce का लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा informal sector में था और लगभग 90 प्रतिशत employment informal nature का था। रिपोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि 2019 के बाद रोजगार वृद्धि में self-employment और unpaid family work की भूमिका बढ़ी।
इसका अर्थ यह नहीं कि स्वरोजगार या पारिवारिक काम अपने आप में खराब रोजगार हैं। समस्या तब पैदा होती है जब रोजगार का बड़ा हिस्सा कम आय, अनिश्चित आय, कमजोर सामाजिक सुरक्षा और सीमित career progression से जुड़ा हो।
यही भारत के रोजगार संकट का असली चेहरा है।
हम अक्सर पूछते हैं—कितने लोग रोजगार में हैं?
अब सवाल बदलना होगा—वे किस तरह के रोजगार में हैं?
क्या उनकी आय नियमित है? क्या वे सामाजिक सुरक्षा से जुड़े हैं? क्या उनकी नौकरी अगले वर्ष भी रहेगी? क्या उनका कौशल विकसित हो रहा है? क्या उनकी आय समय के साथ बढ़ेगी? क्या उन्हें बीमारी, दुर्घटना या नौकरी छूटने की स्थिति में कोई सुरक्षा मिलेगी?
रोजगार का आंकड़ा इन सवालों का उत्तर नहीं देता।
और यहीं सरकारी रोजगार narrative की सबसे बड़ी सीमा सामने आती है।
नौकरी है, लेकिन भविष्य कहाँ है?
भारत के युवा की समस्या सिर्फ बेरोजगारी नहीं है। उसकी समस्या अनिश्चित रोजगार भी है।
Contract employment आधुनिक अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा है और हर contractual job को असुरक्षित या शोषणकारी कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। लेकिन जब अस्थायी रोजगार के साथ कम bargaining power, कमजोर social protection और नौकरी खोने का लगातार भय जुड़ जाता है, तब इसका असर केवल कर्मचारी की आय पर नहीं पड़ता। इसका असर उसकी आवाज पर भी पड़ सकता है।
जिस व्यक्ति की नौकरी हर कुछ महीनों के contract renewal पर टिकी हो, उसके लिए workplace injustice के खिलाफ आवाज उठाना जोखिमपूर्ण हो सकता है। आर्थिक निर्भरता व्यक्ति की bargaining power को प्रभावित करती है।
इसलिए रोजगार केवल वेतन का प्रश्न नहीं है।
यह गरिमा और अधिकार का प्रश्न भी है।
एक लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था में ऐसा श्रम बाजार चाहिए जहां व्यक्ति रोजगार खोने के भय के कारण अन्याय को सहने के लिए मजबूर न हो।
यही कारण है कि रोजगार की गुणवत्ता को केवल नियुक्ति-पत्र से नहीं मापा जा सकता।
डिग्री और नौकरी के बीच बढ़ती खाई
भारत की शिक्षा व्यवस्था ने करोड़ों युवाओं को स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक पहुंचाया है। लेकिन शिक्षा से रोजगार तक जाने वाला रास्ता अभी भी असमान और कमजोर है।
एक युवा डिग्री हासिल करता है। फिर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता है। लाखों आवेदन होते हैं। सीमित पद निकलते हैं। परीक्षा, परिणाम, भर्ती प्रक्रिया और नियुक्ति के बीच वर्षों का समय निकल जाता है।
यह केवल बेरोजगारी नहीं है।
यह human capital का under-utilisation है।
युवा की सबसे मूल्यवान संपत्ति उसकी उम्र और productive years हैं। यदि वह वर्षों तक केवल नौकरी की प्रतीक्षा में रहता है, तो अर्थव्यवस्था केवल एक बेरोजगार व्यक्ति नहीं खोती; वह उसकी क्षमता, कौशल और संभावित उत्पादकता का भी उपयोग नहीं कर पाती।
PLFS 2025 के अनुसार 15–29 वर्ष आयु वर्ग में बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत थी। शहरी युवा महिलाओं में यह दर 18.9 प्रतिशत थी, जबकि शहरी युवा पुरुषों में 11.8 प्रतिशत। यह अंतर बताता है कि रोजगार की समस्या केवल संख्या की नहीं, बल्कि अवसरों की संरचना की भी है।
युवा महिलाओं के लिए workplace safety, transport, childcare, wages और career progression जैसे प्रश्न रोजगार की उपलब्धता जितने ही महत्वपूर्ण हैं।
Job creation से Career creation की ओर
भारत को रोजगार की अपनी भाषा बदलनी होगी।
Job creation से Career creation की ओर।
नौकरी का अर्थ केवल आज का वेतन नहीं है। नौकरी का अर्थ होना चाहिए—प्रवेश, प्रशिक्षण, अनुभव, पदोन्नति, बढ़ती आय, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य की संभावना।
यदि कोई युवा पांच वर्ष तक काम करने के बाद भी लगभग उसी आय और उसी असुरक्षा में खड़ा है, तो रोजगार का आंकड़ा उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति नहीं बताता।
युवा को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें आज की entry-level job कल के career का आधार बने।
यही वह जगह है जहां सरकार की रोजगार नीति की असली परीक्षा होती है।
ग्रामीण भारत को रोजगार मेला नहीं, रोजगार की अर्थव्यवस्था चाहिए
ग्रामीण भारत में समस्या और जटिल है। यहां कृषि, कृषि मजदूरी, निर्माण, छोटे कारोबार, पारिवारिक काम और informal self-employment रोजगार की बड़ी संरचना बनाते हैं।
कम उत्पादकता से कम आय पैदा होती है। कम आय से मौसमी रोजगार बढ़ता है। मौसमी रोजगार से migration बढ़ता है।
एक चक्र बनता है:
कम उत्पादकता → कम आय → मौसमी रोजगार → आर्थिक असुरक्षा → migration
इस चक्र को रोजगार मेले से नहीं तोड़ा जा सकता।
इसके लिए गांवों में स्थानीय आर्थिक गतिविधि पैदा करनी होगी।
कृषि उत्पादन के साथ food processing, cold storage, warehousing, packaging, logistics, rural manufacturing और MSME clusters विकसित करने होंगे। किसान केवल कच्चा माल पैदा करे और मूल्यवर्धन शहरों में हो—ऐसी व्यवस्था ग्रामीण रोजगार को व्यापक आधार नहीं दे सकती।
ग्रामीण रोजगार की असली नीति local production और value addition से शुरू होगी।
जिला रोजगार नीति क्यों नहीं?
भारत के सभी जिलों की अर्थव्यवस्था एक जैसी नहीं है। किसी जिले की ताकत कृषि है, किसी की textile, किसी की food processing, किसी की tourism और किसी की manufacturing।
फिर रोजगार नीति का मूल्यांकन केवल राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों से क्यों हो?
हर जिले के लिए एक District Employment Plan होना चाहिए।
सरकार को सार्वजनिक करना चाहिए:
- जिले की working-age population कितनी है?
- कितने युवा हैं?
- किन skills की उपलब्धता है?
- किन उद्योगों की मांग है?
- कितने formal jobs हैं?
- औसत वेतन कितना है?
- कितने युवा बाहर migration कर रहे हैं?
- अगले पांच वर्षों में कितने नए jobs पैदा किए जाएंगे?
तभी रोजगार नीति वास्तव में परिणाम-आधारित बनेगी।
रोजगार मेले की सफलता appointment letters से नहीं मापी जानी चाहिए
सरकार को रोजगार मेलों की सफलता के लिए एक व्यापक outcome framework बनाना चाहिए।
सिर्फ यह नहीं बताया जाना चाहिए कि कितने नियुक्ति-पत्र बांटे गए।
बताया जाना चाहिए:
कितने उम्मीदवारों ने वास्तव में joining की?
छह महीने बाद कितने नौकरी में रहे?
एक साल बाद कितने टिके?
उनकी median income कितनी थी?
कितने social security से जुड़े?
कितनों को अपने कौशल के अनुरूप काम मिला?
कितनों की आय और पद में वास्तविक वृद्धि हुई?
यही आंकड़े बताएंगे कि रोजगार मेला recruitment event था या sustainable employment का प्रवेश-द्वार।
सरकार की असली परीक्षा
सरकार के लिए यह कहना आसान है कि कितने रोजगार मेले हुए।
कठिन सवाल है—अर्थव्यवस्था ने कितने नए productive jobs पैदा किए?
और उससे भी कठिन सवाल है—उनमें से कितने jobs टिके?
और सबसे कठिन सवाल है—उन jobs से युवाओं की वास्तविक आय कितनी बढ़ी?
यही अंतर रोजगार प्रचार और रोजगार नीति के बीच है।
सरकार को रोजगार की बहस को appointment letters की संख्या से निकालकर net job creation, wages, retention, formalisation और career mobility के आंकड़ों तक ले जाना होगा।
क्योंकि देश को केवल रोजगार की headlines नहीं चाहिए।
उसे रोजगार का economic architecture चाहिए।
युवा को मंच पर ताली नहीं, भविष्य चाहिए
किसी बेरोजगार युवा के हाथ में नियुक्ति-पत्र पहुंचना उसके लिए महत्वपूर्ण है। उसे कम करके आंकना अनुचित होगा। लेकिन एक नियुक्ति-पत्र करोड़ों युवाओं के लिए रोजगार नीति का विकल्प नहीं हो सकता।
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युवा को ऐसी नौकरी चाहिए जिससे वह अपना घर चला सके।
बच्चों की शिक्षा का खर्च उठा सके।
माता-पिता की जिम्मेदारी निभा सके।
बीमारी और दुर्घटना की स्थिति में पूरी तरह असहाय न हो।
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अन्याय होने पर आवाज उठा सके।
और दस वर्ष बाद पीछे मुड़कर देख सके कि उसकी आर्थिक स्थिति वास्तव में बेहतर हुई है।
यही गुणवत्तापूर्ण रोजगार है।
इसलिए अब देश को रोजगार मेले की संख्या नहीं, रोजगार की गुणवत्ता पूछनी चाहिए।
सरकार को बताना चाहिए—
कितने नए productive jobs पैदा हुए?
कितने टिके?
उनकी आय कितनी बढ़ी?
कितने formal हुए?
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कितने युवाओं को अगले पांच-दस वर्षों का career मिला?
यही असली रोजगार रिपोर्ट होगी।
रोजगार मेला किसी युवा को नौकरी तक पहुंचा सकता है। लेकिन गुणवत्तापूर्ण और स्थायी रोजगार के लिए अर्थव्यवस्था को स्वयं नौकरी पैदा करनी होगी।
सरकार जितनी जल्दी इस अंतर को स्वीकार करेगी, रोजगार पर राष्ट्रीय बहस उतनी ही अधिक ईमानदार होगी।
क्योंकि भारत के युवा को केवल एक दिन का नियुक्ति-पत्र नहीं चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/manrega-ka-paisa-kahan-atka-majdoor-payment-ki-jameeni-haqiqat
उसे ऐसा रोजगार चाहिए जिसके सहारे वह अपना जीवन, अपना परिवार और अपना भविष्य सुरक्षित तरीके से बना सके।
और इस सवाल का उत्तर किसी मंच, पोस्टर या रोजगार मेले की तस्वीर में नहीं मिलेगा।
उसका उत्तर अर्थव्यवस्था की जमीन पर पैदा होने वाली उन नौकरियों में मिलेगा जो टिकेंगी, आय बढ़ाएंगी और एक युवा को नौकरी से आगे—एक सुरक्षित career तक ले जाएंगी।
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