“कल सरप्लस, आज संकट! चीनी के दाम में लगी आग—किसान पिसा, उपभोक्ता लुटा और सरकार क्यों करती रही इंतजार?”
भारत में चीनी के दामों में तेज उछाल ने सरकार की कृषि और खाद्य नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरप्लस के अनुमान से आयात तक पहुँची कहानी में किसान और उपभोक्ता दोनों क्यों पिस रहे हैं? पढ़िए चीनी संकट की पूरी पड़ताल।
चीनी का कड़वा सच: किसान और उपभोक्ता दोनों क्यों भुगत रहे हैं?
By- Ch. Sudhir Taliyan
संभावित सरप्लस से महंगाई तक पहुँची भारत की चीनी अर्थव्यवस्था में आखिर गड़बड़ कहाँ हुई?
भारत में त्योहारों का मौसम दस्तक दे रहा है। बाजारों में मिठाइयों की तैयारी शुरू हो चुकी है, घरों में त्योहारों की खरीदारी होने लगी है और इसी समय रसोई की एक मामूली-सी दिखने वाली चीज—चीनी—अचानक आर्थिक और नीतिगत बहस का विषय बन गई है।
20 जुलाई 2026 को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत लगभग ₹48.18 प्रति किलो थी। 20 अगस्त तक यह बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गई—एक महीने में करीब 16 प्रतिशत की छलांग। सरकार के अनुसार इस उछाल के पीछे उत्पादन में कमी, मौसम से फसल को नुकसान, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, वैश्विक बाजार की तंगी तथा कुछ हिस्सों में जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसे कारण हैं।
लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है।
भारत जैसा दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादक और उपभोक्ता देशों में शामिल देश आखिर ऐसी स्थिति में कैसे पहुँचा कि कुछ समय पहले जिस बाजार में संभावित अधिशेष की चर्चा थी, उसी बाजार में सरकार को लगभग एक दशक बाद कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देनी पड़ी?
20 अगस्त को सरकार ने घरेलू कीमतों पर नियंत्रण और त्योहारी मौसम में उपलब्धता बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी। यह कदम लगभग एक दशक बाद इस तरह के बड़े आयात की वापसी है।
यह सिर्फ चीनी की कहानी नहीं है।
यह भारत की कृषि नीति की उस बीमारी का आईना है जिसमें किसान से लेकर उपभोक्ता तक पूरी व्यवस्था को कभी कीमतों के नाम पर, कभी उत्पादन के अनुमान के नाम पर और कभी बाजार की कथित मजबूरियों के नाम पर झुलाया जाता है।
1. कुछ महीने पहले तस्वीर बिल्कुल दूसरी थी
चीनी सीजन की शुरुआत में उत्पादन को लेकर उम्मीदें काफी ऊँची थीं। सरकार द्वारा राज्यों से मिले शुरुआती अनुमानों के आधार पर उत्पादन लगभग 343 लाख टन रहने की संभावना जताई गई थी।
बाद में यही अनुमान घटकर लगभग 306 लाख टन रह गया।
यानी शुरुआती अनुमान और बाद के अनुमान के बीच लगभग 37 लाख टन का अंतर पैदा हो गया। सरकार के अनुसार इसका कारण गन्ने में Red Rot और Top Borer जैसी बीमारियाँ तथा अत्यधिक बारिश से हुआ waterlogging था।
यह अंतर सिर्फ कागज पर लिखे दो आंकड़ों का अंतर नहीं है।
37 लाख टन चीनी किसी मामूली गलती का नाम नहीं है।
जब किसी देश की चीनी अर्थव्यवस्था के बारे में इतनी बड़ी मात्रा में अनुमान बदलता है, तो उसके असर किसान, मिल, व्यापारी और उपभोक्ता—सभी पर पड़ते हैं।
यहीं से सबसे कठोर सवाल पैदा होता है:
जब उत्पादन के अनुमान लगातार कमजोर हो रहे थे, तब बाजार और नीति को समय रहते उसी हिसाब से क्यों नहीं ढाला गया?
कृषि में मौसम का अनुमान गलत हो सकता है। फसल की पैदावार अनुमान से कम हो सकती है। यह कोई अपराध नहीं है।
लेकिन गलत अनुमान से पैदा हुई स्थिति को समय पर पहचानना और नीति बदलना सरकार की जिम्मेदारी है।
2. चीनी की कमी है या कमी का डर पैदा किया गया?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा।
Indian Sugar & Bio-energy Manufacturers Association (ISMA) ने कहा है कि देश में वास्तविक चीनी की कमी नहीं है। उसके अनुसार हाल की कीमत वृद्धि मुख्यतः bulk consumers द्वारा stockpiling और speculative trading से जुड़ी है।
सरकार ने भी कहा है कि देश में नए crushing season के शुरू होने तक घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त stock उपलब्ध है। साथ ही सरकार ने कुछ हिस्सों में जमाखोरी और speculation को मौजूदा price rise का कारण माना है।
तो फिर सवाल है—अगर चीनी पर्याप्त है तो कीमत इतनी तेज क्यों बढ़ी?
यही बाजार की विडंबना है।
किसी वस्तु की वास्तविक कमी से पहले उसकी संभावित कमी की अफवाह और आशंका कीमत बढ़ा सकती है।
अगर व्यापारी को लगता है कि अगले महीने चीनी महंगी होगी, तो वह आज ज्यादा खरीदता है।
अगर bulk consumer को लगता है कि त्योहारों में supply कम पड़ेगी, तो वह अतिरिक्त inventory बनाता है।
अगर मिल को लगता है कि कीमत और ऊपर जा सकती है, तो वह बिक्री रोकने की कोशिश कर सकती है।
इस तरह बाजार में वास्तविक खपत से अधिक मांग का दबाव दिखाई देने लगता है।
और फिर वही डर वास्तविक महंगाई में बदल जाता है।
3. लेकिन सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती
हर चीज का दोष व्यापारी पर डाल देना आसान है।
“जमाखोरों ने कीमत बढ़ाई।”
“सट्टेबाजों ने कीमत बढ़ाई।”
“मौसम खराब था।”
“वैश्विक बाजार महंगा था।”
इनमें से प्रत्येक कारण कुछ हद तक सही हो सकता है।
लेकिन इन सबके बीच एक सवाल खड़ा रहता है:
बाजार की निगरानी कौन करेगा?
सरकार ने 28 जुलाई से sugar dealers के लिए stockholding limits लागू कीं। 1 अगस्त से 30 नवंबर तक dealer के लिए 400 टन की सीमा तय की गई। सितंबर से 10 टन से अधिक मासिक खपत वाले bulk consumers को 15 दिनों से ज्यादा की inventory रखने की अनुमति नहीं होगी।
सरकार ने mills में physical stock verification की भी व्यवस्था की है।
यह कार्रवाई आवश्यक है।
लेकिन यह सवाल भी उतना ही आवश्यक है:
अगर stock monitoring मजबूत थी तो बाजार में इतनी तेज speculative build-up की नौबत क्यों आई?
किसी भी आवश्यक खाद्य वस्तु की कीमत बढ़ने के बाद डंडा चलाना पर्याप्त नहीं है।
सरकार को पहले से पता होना चाहिए कि देश में कितना उत्पादन है, कितना stock है, कितना export हुआ, कितना ethanol में गया, कितना industrial consumption है और अगले तीन महीनों की वास्तविक मांग कितनी है।
4. सबसे बड़ा विरोधाभास: किसान गन्ना उगाता है, फिर भी चीनी महंगी होने का पूरा लाभ उसे नहीं मिलता
यह कहानी किसानों के बिना अधूरी है।
भारत का गन्ना किसान महीनों तक खेत में मेहनत करता है। बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, डीजल, बिजली, कीटनाशक और जमीन की लागत लगातार बढ़ती है।
लेकिन उपभोक्ता के लिए चीनी ₹55-60 किलो होने का अर्थ यह नहीं है कि किसान की आमदनी उसी अनुपात में बढ़ गई।
यही कृषि बाजार की सबसे कड़वी सच्चाई है।
Retail price और farmer income एक ही चीज नहीं हैं।
सरकार स्वयं मानती है कि sugar sector में cane price, sugar mill economics और sugar MSP के बीच संबंध है। 2025-26 के लिए केंद्र ने गन्ने का FRP ₹355 प्रति क्विंटल तय किया है, जबकि उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में SAP इससे अधिक हो सकता है।
लेकिन किसान का वास्तविक सवाल केवल FRP या SAP नहीं है।
उसका सवाल है:
भुगतान समय पर होगा या नहीं?
यदि चीनी मिलें महंगे गन्ने की खरीद करती हैं और चीनी का भाव सरकार नियंत्रित करती है, तो मिल की liquidity प्रभावित हो सकती है।
और अगर मिल की liquidity बिगड़ी, तो सबसे पहले किसान का भुगतान अटकता है।
इसलिए किसान कल्याण और उपभोक्ता कल्याण को एक-दूसरे का विरोधी बनाना खतरनाक है।
5. किसान को सस्ता गन्ना और उपभोक्ता को सस्ती चीनी—यह मॉडल कब तक?
भारत की कृषि नीति में एक पुरानी समस्या है।
जब किसान की फसल का भाव बढ़ता है तो कहा जाता है:
“महंगाई बढ़ जाएगी।”
जब उपभोक्ता के लिए खाद्य वस्तु महंगी होती है तो सरकार कीमत दबाने लगती है।
लेकिन किसान की लागत बढ़ने पर कौन उसकी कीमत दबाता है?
किसान की डीजल लागत बढ़ी।
खाद की कीमत बढ़ी।
मजदूरी बढ़ी।
सिंचाई महंगी हुई।
जमीन की लागत बढ़ी।
कृषि मशीनरी महंगी हुई।
लेकिन बाजार में किसान से उम्मीद की जाती है कि वह सस्ता उत्पादन करे।
यह व्यवस्था उपभोक्ता को भी लंबे समय में नहीं बचाती।
क्योंकि यदि किसान को उसकी लागत और जोखिम के अनुरूप लाभ नहीं मिलेगा तो अगली फसल में उत्पादन घटेगा।
और फिर वही देश जो आज सस्ती चीनी चाहता है, कल महंगी चीनी के लिए आयात पर निर्भर हो सकता है।
किसान को दबाकर उपभोक्ता को स्थायी राहत नहीं दी जा सकती।
6. क्या ethanol जिम्मेदार है?
यह बहस भी बेहद सावधानी से समझनी होगी।
सरकार का कहना है कि हाल की चीनी महंगाई को ethanol diversion के लिए जिम्मेदार ठहराना गलत है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार ethanol के लिए sugar diversion का हिस्सा 2022-23 में लगभग 12 प्रतिशत था, जो 2025-26 में लगभग 9 प्रतिशत रह गया। सरकार यह भी कहती है कि अब देश में ethanol का लगभग तीन-चौथाई उत्पादन grains, खासकर maize, से होता है।
इसलिए यह कहना कि “सारी महंगाई ethanol की वजह से है”, आंकड़ों के आधार पर उचित नहीं होगा।
लेकिन दूसरी तरफ ethanol policy को पूरी तरह बहस से बाहर करना भी गलत होगा।
क्योंकि गन्ने का संसाधन सीमित है।
एक ही गन्ने से sugar भी बन सकती है और ethanol भी।
इसलिए जब domestic sugar stocks कम हों, तब सरकार को ethanol diversion की नीति पर स्वतः पुनर्विचार करने की व्यवस्था रखनी चाहिए।
और जब sugar surplus हो, तब ethanol diversion बढ़ाकर mills और किसानों को बेहतर बाजार दिया जा सकता है।
यानी समाधान ethanol का विरोध नहीं है।
समाधान है:
एक dynamic sugar-ethanol balance policy।
7. असली संकट stock का है
Reuters के अनुसार 2025-26 season के लिए भारत का net sugar production लगभग 27.9 million tonnes रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू खपत लगभग 28 से 28.5 million tonnes है। साथ ही करीब 3 million tonnes sugar ethanol के लिए divert हुई और लगभग 800,000 tonnes export हुई। अगले season में opening stock करीब 3.5 million tonnes रहने की उम्मीद है, जबकि पिछले वर्ष यह लगभग 5 million tonnes था।
यानी भारत के पास buffer कम हुआ है।
यही असली खतरा है।
जब buffer बड़ा होता है तो बाजार झटका सह लेता है।
जब buffer छोटा होता है तो छोटी-सी supply uncertainty भी कीमत को हिला देती है।
इसलिए सरकार को केवल “देश में चीनी है” कहने से आगे जाना होगा।
सवाल यह होना चाहिए:
देश में कितनी चीनी है, कितने दिन की खपत के लिए है और किस कीमत पर उपलब्ध है?
8. दस लाख टन आयात: राहत या नीति की विफलता का प्रमाण?
सरकार ने 10 लाख टन raw sugar के duty-free import की अनुमति दी है। आयात की अनुमति 31 अक्टूबर तक है।
यह कदम उपभोक्ता के हित में समझा जा सकता है।
यदि घरेलू बाजार में supply बढ़ती है और speculative expectations टूटती हैं, तो कीमत नीचे आ सकती है।
लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि आयात कोई जादू की छड़ी नहीं है।
Brazil से आने वाली raw sugar को यहां refine करना होगा।
और import का समय भी महत्वपूर्ण है।
25 अगस्त की Reuters रिपोर्ट के अनुसार घरेलू ex-mill prices में peak से करीब 20 प्रतिशत गिरावट आने के बाद mills और refiners को पूरे 10 लाख टन quota का import आर्थिक रूप से आकर्षक नहीं लग रहा। अनुमान है कि शायद केवल करीब 5 लाख टन ही वास्तव में import हो।
यानी सरकार ने आयात की अनुमति दे दी, लेकिन बाजार ने तुरंत दूसरा सवाल पूछ दिया:
क्या आयात करना अब लाभदायक भी है?
यही commodity policy की जटिलता है।
9. अगर आयात से किसान को नुकसान होता है तो?
यह सवाल भी जायज है।
यदि सरकार अत्यधिक मात्रा में सस्ती imported sugar बाजार में डाल देती है, तो domestic sugar prices दब सकते हैं।
और यदि sugar prices बहुत नीचे चले गए तो mills की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
फिर किसान के गन्ने के भुगतान पर दबाव आ सकता है।
इसलिए उपभोक्ता को राहत देने के नाम पर ऐसा आयात नहीं होना चाहिए जो घरेलू किसान और sugar mills की आर्थिक स्थिरता को तोड़ दे।
Consumer protection का अर्थ farmer destruction नहीं हो सकता।
और farmer protection का अर्थ consumer exploitation भी नहीं हो सकता।
सरकार को दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा।
10. सरकार को किसान और उपभोक्ता के बीच चुनाव नहीं करना चाहिए
यह सबसे महत्वपूर्ण नीति-संदेश है।
एक तरफ करोड़ों किसान हैं जो गन्ने पर निर्भर हैं।
दूसरी तरफ करोड़ों उपभोक्ता हैं जिनके घरों में चीनी रोजमर्रा की खाद्य वस्तु है।
दोनों को लड़ाने की राजनीति आसान है।
लेकिन आर्थिक रूप से मूर्खतापूर्ण है।
किसान चाहता है:
- लागत से ऊपर लाभकारी मूल्य,
- समय पर भुगतान,
- गन्ने का पारदर्शी तौल,
- रिकवरी की निष्पक्ष गणना,
- मिलों की जवाबदेही,
- बिजली और सिंचाई की उचित लागत,
- फसल बीमा और मौसम जोखिम से सुरक्षा।
उपभोक्ता चाहता है:
- उचित कीमत,
- लगातार उपलब्धता,
- जमाखोरी से सुरक्षा,
- मिलावट से सुरक्षा,
- त्योहारों के दौरान अचानक price shock से राहत।
सरकार का काम इन दोनों मांगों को लड़ाना नहीं, एक ऐसी supply chain बनाना है जिसमें दोनों सुरक्षित रहें।
11. चीनी नीति को चुनावी औजार नहीं, दीर्घकालीन कृषि नीति बनाना होगा
चीनी का बाजार अत्यधिक regulated है।
सरकार sugar production, movement, sale, import-export और minimum selling price जैसे क्षेत्रों में हस्तक्षेप करती है। Department of Food & Public Distribution के अनुसार sugar और sugarcane दोनों regulatory framework के अंतर्गत आते हैं।
जब सरकार इतना बड़ा regulatory role निभाती है तो फिर यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि “बाजार को अपना काम करने दें।”
यह पूरी तरह मुक्त बाजार नहीं है।
यह managed market है।
और managed market में सरकार को भी managed responsibility स्वीकार करनी होगी।
अगर सरकार export रोक सकती है, import duty बदल सकती है, stock limit लगा सकती है, sugar quota तय कर सकती है और mill-level monitoring कर सकती है, तो उसे real-time sugar balance sheet भी सार्वजनिक करनी चाहिए।
12. हर महीने देश को बताइए—चीनी की असली स्थिति क्या है
यह सबसे सरल सुधार हो सकता है।
हर महीने एक सार्वजनिक Sugar Balance Sheet जारी हो:
Opening Stock
Current Production
Imports
−
Domestic Consumption
−
Ethanol Diversion
−
Exports
=
Closing Stock
और इसके साथ अगले तीन महीनों का अनुमान।
अगर closing stock किसी निर्धारित सुरक्षा सीमा से नीचे जाए तो automatic policy trigger सक्रिय हो:
- export quota घटे,
- ethanol diversion की समीक्षा हो,
- strategic imports पर विचार हो,
- stock monitoring बढ़े।
और यदि surplus हो:
- exports बढ़ाए जा सकें,
- ethanol diversion बढ़ाया जा सके,
- mills को बेहतर liquidity मिले।
इससे policy अचानक reaction देने के बजाय पूर्व-निर्धारित नियमों पर चलेगी।
13. किसानों को सिर्फ “गन्ना उत्पादक” समझना बंद करना होगा
गन्ना किसान केवल raw material supplier नहीं है।
वह sugar economy की पहली कड़ी है।
मिलें उसकी फसल के बिना नहीं चल सकतीं।
Ethanol industry उसके गन्ने से जुड़ी है।
Sugar exports उसके उत्पादन से संभव होते हैं।
और consumer market की पूरी मिठास उसी खेत से निकलती है।
फिर किसान को इस value chain में सबसे कमजोर पक्ष क्यों बनाया जाए?
किसान को यह सुनिश्चित होना चाहिए कि:
उत्पादन जोखिम का उचित हिस्सा बाजार और नीति भी उठाए, केवल किसान नहीं।
अगर मौसम से फसल खराब हुई है तो किसान अकेला दोषी नहीं।
अगर उत्पादन अनुमान गलत हुआ तो किसान दोषी नहीं।
अगर बाजार में speculative stocking हुआ तो किसान दोषी नहीं।
अगर सरकार ने export या import policy देर से बदली तो किसान दोषी नहीं।
फिर हर संकट का आर्थिक बोझ अंततः किसान की गर्दन पर क्यों आए?
14. उपभोक्ता भी सिर्फ “महंगाई का आंकड़ा” नहीं है
दूसरी तरफ सरकार को यह भी समझना होगा कि ₹5-10 की वृद्धि गरीब परिवार के लिए मामूली नहीं होती।
चीनी अकेली वस्तु नहीं है।
चीनी की कीमत बढ़ती है तो:
- चाय,
- मिठाई,
- बेकरी,
- confectionery,
- होटल,
- रेस्तरां,
- धार्मिक प्रसाद,
- छोटे खाद्य व्यवसाय
सब प्रभावित होते हैं।
त्योहारों के समय इसका असर और बढ़ जाता है।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
इसलिए consumer protection का अर्थ सिर्फ retail sugar price देखना नहीं है।
पूरी food economy पर असर देखना होगा।
15. सबसे कठोर सवाल: क्या सरकार हमेशा संकट आने के बाद जागेगी?
पहले उत्पादन का अनुमान ऊंचा।
फिर उत्पादन घटा।
फिर कीमत बढ़ी।
फिर stock limits।
फिर bulk consumers पर प्रतिबंध।
फिर physical verification।
https://politicsinsightindia.com/garib-bachchon-ke-school-badhaal-viksit-bharat-par-sawal
फिर duty-free imports।
फिर crushing season जल्दी शुरू करने की अपील।
यह पूरी श्रृंखला किसी दूरदर्शी नीति की नहीं, बल्कि fire-fighting policy की तस्वीर पेश करती है।
हर बार आग लगने के बाद पानी लेकर दौड़ना प्रशासनिक सफलता नहीं है।
सफलता यह है कि आग लगने की संभावना पहले से पहचानी जाए।
कृषि बाजार में यही फर्क reactive governance और anticipatory governance के बीच है।
निष्कर्ष: चीनी की मिठास के पीछे किसानों और उपभोक्ताओं के लिए कड़वा सच
भारत की चीनी कहानी हमें एक बेहद कठोर आर्थिक सच बताती है।
किसान और उपभोक्ता एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं।
दोनों एक ऐसी व्यवस्था के हिस्से हैं जिसमें नीति की गलतियां अंततः दोनों की जेब से वसूली जाती हैं।
किसान को उसकी मेहनत का पर्याप्त और समय पर भुगतान नहीं मिला तो अगली फसल का उत्पादन खतरे में पड़ेगा।
उपभोक्ता को उचित कीमत पर चीनी नहीं मिली तो महंगाई बढ़ेगी।
मिलों को आर्थिक स्थिरता नहीं मिली तो किसान भुगतान संकट में आएगा।
बाजार में पर्याप्त stock नहीं रहा तो सट्टेबाजी बढ़ेगी।
सरकार ने समय पर data नहीं पढ़ा तो import-export policy उलटती रहेगी।
और यदि हर बार नीति संकट के बाद बदली जाएगी तो कीमत की मार आखिरकार आम आदमी और किसान—दोनों पर पड़ेगी।
इसलिए भारत को चीनी की कीमत नियंत्रित करने से कहीं ज्यादा बड़ा काम करना होगा।
उसे चीनी की पूरी अर्थव्यवस्था को स्थिर करना होगा।
उत्पादन का विश्वसनीय अनुमान चाहिए।
मजबूत strategic buffer चाहिए।
किसान को लाभकारी और समयबद्ध भुगतान चाहिए।
मिलों की पारदर्शी accounting चाहिए।
जमाखोरी पर कठोर कार्रवाई चाहिए।
लेकिन genuine inventory को criminalize करने से बचना होगा।
Ethanol और food sugar के बीच वैज्ञानिक balance चाहिए।
आयात-निर्यात नीति में predictability चाहिए।
और सबसे बढ़कर—सरकार को वास्तविक समय में देश को यह बताना होगा कि हमारे पास कितनी चीनी है और कितने दिनों की खपत के लिए है।
क्योंकि जब सरकार कहती है कि चीनी पर्याप्त है और बाजार कहता है कि चीनी महंगी होती जा रही है, तब केवल बयान से भरोसा पैदा नहीं होता।
भरोसा आंकड़ों की पारदर्शिता से पैदा होता है।
और जब किसी देश को कुछ महीनों के भीतर संभावित surplus से लेकर duty-free imports तक पहुंचना पड़े, तो सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि चीनी महंगी क्यों हुई।
सवाल इससे कहीं अधिक असुविधाजनक है:
क्या हमारी कृषि और खाद्य नीति भविष्य को देखकर चल रही है, या हर बार बाजार में तूफान आने के बाद सरकार हाथ में बाल्टी लेकर दौड़ रही है?
भारत के किसान को दया नहीं चाहिए—न्यायपूर्ण कीमत और समय पर भुगतान चाहिए।
भारत के उपभोक्ता को भाषण नहीं चाहिए—उचित कीमत और निरंतर आपूर्ति चाहिए।
और भारत को ऐसी चीनी नीति चाहिए जिसमें किसान की मेहनत सस्ती न हो, उपभोक्ता की थाली महंगी न हो और सरकार की नीति हर संकट के बाद उलटी दिशा में न भागे।
वरना चीनी की कीमत चाहे ₹50 हो या ₹60—इस व्यवस्था का असली स्वाद आम आदमी और किसान दोनों के लिए कड़वा ही रहेगा।
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