सेलकू मेला: हिमालय की आस्था, परंपरा और प्रकृति का पर्व
सेलकू मेला उत्तराखंड की गंगा घाटी की समृद्ध लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का अनूठा पर्व है। सोमेश्वर देवता की आराधना, ब्रह्मकमल, पारंपरिक फसल, लोकगीत, रांसो-तांदी नृत्य और सदियों पुरानी मान्यताएं इस पर्व को विशेष सांस्कृतिक पहचान प्रदान करती हैं।
डॉ बृजेश सती
उत्तराखंड की लोक संस्कृति, धार्मिक आस्था और पौराणिक परंपराओं का अनूठा संगम है, सेलकू मेला। गंगा घाटी के सीमांत गांवों में भाद्र मास की पूर्णिमा से पहले आयोजित होने वाला यह मेला ग्रामीण जीवन की परंपराओं और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाता है। सदियों से चली आ रही मान्यताओं और लोक रीति-रिवाजों के कारण सेलकू मेला आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है।
इस धार्मिक आयोजन से अलग अलग मान्यताएं जुडी हैं। एक पौराणिक मान्यता है कि सोमेश्वर देवता, गंगा घाटी के जिस स्थान से विजय करते बढ़ते गए। वहां वहां सेलकू मनाया जाता है। इसके अलावा प्रकृति के प्रति आभार जताने का भी पर्व है। जब गंगा घाटी के गांवों में पारंपरिक फसलें तैयार हो जाती है और कटाई की तैयारी होती है। तब नई फसल काटने से पहले देवता से अनुमति ली जाती है। इस आयोजन की विशेषता उच्च हिमालय क्षेत्र का पुष्प ब्रह्म कमल और वनस्पतियाँ। इन्हें उच्च हिमालय क्षेत्र से लाते हैं। सेलकु, ध्याणियों (विवाहिताओं) कि उपस्थित को भी खास बना देता है।
प्रकृति का आभार जताने का पर्व
इस मेले में ग्रामीण अपने आराध्य सोमेश्वर देवता की पूजा अर्चना कर अच्छी फसल की कामना करते हैं। इसके बाद धान, मंडुआ आदि पारंपरिक फसलों की कटाई करते हैं। इसके अलावा पशुपालकों की जंगलों से सकुशल वापसी पर अपने आराध्य का आभार जताते हैं।
इसके आयोजन के बाद इस घाटी के लोग अपनी फसल को काटना शुरू कर देते हैं।
सीमांकन के बाद लौटे ग्रामीण
वैसे तो सेलकू विशुद्ध रूप से धार्मिक आयोजन है। लेकिन स्थानीय जानकार इससे जुड़े कुछ अन्य तथ्य बताते हैं। भगवताचार्य आचार्य हरीश राज नौटियाल बताते हैं कि मुखवा गांव के लोग भारत तिब्बत सीमा के सीमांकन को गए। लेकिन ग्रामीणों की कुशलता की कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिली। तब इसलिए सेक और संक्रांति को ग्रामीणों ने खोज के लिए तिब्बत सीमा की ओर प्रस्थान किया। इस बीच भगवान सोमेश्वर की कृपा से परिसीमन कर ग्रामीण सकुशल वापस लौट आए। भगवान सोमेश्वर का आभार व्यक्त करने के लिए यह आयोजन किया जाता है।
भाद्र पद मास के अंतिम दिन(सेक) गोरसाली गांव से शुरू होकर अलग अलग गांवों के बाद मुखबा गांव में संपन्न होता है।
दो दिनों का धार्मिक आयोजन
यह दो दिन का आयोजन है। पहले दिन ग्रामीण द्वि सिंधु (दो नदियों का संगम) नामक उच्च हिमालय क्षेत्र से देव पुष्प ब्रह्मकमल के साथ हिस्सर, गूगुल, मासी, जटा, जयाण आदि वनस्पतियों को लाते हैं। इसके बाद समेश्वर देवता मंदिर की थात (चौकी) को सजाया जाता है। विशेष पूजा के साथ मेला शुरू होता है। ग्रामीण रात भर लोकगीतों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर रांसो, तांदी नृत्य करते हैं। पारंपरिक परिधानों और लोक नृत्यों की प्रस्तुति में संस्कृति की झलक दिखती है।
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दूसरे दिन मंदिर परिसर में देवता का आसन लगता है। सोमेश्वर देवता का पाश्वा (अवतारी पुरुष) धारदार डांगरियों (छोटी कुल्हाड़ियों) पर चल ग्रामीणों को आशीर्वाद देते हैं।
मेले का नाम सेलकू क्यों पड़ा
इस मेले का नाम सेलकू क्यों पड़ा। इसके पीछे ग्रामीण दो कारण बताते हैं। पहला मेला पूरी रात चलने से गांव में कोई सोता नहीं है। इसलिए मेले का नाम सेलकु (सोएगा कौन, यानी जागते रहो) पड़ा। देवदार के पेड़ से एक तरल पदार्थ निकलता है इसे स्थानीय भाषा में सेल कहते हैं। चूंकि देवदार के छिल्लों (लकड़ी के छोटे छोटे टुकडे) को जलाया जाता है। इसलिए इसे सेलकू कहा जाता है।
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