काक्रोच जनता पार्टी: एक व्यंग्य, जो व्यवस्था की सबसे बड़ी सच्चाई बन गया, लोकतंत्र बनाम अहंकार

काक्रोच जनता पार्टी भले ही एक व्यंग्यात्मक आंदोलन हो, लेकिन उसके सवाल वास्तविक हैं। शिक्षा के बाजारीकरण, अवसरों की असमानता, बेरोजगारी, परीक्षा व्यवस्था की विफलताओं और मंत्रियों की नैतिक जवाबदेही पर यह लेख सरकार से कठिन लेकिन आवश्यक प्रश्न पूछता है।

काक्रोच जनता पार्टी: एक व्यंग्य, जो व्यवस्था की सबसे बड़ी सच्चाई बन गया, लोकतंत्र बनाम अहंकार

Writer- Sudhir Taliyan

Chaudhary- Talan Khap

काक्रोच जनता पार्टी का सवाल: क्या इस देश में जवाबदेही मांगना भी अपराध है?

जंतर-मंतर पर बैठे कुछ युवा शायद कोई बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं हैं। उनके पास न करोड़ों रुपये का फंड है, न किसी स्थापित दल का संरक्षण, न चुनावी गणित और न ही सत्ता तक पहुंचने का कोई स्पष्ट रोडमैप। संभव है कि काक्रोच जनता पार्टी (CJP) केवल एक व्यंग्यात्मक आंदोलन हो। संभव है कि यह कभी चुनावी दल न बने। संभव है कि कुछ महीनों बाद इसका नाम भी लोगों को याद न रहे।

लेकिन लोकतंत्र में किसी आंदोलन का महत्व इस बात से तय नहीं होता कि उसके पास कितनी सीटें हैं। महत्व इस बात का होता है कि वह कौन-सा सवाल उठा रहा है।

और काक्रोच जनता पार्टी ने जो सवाल उठाया है, वह भारत के करोड़ों युवाओं, विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन का सवाल है—क्या इस देश में शिक्षा, रोजगार और शासन व्यवस्था को लेकर जवाबदेही नाम की कोई चीज बची है?

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आज जंतर-मंतर पर बैठे युवाओं को खारिज करना आसान है। उन्हें ट्रोल कहना आसान है। उन्हें विपक्ष का एजेंट बताना आसान है। लेकिन उनके सवालों का जवाब देना शायद उतना आसान नहीं है।

शिक्षा: अधिकार से व्यवसाय तक का सफर

भारतीय संविधान अवसर की समानता का वादा करता है। यह वादा केवल कागज पर लिखी हुई पंक्ति नहीं है। यह उस बच्चे की उम्मीद है जो गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ता है। यह उस किसान की आशा है जो अपनी बेटी को कॉलेज भेजना चाहता है। यह उस मजदूर की आकांक्षा है जो चाहता है कि उसका बेटा उसकी तरह दिहाड़ी मजदूर न बने।

लेकिन क्या आज की शिक्षा व्यवस्था वास्तव में अवसर की समानता प्रदान कर रही है?

कड़वी सच्चाई यह है कि शिक्षा धीरे-धीरे सार्वजनिक अधिकार से निजी उत्पाद में बदलती जा रही है।

एक तरफ निजी स्कूलों और विश्वविद्यालयों की फीस लगातार बढ़ रही है। दूसरी तरफ गरीब परिवारों की आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। परिणाम यह है कि शिक्षा एक ऐसी सीढ़ी बनती जा रही है जिस पर चढ़ने का अवसर केवल उन्हीं को मिल रहा है जिनकी जेबें भरी हुई हैं।

यदि किसी छात्र को इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंधन या उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ें तो अवसर की समानता का दावा खोखला हो जाता है।

देश का गरीब छात्र पहले ही संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। उसके पास महंगे कोचिंग संस्थानों तक पहुंच नहीं है। उसके पास डिजिटल संसाधनों की कमी है। उसके पास अंग्रेजी माध्यम की सुविधा नहीं है। अब यदि शिक्षा स्वयं एक महंगा उत्पाद बन जाए तो वह प्रतिस्पर्धा कैसे करेगा?

सरकारी संस्थानों का कमजोर होना

भारत की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत कभी सरकारी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय हुआ करते थे।

इन संस्थानों ने ऐसे लाखों छात्रों को अवसर दिया जो निजी शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते थे।

लेकिन वर्षों से सरकारी शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को लेकर गंभीर प्रश्न उठते रहे हैं। अनेक राज्यों में स्कूलों के विलय, बंद होने या संसाधनों की कमी की खबरें सामने आती रही हैं। कई विश्वविद्यालय वित्तीय दबाव की शिकायत करते रहे हैं। फीस वृद्धि को लेकर छात्रों के आंदोलन भी होते रहे हैं।

सरकारें अक्सर आंकड़ों के जरिए अपनी उपलब्धियां गिनाती हैं, लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या गरीब और ग्रामीण छात्र के लिए उच्च शिक्षा पहले की तुलना में अधिक सुलभ हुई है?

यदि जवाब “नहीं” है तो समस्या गंभीर है।

परीक्षा व्यवस्था का संकट

पिछले कुछ वर्षों में देश ने परीक्षा प्रणाली को लेकर अभूतपूर्व अविश्वास देखा है।

पेपर लीक के आरोप, भर्ती परीक्षाओं में देरी, परिणामों को लेकर विवाद, तकनीकी गड़बड़ियां और प्रशासनिक त्रुटियां—इन सबने युवाओं का विश्वास कमजोर किया है।

एक छात्र कई वर्षों तक तैयारी करता है। परिवार अपनी बचत खर्च करता है। माता-पिता सपने देखते हैं। फिर परीक्षा रद्द हो जाती है, पेपर लीक की खबर आती है या प्रक्रिया विवादों में घिर जाती है।

इसका नुकसान केवल समय का नहीं होता।

यह युवाओं के मनोबल का नुकसान है।

यह विश्वास का नुकसान है।

यह उस सामाजिक अनुबंध का नुकसान है जिसमें नागरिक सरकार पर भरोसा करता है कि मेहनत का परिणाम मिलेगा।

मंत्री की नैतिक जिम्मेदारी क्यों नहीं?

लोकतंत्र केवल कानूनी जवाबदेही पर नहीं चलता। लोकतंत्र नैतिक जवाबदेही पर भी चलता है।

भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब मंत्रियों ने किसी बड़ी प्रशासनिक विफलता के बाद इस्तीफा दिया। हर इस्तीफा अपराध स्वीकार करना नहीं होता। कई बार इस्तीफा यह संदेश होता है कि मंत्री अपने विभाग में हुई विफलता की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर रहा है।

यही लोकतांत्रिक परंपरा है।

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यही राजनीतिक शुचिता है।

यदि किसी मंत्रालय के अंतर्गत बार-बार गंभीर विवाद उत्पन्न होते हैं, यदि परीक्षा प्रणाली को लेकर व्यापक असंतोष है, यदि लाखों छात्र सड़कों पर हैं, तो यह पूछना अनुचित नहीं कि मंत्री की जिम्मेदारी क्या है।

लोकतंत्र में पद सम्मान नहीं, उत्तरदायित्व होता है।

बेरोजगारी का असली दर्द

शिक्षा और रोजगार को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।

युवा इसलिए पढ़ता है क्योंकि उसे उम्मीद होती है कि शिक्षा उसे सम्मानजनक जीवन देगी।

लेकिन जब डिग्री मिलने के बाद भी रोजगार नहीं मिलता, जब भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक लंबित रहती हैं, जब अस्थायी नौकरियां स्थायी रोजगार का स्थान ले लेती हैं, तब युवाओं में निराशा बढ़ना स्वाभाविक है।

आज भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। यह हमारी सबसे बड़ी ताकत हो सकती है।

लेकिन यदि यही युवा वर्ग निराश, बेरोजगार और असुरक्षित महसूस करे तो यह सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकता है।

सरकार का काम केवल आर्थिक विकास दर बताना नहीं है।

सरकार का काम यह सुनिश्चित करना भी है कि युवा को भविष्य दिखाई दे।

यदि करोड़ों युवाओं को भविष्य धुंधला दिख रहा है तो सरकार को आत्ममंथन करना चाहिए, न कि आलोचना करने वालों पर हमला।

सवाल पूछना देशद्रोह नहीं

लोकतंत्र में सबसे खतरनाक प्रवृत्ति तब जन्म लेती है जब सरकार आलोचना को शत्रुता समझने लगती है।

सरकार और राष्ट्र एक ही चीज नहीं हैं।

सरकार की आलोचना राष्ट्र की आलोचना नहीं होती।

किसी मंत्री से इस्तीफा मांगना संविधान विरोधी कार्य नहीं है।

बेहतर शिक्षा व्यवस्था की मांग करना राष्ट्रविरोध नहीं है।

रोजगार मांगना राष्ट्रविरोध नहीं है।

जवाबदेही मांगना राष्ट्रविरोध नहीं है।

दरअसल लोकतंत्र की आत्मा ही जवाबदेही है।

यदि नागरिक सवाल नहीं पूछेंगे तो लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित होकर रह जाएगा।

काक्रोच क्यों?

काक्रोच जनता पार्टी का नाम ही अपने आप में एक व्यंग्य है।

काक्रोच वह जीव है जिसे अक्सर लोग तुच्छ समझते हैं। उसे कुचलने की कोशिश करते हैं। उसे महत्व नहीं देते।

शायद आंदोलन का संदेश भी यही है।

इस देश के करोड़ों छात्र, बेरोजगार युवा और सामान्य नागरिक खुद को व्यवस्था की नजर में उसी काक्रोच की तरह महसूस करते हैं—मौजूद तो हैं, लेकिन महत्वपूर्ण नहीं।

उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं।

उनकी समस्याओं का समाधान करने वाला कोई नहीं।

उनकी मेहनत का सम्मान करने वाला कोई नहीं।

लोकतंत्र की असली परीक्षा

सरकारें आंदोलनों को समाप्त कर सकती हैं।

पुलिस बल तैनात किया जा सकता है।

बैरिकेड लगाए जा सकते हैं।

मामले दर्ज किए जा सकते हैं।

लेकिन सवालों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

यदि शिक्षा महंगी होती जाएगी, यदि अवसर असमान होते जाएंगे, यदि रोजगार की चिंता बढ़ती जाएगी और यदि जवाबदेही कम होती जाएगी, तो नए-नए आंदोलन पैदा होते रहेंगे।

आज नाम काक्रोच जनता पार्टी है।

कल कुछ और होगा।

लेकिन असली मुद्दा वही रहेगा।

निष्कर्ष

काक्रोच जनता पार्टी भविष्य की बड़ी राजनीतिक शक्ति बनेगी या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है।

महत्वपूर्ण यह है कि उसने उस बेचैनी को आवाज दी है जिसे देश का एक बड़ा युवा वर्ग महसूस कर रहा है।

एक जिम्मेदार सरकार को इस आवाज से डरना नहीं चाहिए।

उसे सुनना चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक प्रश्न पूछते हैं और सरकार जवाब देती है।

यदि सरकार जवाब देने के बजाय प्रश्न पूछने वालों को ही समस्या मानने लगे, तो समस्या आंदोलन में नहीं, शासन में होती है।

और यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर आज का भारत तलाश रहा है।

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