क्या जिम्मेदार शासन होता तो 15 दिन तक नहीं चलता CJP प्रदर्शन? छात्र अस्पताल में, सोनम वांगचुक का अनशन जारी
CJP प्रदर्शन के 15वें दिन छात्र के अस्पताल पहुंचने, सोनम वांगचुक के अनशन, परीक्षा प्रणाली, प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और सुशासन पर आधारित विस्तृत विश्लेषण पढ़ें।
Writer- Sudhir Taliyan Chaudhary Talan Khap
सुशासन पर उठे बड़े सवाल
लोकतंत्र में जवाबदेही, पारदर्शिता और समय पर कार्रवाई क्यों है सबसे महत्वपूर्ण?
लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है। इसकी वास्तविक शक्ति उन संस्थाओं में निहित होती है जो जनता के प्रति जवाबदेह हों, समय पर निर्णय लें और नागरिकों की शिकायतों का निष्पक्ष समाधान करें। जब किसी मुद्दे पर लंबे समय तक असंतोष बना रहता है, छात्र सड़कों पर उतरते हैं, शांतिपूर्ण प्रदर्शन होते हैं और कुछ लोग भूख हड़ताल जैसे कठिन रास्ते अपनाते हैं, तब यह केवल एक आंदोलन नहीं रह जाता बल्कि शासन, प्रशासन और सार्वजनिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर व्यापक विमर्श का विषय बन जाता है।
हाल के दिनों में CJP से जुड़े विरोध प्रदर्शन ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। आंदोलन के 15वें दिन एक छात्र की तबीयत बिगड़ने और उसे अस्पताल में भर्ती कराए जाने की खबर सामने आई। इसी दौरान सामाजिक कार्यकर्ता Sonam Wangchuk का भूख हड़ताल भी सातवें दिन में प्रवेश कर गया। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने कहा है कि परीक्षा संबंधी कथित अनियमितताओं और छात्रों की चिंताओं को संसद के आगामी मानसून सत्र में उठाया जाएगा।
इन घटनाओं ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया है कि यदि प्रशासनिक व्यवस्था समय पर प्रभावी ढंग से काम करे, शिकायतों का समाधान पारदर्शी तरीके से हो और नागरिकों के साथ नियमित संवाद बना रहे, तो क्या ऐसी परिस्थितियों से बचा जा सकता है?
यह लेख किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन या विरोध नहीं करता। इसका उद्देश्य लोकतांत्रिक व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और सार्वजनिक संस्थानों में विश्वास जैसे व्यापक विषयों का विश्लेषण करना है।
CJP प्रदर्शन क्यों बना राष्ट्रीय चर्चा का विषय?
देश में प्रतियोगी परीक्षाएं केवल रोजगार का माध्यम नहीं हैं; वे लाखों युवाओं के सपनों, वर्षों की मेहनत और परिवारों की उम्मीदों से जुड़ी होती हैं। ऐसे में जब परीक्षा प्रक्रिया को लेकर सवाल उठते हैं, तो उसका प्रभाव केवल परिणामों तक सीमित नहीं रहता। इससे छात्रों का मनोबल, संस्थाओं पर भरोसा और भविष्य की योजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
CJP से जुड़े प्रदर्शन के दौरान छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कथित परीक्षा अनियमितताओं, पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। आंदोलन के दौरान एक छात्र की तबीयत बिगड़ने और अस्पताल में भर्ती होने की घटना ने इस पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया। दूसरी ओर, सोनम वांगचुक का अनशन इस बात का प्रतीक बन गया कि कुछ लोग अपनी मांगों को शांतिपूर्ण और अहिंसक माध्यमों से सामने रखना चाहते हैं।
लोकतांत्रिक समाज में शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों की अभिव्यक्ति का एक मान्य माध्यम है। लेकिन किसी भी लोकतंत्र की सफलता इस बात में निहित होती है कि ऐसी स्थितियों का समाधान संवाद, पारदर्शिता और संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से समय रहते हो सके।
परीक्षा प्रणाली में विश्वास क्यों सबसे बड़ी पूंजी है?
भारत हर वर्ष लाखों प्रतियोगी परीक्षाओं का आयोजन करता है। इन परीक्षाओं में भाग लेने वाले छात्र अक्सर कई वर्षों तक तैयारी करते हैं। अनेक परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करके बच्चों की शिक्षा और कोचिंग का प्रबंध करते हैं। ऐसे में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता केवल प्रशासनिक प्रश्न नहीं रह जाती, बल्कि यह सामाजिक न्याय और समान अवसर के सिद्धांत से भी जुड़ जाती है।
यदि परीक्षा प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगते हैं, तो उसका असर केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता। इससे भविष्य की परीक्षाओं पर भी संदेह उत्पन्न हो सकता है और छात्रों का संस्थाओं पर विश्वास कमजोर पड़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञ लगातार इस बात पर बल देते हैं कि परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से सुरक्षित, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाया जाए।
जवाबदेही केवल कानूनी नहीं, संस्थागत भी होती है
लोकतांत्रिक शासन में जवाबदेही कई स्तरों पर होती है। कानूनी जवाबदेही का अर्थ है कि यदि किसी नियम या कानून का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जांच हो और आवश्यक कार्रवाई की जाए। वहीं संस्थागत जवाबदेही का अर्थ है कि सार्वजनिक संस्थाएं अपने निर्णयों, प्रक्रियाओं और कार्यप्रणाली के बारे में नागरिकों के प्रति उत्तरदायी रहें।
जब किसी परीक्षा, भर्ती या सार्वजनिक प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्न उठते हैं, तब सामान्यतः नागरिक यह अपेक्षा करते हैं कि संबंधित संस्थाएं तथ्यों की पारदर्शी जानकारी दें, शिकायतों की समयबद्ध जांच करें, यदि कहीं प्रक्रिया में कमी पाई जाए तो उसे सुधारें और भविष्य के लिए मजबूत व्यवस्था विकसित करें। यही सुशासन की मूल भावना मानी जाती है।
इसी संदर्भ में प्रशासनिक विशेषज्ञ अक्सर कहते हैं कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति केवल कानून नहीं, बल्कि नागरिकों का विश्वास होता है। यह विश्वास पारदर्शिता, समय पर संवाद और निष्पक्ष कार्रवाई से ही मजबूत होता है।
क्या हर विरोध सरकार की विफलता का संकेत होता है?
यह प्रश्न अक्सर सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनता है। किसी भी लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन होना असामान्य नहीं है। विभिन्न समूह अपनी मांगों और चिंताओं को शांतिपूर्ण तरीके से सामने रखते हैं। दूसरी ओर, सरकार और संबंधित संस्थाओं का दायित्व होता है कि वे इन मांगों पर कानून और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर विचार करें।
हर विरोध अपने आप में किसी निष्कर्ष का प्रमाण नहीं होता। लेकिन यदि कोई मुद्दा लंबे समय तक बना रहता है, बड़ी संख्या में लोग उससे प्रभावित होने का दावा करते हैं और व्यापक सार्वजनिक चर्चा शुरू हो जाती है, तो यह आवश्यक हो जाता है कि संबंधित संस्थाएं अधिक पारदर्शिता, स्पष्ट संवाद और समयबद्ध कार्रवाई के माध्यम से नागरिकों का विश्वास बनाए रखें। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इसी संतुलन में निहित है।
नैतिक जवाबदेही: लोकतांत्रिक शासन की एक महत्वपूर्ण कसौटी
लोकतंत्र में किसी भी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति या संस्था की जवाबदेही केवल कानूनों के पालन तक सीमित नहीं होती। नागरिक यह भी अपेक्षा करते हैं कि सार्वजनिक संस्थाएं पारदर्शी रहें, निर्णयों के पीछे के कारण स्पष्ट करें और यदि किसी प्रक्रिया में गंभीर प्रश्न उठते हैं तो उनका निष्पक्ष समाधान करें। यही कारण है कि किसी भी बड़े प्रशासनिक विवाद के बाद "नैतिक जवाबदेही" शब्द सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बन जाता है।
नैतिक जवाबदेही का अर्थ किसी व्यक्ति को स्वतः दोषी मान लेना नहीं है। इसका आशय यह है कि सार्वजनिक संस्थाएं नागरिकों के विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, तथ्यों को सामने रखें, स्वतंत्र जांच का सम्मान करें और आवश्यक होने पर सुधारात्मक कदम उठाएं। विभिन्न राजनीतिक दल, विशेषज्ञ और नागरिक संगठन इस विषय पर अलग-अलग मत रख सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम उद्देश्य संस्थाओं की विश्वसनीयता बनाए रखना होता है।
सरकार और सार्वजनिक संस्थानों की जिम्मेदारी
जब किसी संवेदनशील मुद्दे पर व्यापक विरोध होता है, तब सरकार और संबंधित संस्थानों से सामान्यतः कई प्रकार की अपेक्षाएं की जाती हैं।
सबसे पहले, प्रभावित लोगों की शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए। दूसरे, यदि किसी प्रक्रिया पर प्रश्न उठे हैं तो तथ्यों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। तीसरे, जांच पूरी होने तक समय-समय पर आधिकारिक जानकारी साझा की जाए ताकि अफवाहों और भ्रम की स्थिति न बने। चौथे, यदि कहीं प्रक्रियागत कमियां सामने आती हैं तो उन्हें स्वीकार करते हुए सुधार लागू किए जाएं।
प्रभावी शासन का अर्थ केवल संकट का समाधान करना नहीं, बल्कि भविष्य में उसी प्रकार की परिस्थितियों की पुनरावृत्ति रोकना भी होता है। इसलिए संस्थागत सुधार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा माने जाते हैं।
परीक्षा विवादों का सबसे बड़ा प्रभाव युवाओं पर
भारत विश्व के सबसे युवा देशों में से एक है। हर वर्ष करोड़ों छात्र विभिन्न प्रवेश और भर्ती परीक्षाओं में भाग लेते हैं। इन परीक्षाओं के परिणाम केवल रोजगार या प्रवेश का माध्यम नहीं होते, बल्कि अनेक परिवारों की वर्षों की मेहनत और आर्थिक निवेश से जुड़े होते हैं।
एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में कई छात्र प्रतिदिन दस से बारह घंटे तक अध्ययन करते हैं। अनेक परिवार कोचिंग, रहने और अध्ययन सामग्री पर अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा प्रक्रिया पर प्रश्न उठते हैं, तो उसका प्रभाव केवल परिणामों तक सीमित नहीं रहता बल्कि छात्रों के आत्मविश्वास और भविष्य की योजनाओं पर भी पड़ सकता है।
शिक्षा विशेषज्ञ लगातार इस बात पर बल देते हैं कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, समयबद्धता और तकनीकी सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि युवाओं के भविष्य की सुरक्षा का भी विषय है।
मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ती चिंता
प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव पहले से ही छात्रों के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। यदि इसके साथ अनिश्चितता, प्रक्रिया संबंधी विवाद या लंबी देरी जुड़ जाए, तो तनाव और बढ़ सकता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में छात्रों को परिवार, शिक्षकों और संस्थानों से उचित मार्गदर्शन तथा भावनात्मक सहयोग मिलना आवश्यक है।
इसी कारण शिक्षा नीति और परीक्षा प्रबंधन पर चर्चा करते समय मानसिक स्वास्थ्य को भी महत्वपूर्ण पहलू माना जाने लगा है। कई विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं को छात्रों के लिए प्रभावी सहायता तंत्र, स्पष्ट सूचना प्रणाली और शिकायत निवारण की सुलभ व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।
क्या केवल तकनीक से समस्या हल हो जाएगी?
पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा प्रणाली में डिजिटल तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। बायोमेट्रिक सत्यापन, एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र, सुरक्षित डेटा प्रबंधन और निगरानी तंत्र जैसी व्यवस्थाएं अपनाई जा रही हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक अपने आप में पर्याप्त समाधान नहीं है।
यदि प्रशासनिक प्रक्रियाएं मजबूत न हों, जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण न हो और स्वतंत्र निगरानी तंत्र प्रभावी न हो, तो केवल तकनीकी बदलाव अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकते। इसलिए परीक्षा सुधारों को तकनीकी, प्रशासनिक और संस्थागत—तीनों स्तरों पर देखने की आवश्यकता है।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव क्या बताते हैं?
दुनिया के अनेक देशों ने परीक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था विकसित की है। कई स्थानों पर स्वतंत्र परीक्षा नियामक संस्थाएं, डिजिटल ऑडिट, प्रश्नपत्रों की सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला और शिकायतों की समयबद्ध समीक्षा जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं।
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि किसी भी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता केवल कठोर नियमों से नहीं, बल्कि निरंतर समीक्षा, पारदर्शिता और संस्थागत सुधारों से मजबूत होती है।
संसद और लोकतांत्रिक विमर्श की भूमिका
जब कोई सार्वजनिक मुद्दा व्यापक महत्व प्राप्त कर लेता है, तब उसका संसद में उठना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा होता है। संसद में विभिन्न पक्ष अपने विचार रखते हैं, सरकार से प्रश्न पूछे जाते हैं और नीतिगत सुधारों पर चर्चा होती है।
लोकतंत्र की यही विशेषता है कि महत्वपूर्ण सार्वजनिक विषय केवल सड़कों पर ही नहीं बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के भीतर भी विचार-विमर्श का हिस्सा बनते हैं। इससे नीतियों की समीक्षा और सुधार की संभावना बढ़ती है।
आगे का रास्ता: केवल प्रतिक्रिया नहीं, दीर्घकालिक सुधार
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसे विवादों की संभावना कम करने के लिए कुछ बुनियादी सुधारों पर लगातार काम करने की आवश्यकता है।
इनमें परीक्षा प्रक्रियाओं का नियमित स्वतंत्र ऑडिट, शिकायतों के त्वरित निवारण की व्यवस्था, तकनीकी सुरक्षा को मजबूत करना, अधिकारियों की स्पष्ट जवाबदेही, समयबद्ध जांच और नागरिकों के साथ पारदर्शी संवाद शामिल हैं।
साथ ही, छात्रों और अभिभावकों को समय पर आधिकारिक जानकारी उपलब्ध कराना भी अत्यंत आवश्यक है। स्पष्ट संवाद से भ्रम कम होता है और संस्थाओं पर विश्वास मजबूत होता है।
क्या लंबे आंदोलन किसी व्यवस्था के लिए चेतावनी होते हैं?
लोकतांत्रिक समाज में विरोध प्रदर्शन, धरना और शांतिपूर्ण अनशन नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हिस्सा हैं। लेकिन जब कोई आंदोलन कुछ दिनों की बजाय कई सप्ताह तक चलता है, बड़ी संख्या में छात्र, अभिभावक और सामाजिक संगठन उससे जुड़ते हैं, तब यह केवल एक विरोध कार्यक्रम नहीं रह जाता। यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी एक संकेत होता है कि संबंधित मुद्दे पर व्यापक संवाद और भरोसे की आवश्यकता है।
CJP प्रदर्शन के 15वें दिन एक छात्र के अस्पताल में भर्ती होने और सोनम वांगचुक के लगातार जारी अनशन ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है। किसी भी लोकतंत्र की मजबूती इस बात से मापी जाती है कि वह असहमति को किस प्रकार सुनता है और शिकायतों का समाधान कितनी पारदर्शिता तथा संवेदनशीलता के साथ करता है।
केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं, उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक
पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए विभिन्न स्तरों पर कानूनों और प्रशासनिक सुधारों की दिशा में प्रयास किए गए हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी कानून की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका क्रियान्वयन कितना प्रभावी है।
यदि किसी व्यवस्था में शिकायतें लगातार सामने आती रहें, जांच में देरी हो या नागरिकों को समय पर स्पष्ट जानकारी न मिले, तो केवल नए नियम बना देना पर्याप्त नहीं माना जाता। प्रभावी प्रशासन का अर्थ है कि कानूनों के साथ-साथ संस्थागत क्षमता, प्रशिक्षित मानव संसाधन, आधुनिक तकनीक और पारदर्शी निगरानी तंत्र भी विकसित किए जाएं।
सुशासन की असली पहचान क्या है?
विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न प्रशासनिक विशेषज्ञ सुशासन (Good Governance) के कुछ सामान्य सिद्धांतों पर बल देते हैं। इनमें प्रमुख हैं—
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पारदर्शिता
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जवाबदेही
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कानून का समान अनुपालन
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समयबद्ध निर्णय
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नागरिक सहभागिता
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प्रभावी शिकायत निवारण
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निष्पक्ष और सक्षम संस्थाएं
- https://politicsinsightindia.com/new/bhrashtachar-ka-naya-bharatiya-model-aarop-ke-jawab-me-aarop
यदि इन सिद्धांतों का पालन लगातार किया जाए तो न केवल विवाद कम होते हैं, बल्कि नागरिकों का सार्वजनिक संस्थाओं पर विश्वास भी मजबूत होता है।
युवाओं का विश्वास बनाए रखना क्यों जरूरी है?
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। हर वर्ष लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं, विश्वविद्यालयों और सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं के माध्यम से अपने भविष्य का निर्माण करने का प्रयास करते हैं।
ऐसे में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता केवल शिक्षा का प्रश्न नहीं बल्कि देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति से भी जुड़ी हुई है। यदि युवाओं को यह भरोसा हो कि सभी उम्मीदवारों के साथ समान व्यवहार होगा, प्रक्रिया पारदर्शी होगी और शिकायतों का निष्पक्ष समाधान मिलेगा, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास को मजबूत करता है।
मीडिया और नागरिक समाज की जिम्मेदारी
ऐसे संवेदनशील मामलों में मीडिया और नागरिक समाज की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। मीडिया का दायित्व है कि वह तथ्यों की पुष्टि के बाद ही जानकारी प्रकाशित करे और विभिन्न पक्षों का दृष्टिकोण प्रस्तुत करे। वहीं नागरिक समाज और सामाजिक संगठनों की भूमिका रचनात्मक संवाद को बढ़ावा देने, शांतिपूर्ण तरीके से मुद्दों को सामने लाने और सुधार संबंधी सुझाव देने की होती है।
सार्वजनिक विमर्श जितना तथ्य-आधारित और संतुलित होगा, समाधान की संभावना भी उतनी ही मजबूत होगी।
भविष्य के लिए क्या सीख मिलती है?
CJP प्रदर्शन और उससे जुड़े घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि सार्वजनिक संस्थाओं को केवल संकट आने पर प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करनी चाहिए जो विवादों की संभावना को कम करें।
इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं—
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परीक्षा प्रक्रियाओं का नियमित स्वतंत्र मूल्यांकन।
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प्रश्नपत्र सुरक्षा और डिजिटल निगरानी को मजबूत करना।
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शिकायतों के निस्तारण के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय करना।
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प्रभावित छात्रों को समय-समय पर आधिकारिक जानकारी उपलब्ध कराना।
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जांच रिपोर्टों को यथासंभव सार्वजनिक करना।
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संस्थागत सुधारों की नियमित समीक्षा करना।
इस प्रकार के सुधार केवल किसी एक परीक्षा या एक विभाग के लिए नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
निष्कर्ष
CJP प्रदर्शन का 15वां दिन, एक छात्र के अस्पताल पहुंचने की घटना और सोनम वांगचुक का जारी अनशन लोकतंत्र, प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक विश्वास जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक चर्चा का अवसर प्रदान करते हैं। इन घटनाओं के सभी तथ्य और उनसे जुड़े दावों का परीक्षण संबंधित संस्थाओं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से होना चाहिए, लेकिन एक बात स्पष्ट है—जब नागरिक बड़ी संख्या में किसी विषय पर चिंता व्यक्त करते हैं, तब संवाद, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई का महत्व और बढ़ जाता है।
लोकतांत्रिक शासन की सफलता केवल इस बात से नहीं आंकी जाती कि वह कितनी योजनाएं बनाता है, बल्कि इस बात से भी कि वह नागरिकों की शिकायतों को कितनी गंभीरता से सुनता है, सार्वजनिक संस्थाओं में विश्वास कैसे बनाए रखता है और आवश्यकता पड़ने पर सुधार की दिशा में कितनी तत्परता से कार्य करता है।
अंततः, किसी भी मजबूत लोकतंत्र की पहचान यह नहीं होती कि वहां कभी विरोध प्रदर्शन नहीं होते, बल्कि यह होती है कि वहां संस्थाएं संवाद के लिए खुली रहती हैं, जवाबदेही स्वीकार करती हैं, पारदर्शिता बनाए रखती हैं और सुधार की प्रक्रिया को निरंतर आगे बढ़ाती हैं। यही सुशासन का मूल आधार है और यही वह मार्ग है जो नागरिकों के विश्वास को लंबे समय तक मजबूत बनाए रख सकता है।
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