डर तो है लेकिन व्यवस्था से टूटी हुई पीढ़ी के लिए बोलना होगा, चुप रहकर लोकतंत्र नहीं बचता
देश में बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और युवाओं के भीतर जमा हो रहे असंतोष के बीच “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे प्लेटफॉर्म का उभरना केवल एक इंटरनेट ट्रेंड नहीं बल्कि व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास का संकेत है। यह लेख एक ऐसे लेखक की आवाज़ है जो डर के बावजूद लिख रहा है — क्योंकि उसे लगता है कि लोकतंत्र में जनता की पीड़ा और सवालों को दबाकर देश को मजबूत नहीं बनाया जा सकता। इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, बेरोजगार युवाओं की निराशा, सरकार की नीतियों और लोकतांत्रिक मूल्यों पर कठोर लेकिन जिम्मेदार आलोचना प्रस्तुत की गई है।
डर के बावजूद लिखना ज़रूरी है: क्योंकि बेरोजगारों की आवाज़ को कुचलकर लोकतंत्र नहीं बचाया जा सकता
सच कहें तो हम इस विषय पर लिखना ही नहीं चाहते थे। हमने कभी नहीं सोचा था कि हमें “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे विषय पर सार्वजनिक रूप से कुछ लिखना पड़ेगा। कई दिनों तक हम असमंजस में रहे कि इस पर बोलना चाहिए भी या नहीं। क्योंकि आज के भारत में किसी संवेदनशील विषय पर लिखना केवल लिखना नहीं रह गया है, बल्कि एक जोखिम बन चुका है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाइए, बेरोजगारी की बात कीजिए, महंगाई का जिक्र कर दीजिए या जनता की पीड़ा को शब्द दे दीजिए — और तुरंत आपको देशविरोधी, नकारात्मक या व्यवस्था विरोधी साबित करने की कोशिश शुरू हो जाती है।
हम स्वीकार करते हैं कि हमें भी डर लग रहा है। यह डर काल्पनिक नहीं है। यह वही डर है जो आज लाखों भारतीयों के भीतर बैठ चुका है। हमने अपनी इस छोटी-सी वेबसाइट को एक साल तक संघर्ष करके बनाया है। पैसे बचाए, जरूरतें टालीं, तब जाकर यह मंच खड़ा हुआ जहाँ हम समाज के वास्तविक मुद्दों पर लिख सकें। हम कोई बड़े मीडिया हाउस नहीं हैं। न हमारे पीछे करोड़ों का फंड है, न कोई राजनीतिक संरक्षण। हम भी उसी बेरोजगार भीड़ का हिस्सा हैं जिसे आज व्यंग्य में “कॉकरोच” कहा जा रहा है।
यही कारण है कि जब हमने सुना कि “कॉकरोच जनता पार्टी” का X अकाउंट कुछ ही दिनों में बंद कर दिया गया, तब हमारे भीतर एक बेचैनी पैदा हुई। सवाल केवल एक अकाउंट का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है जिसमें सरकार आलोचना से डरने लगती है। अगर लाखों युवा बेरोजगारी, आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक निराशा की बात कर रहे हैं, तो क्या उनका मुँह बंद कर देना समाधान है?
सरकार को समझना होगा कि जनता को ऐसे तुच्छ हथकंडों से दबाया नहीं जा सकता। अकाउंट बंद करने, पोस्ट हटवाने, डर का माहौल बनाने और असहमति को अपराध की तरह प्रस्तुत करने से समस्या खत्म नहीं होगी। बल्कि इससे असंतोष और भड़केगा। और इतिहास गवाह है कि जब जनता का असंतोष लंबे समय तक दबाया जाता है, तो उसका परिणाम किसी भी देश के लिए अच्छा नहीं होता।
लोकतंत्र की आत्मा केवल चुनाव नहीं होती। लोकतंत्र की असली आत्मा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है। अगर नागरिक अपनी पीड़ा खुलकर व्यक्त नहीं कर सकता, अगर युवा बेरोजगारी पर सवाल नहीं पूछ सकता, अगर पत्रकार सरकार की आलोचना करने से डरने लगे, तो फिर लोकतंत्र केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है।
आज भारत में वही माहौल तेजी से बनता दिखाई दे रहा है। सरकार और उसका समर्थक तंत्र हर आलोचना को राष्ट्रविरोध में बदल देने पर तुला हुआ है। लेकिन सच्चाई यह है कि जनता की समस्याएँ ट्रोलिंग से गायब नहीं होतीं। बेरोजगारी राष्ट्रवाद के नारों से खत्म नहीं होती। महंगाई टीवी डिबेट्स से कम नहीं होती। और भूख सरकारी विज्ञापनों से नहीं मिटती।
“कॉकरोच जनता पार्टी” का अचानक लोकप्रिय होना कोई मजाक नहीं है। यह उस दबे हुए असंतोष का विस्फोट है जो वर्षों से युवाओं के भीतर जमा हो रहा था। Reuters की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यह मंच बहुत कम समय में लाखों युवाओं तक पहुँचा और उसका मुख्य मुद्दा बेरोजगारी, आर्थिक असुरक्षा और व्यवस्था से मोहभंग था। (reuters.com)
सरकार को यह समझना चाहिए कि कोई भी युवा शौक से व्यवस्था विरोधी नहीं बनता। जब उसे नौकरी नहीं मिलती, जब उसकी डिग्री बेकार हो जाती है, जब परीक्षाओं के पेपर लीक होते हैं, जब भर्ती वर्षों तक अटकी रहती है, जब घर में पिता की कमाई से परिवार नहीं चल पाता — तब उसके भीतर गुस्सा पैदा होता है।
भारत सरकार के Periodic Labour Force Survey (PLFS) 2025 के अनुसार, 15-29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर लगभग 10% दर्ज की गई, जबकि शहरी युवाओं में यह और अधिक है। (pib.gov.in) लेकिन सच्चाई इससे भी ज्यादा भयावह है। क्योंकि लाखों लोग मजबूरी में छोटे-मोटे अस्थायी काम कर रहे हैं ताकि वे “बेरोजगार” की श्रेणी में न गिने जाएँ। कोई डिलीवरी बॉय बनकर इंजीनियरिंग की डिग्री ढो रहा है, कोई एमए पास युवक पांच हजार की नौकरी में जिंदगी काट रहा है, कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते-करते उम्र पार कर चुका है।
यह केवल आर्थिक संकट नहीं है। यह सम्मान का संकट है। यह उस पीढ़ी का टूटता हुआ आत्मविश्वास है जिसे हर चुनाव में “देश का भविष्य” कहा गया, लेकिन नीतियों में सबसे आखिर में रखा गया।
आज देश का युवा यह महसूस कर रहा है कि सरकार उसके वास्तविक मुद्दों से भाग रही है। रोजगार की जगह धार्मिक ध्रुवीकरण पर चर्चा होती है। शिक्षा की जगह प्रचार पर पैसा बहाया जाता है। स्वास्थ्य की जगह राजनीतिक इवेंट्स पर करोड़ों खर्च होते हैं। टीवी चैनलों पर बेरोजगारी की चर्चा कम और शोर ज्यादा होता है।
और जब जनता अपनी आवाज सोशल मीडिया पर उठाती है, तब वही सरकार डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर नियंत्रण बढ़ाने लगती है। अकाउंट सस्पेंड होते हैं, पोस्ट हटती हैं, और डर का वातावरण बनाया जाता है। लेकिन सरकार शायद यह भूल रही है कि डर स्थायी समाधान नहीं होता। डर कुछ समय के लिए आवाज दबा सकता है, लेकिन असंतोष को खत्म नहीं कर सकता।
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बल्कि सच यह है कि जितना दमन बढ़ेगा, उतना गुस्सा बढ़ेगा। और यह किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरनाक स्थिति होती है। कोई भी जिम्मेदार नागरिक अराजकता नहीं चाहता। हम भी नहीं चाहते। लेकिन सरकार को यह समझना होगा कि अगर करोड़ों युवाओं की समस्याओं को लगातार नजरअंदाज किया जाएगा, तो सामाजिक अस्थिरता बढ़ेगी ही।
https://politicsinsightindia.com/new/norway-press-freedom-pm-media-democracy-satire
आज देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास स्थायी रोजगार नहीं है। किसान कर्ज में डूबा है। मजदूर परिवार का पेट भरने के लिए संघर्ष कर रहा है। छोटे व्यापारी बड़े कॉरपोरेट्स के दबाव में टूट रहे हैं। स्थानीय बाजार खत्म हो रहे हैं। गाँवों में अवसर नहीं हैं। शहरों में महंगाई दम घोंट रही है।
लेकिन सत्ता का बड़ा हिस्सा अब भी आत्ममुग्ध प्रचार में व्यस्त दिखाई देता है। सरकार आलोचना सुनने के बजाय अपनी छवि बचाने में ज्यादा ऊर्जा खर्च कर रही है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। क्योंकि जब सरकारें खुद को जनता से ऊपर समझने लगती हैं, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।
सरकार को यह भी समझना चाहिए कि जनता कोई गुलाम भीड़ नहीं है। यह देश केवल नेताओं का नहीं है। यह उतना ही एक बेरोजगार युवक का है जितना किसी उद्योगपति या मंत्री का। इसलिए जनता को अपनी पीड़ा व्यक्त करने का पूरा अधिकार है।
आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि सरकार हर आलोचक को दुश्मन की तरह देखने लगी है। लेकिन सवाल पूछना देशद्रोह नहीं होता। असहमति लोकतंत्र की ताकत होती है। अगर जनता सरकार से सवाल नहीं पूछेगी, तो फिर लोकतंत्र और राजशाही में अंतर ही क्या बचेगा?
हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि हमारा उद्देश्य नफरत फैलाना नहीं है। हम किसी हिंसा या अराजकता का समर्थन नहीं करते। लेकिन हम यह भी मानते हैं कि चुप रहना अब अपराध जैसा महसूस होने लगा है। क्योंकि अगर समाज के वास्तविक मुद्दों पर भी लोग डरकर चुप हो जाएँ, तो फिर देश केवल प्रचार से चलने लगता है।
और यही डर आज हमारे भीतर भी है। हमें भी यह भय है कि कहीं हमारी वेबसाइट को निशाना न बना दिया जाए। कहीं हमारे लिखे शब्द हमारे खिलाफ न इस्तेमाल कर लिए जाएँ। लेकिन फिर सवाल यह उठता है कि अगर हर नागरिक डरकर चुप हो जाए, तो जनता की आवाज कौन उठाएगा?
हम कोई क्रांतिकारी संगठन नहीं हैं। हम केवल एक छोटे लेखक, एक बेरोजगार नागरिक और एक जिम्मेदार भारतीय की तरह यह कहना चाहते हैं कि सरकार को जनता की तकलीफें सुननी चाहिए। जनता को ट्रोल, निकम्मा या “कॉकरोच” समझने की गलती बहुत भारी पड़ सकती है।
क्योंकि ये लोग मजाक नहीं हैं। ये असंतोष हैं। ये वह युवा हैं जिन्हें अवसर नहीं मिला। ये वे परिवार हैं जो महंगाई से टूट चुके हैं। ये वे किसान हैं जिनकी फसल का दाम नहीं मिलता। ये वे मजदूर हैं जो दिनभर मेहनत करके भी बच्चों की पढ़ाई नहीं करा पा रहे।
अगर करोड़ों लोग किसी व्यंग्यात्मक मंच से जुड़ रहे हैं, तो यह व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास दिखाता है। सरकार को इसे चेतावनी की तरह लेना चाहिए, दुश्मनी की तरह नहीं।
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है। यह हमारी सबसे बड़ी ताकत हो सकती है। लेकिन अगर यही युवा लगातार बेरोजगारी, अपमान और असुरक्षा में जीता रहा, तो यही सबसे बड़ा संकट भी बन सकता है। Forbes India सहित कई रिपोर्टों में यह चिंता जताई गई है कि उच्च शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी गंभीर स्तर पर बनी हुई है। (forbesindia.com)
सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों https://politicsinsightindia.com/new/bharat-arthvyavastha-nijikaran-grameen-sankat पर भी पुनर्विचार करना होगा। केवल बड़े कॉरपोरेट्स को लाभ पहुँचाकर देश मजबूत नहीं होता। जब स्थानीय बाजार खत्म होते हैं, छोटे व्यापारी टूटते हैं और रोजगार के अवसर कम होते हैं, तब समाज के भीतर असंतोष बढ़ता है।
देशभक्ति का अर्थ केवल सरकार की प्रशंसा करना नहीं होता। असली देशभक्ति जनता के पक्ष में खड़ा होना है। असली देशभक्ति यह कहना है कि गरीब का पैसा गरीब के जीवन को बेहतर बनाने में लगे, न कि केवल कुछ चुनिंदा शक्तिशाली लोगों की संपत्ति बढ़ाने में।
सरकार को यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि अकाउंट बंद करके या आवाज दबाकर जनता शांत हो जाएगी। नहीं होगी। बल्कि इससे अविश्वास और बढ़ेगा। लोकतंत्र संवाद से चलता है, दमन से नहीं।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार जनता की आलोचना को दुश्मनी नहीं बल्कि फीडबैक की तरह देखे। बेरोजगार युवा देश पर बोझ नहीं हैं। वे इस देश का भविष्य हैं। उन्हें सम्मान चाहिए, अवसर चाहिए, सुरक्षा चाहिए और सबसे ज्यादा चाहिए — सुने जाने का अधिकार।
अगर सरकार सच में मजबूत है, तो उसे आलोचना से डरना नहीं चाहिए। क्योंकि जो सत्ता सवालों से डरती है, वह अंदर से कमजोर होती है।
हम अंत में केवल इतना कहना चाहते हैं कि हम यह लेख डर के बावजूद लिख रहे हैं। क्योंकि हमें लगता है कि चुप रहना अब संभव नहीं है। हम भी उसी जनता का हिस्सा हैं जो संघर्ष कर रही है। हम भी उसी पीड़ा को महसूस करते हैं जिसे करोड़ों युवा हर दिन झेल रहे हैं।
और शायद यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी उम्मीद भी है — कि डर के बावजूद कुछ लोग सच लिखने की कोशिश करते रहेंगे।
भावुक भाषणों के सहारे कब तक देश चलाओगे एक दिन तो इस पीढ़ी को जवाब देना ही होगा
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