इंडो-पैसिफिक से पैसिफिक: क्या अमेरिका ने भारत को उसकी वास्तविक हैसियत का संकेत दे दिया है?

इंडो-पैसिफिक से पैसिफिक तक का सफर क्या सिर्फ एक नाम परिवर्तन है या भारत की विदेश नीति के लिए चेतावनी? ट्रम्प के दावे, जी-7 की हकीकत, रूस-ईरान पर दबाव और अमेरिका की बदलती रणनीति के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर बड़ा सवाल।

इंडो-पैसिफिक से पैसिफिक: क्या अमेरिका ने भारत को उसकी वास्तविक हैसियत का संकेत दे दिया है?

By- Sudhir Taliyan

Chaudhary- Talan Khap

कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सबसे बड़ा संदेश किसी मिसाइल, युद्ध या समझौते से नहीं बल्कि एक नाम से दिया जाता है।

अमेरिका ने 2018 में अपने "पैसिफिक कमांड" का नाम बदलकर "इंडो-पैसिफिक कमांड" किया था। उस समय इसे भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका, भारतीय महासागर के बढ़ते महत्व और भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी के प्रतीक के रूप में पेश किया गया था। भारत के रणनीतिक विशेषज्ञों और मीडिया के एक बड़े वर्ग ने इसे नई विश्व व्यवस्था में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा का प्रमाण बताया था।

लेकिन अब वही अमेरिका उस नाम को वापस बदल रहा है।

सवाल यह नहीं है कि किसी सैन्य कमांड का नाम क्या है।

सवाल यह है कि जिस "इंडो" को जोड़कर भारत को वैश्विक रणनीति के केंद्र में दिखाया गया था, उसे हटाने का संदेश क्या है?

और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि भारत की विदेश नीति आज किस दिशा में जा रही है?

क्या भारत को केवल इस्तेमाल किया गया?

2018 में जब अमेरिका ने "इंडो-पैसिफिक" शब्द को अपनाया था तो उसका सबसे बड़ा भू-राजनीतिक लक्ष्य चीन था। उस समय वाशिंगटन को एशिया में एक ऐसे साझेदार की जरूरत थी जो चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित कर सके।

भारत उसके लिए आदर्श उम्मीदवार था।

लोकतंत्र भी था।

जनसंख्या भी थी।

भौगोलिक स्थिति भी थी।

चीन के साथ विवाद भी था।

https://politicsinsightindia.com/new/bharat-ki-videsh-niti-bahudhruviya-vishva-vyavastha-sankat

भारत को बताया गया कि वह "उभरती हुई महाशक्ति" है।

भारत को बताया गया कि वह "इंडो-पैसिफिक का स्तंभ" है।

भारत को बताया गया कि 21वीं सदी भारत की सदी होगी।

लेकिन आज जब अमेरिका ने उसी नाम को वापस बदल दिया है, तब यह सवाल पूछना स्वाभाविक है कि क्या भारत वास्तव में साझेदार था या केवल एक रणनीतिक उपकरण?

क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सम्मान भाषणों से नहीं, व्यवहार से मापा जाता है।

ट्रम्प की बयानबाजी और भारत की चुप्पी

ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कई बार सार्वजनिक रूप से दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाया था।

भारत सरकार ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया।

लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रम्प बार-बार वही दावा दोहराते रहे।

अगर कोई विदेशी नेता बार-बार यह कहे कि उसने भारत को युद्ध रोकने के लिए मजबूर किया, तो यह केवल एक बयान नहीं होता।

यह भारत की सामरिक स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लगाने की कोशिश भी हो सकती है।

लेकिन भारतीय जनता के सामने इस मुद्दे पर वह राजनीतिक आक्रामकता दिखाई नहीं दी जो दिखाई जानी चाहिए थी।

अगर कोई दूसरा देश ऐसा दावा करता तो शायद राष्ट्रीय स्वाभिमान की पूरी बहस खड़ी हो जाती।

लेकिन अमेरिका के मामले में अक्सर अलग मानदंड दिखाई देते हैं।

मित्रता या दबाव?

भारत-अमेरिका संबंधों को अक्सर "साझेदारी" कहा जाता है।

लेकिन क्या यह वास्तव में बराबरी की साझेदारी है?

जब अमेरिका टैरिफ लगाने की धमकी देता है।

जब वह व्यापारिक दबाव बनाता है।

जब वह रूस के साथ भारत के संबंधों पर सवाल उठाता है।

जब वह ईरान से तेल खरीदने पर आपत्तियां दर्ज करता है।

जब वह पाकिस्तान को रणनीतिक महत्व देना जारी रखता है।

तो यह प्रश्न उठता है कि क्या यह साझेदारी है या नियंत्रित सहयोग?

किसी भी संबंध की वास्तविकता संकट के समय सामने आती है।

और पिछले कुछ वर्षों में भारत को बार-बार यह अनुभव हुआ है कि अमेरिका सबसे पहले अपने हितों की रक्षा करता है।

समस्या अमेरिका का ऐसा करना नहीं है।

समस्या यह है कि भारत का राजनीतिक विमर्श अभी भी अमेरिका को किसी नैतिक संरक्षक की तरह प्रस्तुत करता है।

रूस का मामला: स्वतंत्रता की असली परीक्षा

शीत युद्ध के दौर से लेकर आज तक रूस भारत का सबसे महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार रहा है।

भारत की सेना का बड़ा हिस्सा रूसी तकनीक पर आधारित है।

यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस को अलग-थलग करने की कोशिश की।

भारत ने औपचारिक रूप से स्वतंत्र रुख बनाए रखा।

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लेकिन लगातार दबाव भी झेला।

यहीं विदेश नीति की वास्तविक परीक्षा होती है।

क्या भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय ले रहा है?

या फिर वह अमेरिकी असंतोष से बचने की कोशिश में संतुलन साध रहा है?

आज भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौती चीन नहीं है।

सबसे बड़ी चुनौती अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बचाए रखना है।

ईरान: जहाँ भारत ने अवसर खोया

ईरान केवल तेल का स्रोत नहीं था।

वह भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंच का द्वार था।

चाबहार बंदरगाह भारत की सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक परियोजनाओं में से एक था।

लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों और दबावों ने इस पूरे समीकरण को प्रभावित किया।

विडंबना देखिए।

https://politicsinsightindia.com/new/dar-ke-bawajood-likhna-zaroori-hai

भारत ऊर्जा सुरक्षा चाहता है।

भारत रणनीतिक पहुंच चाहता है।

भारत वैकल्पिक व्यापार मार्ग चाहता है।

लेकिन हर बार अमेरिकी प्रतिबंधों का साया इन योजनाओं पर दिखाई देता है।

यदि किसी तीसरे देश की नीति आपके राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करने लगे, तो यह प्रश्न उठना ही चाहिए कि आपकी रणनीतिक स्वतंत्रता कितनी सुरक्षित है।

जी-7 का भ्रम

भारतीय मीडिया में जी-7 सम्मेलनों को अक्सर ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे भारत विश्व व्यवस्था का केंद्रीय खिलाड़ी बन गया हो।

वास्तविकता थोड़ी अलग है।

भारत महत्वपूर्ण है।

भारत प्रभावशाली है।

भारत आवश्यक है।

लेकिन भारत अभी भी जी-7 का सदस्य नहीं है।

भारत एक आमंत्रित देश है।

निर्णायक शक्ति अभी भी सात देशों के हाथों में है।

फिर भी भारत में इस प्रकार उत्सव मनाया जाता है मानो स्थायी सदस्यता मिल गई हो।

विडंबना यह है कि जिस मंच पर भारत "ग्लोबल साउथ" की आवाज बनने की बात करता है, वही मंच अक्सर यूक्रेन, रूस, चीन और पश्चिमी सुरक्षा चिंताओं के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है।

पाकिस्तान का प्रश्न

भारत दशकों से सीमा पार आतंकवाद की शिकायत करता रहा है।

लेकिन अमेरिका की पाकिस्तान नीति हमेशा व्यावहारिक रही है।

जब वाशिंगटन को इस्लामाबाद की जरूरत होती है, वह उसके साथ खड़ा हो जाता है।

जब जरूरत नहीं होती, वह दूरी बना लेता है।

यह नया नहीं है।

यह दशकों पुराना पैटर्न है।

फिर भी भारत के नीति-निर्माता बार-बार इस उम्मीद में दिखाई देते हैं कि अमेरिका भारत की सभी सुरक्षा चिंताओं को अपनी प्राथमिकता बना लेगा।

महाशक्तियां ऐसा नहीं करतीं।

वे केवल अपने हितों को प्राथमिकता देती हैं।

विदेश नीति या जनसंपर्क अभियान?

आज भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा संकट शायद विदेश नीति नहीं, बल्कि उसकी प्रस्तुति है।

हर विदेश यात्रा को ऐतिहासिक उपलब्धि बताया जाता है।

हर हाथ मिलाने को रणनीतिक सफलता कहा जाता है।

हर फोटो को कूटनीतिक विजय घोषित कर दिया जाता है।

लेकिन विदेश नीति फोटो से नहीं चलती।

विदेश नीति शक्ति संतुलन से चलती है।

विदेश नीति राष्ट्रीय हितों से चलती है।

विदेश नीति कठिन निर्णयों से चलती है।

और सबसे महत्वपूर्ण बात—विदेश नीति प्रशंसा से नहीं, परिणामों से मापी जाती है।

इंडो-पैसिफिक से पैसिफिक: केवल नाम नहीं, संकेत

जब अमेरिका ने 2018 में "इंडो-पैसिफिक" शब्द अपनाया था, तब कहा गया था कि यह भारत के बढ़ते महत्व की मान्यता है।

यदि आज वही शब्द हटाया जा रहा है, तो कम से कम इतना तो स्पष्ट है कि प्रतीकों की राजनीति स्थायी नहीं होती।

महाशक्तियां मित्रता से अधिक हितों को महत्व देती हैं।

वे सम्मान भी उतना ही देती हैं जितना उनके हितों को लाभ हो।

भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यही है।

कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के कंधों पर चढ़कर महाशक्ति नहीं बनता।

कोई भी राष्ट्र विदेशी स्वीकृति से महान नहीं बनता।

और कोई भी राष्ट्र लगातार प्रशंसा सुनकर रणनीतिक रूप से मजबूत नहीं होता।

निष्कर्ष: भारत को फिर से अपनी राह चुननी होगी

भारत को अमेरिका-विरोधी होने की जरूरत नहीं है।

भारत को रूस-समर्थक होने की जरूरत नहीं है।

भारत को चीन-समर्थक होने की जरूरत नहीं है।

भारत को केवल भारत-समर्थक होने की जरूरत है।

गुटनिरपेक्षता का अर्थ निष्क्रियता नहीं था।

उसका अर्थ था स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता।

आज आवश्यकता उसी आत्मविश्वास की है।

क्योंकि यदि भारत अपनी विदेश नीति को राष्ट्रीय हितों के बजाय किसी एक शक्ति केंद्र की प्राथमिकताओं के अनुसार ढालने लगेगा, तो वह वैश्विक शक्ति नहीं बनेगा—वह किसी और की रणनीति का हिस्सा बन जाएगा।

और शायद "इंडो" से "पैसिफिक" तक की यात्रा का सबसे बड़ा संदेश भी यही है।

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