BRICS 2026: क्या दुनिया की नई ताकत बन रहा है यह गठबंधन?

भारत में 14–15 मई 2026 को होने वाला BRICS सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब दुनिया अमेरिका-ईरान तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता से जूझ रही है। India, China, Russia और Iran जैसे देशों की मौजूदगी इस सम्मेलन को वैश्विक शक्ति संतुलन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बना रही है। लेख में चीन की बढ़ती वैश्विक ताकत, भारत-ईरान संबंधों की नई संभावनाएं, रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रभाव और BRICS की साझा मुद्रा या वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था की जरूरत का गहन विश्लेषण किया गया है। यह सम्मेलन केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं, बल्कि नई विश्व व्यवस्था के निर्माण की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।

BRICS 2026: क्या दुनिया की नई ताकत बन रहा है यह गठबंधन?

BRICS 2026: क्या दुनिया की नई ताकत बन रहा है यह गठबंधन?

भारत में होने वाला सम्मेलन बदल सकता है वैश्विक राजनीति का भविष्य

दुनिया इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां पुरानी विश्व व्यवस्था दरकती दिखाई दे रही है। पश्चिमी देशों का दशकों पुराना प्रभुत्व पहली बार खुली चुनौती का सामना कर रहा है। अमेरिका की आर्थिक ताकत अब भी बड़ी है, लेकिन उसका राजनीतिक प्रभाव पहले जैसा निर्विवाद नहीं रह गया। दूसरी ओर एशिया, मध्य पूर्व और यूरेशिया के कई देश अब अपने लिए नई जगह तलाश रहे हैं। इसी बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच 14–15 मई 2026 को भारत में होने जा रहा BRICS सम्मेलन पूरी दुनिया की नजरों में आ गया है।

यह केवल एक औपचारिक बैठक नहीं है। यह उस नए विश्व संतुलन की तस्वीर हो सकती है जिसमें पश्चिम के बजाय पूर्व की आवाज ज्यादा प्रभावशाली दिखाई दे। सम्मेलन में India, China, Russia और Iran जैसे देश ऐसी परिस्थितियों में साथ बैठने जा रहे हैं जब दुनिया कई गंभीर संकटों से गुजर रही है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है, रूस और यूक्रेन का युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ, वैश्विक अर्थव्यवस्था दबाव में है और ऊर्जा संकट लगातार गहराता जा रहा है।

लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है — क्या BRICS केवल बयान देने वाला मंच रहेगा या वास्तव में दुनिया की नई शक्ति बनकर उभरेगा?


दुनिया क्यों बदल रही है?

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो वैश्विक व्यवस्था बनी थी, उसमें अमेरिका और पश्चिमी देशों का वर्चस्व था। डॉलर पूरी दुनिया की आर्थिक धुरी बन गया। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं पश्चिमी सोच के अनुसार चलती रहीं। लेकिन पिछले दो दशकों में हालात बदलने लगे।

China ने अभूतपूर्व आर्थिक विकास किया। India दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया। Russia ने सैन्य और ऊर्जा शक्ति के आधार पर अपनी भूमिका फिर मजबूत की। मध्य पूर्व में भी कई देश पश्चिमी प्रभाव से बाहर निकलकर स्वतंत्र रणनीति बनाने लगे।

यही वह जमीन थी जहां BRICS जैसे समूह का महत्व बढ़ा। शुरुआत में इसे केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का मंच माना गया था, लेकिन अब यह धीरे-धीरे वैकल्पिक वैश्विक शक्ति केंद्र का रूप लेता दिखाई दे रहा है।


चीन: संकट में सबसे मजबूत खिलाड़ी?

आज की वैश्विक राजनीति में सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी देश की है तो वह चीन है। अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध, ताइवान विवाद और सैन्य तनाव के बावजूद चीन लगातार आगे बढ़ रहा है।

पश्चिमी देशों का अनुमान था कि प्रतिबंध चीन की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर देंगे, लेकिन हुआ उल्टा। चीन ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में अपने व्यापारिक और रणनीतिक संबंध और मजबूत कर लिए। BRICS इसका बड़ा माध्यम बना।

आज स्थिति यह है कि चीन कई मामलों में अमेरिका के साथ लगभग समान स्तर पर व्यवहार करता दिखाई देता है। यही कारण है कि अमेरिका अब केवल रूस नहीं, बल्कि चीन को सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती मानता है।

BRICS सम्मेलन में चीन की सबसे बड़ी कोशिश यह होगी कि सदस्य देश डॉलर आधारित व्यवस्था से बाहर निकलने की दिशा में ठोस कदम उठाएं। चीन जानता है कि अगर वैश्विक व्यापार में डॉलर का दबदबा कम हुआ तो अमेरिका की आर्थिक शक्ति को सीधी चुनौती मिलेगी।


भारत की सबसे कठिन कूटनीतिक परीक्षा

भारत इस पूरे समीकरण में सबसे दिलचस्प स्थिति में है। एक तरफ उसके अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ मजबूत संबंध हैं। तकनीक, रक्षा और निवेश के क्षेत्र में भारत को पश्चिम से बड़ा सहयोग मिल रहा है। दूसरी ओर भारत के पुराने और महत्वपूर्ण संबंध रूस तथा ईरान से भी हैं।

यही संतुलन भारत को वैश्विक राजनीति में खास बनाता है।

India इस समय ऊर्जा संकट और बढ़ती ईंधन कीमतों के दबाव से गुजर रहा है। देश को लगातार सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति की जरूरत है। ऐसे में Iran भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन जाता है।

कभी ईरान भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल था। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों में दूरी आ गई। इसके बावजूद भारत ने ईरान से अपने रणनीतिक संबंध पूरी तरह खत्म नहीं किए।

अब BRICS सम्मेलन दोनों देशों को फिर करीब ला सकता है।


ईरान क्यों चाहता है भारत का साथ?

ईरान इस समय भारी पश्चिमी दबाव का सामना कर रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है, लेकिन ईरान पूरी तरह अलग-थलग नहीं पड़ा। उसने चीन और रूस के साथ संबंध मजबूत किए हैं।

फिर भी ईरान जानता है कि भारत उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता है।

भारत केवल बड़ा बाजार नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक शक्ति भी है। अगर भारत और ईरान के संबंध मजबूत होते हैं तो इसका असर पूरे एशियाई व्यापार नेटवर्क पर पड़ सकता है।

विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह परियोजना भविष्य में गेमचेंजर साबित हो सकती है। यह बंदरगाह भारत को मध्य एशिया और यूरोप तक वैकल्पिक व्यापार मार्ग देता है। पाकिस्तान को बायपास करने वाली यह परियोजना भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता के लिए भी महत्वपूर्ण है।

BRICS सम्मेलन में अगर भारत और ईरान ऊर्जा तथा व्यापार सहयोग को लेकर नए समझौते करते हैं तो यह केवल द्विपक्षीय संबंध नहीं होगा, बल्कि पूरे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगा।


रूस-यूक्रेन युद्ध: BRICS की सबसे बड़ी चुनौती

Russia और Ukraine के बीच युद्ध ने पूरी दुनिया को हिला दिया। यूरोप में ऊर्जा संकट बढ़ा, खाद्यान्न सप्लाई प्रभावित हुई और वैश्विक महंगाई बढ़ गई।

लेकिन इस युद्ध ने एक और चीज स्पष्ट कर दी — दुनिया अब पूरी तरह पश्चिमी निर्णयों पर निर्भर नहीं रहना चाहती।

रूस पर भारी प्रतिबंध लगाए गए, लेकिन वह पूरी तरह अलग-थलग नहीं पड़ा क्योंकि चीन, भारत और कई अन्य देशों ने उसके साथ सीमित या संतुलित संबंध बनाए रखे।

भारत ने यहां बेहद सावधानी से कदम बढ़ाए। उसने खुले तौर पर किसी पक्ष का समर्थन नहीं किया, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी। सस्ता रूसी तेल खरीदना उसी रणनीति का हिस्सा था।

अब BRICS सम्मेलन के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह समूह केवल आर्थिक मंच रहेगा या वैश्विक संघर्षों को समाप्त करने में भी सक्रिय भूमिका निभाएगा?

अगर BRICS देश मिलकर शांति पहल करते हैं तो यह पश्चिमी प्रभाव वाली कूटनीति के मुकाबले नई दिशा दे सकता है।


क्या डॉलर का विकल्प संभव है?

यह BRICS सम्मेलन का सबसे चर्चित मुद्दा बनने जा रहा है।

आज दुनिया का अधिकांश व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि अपनी मुद्रा के जरिए भी पूरी दुनिया को प्रभावित करता है।

जब किसी देश पर अमेरिकी प्रतिबंध लगते हैं तो उसकी सबसे बड़ी समस्या डॉलर आधारित वैश्विक बैंकिंग व्यवस्था बन जाती है।

इसीलिए BRICS देश अब वैकल्पिक भुगतान प्रणाली और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की बात कर रहे हैं।

अगर India, China, Russia और Iran आपसी व्यापार में अपनी मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाते हैं तो इसका वैश्विक असर हो सकता है।

हालांकि यह आसान नहीं होगा। चीन की आर्थिक ताकत बाकी देशों से कहीं ज्यादा है, इसलिए कई देशों को डर है कि डॉलर से निकलकर कहीं वे युआन पर निर्भर न हो जाएं। भारत भी इसी वजह से संतुलित नीति अपनाना चाहता है।

लेकिन इतना तय है कि BRICS अब केवल आर्थिक चर्चा का मंच नहीं रहा। यह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को चुनौती देने की दिशा में बढ़ रहा है।


भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर

भारत इस पूरे सम्मेलन का सबसे बड़ा लाभार्थी बन सकता है।

क्यों?

क्योंकि भारत आज दुनिया के उन कुछ देशों में है जिनसे लगभग हर बड़ा शक्ति केंद्र संबंध बनाए रखना चाहता है।

अमेरिका भारत को चीन के संतुलन के रूप में देखता है। रूस भारत को भरोसेमंद साझेदार मानता है। ईरान भारत से रणनीतिक सहयोग चाहता है। पश्चिमी कंपनियां भारत में निवेश बढ़ा रही हैं।

यानी भारत के पास वह स्थिति है जहां वह केवल “किसी गुट का हिस्सा” नहीं बल्कि “संतुलन बनाने वाली शक्ति” बन सकता है।

अगर भारत BRICS मंच पर शांति, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक संतुलन और वैकल्पिक आर्थिक ढांचे की दिशा में नेतृत्व करता है तो उसकी वैश्विक प्रतिष्ठा और बढ़ सकती है।


क्या BRICS वास्तव में दुनिया बदल सकता है?

यह सबसे बड़ा प्रश्न है।

BRICS देशों के बीच मतभेद भी कम नहीं हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है। रूस युद्ध में उलझा है। ईरान पर प्रतिबंध हैं। आर्थिक हित भी अलग-अलग हैं।

लेकिन इसके बावजूद इन देशों को एक चीज जोड़ती है — पश्चिमी वर्चस्व से बाहर अधिक स्वतंत्र वैश्विक व्यवस्था की इच्छा।

अगर BRICS केवल भाषणों तक सीमित रहता है तो इसका प्रभाव सीमित रहेगा। लेकिन अगर यह ऊर्जा सहयोग, वैकल्पिक भुगतान प्रणाली, व्यापार गलियारों और शांति पहल पर ठोस कदम उठाता है तो आने वाले दशक में यह दुनिया की सबसे प्रभावशाली शक्तियों में शामिल हो सकता है।


निष्कर्ष: भारत में होने वाला यह सम्मेलन इतिहास लिख सकता है

2026 का BRICS सम्मेलन केवल कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं है। यह उस बदलती दुनिया की झलक है जहां नई शक्तियां उभर रही हैं और पुरानी व्यवस्थाएं चुनौती का सामना कर रही हैं।

भारत के सामने अवसर भी है और जिम्मेदारी भी।

अगर भारत इस मंच का उपयोग संतुलन, संवाद और वैश्विक सहयोग बढ़ाने के लिए करता है, तो वह केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं बल्कि नई विश्व व्यवस्था का प्रमुख केंद्र बन सकता है।

दुनिया इस सम्मेलन को ध्यान से देख रही है।
क्योंकि शायद पहली बार सवाल यह नहीं है कि “दुनिया पर कौन राज करेगा”, बल्कि यह है कि “दुनिया को स्थिर कौन रखेगा?”

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