ट्रम्प को खुश करने की कीमत: क्या भारत अपने किसानों, मजदूरों और आत्मनिर्भरता की बलि चढ़ा देगा?

क्या अमेरिका के साथ संभावित ट्रेड डील भारत के किसानों, छोटे व्यापारियों, मजदूरों, मैन्युफैक्चरिंग और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को नुकसान पहुंचा सकती है? बढ़ती महंगाई, रोजगार संकट और मेक इन इंडिया पर पड़ने वाले प्रभावों का एक तीखा विश्लेषण।

ट्रम्प को खुश करने की कीमत: क्या भारत अपने किसानों, मजदूरों और आत्मनिर्भरता की बलि चढ़ा देगा?

Writer- Sudhir Taliyan

Chaudhary- Talan Khap

क्या ट्रम्प को खुश करने के लिए भारत अपने किसानों, मजदूरों और आत्मनिर्भरता को दांव पर लगा देगा?

ट्रेडिंग डील या राष्ट्रीय हित की नीलामी?

भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक व्यापारिक समझौते की कीमत सिर्फ टैरिफ, निर्यात या आयात तक सीमित नहीं है। सवाल कहीं बड़ा है। सवाल यह है कि क्या दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था अपने किसानों, छोटे व्यापारियों, घरेलू उद्योगों, मजदूरों और “मेक इन इंडिया” के सपने को किसी विदेशी नेता की राजनीतिक संतुष्टि के लिए दांव पर लगाने को तैयार है?

अगर किसी ट्रेड डील का उद्देश्य दोनों देशों के हितों का संतुलन बनाना है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यदि किसी समझौते का परिणाम भारतीय बाजारों को विदेशी उत्पादों के लिए खोलना, घरेलू उत्पादकों को कमजोर करना और आत्मनिर्भरता की परियोजना को खोखला करना है, तो फिर यह सवाल पूछना राष्ट्रहित का विषय बन जाता है।

आज जब अर्थव्यवस्था पहले से दबाव में है, महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है, और रोजगार का संकट लगातार चर्चा में है, तब किसी भी ऐसी डील को सिर्फ कूटनीतिक उपलब्धि बताकर बेचने की कोशिश खतरनाक हो सकती है।

सबसे बड़ा खतरा: भारतीय किसान

भारत का किसान पहले ही लागत और आय के बीच की लड़ाई लड़ रहा है। खाद, बीज, डीजल, बिजली और मशीनरी की लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में यदि किसी ट्रेड डील के तहत विदेशी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में आसान प्रवेश मिलता है, तो सबसे पहले चोट किसान को लगेगी।

अमेरिका की कृषि व्यवस्था और भारत की कृषि व्यवस्था में जमीन-आसमान का फर्क है। वहां बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है, भारी सब्सिडी दी जाती है और तकनीकी संसाधन कहीं अधिक हैं। भारत में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं।

ऐसी स्थिति में यदि दोनों को एक ही मैदान में उतार दिया जाए, तो यह प्रतियोगिता नहीं होगी, बल्कि असमान युद्ध होगा।

जो लोग एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर मुक्त व्यापार के गीत गाते हैं, वे शायद यह भूल जाते हैं कि किसी भी देश की खाद्य सुरक्षा का आधार उसका किसान होता है। अगर किसान कमजोर होगा, तो देश भी कमजोर होगा।

छोटे व्यापारियों के लिए नई मुसीबत

भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा छोटे व्यापारियों और सूक्ष्म उद्यमों पर टिका हुआ है। यही लोग स्थानीय बाजारों को जीवित रखते हैं, रोजगार पैदा करते हैं और आर्थिक गतिविधियों का आधार बनते हैं।

लेकिन विदेशी कंपनियों के लिए बाजार खोलने का मतलब अक्सर यह होता है कि छोटे कारोबारी कीमतों और संसाधनों की उस लड़ाई में धकेल दिए जाते हैं जिसमें उनके जीतने की संभावना बेहद कम होती है।

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बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां शुरुआती वर्षों में कम कीमतों पर सामान बेच सकती हैं, घाटा सह सकती हैं और बाजार पर कब्जा कर सकती हैं। छोटे व्यापारी ऐसा नहीं कर सकते।

परिणाम क्या होता है?

पहले प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, फिर स्थानीय व्यापार कमजोर पड़ता है और अंततः बाजार कुछ बड़े खिलाड़ियों के हाथों में सिमट जाता है।

जिस देश की रीढ़ छोटे उद्यम हैं, वहां ऐसी नीतियां बहुत सोच-समझकर बननी चाहिए।

मेक इन इंडिया: नारा या वास्तविक नीति?

कुछ साल पहले “मेक इन India” को भारत के आर्थिक भविष्य की कुंजी बताया गया था। कहा गया कि भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनेगा। विदेशी कंपनियां भारत में उत्पादन करेंगी। रोजगार पैदा होंगे। आयात पर निर्भरता घटेगी।

लेकिन यदि ट्रेड डील का परिणाम सस्ते आयातों की बाढ़ के रूप में सामने आता है, तो फिर मेक इन इंडिया का क्या होगा?

किसी भी घरेलू उद्योग को मजबूत होने के लिए समय चाहिए। उसे निवेश चाहिए। उसे संरक्षण चाहिए। उसे स्थिर नीति चाहिए।

यदि एक तरफ सरकार घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की बात करे और दूसरी तरफ बाजार को ऐसे आयातों के लिए खोल दे जो स्थानीय उत्पादकों को नुकसान पहुंचाएं, तो यह नीति विरोधाभास बन जाता है।

मेक इन इंडिया पोस्टरों और भाषणों से नहीं चलेगा। उसे वास्तविक आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक सोच की जरूरत है।

आत्मनिर्भरता का क्या होगा?

आत्मनिर्भरता का विचार सिर्फ आर्थिक नहीं था। यह रणनीतिक भी था।

कोविड महामारी ने पूरी दुनिया को सिखाया कि अत्यधिक आयात-निर्भरता कितनी खतरनाक हो सकती है। जब वैश्विक सप्लाई चेन टूटीं, तब हर देश ने महसूस किया कि कुछ क्षेत्रों में घरेलू क्षमता होना जरूरी है।

भारत ने भी आत्मनिर्भर भारत का नारा इसी संदर्भ में दिया।

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लेकिन यदि हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में विदेशी उत्पादों और कंपनियों के लिए रास्ता आसान किया जाएगा, तो आत्मनिर्भरता का लक्ष्य सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जाएगा।

सवाल यह नहीं है कि विदेशी निवेश चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या भारत अपनी घरेलू क्षमता को मजबूत करते हुए वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ेगा, या फिर सिर्फ एक विशाल उपभोक्ता बाजार बनकर रह जाएगा?

मजदूर आखिर कहां जाए?

जब घरेलू उद्योग दबाव में आते हैं, तो सबसे पहले असर रोजगार पर पड़ता है।

किसी भी फैक्ट्री की मशीनें कुछ समय तक चल सकती हैं, लेकिन यदि ऑर्डर कम हो जाएं, उत्पादन घट जाए और बाजार विदेशी उत्पादों से भर जाए, तो नौकरियां खतरे में पड़ती हैं।

भारत पहले ही बेरोजगारी और कम आय वाले रोजगारों की चुनौती का सामना कर रहा है।

युवा डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं। कई क्षेत्रों में वेतन वृद्धि महंगाई से पीछे चल रही है।

ऐसे समय में यदि नीतियां रोजगार पैदा करने के बजाय रोजगार पर दबाव बढ़ाएं, तो जनता का असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।

उपभोक्ता को सस्ता माल मिलेगा? पूरी कहानी इतनी सरल नहीं

ट्रेड डील के समर्थक अक्सर एक तर्क देते हैं—उपभोक्ताओं को सस्ता सामान मिलेगा।

पहली नजर में यह आकर्षक लगता है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

यदि सस्ते आयातों के कारण स्थानीय उद्योग बंद होते हैं, रोजगार घटते हैं और आय कम होती है, तो उपभोक्ता की क्रय शक्ति भी प्रभावित होती है।

सवाल सिर्फ कीमत का नहीं है। सवाल आय का भी है।

एक बेरोजगार व्यक्ति के लिए सस्ता सामान भी महंगा होता है।

आर्थिक नीति का उद्देश्य केवल कम कीमतें नहीं होना चाहिए। उसका उद्देश्य मजबूत उत्पादन, अच्छे रोजगार और स्थायी विकास भी होना चाहिए।

महंगाई और बढ़ती जीवन-यापन लागत

देश का आम नागरिक आज जिस समस्या को सबसे ज्यादा महसूस कर रहा है, वह है बढ़ती जीवन-यापन लागत।

किराया बढ़ रहा है।

शिक्षा महंगी हो रही है।

स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च बढ़ रहा है।

खाद्य पदार्थों की कीमतों में उतार-चढ़ाव लगातार चिंता पैदा करता है।

मध्यम वर्ग अपनी बचत को लेकर चिंतित है।

निम्न आय वर्ग रोजमर्रा के खर्चों से जूझ रहा है।

ऐसे समय में सरकार की प्राथमिकता घरेलू आर्थिक मजबूती होनी चाहिए।

यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि नीतियां उनके बजाय किसी विदेशी राजनीतिक एजेंडे को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं, तो भरोसा कमजोर पड़ता है।

क्या विदेश नीति और आर्थिक नीति में संतुलन नहीं होना चाहिए?

भारत और अमेरिका के संबंध महत्वपूर्ण हैं।

व्यापार भी महत्वपूर्ण है।

रणनीतिक साझेदारी भी जरूरी है।

लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का पहला दायित्व अपने नागरिकों के प्रति होता है।

विदेश नीति का उद्देश्य राष्ट्रीय हित की रक्षा करना है, न कि घरेलू हितों की कीमत पर विदेशी प्रशंसा हासिल करना।

मजबूत देश वही होता है जो दोस्ती भी करे और अपने हितों की रक्षा भी।

जो अपने किसानों, मजदूरों, व्यापारियों और उद्योगों की कीमत पर समझौते करता है, वह लंबे समय में आर्थिक रूप से कमजोर पड़ सकता है।

निष्कर्ष: तालियों से नहीं, परिणामों से होगी परीक्षा

किसी भी ट्रेड डील का मूल्यांकन फोटो-ऑप, प्रेस कॉन्फ्रेंस या विदेशी नेताओं की तारीफ से नहीं होना चाहिए।

असली सवाल यह है:

क्या किसान मजबूत होगा?

क्या रोजगार बढ़ेंगे?

क्या छोटे व्यापारी टिक पाएंगे?

क्या मैन्युफैक्चरिंग मजबूत होगी?

क्या आत्मनिर्भरता आगे बढ़ेगी?

क्या आम आदमी की जिंदगी बेहतर होगी?

यदि इन सवालों का जवाब “नहीं” है, तो फिर चाहे डील कितनी भी शानदार बताई जाए, उसका लाभ संदिग्ध रहेगा।

भारत कोई बाजार मात्र नहीं है। भारत 140 करोड़ लोगों की आकांक्षाओं का देश है। यहां की नीतियों का केंद्र विदेशी नेताओं की खुशी नहीं, बल्कि भारतीय नागरिकों का भविष्य होना चाहिए।

किसानों की कीमत पर कूटनीति नहीं।

मजदूरों की कीमत पर व्यापार नहीं।

आत्मनिर्भरता की कीमत पर तालियां नहीं।

राष्ट्रहित किसी भी ट्रेड डील से बड़ा है, और हमेशा रहना चाहिए।

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