बेरोजगारी, असमानता और कमजोर होती सार्वजनिक व्यवस्था: कमजोर राजनीतिक सोच का परिणाम
"भारत में निजीकरण के 12 वर्षों का विश्लेषण। जानिए बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक असमानता, सार्वजनिक क्षेत्र और जनहित पर इसके प्रभाव।"
Written by- Sudhir Taliyan
Chaudhary- Talan khap
निजीकरण का महाअभियान: क्या भारत आत्मनिर्भरता से पूंजीपतियों की गुलामी की ओर बढ़ गया है?
भारत को कभी सार्वजनिक क्षेत्र के मजबूत ढांचे पर गर्व था। रेलवे, बैंक, बीमा, बिजली, तेल, दूरसंचार, खनन और भारी उद्योग जैसे क्षेत्रों में सरकारी संस्थानों ने न केवल देश का निर्माण किया बल्कि करोड़ों लोगों को रोजगार, सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता भी प्रदान की। लेकिन पिछले एक दशक में जिस तेजी से निजीकरण और विनिवेश की नीति को आगे बढ़ाया गया, उसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या देश विकास की ओर बढ़ा है या कुछ चुनिंदा कॉर्पोरेट घरानों के हाथों अपनी आर्थिक संप्रभुता सौंप रहा है?
सरकार ने बार-बार दावा किया कि निजीकरण से दक्षता बढ़ेगी, निवेश आएगा, रोजगार पैदा होंगे और जनता को बेहतर सेवाएं मिलेंगी। लेकिन जमीनी तस्वीर कहीं अधिक जटिल और चिंताजनक दिखाई देती है।
सार्वजनिक संपत्तियों की बिक्री या राष्ट्र निर्माण की नींव का क्षरण?
2014 के बाद केंद्र सरकार ने बड़े पैमाने पर विनिवेश और निजीकरण की नीति अपनाई। सरकार विभिन्न सार्वजनिक उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी लगातार बेचती रही। सरकारी आंकड़ों और रिपोर्टों के अनुसार पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश किया गया।
सवाल यह है कि जिन संस्थानों को बनाने में देश की जनता के टैक्स का पैसा, कई पीढ़ियों का श्रम और दशकों की राष्ट्रीय पूंजी लगी, उन्हें बेचकर सरकार आखिर क्या हासिल करना चाहती है?
यदि कोई परिवार अपने घर का फर्नीचर बेचकर कुछ महीनों का खर्च चला ले तो उसे समझदारी नहीं कहा जाएगा। फिर सरकार द्वारा राष्ट्रीय संपत्तियों की बिक्री को दूरदर्शी आर्थिक नीति कैसे कहा जा सकता है?
रोजगार का संकट और निजीकरण का भ्रम
निजीकरण के समर्थक कहते हैं कि निजी क्षेत्र अधिक रोजगार पैदा करता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि निजी क्षेत्र का प्राथमिक उद्देश्य रोजगार नहीं बल्कि अधिकतम लाभ होता है।
जहां सार्वजनिक क्षेत्र सामाजिक जिम्मेदारी के साथ रोजगार देता है, वहीं निजी कंपनियां लागत घटाने के लिए कर्मचारियों की संख्या कम करती हैं, ठेका प्रथा बढ़ाती हैं और स्थायी नौकरियों को अस्थायी रोजगार में बदल देती हैं।
भारत में रोजगार की गुणवत्ता को लेकर लगातार चिंता व्यक्त की जाती रही है। अनेक अध्ययन बताते हैं कि बड़ी संख्या में युवा असुरक्षित और अनौपचारिक रोजगार में धकेले गए हैं।
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आज लाखों पढ़े-लिखे युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं क्योंकि उन्हें सरकारी नौकरी में स्थिरता और सुरक्षा दिखाई देती है। यदि सरकारी संस्थानों का दायरा लगातार घटता गया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रोजगार के अवसर और सीमित हो जाएंगे।
जब बाजार कुछ हाथों में सिमटने लगे
आर्थिक सिद्धांत कहता है कि प्रतिस्पर्धा उपभोक्ता के हित में होती है। लेकिन भारत में कई क्षेत्रों में स्थिति उलटी दिखाई देती है।
दूरसंचार, हवाई परिवहन, बंदरगाह, ऊर्जा, खुदरा व्यापार और डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों में बाजार का बड़ा हिस्सा कुछ बड़े कॉर्पोरेट समूहों के हाथों केंद्रित होता गया है। जब बाजार में कुछ ही बड़े खिलाड़ी बचते हैं तो प्रतिस्पर्धा कम होती है और उपभोक्ता के पास विकल्प भी घट जाते हैं।
नतीजा यह होता है कि मूल्य निर्धारण, निवेश और उत्पादन के फैसले धीरे-धीरे सार्वजनिक हित के बजाय कॉर्पोरेट हितों से प्रभावित होने लगते हैं।
यह मुक्त बाजार नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण है।
बढ़ती असमानता: विकास किसके लिए?
सरकार अक्सर जीडीपी वृद्धि के आंकड़े प्रस्तुत करती है। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—उस विकास का लाभ किसे मिला?
कई शोध बताते हैं कि आय और संपत्ति का बड़ा हिस्सा समाज के ऊपरी तबकों में केंद्रित हुआ है जबकि निचले आय वर्गों की वास्तविक आय वृद्धि कमजोर रही है। कुछ अध्ययनों में ग्रामीण गरीबों की आय हिस्सेदारी में गिरावट और निचले वर्गों की आर्थिक स्थिति के कमजोर होने की बात सामने आई है।
यदि अर्थव्यवस्था बढ़ रही है लेकिन किसान कर्ज में डूबा है, युवा बेरोजगार है, छोटे व्यापारी संघर्ष कर रहे हैं और मध्यम वर्ग महंगाई से परेशान है, तो ऐसी वृद्धि को जनकल्याणकारी विकास नहीं कहा जा सकता।
भारत में आर्थिक असमानता केवल आर्थिक समस्या नहीं है। यह सामाजिक तनाव, अवसरों की असमानता और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रभाव डालने वाली चुनौती भी है।
महंगाई और जनता की जेब पर हमला
जब सार्वजनिक क्षेत्र कमजोर होता है और आवश्यक सेवाओं में निजी भागीदारी बढ़ती है, तब लाभ कमाने का दबाव सीधे उपभोक्ता पर पड़ता है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निजीकरण का अनुभव बताता है कि गुणवत्ता के साथ-साथ लागत भी बढ़ती है।
एक साधारण परिवार की आय सीमित है लेकिन उसकी जरूरतें लगातार महंगी होती जा रही हैं। स्कूल फीस, अस्पताल का खर्च, बिजली बिल, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें आम आदमी की कमर तोड़ रही हैं।
जब सरकार सेवा प्रदाता की भूमिका से पीछे हटती है तो नागरिक ग्राहक में बदल जाता है। और ग्राहक की हैसियत हमेशा उसकी जेब तय करती है।
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आत्मनिर्भरता या बढ़ती निर्भरता?
सरकार ने आत्मनिर्भर भारत का नारा दिया। लेकिन आत्मनिर्भरता केवल नारों से नहीं बनती।
आत्मनिर्भरता का अर्थ है मजबूत विनिर्माण, वैज्ञानिक अनुसंधान, सार्वजनिक निवेश, तकनीकी क्षमता और घरेलू उत्पादन का विस्तार।
यदि रणनीतिक क्षेत्रों में सार्वजनिक नियंत्रण कमजोर होता है और उत्पादन क्षमता कुछ निजी समूहों तक सीमित हो जाती है तो राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
कोविड महामारी के दौरान दुनिया ने देखा कि संकट के समय केवल बाजार व्यवस्था पर निर्भर रहना कितना खतरनाक हो सकता है। ऐसे समय में सार्वजनिक संस्थानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यही कारण है कि दुनिया के कई विकसित देशों ने भी संकट के दौरान राज्य की भूमिका को मजबूत किया।
छोटे उद्योगों की टूटती कमर
भारत की अर्थव्यवस्था की असली ताकत बड़े कॉर्पोरेट नहीं बल्कि छोटे और मध्यम उद्योग हैं।
यही क्षेत्र सबसे अधिक रोजगार पैदा करता है। लेकिन बड़े कॉर्पोरेट समूहों की बढ़ती ताकत और वित्तीय संसाधनों की असमान उपलब्धता ने छोटे उद्यमों को कमजोर किया है।
कई छोटे उद्योग बंद हुए, स्थानीय बाजार सिकुड़े और लाखों परिवारों की आय प्रभावित हुई। निजी क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में कंपनियों के बंद होने की घटनाएं दर्ज की गई हैं।
यदि आर्थिक नीतियां केवल बड़े उद्योगों के अनुकूल हों और छोटे उद्यम लगातार संघर्ष करें, तो अर्थव्यवस्था की जड़ें कमजोर हो जाती हैं।
सार्वजनिक जवाबदेही का संकट
सरकारी संस्थानों की कमियां हैं। भ्रष्टाचार है, अक्षमता है और राजनीतिक हस्तक्षेप भी है।
लेकिन एक महत्वपूर्ण अंतर है।
सरकारी संस्थानों से जनता सवाल पूछ सकती है। संसद में जवाब मांगा जा सकता है। सूचना के अधिकार के माध्यम से जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
निजी कंपनियां मुख्य रूप से अपने शेयरधारकों के प्रति जवाबदेह होती हैं, जनता के प्रति नहीं।
जब आवश्यक सेवाएं निजी हाथों में चली जाती हैं, तब पारदर्शिता और जवाबदेही का स्तर भी बदल जाता है।
लोकतंत्र में यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक प्रश्न भी है।
क्या सरकार के पास कोई विकल्प नहीं था?
यह कहना गलत होगा कि सार्वजनिक क्षेत्र की सभी समस्याओं का समाधान केवल निजीकरण था।
सुधार के अन्य रास्ते भी मौजूद थे—
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पेशेवर प्रबंधन
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राजनीतिक हस्तक्षेप में कमी
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तकनीकी आधुनिकीकरण
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भ्रष्टाचार पर सख्त नियंत्रण
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कर्मचारियों का कौशल विकास
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प्रतिस्पर्धी प्रशासनिक ढांचा
दुनिया के कई देशों में सार्वजनिक संस्थानों को मजबूत बनाकर सफल बनाया गया है।
भारत भी ऐसा कर सकता था।
लेकिन आसान रास्ता चुना गया—बेच दो।
भविष्य का खतरा
यदि यही मॉडल जारी रहा तो आने वाले वर्षों में भारत को तीन बड़े संकटों का सामना करना पड़ सकता है।
पहला, स्थायी रोजगार के अवसर और घटेंगे।
दूसरा, आर्थिक शक्ति कुछ बड़े कॉर्पोरेट समूहों में और अधिक केंद्रित होगी।
तीसरा, सामाजिक असमानता और असंतोष बढ़ेगा।
जब एक ओर अरबपतियों की संपत्ति तेजी से बढ़े और दूसरी ओर करोड़ों लोग रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए संघर्ष करें, तो समाज में विश्वास कमजोर होने लगता है।
आर्थिक असमानता केवल आंकड़ा नहीं होती। वह धीरे-धीरे सामाजिक विभाजन में बदल जाती है।
निष्कर्ष: विकास का मॉडल जनता के लिए या पूंजी के लिए?
भारत को निजी क्षेत्र की आवश्यकता है। लेकिन भारत को मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र की भी उतनी ही आवश्यकता है।
समस्या निजी क्षेत्र के अस्तित्व से नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब सरकार स्वयं पीछे हटकर राष्ट्रीय संपत्तियों, रोजगार सुरक्षा और सार्वजनिक कल्याण की जिम्मेदारी बाजार के भरोसे छोड़ देती है।
एक राष्ट्र केवल शेयर बाजार के सूचकांकों से महान नहीं बनता। उसकी ताकत उसके किसान, मजदूर, शिक्षक, इंजीनियर, छोटे व्यापारी, युवा और मध्यम वर्ग होते हैं।
यदि आर्थिक नीतियां कुछ चुनिंदा कॉर्पोरेट घरानों को समृद्ध बनाएं लेकिन आम नागरिक को असुरक्षा, बेरोजगारी और महंगाई दें, तो उस मॉडल पर प्रश्न उठाना लोकतंत्र का अधिकार ही नहीं बल्कि कर्तव्य भी है।
भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जहां विकास का लाभ ऊपर से नीचे टपकने का इंतजार न करे, बल्कि नीचे से ऊपर तक हर नागरिक महसूस कर सके।
क्योंकि राष्ट्र केवल पूंजी से नहीं बनता, राष्ट्र जनता से बनता है।
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