21 जुलाई को दिल्ली में किसानों का महाआंदोलन: भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के खिलाफ 'देश बचाओ मोर्चा' का ऐलान, MSP, कर्जमाफी और जल संकट पर निर्णायक लड़ाई.
21 जुलाई 2026 को दिल्ली के किसान घाट पर भारत–अमेरिका व्यापार समझौते, MSP की कानूनी गारंटी, संपूर्ण कर्जमाफी और जल प्रबंधन की मांगों को लेकर देशव्यापी किसान आंदोलन का ऐलान। पढ़िए पूरी रिपोर्ट।
Writer- Sudhir Taliyan Chaudhary Talan Khap
Politics Insight India | चंडीगढ़ | 1 जुलाई 2026
देश में एक बार फिर किसान आंदोलन की आहट तेज होती दिखाई दे रही है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र सहित देशभर के किसान संगठनों ने केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ एक बड़े राष्ट्रीय आंदोलन का ऐलान कर दिया है। इस बार आंदोलन केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत–अमेरिका व्यापार समझौते, किसानों की संपूर्ण कर्जमाफी, जल संरक्षण, जल प्रबंधन और कृषि से जुड़े कई बड़े मुद्दों को लेकर संयुक्त संघर्ष की रणनीति बनाई गई है।
चंडीगढ़ के सेक्टर-35ए स्थित किसान भवन में मंगलवार को आयोजित राष्ट्रीय बैठक में देशभर के किसान, मजदूर, कर्मचारी, विद्यार्थी, युवा तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक में सर्वसम्मति से एक नए साझा मंच "देश बचाओ मोर्चा" का गठन किया गया, जिसने आगामी दिनों में व्यापक जनआंदोलन छेड़ने का फैसला लिया।
मोर्चे ने घोषणा की है कि 21 जुलाई 2026 को दिल्ली के किसान घाट पर एक विशाल देशव्यापी आंदोलन और जनसभा आयोजित की जाएगी, जिसमें देशभर से हजारों किसानों, मजदूरों, युवाओं, कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।
भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर क्यों बढ़ा विरोध?
बैठक में सबसे अधिक चर्चा भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर हुई। किसान संगठनों ने आरोप लगाया कि यदि यह समझौता मौजूदा स्वरूप में लागू हुआ तो भारतीय कृषि व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
बैठक में मौजूद वक्ताओं का कहना था कि भारतीय किसान पहले ही बढ़ती उत्पादन लागत, प्राकृतिक आपदाओं, घटती आय और बाजार की अनिश्चितता जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में यदि विदेशी कृषि उत्पादों को अधिक छूट मिलती है तो घरेलू किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा और कठिन हो सकती है।
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मोर्चे का दावा है कि इस तरह के व्यापार समझौते केवल किसानों को ही नहीं, बल्कि छोटे व्यापारियों, कृषि आधारित उद्योगों, ग्रामीण रोजगार और देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसी कारण बैठक में सर्वसम्मति से इस समझौते का विरोध करने और इसे रद्द कराने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन चलाने का निर्णय लिया गया।
किसानों की पांच बड़ी मांगें
बैठक में विभिन्न किसान संगठनों ने संयुक्त रूप से कई महत्वपूर्ण मांगों को लेकर संघर्ष करने का निर्णय लिया। इनमें प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं—
1. भारत–अमेरिका व्यापार समझौता तत्काल रद्द किया जाए
मोर्चे का कहना है कि प्रस्तावित व्यापार समझौता भारतीय किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हितों के अनुरूप नहीं है। इसलिए इसे लागू करने से पहले व्यापक सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिए और यदि किसानों के हित प्रभावित होते हैं तो इसे रद्द किया जाना चाहिए।
2. सभी फसलों पर C2+50% के आधार पर MSP की कानूनी गारंटी
बैठक में दोहराया गया कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए केवल MSP की घोषणा पर्याप्त नहीं है। संगठन चाहते हैं कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार C2 लागत पर 50 प्रतिशत लाभ जोड़कर सभी फसलों पर MSP की कानूनी गारंटी दी जाए, ताकि किसानों को अपनी उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित हो सके।
3. किसानों की संपूर्ण कर्जमाफी
देश के विभिन्न राज्यों में बढ़ते कृषि ऋण को देखते हुए संगठनों ने किसानों की पूर्ण कर्जमाफी की मांग उठाई। उनका कहना है कि लगातार बढ़ती लागत, मौसम की मार और बाजार में उचित दाम न मिलने के कारण किसान आर्थिक संकट में फंसते जा रहे हैं।
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4. जल संरक्षण और राष्ट्रीय जल नीति लागू हो
देश में लगातार बढ़ते जल संकट को गंभीर बताते हुए बैठक में जल संरक्षण, भूजल प्रबंधन और राष्ट्रीय जल नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग की गई।
संगठनों का कहना है कि यदि जल प्रबंधन पर गंभीरता से काम नहीं किया गया तो भविष्य में कृषि उत्पादन पर व्यापक असर पड़ सकता है।
5. किसानों को लाभकारी एवं सुनिश्चित मूल्य मिले
बैठक में कहा गया कि किसानों को उनकी मेहनत के अनुरूप उचित मूल्य मिलना चाहिए। इसके लिए खरीद व्यवस्था मजबूत करने, बाजार सुधार और फसल की सुनिश्चित खरीद जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी बनाने की आवश्यकता बताई गई।
21 जुलाई को दिल्ली के किसान घाट पर होगा शक्ति प्रदर्शन
देश बचाओ मोर्चा ने घोषणा की है कि 21 जुलाई 2026 को दिल्ली के किसान घाट पर एक विशाल जनसभा और आंदोलन आयोजित किया जाएगा।
मोर्चे का दावा है कि इस कार्यक्रम में देशभर से किसान, खेत मजदूर, कर्मचारी, छात्र, युवा, महिला संगठन और अन्य जनसंगठन बड़ी संख्या में शामिल होंगे।
आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध प्रदर्शन करना नहीं बल्कि कृषि, रोजगार, जल संसाधन और आर्थिक नीतियों से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर जनमत तैयार करना भी बताया गया है।
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यदि विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में लोग दिल्ली पहुंचते हैं, तो यह आने वाले समय में देश के सबसे बड़े किसान आंदोलनों में से एक साबित हो सकता है।
15 जुलाई को पूरे देश में निकलेगा मोटरसाइकिल मार्च
21 जुलाई के आंदोलन से पहले मोर्चा ने व्यापक जनसंपर्क अभियान की भी घोषणा की है।
इसके तहत 15 जुलाई 2026 को देशभर में तहसील, ब्लॉक और जिला स्तर पर मोटरसाइकिल मार्च निकाले जाएंगे।
इन कार्यक्रमों के दौरान प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपे जाएंगे और गांव-गांव जाकर लोगों को आंदोलन के उद्देश्यों से अवगत कराया जाएगा।
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मोर्चे का मानना है कि जनजागरण अभियान के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को आंदोलन से जोड़ा जा सकेगा।
छह सदस्यीय समिति को मिली बड़ी जिम्मेदारी
आंदोलन के संचालन और समन्वय के लिए छह सदस्यीय समिति का गठन किया गया है।
समिति में निम्नलिखित नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है—
- गुरनाम सिंह चढूनी
- सरवन सिंह पंधेर
- वी.एम. सिंह
- सरजीत सिंह फूल
- प्रकाश पोहरे
- शिव कुमार कक्का
यह समिति आंदोलन की रणनीति, राज्यों के बीच समन्वय और आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा तय करेगी।
क्या फिर दिख सकता है किसान आंदोलन जैसा माहौल?
देश में वर्ष 2020-21 के किसान आंदोलन के बाद यह पहली बार है जब इतने व्यापक स्तर पर विभिन्न किसान संगठनों ने साझा मंच बनाकर राष्ट्रीय आंदोलन की घोषणा की है।
हालांकि इस बार आंदोलन के मुद्दे पहले की तुलना में अधिक व्यापक दिखाई दे रहे हैं।
इस बार केवल कृषि कानून या MSP ही नहीं बल्कि—
- व्यापार समझौता,
- जल संकट,
- किसानों की कर्जमाफी,
- ग्रामीण रोजगार,
- प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा,
- कृषि नीति
जैसे कई विषय एक साथ सामने रखे गए हैं।
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विभिन्न राज्यों के किसान संगठन एकजुट रहते हैं और बड़ी संख्या में दिल्ली पहुंचते हैं, तो यह आंदोलन राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।
सरकार के सामने क्या होंगी चुनौतियां?
यदि 21 जुलाई का आंदोलन बड़े स्तर पर सफल रहता है, तो केंद्र सरकार के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को एक ओर अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं को आगे बढ़ाना है, वहीं दूसरी ओर घरेलू कृषि क्षेत्र की चिंताओं को भी संतुलित करना होगा।
MSP, कृषि लागत, जल संकट और किसानों की आय जैसे मुद्दे पहले से ही राष्ट्रीय बहस का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में यह आंदोलन इन विषयों को एक बार फिर राजनीतिक और आर्थिक विमर्श के केंद्र में ला सकता है।
'देश बचाओ मोर्चा' की अपील
बैठक के अंत में देश बचाओ मोर्चा ने किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों, युवाओं, कर्मचारियों और आम नागरिकों से अपील की कि वे 21 जुलाई 2026 को दिल्ली के किसान घाट पर आयोजित जनसभा में अधिक से अधिक संख्या में पहुंचें और कृषि, रोजगार, प्राकृतिक संसाधनों तथा जनहित से जुड़े मुद्दों पर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
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मोर्चे का कहना है कि यह आंदोलन केवल किसानों का नहीं बल्कि देश के व्यापक सामाजिक और आर्थिक हितों से जुड़े मुद्दों का आंदोलन है।
क्या 21 जुलाई बनेगी राष्ट्रीय राजनीति का नया मोड़?
अब सबकी निगाहें 15 जुलाई के देशव्यापी मोटरसाइकिल मार्च और 21 जुलाई को दिल्ली के किसान घाट पर होने वाले प्रस्तावित महाआंदोलन पर टिकी हैं। यदि बड़ी संख्या में किसान, मजदूर, युवा और अन्य सामाजिक संगठन इसमें शामिल होते हैं, तो यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा का विषय बन सकता है। वहीं, सरकार की प्रतिक्रिया और आगे की वार्ताएं भी इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
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