सवाल करने वालों पर UAPA-NSA, गंभीर आरोपों वालों पर नरमी? क्या देश में दो कानून हैं?

सवाल करने वालों पर UAPA-NSA और गंभीर आरोपों में घिरे विदेशियों पर नरमी क्यों? NIA मामले ने कानून के समान इस्तेमाल, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतंत्र पर बड़े सवाल खड़े किए हैं।

सवाल करने वालों पर UAPA-NSA, गंभीर आरोपों वालों पर नरमी? क्या देश में दो कानून हैं?

By- Ch. Sudhir Talyan

देश में कानून का राज है—यह संविधान का मूल विश्वास है। कानून किसी व्यक्ति की विचारधारा, धर्म, राष्ट्रीयता, सामाजिक हैसियत या सरकार के प्रति उसके रुख को देखकर अपना चेहरा नहीं बदल सकता। लेकिन जब कानून के इस्तेमाल का तरीका अलग-अलग लोगों के लिए अलग दिखाई देने लगे, तब सवाल केवल किसी एक मुकदमे का नहीं रहता; सवाल व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाता है।

आज यही सवाल राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA के उस मामले से उठ रहा है जिसमें एक अमेरिकी नागरिक और छह यूक्रेनी नागरिकों पर म्यांमार में सशस्त्र समूहों को कथित प्रशिक्षण देने से जुड़े गंभीर आरोप लगे। शुरुआती कार्रवाई में आतंकवाद से संबंधित UAPA की धारा 18 लगाई गई थी। लेकिन बाद में दाखिल चार्जशीट में UAPA की धाराएं शामिल नहीं की गईं और Immigration and Foreigners Act, 2025 की धाराओं के तहत आरोप लगाए गए।

यहीं से एक असहज सवाल पैदा होता है—

अगर किसी विदेशी नागरिक पर आतंकवादी गतिविधियों, सशस्त्र समूहों को प्रशिक्षण देने और ड्रोन युद्ध जैसी गतिविधियों से जुड़े गंभीर आरोपों की जांच हो रही है, तो UAPA की धाराएं पहली चार्जशीट में क्यों नहीं हैं?

और इसके साथ दूसरा, उससे भी बड़ा सवाल—

क्या भारत में कानून का इस्तेमाल व्यक्ति के काम से तय होता है या उसकी राजनीतिक और सामाजिक पहचान से?

सवाल करने वाला अपराधी और हथियारबंद गतिविधियों के आरोपों वाला संदिग्ध?

भारत में सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, छात्रों, बुद्धिजीवियों और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले नागरिकों के खिलाफ कठोर कानूनों के इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है।

UAPA और NSA जैसे कानून सामान्य आपराधिक कानूनों से कहीं अधिक गंभीर हैं। इन कानूनों का उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और गंभीर सार्वजनिक खतरे से निपटना है। इसलिए इनका इस्तेमाल असाधारण परिस्थितियों में और ठोस आधार पर होना चाहिए।

लेकिन लोकतंत्र में असहमति को अपराध मान लेना बेहद खतरनाक रास्ता है।

यदि कोई सामाजिक कार्यकर्ता सरकार से सवाल करता है, किसानों के अधिकार की बात करता है, मजदूरों की आवाज उठाता है, आदिवासियों के अधिकारों की मांग करता है या किसी नीति का विरोध करता है, तो उसके खिलाफ देशद्रोह जैसी मानसिकता से कार्रवाई करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।

NIA मामले ने सवाल और बड़ा कर दिया है

जिस मामले में अमेरिकी नागरिक मैथ्यू आरोन VanDyke और छह यूक्रेनी नागरिक गिरफ्तार किए गए, उसमें NIA ने शुरुआत में गंभीर आरोप लगाए थे।

जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपियों के म्यांमार पहुंचने, वहां ethnic armed groups से संपर्क और उन्हें ड्रोन संचालन, ड्रोन युद्ध तथा संबंधित तकनीकों का प्रशिक्षण देने जैसी गतिविधियों की जांच की गई।

यह सामान्य पर्यटन या visa violation का मामला होता तो बात अलग थी।

यदि जांच एजेंसी के पास सचमुच ऐसे प्रमाण हैं कि विदेशी नागरिकों ने किसी सशस्त्र समूह को सैन्य प्रशिक्षण दिया, तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई या किसी हमले से संबंधित गतिविधियों में भूमिका निभाई, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से गंभीर विषय है।

असली सवाल यह है कि जांच एजेंसी ने जो गंभीर आरोप लगाए थे, उनके समर्थन में उसके पास कितना प्रमाण है?

और यदि प्रमाण पर्याप्त नहीं थे, तो शुरुआती स्तर पर आतंकवाद संबंधी धाराएं लगाने का आधार क्या था?

UAPA का इस्तेमाल—दोनों तरफ समान होना चाहिए

UAPA कोई सामान्य कानून नहीं है।

इसका उद्देश्य आतंकवादी गतिविधियों और राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर खतरों से निपटना है। इसलिए इसका इस्तेमाल करते समय राज्य से अपेक्षा होती है कि वह अत्यंत सावधानी और प्रमाण आधारित दृष्टिकोण अपनाए।

यही कारण है कि जब किसी सामाजिक कार्यकर्ता या असहमति रखने वाले नागरिक पर UAPA लगाया जाता है, तो सवाल उठता है कि क्या आरोप वास्तव में आतंकवादी गतिविधि से जुड़े हैं या केवल राजनीतिक असहमति को कठोर कानून के दायरे में लाया जा रहा है।

लेकिन यही कसौटी उन लोगों पर भी लागू होनी चाहिए जिन पर सशस्त्र समूहों के साथ कथित गतिविधियों के आरोप हों।

कानून का सिद्धांत व्यक्ति देखकर नहीं बदल सकता।

अगर प्रमाण हैं—कार्रवाई हो।

अगर प्रमाण नहीं हैं—आरोप हटें।

लेकिन यदि एक तरफ सवाल उठाने वाले नागरिक पर कठोरतम कानून लगा दिया जाए और दूसरी तरफ वास्तविक आतंकवादी गतिविधियों के आरोपों में घिरे व्यक्ति पर वही कानून लगाने से पहले असाधारण सावधानी दिखाई जाए, तो जनता सवाल पूछेगी ही।

NSA का सवाल भी इसी संदर्भ में उठता है

राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों का इस्तेमाल केवल इसलिए नहीं होना चाहिए कि सरकार को किसी व्यक्ति की गतिविधियां पसंद नहीं हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक असहमति के बीच स्पष्ट सीमा होना लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है।

यदि कोई व्यक्ति हिंसा भड़काता है, हथियारबंद गतिविधियों को समर्थन देता है, आतंकवादी नेटवर्क का हिस्सा है या देश की सुरक्षा को वास्तविक खतरा पैदा करता है, तो राज्य की कठोर कार्रवाई उचित है।

लेकिन यदि व्यक्ति शांतिपूर्ण तरीके से सरकार की आलोचना कर रहा है, प्रदर्शन कर रहा है या सामाजिक अधिकारों की मांग कर रहा है, तो उस पर आतंकवाद विरोधी कानूनों का इस्तेमाल लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर कर सकता है।

सरकार की आलोचना और आतंकवाद के बीच का अंतर मिटाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

क्या राष्ट्रीयता कानून की कसौटी बदल देती है?

इस मामले में एक और असहज प्रश्न उठता है।

आरोपियों में एक अमेरिकी और छह यूक्रेनी नागरिक बताए गए हैं।

किसी विदेशी नागरिक के लिए भारत के कानूनों का पालन करना अनिवार्य है। Protected Area Permit, visa conditions, immigration rules और सीमा संबंधी प्रतिबंधों का उल्लंघन गंभीर विषय हो सकता है।

लेकिन यदि मामला केवल immigration violation तक सीमित है, तो कानून उसी के अनुरूप लागू होना चाहिए।

और यदि उससे आगे आतंकवाद या राष्ट्रीय सुरक्षा का अपराध प्रमाणित होता है, तो उसके अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

राष्ट्रीयता न तो किसी को अपराध से बचा सकती है और न ही किसी को बिना प्रमाण अपराधी बना सकती है।

कानून का एक ही पैमाना होना चाहिए।

सबसे बड़ा संकट: जनता का भरोसा

लोकतंत्र केवल संसद, चुनाव और अदालतों से नहीं चलता।

लोकतंत्र जनता के भरोसे से चलता है।

जब नागरिक यह मानने लगें कि कानून कमजोर व्यक्ति पर ज्यादा तेजी से और शक्तिशाली व्यक्ति पर अलग तरीके से लागू होता है, तो कानून की प्रतिष्ठा कमजोर होती है।

जब सामाजिक कार्यकर्ता जेल में जाता है और उस पर कठोर कानून लगते हैं, तो जनता पूछती है—क्या उसने हिंसा की थी?

जब कोई छात्र सरकार से सवाल करता है और उसके ऊपर राष्ट्रीय सुरक्षा की धाराएं लगती हैं, तो समाज पूछता है—क्या सवाल पूछना अपराध हो गया?

जब कोई पत्रकार सत्ता से असहज प्रश्न करता है और उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होती है, तो प्रश्न उठता है—क्या आलोचना लोकतंत्र में सुरक्षित है?

और अब जब विदेशी नागरिकों पर सशस्त्र समूहों को कथित प्रशिक्षण देने जैसे गंभीर आरोप सामने आते हैं, लेकिन पहली चार्जशीट में UAPA की धाराएं नहीं हैं, तो वही जनता एक और सवाल पूछेगी—

क्या कानून का पैमाना सबके लिए समान है?

सरकार को जवाब देना चाहिए

इस पूरे मामले में सरकार और जांच एजेंसियों को पारदर्शिता के साथ कुछ मूल सवालों का जवाब देना चाहिए।

पहला—शुरुआत में UAPA की धारा 18 लगाने का आधार क्या था?

दूसरा—जांच के दौरान ऐसा क्या सामने आया जिसके कारण पहली चार्जशीट में UAPA की धाराएं शामिल नहीं की गईं?

तीसरा—क्या आरोपियों के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े पर्याप्त सबूत उपलब्ध हैं?

चौथा—क्या उन सबूतों की forensic और स्वतंत्र कानूनी जांच पूरी हो चुकी है?

पांचवां—यदि UAPA की जांच जारी है, तो उसकी समयसीमा और वर्तमान स्थिति क्या है?

छठा—यदि आरोप केवल immigration violations तक सीमित हैं, तो इतने गंभीर प्रारंभिक आरोपों का आधार क्या था?

इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं बल्कि दस्तावेजों और अदालत के रिकॉर्ड से मिलना चाहिए।

सवाल करने वालों को दुश्मन मत बनाइए

भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी विविधता में है।

यह देश उन लोगों से भी बनता है जो सत्ता की प्रशंसा करते हैं और उन लोगों से भी जो सत्ता की आलोचना करते हैं।

सरकार से सवाल करने वाला व्यक्ति सरकार का दुश्मन नहीं होता।

वह नागरिक होता है।

विरोध करने वाला व्यक्ति देश का विरोधी नहीं होता।

वह लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा होता है।

किसी आंदोलनकारी की मांग गलत हो सकती है। किसी सामाजिक कार्यकर्ता की विचारधारा से असहमति हो सकती है। किसी पत्रकार की रिपोर्ट पर विवाद हो सकता है।

लेकिन इसका जवाब कानून की सबसे कठोर धाराओं से देना तभी उचित है जब कानूनी कसौटी वास्तव में पूरी होती हो।

असहमति को आतंकवाद की श्रेणी में रख देना लोकतंत्र को कमजोर करता है।

लेकिन आतंकवाद के आरोपों को भी राजनीतिक बहस से मुक्त रखिए

दूसरी ओर, यह कहना भी गलत होगा कि केवल इसलिए किसी विदेशी नागरिक पर कार्रवाई न हो क्योंकि वह विदेशी है या उसके पास किसी दूसरे देश की नागरिकता है।

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यदि जांच में वास्तविक आतंकवादी गतिविधि के प्रमाण मिलते हैं, तो कानून पूरी कठोरता से लागू होना चाहिए।

यही समानता है।

न सामाजिक कार्यकर्ता के लिए अलग कानून, न विदेशी नागरिक के लिए अलग कानून।

न सत्ता समर्थक के लिए अलग न्याय, न सरकार विरोधी के लिए अलग न्याय।

कानून व्यक्ति नहीं, कृत्य देखे।

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प्रमाण देखे।

इरादा देखे।

और अदालत अंतिम निर्णय दे।

देश का दुर्भाग्य तभी होगा जब कानून पर भरोसा टूटे

आज भारत को सबसे ज्यादा जरूरत मजबूत संस्थाओं की है।

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NIA जैसी एजेंसियां इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि देश उनसे आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में निष्पक्ष जांच की अपेक्षा करता है।

इसी तरह अदालतें इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अंतिम निर्णय राजनीतिक इच्छा से नहीं बल्कि कानून और प्रमाण से होना चाहिए।

इसलिए इस मामले में किसी आरोपी को पहले से दोषी घोषित करना भी गलत होगा और किसी जांच एजेंसी को बिना सवाल किए सही मान लेना भी।

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लोकतंत्र में दोनों की जगह है—जांच भी और सवाल भी।

यदि कोई व्यक्ति आतंकवादी गतिविधि में शामिल है, तो उसे कानून के तहत सजा मिलनी चाहिए।

यदि कोई निर्दोष है, तो उसे न्याय मिलना चाहिए।

यदि किसी सामाजिक कार्यकर्ता ने केवल सवाल पूछा है, तो उसके सवाल को आतंकवाद कहना लोकतंत्र का अपमान होगा।

और यदि किसी व्यक्ति ने वास्तव में आतंकवादी गतिविधि की है, तो उसकी पहचान, राष्ट्रीयता या राजनीतिक संपर्क उसे कानून से बचाने का कारण नहीं बनना चाहिए।

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अंतिम सवाल

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि गिरफ्तार सात लोग दोषी हैं या निर्दोष।

यह निर्णय अदालत करेगी।

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत में कानून सबके लिए एक समान है?

क्या UAPA का इस्तेमाल प्रमाण के आधार पर होगा?

क्या NSA का इस्तेमाल वास्तविक राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे के मामलों में होगा?

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क्या सामाजिक कार्यकर्ता को केवल असहमति के कारण आतंकवादी की तरह पेश नहीं किया जाएगा?

क्या विदेशी नागरिक होने से किसी व्यक्ति को विशेष नरमी मिलेगी?

और क्या वास्तविक आतंकवादी गतिविधि के प्रमाण मिलने पर सरकार बिना किसी दबाव के समान कठोरता से कार्रवाई करेगी?

इन सवालों का जवाब केवल सरकार को नहीं देना है।

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यह सवाल पूरी व्यवस्था के सामने है।

क्योंकि लोकतंत्र की ताकत यह नहीं कि सरकार कितनी ताकतवर है।

लोकतंत्र की असली ताकत यह है कि कानून सरकार से भी ऊपर खड़ा दिखाई दे।

यदि सवाल पूछने वाले नागरिक पर UAPA और NSA लगाया जाए, लेकिन गंभीर आतंकवादी गतिविधियों के आरोपों वाले व्यक्ति के मामले में वही कानून लागू करने से पहले व्यवस्था असमंजस में दिखाई दे, तो जनता का सवाल स्वाभाविक है—

क्या देश में दो कानून हैं?

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और यदि सचमुच ऐसा अंतर पैदा होने लगे, तो यह केवल किसी एक नागरिक या किसी एक मामले का दुर्भाग्य नहीं होगा।

यह लोकतंत्र, संविधान और न्याय व्यवस्था—तीनों के लिए देश का दुर्भाग्य होगा।

कानून की सबसे बड़ी खूबी उसकी कठोरता नहीं, उसकी समानता है।

और भारत को आज सबसे ज्यादा इसी समानता की जरूरत है।

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