“रमाबाई ने दौड़ जीती, लेकिन सिस्टम हार गया! बेटी की किताबों के लिए नंगे पैर दौड़ी मां ने सत्ता को दिखाया आईना”

बेटी की किताबों के लिए महाराष्ट्र की रमाबाई नंगे पैर दौड़ीं और जीत गईं। उनकी जीत से ज्यादा बड़ा सवाल उस व्यवस्था पर है, जो गरीबों को अधिकार देने के बजाय संघर्ष करने पर मजबूर करती है।

“रमाबाई ने दौड़ जीती, लेकिन सिस्टम हार गया! बेटी की किताबों के लिए नंगे पैर दौड़ी मां ने सत्ता को दिखाया आईना”

By- Ch. Sudhir Talyan

रमाबाई की जीत पर तालियां मत बजाइए, पहले उस व्यवस्था से सवाल कीजिए जिसने एक मां को बेटी की किताबों के लिए दौड़ने पर मजबूर किया

महाराष्ट्र के बीड जिले की 47 वर्षीय रमाबाई रणवीर ने लगभग तीन किलोमीटर की दौड़ जीती। वह साड़ी पहनकर दौड़ीं। जब चप्पलें रास्ते में साथ छोड़ने लगीं तो उन्होंने उन्हें उतार दिया और नंगे पैर दौड़ती रहीं। सामने युवा प्रतिभागी थे, पैरों में महंगे खेल-जूते थे, शरीर पर स्पोर्ट्स ड्रेस थी और पीछे प्रशिक्षण का आत्मविश्वास था। रमाबाई के पास इनमें से कुछ भी नहीं था।

उनके पास सिर्फ एक लक्ष्य था—बेटी की किताबें।

और यही इस कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा है।

रमाबाई को पुरस्कार की रकम चाहिए थी ताकि उनकी बेटी अपनी पढ़ाई के लिए किताबें खरीद सके। जिस देश में सरकारें शिक्षा, डिजिटल इंडिया, महिला सशक्तिकरण और करोड़ों-अरबों रुपये की योजनाओं के विज्ञापन करती हैं, उसी देश में एक मां को अपनी बेटी की किताबों के लिए तीन किलोमीटर नंगे पैर दौड़ना पड़ता है।

इस पर तालियां बजाना आसान है।

लेकिन शर्मिंदा होना ज्यादा जरूरी है।

क्योंकि रमाबाई ने केवल दौड़ नहीं जीती।

उन्होंने उस व्यवस्था को बेनकाब किया है जो गरीब नागरिक को उसके अधिकार देने के बजाय उसे अपनी जरूरतों के लिए संघर्ष करने, लाइन लगाने, प्रमाणपत्र जुटाने और अंततः अपनी मजबूरी को सार्वजनिक तमाशा बनाने पर मजबूर करती है।

यह प्रेरणा की कहानी नहीं, व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है

सोशल मीडिया पर रमाबाई की तस्वीरें देखकर लोग भावुक हो रहे हैं। कोई उन्हें “भारत की बेटी” कह रहा है, कोई “मां की ताकत” बता रहा है, कोई उनकी हिम्मत को सलाम कर रहा है।

यह सब ठीक है।

लेकिन अगर हम यहीं रुक गए तो हमने इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा खो दिया।

सवाल यह नहीं है कि रमाबाई कितनी मजबूत हैं।

सवाल यह है कि उन्हें इतना मजबूत बनने के लिए मजबूर किसने किया?

एक विधवा महिला वर्षों से मजदूरी और खाना बनाने का काम करके अपनी बेटियों को पढ़ा रही है। पति की मृत्यु के बाद उसने परिवार को संभाला। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद बेटियों की शिक्षा नहीं छोड़ी। एक बेटी पुलिस भर्ती की तैयारी कर रही है, दूसरी उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में जुटी है।

यह परिवार सरकार से कोई महल नहीं मांग रहा था।

उसे सिर्फ किताबें चाहिए थीं।

और किताबों की कीमत इतनी थी कि मां को पुरस्कार राशि के लिए दौड़ना पड़ा।

यही भारत के विकास के दावों के बीच खड़ा सबसे असुविधाजनक प्रश्न है।

गरीब को योजना नहीं, उसका लाभ चाहिए

सरकारी योजनाओं की सूची लंबी है। छात्रवृत्तियां हैं। सामाजिक सुरक्षा योजनाएं हैं। विधवा सहायता है। शिक्षा के लिए अनुदान हैं। गरीब विद्यार्थियों के लिए सहायता है।

फिर भी गरीब परिवार अक्सर योजना और लाभ के बीच फंस जाता है।

कागज मांगिए।

प्रमाणपत्र मांगिए।

ऑनलाइन आवेदन कराइए।

फिर सत्यापन।

फिर कार्यालय।

फिर दूसरा दस्तावेज।

फिर सुधार।

फिर इंतजार।

और अंत में गरीब नागरिक थककर पूछता है—“साहब, मिलेगा भी या नहीं?”

रमाबाई के परिवार से जुड़ी रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि सरकारी छात्रवृत्ति का लाभ लेने में आवश्यक दस्तावेजों की समस्या बाधा बन रही थी।

यानी सरकार कहती है—हमने योजना बना दी।

गरीब कहता है—लेकिन मुझे मिली नहीं।

सरकार कहती है—पोर्टल पर आवेदन करो।

गरीब पूछता है—पोर्टल तक पहुंचने का साधन कौन देगा?

सरकार कहती है—दस्तावेज पूरे करो।

गरीब पूछता है—दस्तावेज न होने की स्थिति में मेरी मदद कौन करेगा?

यही है जनता की बेबसी।

सत्ता को गरीब की तस्वीर चाहिए, गरीब की समस्या नहीं

जब कोई गरीब व्यक्ति अपनी मजबूरी के बावजूद असाधारण सफलता हासिल करता है तो व्यवस्था अचानक सक्रिय हो जाती है।

अधिकारी बयान देते हैं।

नेता संवेदना जताते हैं।

सोशल मीडिया पर संदेश आते हैं।

सम्मान की घोषणाएं होती हैं।

मीडिया कहानी दिखाता है।

लेकिन सवाल है—इससे पहले व्यवस्था कहां थी?

जब रमाबाई खेतों में मजदूरी कर रही थीं, तब कौन उनके साथ था?

जब वह घरों में खाना बना रही थीं, तब कौन पूछ रहा था कि उनकी बेटियां कैसे पढ़ रही हैं?

जब किताब खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, तब कौन-सी सरकारी मशीनरी उनके दरवाजे पर पहुंची?

जब जरूरी दस्तावेज के अभाव में छात्रवृत्ति अटक रही थी, तब कौन अधिकारी कह रहा था—“चिंता मत कीजिए, हम समाधान करेंगे”?

कोई नहीं।

व्यवस्था को गरीब की परेशानी तब दिखाई देती है जब वह खबर बन जाती है।

यह लोकतंत्र की ताकत नहीं, प्रशासन की कमजोरी है।

राजनीति में जनता कहां है?

देश की राजनीति का बड़ा हिस्सा आज जनता की वास्तविक समस्याओं से हटकर पहचान की राजनीति के शोर में उलझा हुआ दिखाई देता है।

धर्म के नाम पर बहस।

जाति के नाम पर ध्रुवीकरण।

मंदिर-मस्जिद पर बयान।

कौन किसके साथ है, कौन किसके खिलाफ है—इस पर अंतहीन राजनीतिक युद्ध।

टीवी स्टूडियो में चीखते प्रवक्ता।

सोशल मीडिया पर नफरत।

चुनावी सभाओं में भावनात्मक नारों की बारिश।

लेकिन इसी देश में एक मां अपनी बेटी की किताब खरीदने के लिए नंगे पैर दौड़ रही है।

यह विरोधाभास हमें परेशान क्यों नहीं करता?

धार्मिक पहचान की राजनीति में जनता की आर्थिक पहचान क्यों गायब हो जाती है?

गरीब हिंदू हो या गरीब मुस्लिम, किसान हो या मजदूर, विधवा हो या अकेली मां—उसकी सबसे पहली जरूरत रोटी, रोजगार, शिक्षा, इलाज और सम्मान है।

लेकिन चुनाव आते ही नागरिक को उसकी आर्थिक समस्याओं से निकालकर किसी दूसरी पहचान के खांचे में डाल दिया जाता है।

उसे बताया जाता है कि उसका असली खतरा कौन है।

उसे बताया जाता है कि उसे किससे नफरत करनी चाहिए।

उसे बताया जाता है कि उसकी अस्मिता किस मुद्दे में सुरक्षित है।

लेकिन शायद ही कोई उससे पूछता है—

“तुम्हारी बेटी की फीस कैसे भरेगा?”

“तुम्हारे बेटे को नौकरी कब मिलेगी?”

“तुम्हारे घर में इलाज के पैसे हैं?”

“तुम्हारी फसल का दाम मिला?”

“तुम्हारे पास पढ़ाई के लिए किताबें हैं?”

रमाबाई की दौड़ इन सवालों को फिर सामने ले आई है।

गरीबी को उत्सव मत बनाइए

हमारे समाज की एक विचित्र आदत बन गई है।

गरीब संघर्ष करता है तो हम उसे “प्रेरणादायक” घोषित कर देते हैं।

मजदूर का बच्चा पढ़ जाए तो उसकी कहानी वायरल हो जाती है।

किसान का बेटा परीक्षा पास कर ले तो हम उसकी मेहनत पर तालियां बजाते हैं।

घरेलू कामगार की बेटी अधिकारी बन जाए तो हम उसकी मां को सलाम करते हैं।

लेकिन हम यह पूछने से बचते हैं कि इन परिवारों को इतनी कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करना ही क्यों पड़ा?

गरीबी कोई रोमांचक कहानी नहीं है।

भूख कोई प्रेरणादायक परिस्थिति नहीं है।

किताबों के लिए पैसे न होना कोई महान संघर्ष नहीं होना चाहिए।

यह सामाजिक असफलता है।

रमाबाई की नंगे पैर दौड़ हमें गर्व से ज्यादा बेचैनी देनी चाहिए।

क्योंकि एक सभ्य और न्यायपूर्ण व्यवस्था का लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि गरीब अपनी मजबूरी को मात देकर असाधारण बन जाए।

लक्ष्य यह होना चाहिए कि गरीब को असाधारण संघर्ष करने की जरूरत ही न पड़े।

महिला सशक्तिकरण के भाषण बनाम रमाबाई की जिंदगी

हर साल महिला सशक्तिकरण पर बड़े-बड़े कार्यक्रम होते हैं।

मंच सजते हैं।

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भाषण होते हैं।

पोस्टर छपते हैं।

“नारी शक्ति” के नारे लगते हैं।

लेकिन रमाबाई जैसी लाखों महिलाओं के लिए सशक्तिकरण का अर्थ क्या है?

पति की मृत्यु के बाद परिवार चलाना।

काम की तलाश करना।

कम वेतन में घंटों काम करना।

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बेटियों की फीस जुटाना।

किताबों का इंतजाम करना।

घर और बाहर की जिम्मेदारी उठाना।

और फिर भी सम्मान के साथ जीने की कोशिश करना।

यह वास्तविक महिला सशक्तिकरण है।

महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल मंच से नारी शक्ति का गुणगान करना नहीं है।

इसका अर्थ है ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें किसी विधवा मां को अपनी बेटियों की शिक्षा के लिए अपनी शारीरिक क्षमता की अंतिम सीमा तक संघर्ष न करना पड़े।

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रमाबाई जीती हैं, लेकिन व्यवस्था हार गई

दौड़ के परिणाम में रमाबाई प्रथम स्थान पर रहीं।

लेकिन इस कहानी का एक दूसरा परिणाम भी है।

रमाबाई जीत गईं। व्यवस्था हार गई।

वह इसलिए नहीं हारी कि उसने किसी प्रतियोगिता में भाग लिया।

वह इसलिए हारी क्योंकि एक नागरिक को उस सहायता की जरूरत थी जो व्यवस्था समय पर नहीं दे सकी।

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वह इसलिए हारी क्योंकि शिक्षा का सपना आर्थिक असुरक्षा से टकरा रहा था।

वह इसलिए हारी क्योंकि एक गरीब परिवार के लिए कुछ हजार रुपये भी जीवन बदल देने वाली रकम हो सकते हैं।

वह इसलिए हारी क्योंकि योजनाओं और जरूरतमंद व्यक्ति के बीच अभी भी ऐसी दीवारें हैं जिन्हें गरीब अपने दम पर पार नहीं कर पाता।

जनता की बेबसी को राष्ट्र की सफलता मत बताइए

आज रमाबाई की कहानी वायरल है।

कल कोई दूसरी रमाबाई होगी।

कहीं कोई पिता बेटे की फीस के लिए मजदूरी कर रहा होगा।

कहीं कोई मां दवा और राशन के बीच चुनाव कर रही होगी।

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कहीं कोई छात्र किताबों के बिना परीक्षा की तैयारी कर रहा होगा।

कहीं कोई किसान कर्ज के बोझ में दबा होगा।

कहीं कोई बेरोजगार युवा प्रतियोगी परीक्षा के फॉर्म और घर के राशन में से एक चुन रहा होगा।

इन लोगों की जिंदगी सोशल मीडिया की पोस्ट नहीं है।

यह भारत की वास्तविक तस्वीर है।

देश तभी मजबूत होगा जब उसकी सरकारें गरीब को उसकी मजबूरी पर गर्व करना सिखाने के बजाय उसकी मजबूरी खत्म करेंगी।

गरीब नागरिक को यह कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि “मैं भी कर सकता हूं।”

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उसे यह अधिकार मिलना चाहिए कि—

“मेरे बच्चों को पढ़ने का पूरा अवसर मिलेगा, चाहे मेरा परिवार गरीब ही क्यों न हो।”

रमाबाई को पुरस्कार से ज्यादा अधिकार चाहिए

रमाबाई को सम्मान मिलना चाहिए।

उनकी बेटियों को शिक्षा के लिए हर संभव सहायता मिलनी चाहिए।

लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण है कि उनकी कहानी से नीति बने।

सरकारी छात्रवृत्तियों की प्रक्रिया सरल हो।

जरूरी दस्तावेज न होने पर प्रशासन गरीब परिवार की सहायता करे।

विधवा और असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा वास्तविक बने।

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गरीब विद्यार्थियों को किताबें, फीस और परीक्षा तैयारी के लिए समय पर सहायता मिले।

और सबसे बढ़कर—सरकार गरीब नागरिक को लाभार्थी नहीं, अधिकार-संपन्न नागरिक समझे।

रमाबाई ने चप्पल उतारी और दौड़ पड़ीं।

उनके पैरों में शायद जूते नहीं थे।

लेकिन उनके सपनों में कोई कमी नहीं थी।

उनकी दौड़ ने एक मां की ताकत दिखाई है, लेकिन साथ ही सत्ता की कमजोरी भी दिखाई है।

यह कहानी हमें सिर्फ रमाबाई को सलाम करना नहीं सिखाती। यह हमें सरकार से हिसाब मांगना भी सिखाती है।

क्योंकि लोकतंत्र में जनता का काम केवल वोट देना नहीं है।

जनता को यह पूछने का अधिकार है—

जब मेरी बेटी पढ़ना चाहती है, तो मुझे उसके लिए दौड़ना क्यों पड़ता है?

और सत्ता को इसका जवाब देना होगा।

नारे से नहीं।

धार्मिक ध्रुवीकरण से नहीं।

चुनावी भाषण से नहीं।

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नीति से।

व्यवस्था से।

और जनता के जीवन में दिखाई देने वाले परिणाम से।

रमाबाई ने तीन किलोमीटर की दौड़ जीती है।

अब सरकार को यह साबित करना है कि वह गरीब नागरिक की उस लंबी दौड़ को खत्म कर सकती है, जो वह वर्षों से रोटी, शिक्षा, रोजगार, इलाज और सम्मान के लिए दौड़ रहा है।

वरना हर बार जब कोई गरीब अपनी मजबूरी को हराकर जीतता हुआ दिखाई देगा, तो तालियों के पीछे एक कड़वा सच खड़ा रहेगा—

देश में गरीबों की हिम्मत बहुत बड़ी है, लेकिन उन्हें संभालने वाली व्यवस्था अभी भी बहुत छोटी है।

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