“किसान की आमदनी घटती रही, कर्ज बढ़ता रहा: आखिर किस नीति की कीमत जान देकर चुकाएगा किसान?”

किसान की घटती आमदनी, बढ़ती लागत, कर्ज और आत्महत्या के संकट पर गंभीर संपादकीय विश्लेषण। क्या भारत की कृषि नीति किसान को आर्थिक सुरक्षा देने में विफल रही है?

“किसान की आमदनी घटती रही, कर्ज बढ़ता रहा: आखिर किस नीति की कीमत जान देकर चुकाएगा किसान?”

नीतियों के चक्रव्यूह में फंसा किसान 

By- Chaudhary Sudhir Talyan

भारत में किसान की त्रासदी को केवल मौसम, बाजार या व्यक्तिगत आर्थिक अनुशासन की कहानी बनाकर देखना आसान है। कठिन सवाल यह है कि ऐसी आर्थिक व्यवस्था क्यों बनी हुई है जिसमें किसान उत्पादन का जोखिम उठाता है, लागत का बोझ उठाता है, कीमत का अनिश्चितता सहता है और संकट आने पर कर्ज लेकर अपने परिवार को बचाने की कोशिश करता है। जब आय उस कर्ज को चुकाने की क्षमता पैदा नहीं करती, तो पुराना कर्ज अगली फसल की लागत बन जाता है। यही वह चक्र है जिसमें किसान की आर्थिक स्वतंत्रता धीरे-धीरे समाप्त होती जाती है।

आधिकारिक आंकड़े समस्या की गंभीरता बताते हैं। 2019 के राष्ट्रीय कृषि परिवार सर्वेक्षण में 50.2 प्रतिशत कृषि परिवारों के कर्जदार होने की बात सामने आई थी और औसत बकाया ऋण ₹74,121 था। दूसरी ओर, NCRB के 2024 के आंकड़ों में खेती से जुड़े 10,546 लोगों की आत्महत्याएं दर्ज हुईं, जिनमें किसान और कृषि मजदूर दोनों शामिल हैं। इन मौतों को केवल कर्ज के कारण कहना सांख्यिकीय रूप से सही नहीं होगा; फिर भी यह तथ्य कि कृषि से जुड़ी हजारों जिंदगियां हर वर्ष समाप्त हो रही हैं, नीति की प्रभावशीलता पर कठोर सवाल जरूर खड़ा करता है।

किसान को कर्ज क्यों चाहिए?

किसान कर्ज केवल उपभोग के लिए नहीं लेता। बीज, खाद, सिंचाई, डीजल, मजदूरी, मशीनरी, दवा, शिक्षा, इलाज और घरेलू खर्च—सबके लिए नकदी चाहिए। खेती की आय अक्सर फसल कटने और बिकने के बाद आती है, जबकि खर्च पहले करना पड़ता है। इसलिए ऋण कृषि व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा बन जाता है। समस्या तब पैदा होती है जब ऋण उत्पादन बढ़ाने का साधन न रहकर घाटा भरने का साधन बन जाए।

यदि किसान की फसल की लागत बढ़ती है, लेकिन बिक्री मूल्य उसी अनुपात में नहीं बढ़ता, तो उत्पादन बढ़ने के बावजूद शुद्ध आय घट सकती है। लगातार दो-तीन मौसम ऐसे निकल जाएं तो किसान नया कर्ज लेकर पुराने दायित्वों को संभालता है। लेकिन जिस किसान की पिछली देनदारी चुकाने की क्षमता कमजोर हो चुकी हो, उसके लिए अगला संस्थागत ऋण भी कठिन हो सकता है। तब साहूकारी, संपत्ति बिक्री या परिवार के अन्य स्रोत सहारा बनते हैं। यह केवल ऋण की समस्या नहीं, आय की असुरक्षा की समस्या है।

लागत का बोझ किसान पर, कीमत का नियंत्रण बाजार पर

कृषि नीति की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं है कि सरकार ने कितनी योजनाएं घोषित कीं। परीक्षा यह है कि किसान की खेती से लागत काटने के बाद कितना बचता है। सरकार स्वयं MSP, फसल बीमा, PM-KISAN, कृषि ऋण, सिंचाई, बाजार और बुनियादी ढांचे जैसी अनेक व्यवस्थाएं चला रही है। Economic Survey 2025-26 ने भी कृषि में उत्पादकता बढ़ाने, आय सुरक्षित करने और खाद्य सुरक्षा मजबूत करने को प्रमुख नीति उद्देश्य माना है। इसलिए यह कहना कि कृषि के लिए कोई नीति नहीं है, तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।

लेकिन सवाल नीति की मौजूदगी का नहीं, उसके परिणाम का है।

किसान के लिए डीजल, मजदूरी, मशीनरी, सिंचाई, बीज और अन्य इनपुट की लागत वास्तविक है। दूसरी तरफ उसकी उपज का बाजार मूल्य उसके नियंत्रण में नहीं होता।

MSP का सवाल केवल घोषणा का नहीं

MSP पर बहस को राजनीतिक नारे से आगे ले जाना होगा। सरकार 22 प्रमुख फसलों के लिए MSP घोषित करती है और उसकी मौजूदा व्यवस्था में लागत पर 50 प्रतिशत का मार्जिन शामिल है। लेकिन किसान के लिए निर्णायक सवाल है कि उसे अपनी पूरी बाजार योग्य उपज का कितना हिस्सा उस कीमत के आसपास बेचने का अवसर मिलता है।

MSP बढ़ने की खबर किसान की आय की गारंटी नहीं है। यदि बाजार में उसे मजबूरी में कम कीमत पर बेचना पड़े, तो कागज पर घोषित कीमत उसकी आर्थिक सुरक्षा नहीं बनती। किसान को केवल मूल्य घोषित करने वाली नीति नहीं, बल्कि मूल्य प्राप्त कराने वाली संस्थागत व्यवस्था चाहिए।

आत्महत्या को कमजोरी कहना अन्याय है

किसान आत्महत्या को उसकी व्यक्तिगत कमजोरी, असफलता या मानसिक दृढ़ता की कमी बताना समस्या को व्यक्ति पर डाल देना है। लेकिन दूसरी अतिशयोक्ति भी ठीक नहीं है—हर आत्महत्या को केवल सरकारी नीति का प्रत्यक्ष परिणाम घोषित करना उपलब्ध आंकड़ों से सिद्ध नहीं होता। वास्तविकता अधिक जटिल है।

कर्ज, फसल नुकसान, बाजार कीमत, पारिवारिक दायित्व, स्वास्थ्य संकट, सामाजिक दबाव और भविष्य की निराशा एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी यह है कि वह ऐसे आर्थिक झटकों को जीवन-मरण की स्थिति बनने से रोके। यदि किसी परिवार की आय गिरती है और उसके पास स्वास्थ्य, भोजन, ऋण पुनर्गठन तथा वैकल्पिक रोजगार की सुरक्षा नहीं है, तो आर्थिक संकट तेजी से सामाजिक संकट बन सकता है।

यहीं नीति की नैतिक परीक्षा होती है।

कृषि को समाज कल्याण रखना है या बाजार?

यदि कृषि को मुख्यतः समाज कल्याण की संस्था की तरह रखना है, तो सरकार को किसान को आर्थिक संरक्षण देना होगा। न्यूनतम आय सुरक्षा, फसल जोखिम सुरक्षा, सस्ती संस्थागत ऋण व्यवस्था, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा तथा संकट में ऋण पुनर्गठन को अधिकार आधारित ढांचे में लाना होगा।

यदि कृषि को प्रतिस्पर्धी बाजार और आय का व्यवसाय बनाना है, तो किसान को बाजार का वास्तविक हिस्सेदार बनाना होगा। उसे केवल कच्चा माल बेचने वाला उत्पादक नहीं, बल्कि भंडारण, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग और निर्यात श्रृंखला में हिस्सेदारी रखने वाला आर्थिक भागीदार बनाना होगा।

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दोनों मॉडलों को बिना स्पष्ट संतुलन के चलाने की कीमत किसान चुका रहा है। जब सरकार एक तरफ किसान को बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए कहती है और दूसरी तरफ उसकी आय को व्यापक बाजार जोखिमों के हवाले छोड़ देती है, तब जोखिम निजी हो जाता है लेकिन खाद्य सुरक्षा का लाभ सार्वजनिक रहता है।

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निश्चित आय का प्रश्न

किसान के लिए सबसे जरूरी सुरक्षा केवल कर्जमाफी नहीं, आय की पूर्वानुमेयता है। न्यूनतम आय की गारंटी पर गंभीर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। प्रति व्यक्ति आय के कम से कम 50 प्रतिशत के बराबर किसान परिवार के सदस्य की आय-सुरक्षा का विचार इसी दिशा में एक नीति प्रस्ताव हो सकता है। हालांकि इसकी गणना, पात्रता, राजकोषीय लागत और परिवार की परिभाषा पर स्वतंत्र आर्थिक अध्ययन जरूरी होगा।

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ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य किसान को हमेशा सहायता देना नहीं, बल्कि उसे घाटे के बाद टूटने से बचाना होना चाहिए।

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अब नीति को एक दिशा चुननी होगी

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सरकार यदि किसान आत्महत्या रोकने को वास्तविक सार्वजनिक दायित्व मानती है, तो उसे कृषि नीति के मूल दर्शन को स्पष्ट करना होगा। क्या किसान को संरक्षित आय वाला सामाजिक क्षेत्र माना जाएगा? या उसे बाजार में बराबर का आर्थिक भागीदार बनाया जाएगा? यदि दोनों रास्ते चुने जाते हैं, तो उनके बीच जोखिम और सुरक्षा का संतुलन भी स्पष्ट होना चाहिए।

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क्योंकि किसान से उत्पादन का जोखिम लेकर उसे बाजार की अनिश्चितता में अकेला छोड़ देना और फिर संकट के बाद राहत देना स्थायी कृषि नीति नहीं हो सकती।

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भारत को किसान को दया का पात्र नहीं, आर्थिक अधिकारों वाला उत्पादक मानना होगा। किसान की आय, लागत और जोखिम को नीति के केंद्र में रखना होगा। अन्यथा योजनाओं की संख्या बढ़ती रहेगी, बजट बढ़ता रहेगा, उत्पादन के आंकड़े भी सुधर सकते हैं, लेकिन खेत पर खड़ा किसान फिर वही सवाल पूछेगा—फसल मेरी, जोखिम मेरा, लागत मेरी; तो सुरक्षित आय किसकी जिम्मेदारी है?

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इस प्रश्न का उत्तर केवल भाषण से नहीं, नीति से देना होगा।

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किसान की आय-सुरक्षा को कृषि नीति का केंद्रीय लक्ष्य बनाना होगा, क्योंकि खाद्य सुरक्षा आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी है।

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