5 सितंबर को फिर सड़कों पर CJP: इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक मार्च, सरकार के वादों से लेकर स्कूलों के बंद दरवाजों तक उठे सवाल
CJP का 5 सितंबर को इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक मार्च, 25 जुलाई के सरकारी आश्वासनों, पुलिस कार्रवाई, FIR और ‘School Thik Karo’ अभियान के बीच सरकारी स्कूलों में बिना अनुमति प्रवेश पर रोक से जुड़े सवालों का विश्लेषण।
By- Ch. Sudhir Taliyan
देश की राजनीति में युवाओं, परीक्षा व्यवस्था, पुलिस कार्रवाई और सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर चल रहा आंदोलन अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। Cockroach Janta Party (CJP) ने 24 अगस्त की National Working Committee की बैठक के बाद घोषणा की है कि वह 5 सितंबर 2026, शिक्षक दिवस के दिन, इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक शांतिपूर्ण मार्च निकालेगी। संगठन का आरोप है कि 25 जुलाई को आंदोलन समाप्त कराने के लिए सरकार की ओर से जो आश्वासन दिए गए थे, उन पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। (The Times of India)
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम की एक दूसरी और उतनी ही महत्वपूर्ण कड़ी है—“School Thik Karo” अभियान। CJP ने 15 अगस्त से सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर देशव्यापी सामाजिक ऑडिट अभियान शुरू किया। संगठन के कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं—कक्षाओं, शौचालयों, पेयजल, बिजली, शिक्षकों और अन्य व्यवस्थाओं—की वास्तविक स्थिति सामने लाने की कोशिश की। (Rediff)
यहीं से प्रशासन और CJP के बीच एक नया टकराव शुरू हुआ है।
कुछ राज्यों और स्थानीय प्रशासन ने अब सरकारी स्कूल परिसरों में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश, फोटो/वीडियो बनाने और इंटरव्यू लेने के लिए पूर्व अनुमति जैसी पाबंदियां लागू की हैं। राजस्थान में ऐसी गाइडलाइन सामने आई है और मुंबई महानगरपालिका के शिक्षा विभाग ने भी CJP के स्वयंसेवकों को बिना अनुमति नगरपालिका स्कूलों में प्रवेश से रोका है। (Hindustan Times)
यहीं लोकतंत्र का एक असहज लेकिन जरूरी प्रश्न खड़ा होता है—
क्या सरकारी स्कूल जनता के हैं या केवल सरकारी अधिकारियों के निरीक्षण के लिए हैं?
और इसके साथ दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है—
क्या किसी राजनीतिक संगठन या बाहरी व्यक्ति को बिना अनुमति स्कूल में प्रवेश करके बच्चों से पूछताछ, रिकॉर्डिंग या निरीक्षण करने का अधिकार है?
दोनों प्रश्नों का जवाब एकतरफा नहीं हो सकता।
25 जुलाई का समझौता और फिर क्यों लौटा आंदोलन?
CJP का मौजूदा आंदोलन समझने के लिए 25 जुलाई की घटनाओं को समझना जरूरी है।
परीक्षा व्यवस्था, NEET से जुड़े विवादों और छात्रों के सवालों को लेकर दिल्ली में आंदोलन तेज हुआ था। 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई के बाद मामला और गंभीर हो गया। प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए गए, जबकि पुलिस ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि भीड़ में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने के बाद आवश्यक बल का इस्तेमाल किया गया।
इसके बाद केंद्र और CJP के बीच बातचीत हुई और 25 जुलाई को आंदोलन समाप्त किया गया। CJP का कहना है कि उस समय सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों पर दर्ज FIR तथा अन्य मामलों को लेकर आश्वासन दिए गए थे। बाद में संगठन ने आरोप लगाया कि इन आश्वासनों के अमल में देरी की जा रही है। 24 अगस्त की बैठक के बाद CJP ने इसी को आंदोलन दोबारा शुरू करने का मुख्य कारण बताया। (The Times of India)
5 सितंबर का मार्च इसी पृष्ठभूमि में घोषित किया गया है।
मार्च का प्रस्तावित रास्ता है:
इंडिया गेट → दिल्ली पुलिस मुख्यालय
CJP ने इसे शांतिपूर्ण मार्च बताया है और कहा है कि इसमें छात्रों, युवाओं, युवा संगठनों तथा देशभर के समर्थकों से शामिल होने का आह्वान किया गया है। संगठन के अनुसार मार्च में NEET से जुड़े मृत छात्रों के परिवारों और कथित पुलिस कार्रवाई से प्रभावित लोगों की भागीदारी भी रहेगी। (The Economic Times)
लेकिन कहानी सिर्फ FIR की नहीं है
यदि इस आंदोलन को केवल “FIR वापस लेने” का आंदोलन माना जाए तो तस्वीर अधूरी रहेगी।
पिछले कुछ सप्ताह में CJP की गतिविधियां शिक्षा व्यवस्था के दूसरे हिस्सों तक पहुंची हैं।
School Thik Karo अभियान इसी बदलाव का संकेत है।
संगठन का दावा है कि सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति को जनता के सामने लाना जरूरी है। इसके लिए वह स्थानीय लोगों, अभिभावकों और स्वयंसेवकों को सरकारी स्कूलों की सुविधाओं का ऑडिट करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। (Cockroach Janta Party (CJP) Fan Hub)
यह विचार अपने मूल में नया नहीं है।
भारत में सामाजिक ऑडिट की अवधारणा पहले से मौजूद है। सरकारी योजनाओं में जनता की निगरानी, सूचना का अधिकार, ग्राम सभाओं की भूमिका और सार्वजनिक संस्थानों में पारदर्शिता लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
लेकिन स्कूल के मामले में एक अतिरिक्त संवेदनशीलता जुड़ जाती है—
स्कूल में बच्चे होते हैं।
इसलिए सुरक्षा, निजता और शैक्षणिक वातावरण की रक्षा भी जरूरी है।
यही वह बिंदु है जहां प्रशासन का पक्ष पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
स्कूल में बिना अनुमति प्रवेश पर आदेश: प्रशासन के पास अधिकार है, लेकिन सवाल भी हैं
राजस्थान में सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और फोटो/वीडियो जैसी गतिविधियों को लेकर नई पाबंदियां लागू की गई हैं। रिपोर्टों के अनुसार बिना पूर्व अनुमति बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और इंटरव्यू जैसी गतिविधियों पर नियंत्रण लगाया गया है। (TheQuint)
मुंबई में भी civic education department ने CJP स्वयंसेवकों को बिना अनुमति नगरपालिका स्कूलों में प्रवेश से रोक दिया है। (Hindustan Times)
प्रशासन का तर्क समझना कठिन नहीं है।
स्कूल कोई सार्वजनिक पार्क नहीं है जहां कोई भी व्यक्ति कभी भी जाकर बच्चों से सवाल पूछे या रिकॉर्डिंग शुरू कर दे। बच्चों की सुरक्षा, व्यक्तिगत जानकारी, शिक्षकों की कार्यप्रणाली और पढ़ाई का वातावरण सुरक्षित रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
इसलिए बिना अनुमति स्कूल में प्रवेश पर नियंत्रण अपने आप में गलत नहीं है।
लेकिन असली सवाल यहां से शुरू होता है।
क्या अनुमति की व्यवस्था पारदर्शी है?
यदि कोई अभिभावक सरकारी स्कूल की स्थिति देखना चाहता है तो उसे किससे अनुमति लेनी होगी?
कितने समय में अनुमति मिलेगी?
क्या आवेदन अस्वीकार करने का लिखित कारण देना होगा?
क्या पत्रकारों, सामाजिक संगठनों, अभिभावकों और जनप्रतिनिधियों के लिए अलग-अलग नियम होंगे?
क्या सरकारी स्कूल में बुनियादी सुविधाओं की शिकायत करने वाले नागरिक को निरीक्षण का कोई वैधानिक रास्ता उपलब्ध कराया जाएगा?
और सबसे बड़ा प्रश्न—
क्या “बिना अनुमति प्रवेश निषिद्ध” का नियम स्कूलों की कमियों पर सार्वजनिक निगरानी रोकने का माध्यम तो नहीं बन जाएगा?
यही वह बिंदु है जहां प्रशासन को जवाब देना चाहिए।
प्रशासन से सीधा सवाल: स्कूल छिपाने की चीज नहीं, सार्वजनिक जवाबदेही का संस्थान हैं
सरकारी स्कूलों का खर्च किसका पैसा है?
जनता का।
सरकारी शिक्षक किस व्यवस्था के माध्यम से वेतन पाते हैं?
सार्वजनिक धन से।
स्कूल की इमारत किसके पैसे से बनती है?
करदाताओं और सरकारी बजट से।
बच्चों को मिलने वाली सुविधाएं किसकी जिम्मेदारी हैं?
सरकार और संबंधित प्रशासन की।
तो फिर जनता को यह जानने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए कि उसका सरकारी स्कूल किस हालत में है?
यहां प्रशासन को रक्षात्मक होने के बजाय खुला और पारदर्शी मॉडल अपनाना चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति या संगठन को स्कूल के अंदर जाकर निरीक्षण करने की अनुमति नहीं है, तो सरकार स्वयं हर स्कूल का:
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फोटो रिकॉर्ड,
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भवन की स्थिति,
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शौचालयों की संख्या,
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पेयजल व्यवस्था,
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बिजली की स्थिति,
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शिक्षक-छात्र अनुपात,
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विद्यार्थियों की उपस्थिति,
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उपलब्ध संसाधन,
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बजट आवंटन,
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खर्च,
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मरम्मत की स्थिति
सार्वजनिक क्यों नहीं कर देती?
फिर किसी राजनीतिक संगठन को कैमरा लेकर स्कूल में जाने की आवश्यकता ही कम हो जाएगी।
पारदर्शिता का सबसे अच्छा जवाब प्रतिबंध नहीं, सूचना है।
लेकिन CJP को भी नियमों की सीमा समझनी होगी
यहां CJP के लिए भी एक स्पष्ट सवाल है।
सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार या लापरवाही उजागर करना लोकतांत्रिक उद्देश्य हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कोई भी संगठन किसी भी स्कूल में अचानक प्रवेश करके बच्चों से पूछताछ शुरू कर दे।
हाल में CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके के खिलाफ सरकारी स्कूल में कथित रूप से बिना अनुमति प्रवेश करने और वहां गतिविधियां करने के संबंध में मामला दर्ज होने की खबर सामने आई है। शिकायत में आरोप लगाया गया कि वे और उनके सहयोगी स्कूल में गए, विद्यार्थियों से बातचीत की और रिकॉर्डिंग की। ये प्रशासन/शिकायत में लगाए गए आरोप हैं, सिद्ध तथ्य नहीं—इसलिए अंतिम निष्कर्ष संबंधित कानूनी प्रक्रिया से ही निकलेगा। (NDTV)
यही लोकतंत्र की स्वस्थ सीमा है।
सरकार को जवाबदेह बनाना जरूरी है।
लेकिन
कानून से ऊपर जाकर सरकार को जवाबदेह बनाना लोकतांत्रिक जवाबदेही नहीं कहलाएगा।
CJP यदि वास्तव में सामाजिक ऑडिट का मॉडल बनाना चाहता है तो उसे एक स्पष्ट और कानूनी प्रक्रिया भी बनानी चाहिए:
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स्कूल प्रशासन को लिखित सूचना।
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निरीक्षण के लिए निर्धारित समय।
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बच्चों की पहचान और निजी जानकारी की सुरक्षा।
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बिना अनुमति बच्चों की वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं।
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निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक।
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स्कूल को जवाब देने का अवसर।
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गंभीर कमी मिलने पर संबंधित विभाग को शिकायत।
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शिकायत की कार्रवाई की सार्वजनिक निगरानी।
इससे आंदोलन की विश्वसनीयता और बढ़ेगी।
प्रशासन की असली परीक्षा यहीं है
सरकार के लिए सबसे आसान रास्ता है—
“प्रवेश मत करने दो।”
लेकिन यह समाधान नहीं है।
यदि स्कूल वास्तव में अच्छे हैं, तो जनता को अंदर आने से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
यदि स्कूलों में समस्याएं हैं, तो उन्हें ठीक करने की जरूरत है।
यदि कोई संगठन गलत तरीके से निरीक्षण कर रहा है, तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
लेकिन एक पूरे समाज को स्कूलों की वास्तविक स्थिति देखने से रोक देना लोकतांत्रिक पारदर्शिता के लिए स्वस्थ मॉडल नहीं होगा।
प्रशासन को यह अंतर समझना होगा:
अनधिकृत प्रवेश रोकना एक बात है।
सार्वजनिक निगरानी रोकना दूसरी बात।
दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
राजस्थान की पाबंदियों ने बहस को और तेज कर दिया
CJP के “School Thik Karo” अभियान के बाद राजस्थान में प्रशासनिक प्रतिक्रिया सामने आई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों की एंट्री और रिकॉर्डिंग को लेकर प्रतिबंध लगाए गए हैं। (The Times of India)
CJP ने इसका विरोध करते हुए आरोप लगाया कि सरकार स्कूलों की कमियों को छिपाना चाहती है। दूसरी ओर प्रशासन का तर्क स्कूलों की सुरक्षा और शैक्षणिक वातावरण से जुड़ा है। (The Times of India)
यह विवाद केवल राजस्थान का मामला नहीं रह गया है।
यदि दूसरे राज्य भी इसी तरह के आदेश जारी करते हैं तो देश के सामने एक बड़ा नीति प्रश्न खड़ा होगा:
क्या सरकारी स्कूलों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक पारदर्शी “Citizen School Audit” व्यवस्था बनाई जानी चाहिए?
मेरा मानना है कि इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
सरकार चाहे तो CJP के अभियान को चुनौती के बजाय अवसर बना सकती है
सरकार CJP से कह सकती है:
“आप बिना अनुमति स्कूल में प्रवेश न करें। लेकिन हम आपको सार्वजनिक डेटा देंगे और निर्धारित प्रक्रिया के तहत निरीक्षण की सुविधा देंगे।”
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
यह रास्ता टकराव कम कर सकता है।
हर जिले में एक Public School Transparency Portal बनाया जा सकता है।
हर स्कूल की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध हो:
स्कूल का नाम | छात्र संख्या | शिक्षक संख्या | भवन | कमरे | शौचालय | पानी | बिजली | कंप्यूटर | पुस्तकालय | बजट | खर्च | मरम्मत | शिकायतें | कार्रवाई
इसके साथ नागरिकों के लिए शिकायत पोर्टल हो।
यदि कोई व्यक्ति स्कूल की समस्या की फोटो भेजना चाहता है तो उसके लिए निर्धारित व्यवस्था हो।
इस मॉडल में प्रशासन की गरिमा भी बचेगी और जनता की निगरानी भी।
5 सितंबर का मार्च इसलिए बड़ा है
5 सितंबर का मार्च केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है।
यह तीन अलग-अलग विवादों को एक मंच पर ला रहा है:
पहला—सरकारी आश्वासन
25 जुलाई को जो वादे हुए, उनका कितना पालन हुआ?
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
दूसरा—पुलिस जवाबदेही
20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई में क्या हुआ? किसने क्या किया? किस स्तर पर बल का इस्तेमाल हुआ?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही और प्रस्तावित उच्चस्तरीय जांच के कारण मुद्दे की संवेदनशीलता और बढ़ गई है। (The New Indian Express)
तीसरा—शिक्षा व्यवस्था
सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति क्या है और सरकार जनता को उसका स्वतंत्र मूल्यांकन करने का कितना अवसर देती है?
इन तीनों प्रश्नों को जोड़कर देखें तो CJP का आंदोलन केवल परीक्षा विवाद तक सीमित नहीं रह गया है।
सरकार और आंदोलन—दोनों के लिए लक्ष्मण रेखा जरूरी
लोकतंत्र में आंदोलन जरूरी है।
सरकार से सवाल पूछना जरूरी है।
पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाना जरूरी है।
सरकारी स्कूलों की खराब व्यवस्था उजागर करना जरूरी है।
लेकिन इसी लोकतंत्र में प्रशासन की जिम्मेदारी भी जरूरी है।
बच्चों की सुरक्षा, स्कूल की कार्यप्रणाली, कानून-व्यवस्था और व्यक्तिगत निजता की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इसलिए समाधान किसी एक पक्ष की जीत में नहीं है।
समाधान है—
पारदर्शिता + कानून + जवाबदेही + नागरिक भागीदारी।
एक सवाल सरकार से, एक सवाल CJP से
सरकार से सवाल:
अगर सरकारी स्कूल अच्छे हैं तो जनता को उनकी स्थिति देखने में इतनी परेशानी क्यों होनी चाहिए?
और अगर स्कूलों में कमियां हैं तो उन्हें सामने लाने वाले नागरिकों को दुश्मन की तरह देखने के बजाय शिकायतकर्ता और निगरानीकर्ता क्यों नहीं माना जाना चाहिए?
CJP से सवाल:
यदि आप जनता की ओर से स्कूलों का सामाजिक ऑडिट करना चाहते हैं तो क्या आप स्वयं भी ऐसी प्रक्रिया स्वीकार करेंगे जिसमें बच्चों की निजता, स्कूल की सुरक्षा और कानून का पूरा पालन हो?
इन दोनों सवालों का ईमानदार जवाब ही इस विवाद को रास्ता दे सकता है।
5 सितंबर के बाद क्या होगा?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि 5 सितंबर का मार्च कितना बड़ा होगा या प्रशासन की प्रतिक्रिया क्या होगी।
लेकिन इतना स्पष्ट है कि CJP ने आंदोलन का दूसरा चरण शुरू करने का फैसला कर लिया है। 24 अगस्त की बैठक के बाद संगठन ने 5 सितंबर का कार्यक्रम घोषित किया है और इसे 25 जुलाई के कथित अधूरे सरकारी आश्वासनों से जोड़ा है। (The Times of India)
इसी समय “School Thik Karo” अभियान ने आंदोलन को एक नया सामाजिक मुद्दा दे दिया है।
अब सवाल सिर्फ NEET का नहीं है।
सवाल है—
परीक्षा व्यवस्था कैसी हो?
सरकार युवाओं से किए वादे कितनी गंभीरता से निभाती है?
प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी?
पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच कैसे होगी?
सरकारी स्कूलों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
और जनता को सरकारी संस्थानों की निगरानी का कितना अधिकार होगा?
निष्कर्ष: स्कूलों के दरवाजे बंद नहीं, व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए
भारत जैसे लोकतंत्र में सरकारी संस्थाएं जनता के पैसे से चलती हैं। इसलिए उनमें पारदर्शिता आवश्यक है।
लेकिन पारदर्शिता का मतलब यह नहीं कि कोई भी व्यक्ति किसी भी सरकारी परिसर में बिना अनुमति प्रवेश करे। उसी तरह सुरक्षा का मतलब यह भी नहीं होना चाहिए कि प्रशासन जनता से अपने काम का निरीक्षण ही छिपा ले।
सरकारी स्कूलों में बिना अनुमति प्रवेश रोकने का प्रशासनिक अधिकार हो सकता है; लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल स्कूलों की कमियों पर सार्वजनिक निगरानी को दबाने के लिए नहीं होना चाहिए।
सरकार को यदि लगता है कि CJP या कोई अन्य संगठन नियम तोड़ रहा है तो कानून के अनुसार कार्रवाई करे। लेकिन साथ ही सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जनता को सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति जानने के वैध, आसान और पारदर्शी रास्ते उपलब्ध हों।
दूसरी तरफ CJP को भी यह साबित करना होगा कि “School Thik Karo” केवल राजनीतिक प्रदर्शन नहीं बल्कि वास्तविक सामाजिक ऑडिट है—जिसमें तथ्य, दस्तावेज, निष्पक्षता, बच्चों की निजता और कानून का सम्मान हो।
क्योंकि अंततः सवाल CJP बनाम सरकार का नहीं है।
सवाल भारत के उस बच्चे का है जो सरकारी स्कूल में पढ़ता है।
उसे अच्छी इमारत चाहिए, लेकिन केवल रंगी हुई दीवार नहीं।
उसे शिक्षक चाहिए, लेकिन केवल उपस्थिति रजिस्टर नहीं।
उसे शौचालय चाहिए, लेकिन केवल कागज पर दर्ज शौचालय नहीं।
उसे किताबें चाहिए, बिजली चाहिए, पानी चाहिए, सुरक्षित वातावरण चाहिए और सबसे बढ़कर—ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जिस पर उसके माता-पिता भरोसा कर सकें।
और यदि कोई सरकार यह सब दे रही है, तो उसे नागरिक निगरानी से डरने की जरूरत नहीं।
क्योंकि मजबूत प्रशासन सवालों से नहीं डरता—वह सवालों का जवाब देता है।
5 सितंबर का मार्च इसी जवाबदेही की अगली परीक्षा बनने जा रहा है।
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