SCO में मोदी के सामने सबसे बड़ा इम्तिहान: अमेरिका की छाया से निकलेंगे या किसान-छोटे व्यापारी फिर रह जाएंगे पीछे?
SCO Summit 2026 भारत के लिए रणनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक Bargaining का बड़ा अवसर है। क्या भारत अमेरिका की छाया से बाहर निकलकर चीन, रूस और मध्य एशिया से अपने हित में सौदे कर पाएगा? सबसे बड़ा सवाल—क्या इन फैसलों में किसान, छोटे व्यापारी और MSME का हित भी सुरक्षित होगा?
By- ch. Sudhir Talyan
बिश्केक में हो रहा SCO शिखर सम्मेलन भारत के लिए केवल विदेश नीति का एक और पड़ाव नहीं है। यह उस समय हो रहा है जब दुनिया पुरानी शक्ति-संरचना से बाहर निकल रही है और व्यापार, ऊर्जा, युद्ध, प्रतिबंध तथा आपूर्ति-श्रृंखलाओं के सवाल एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं। भारत के सामने अब एक असाधारण अवसर है—वह अमेरिका, चीन या रूस में से किसी एक की छाया बनने के बजाय अपने हितों के आधार पर सभी से सौदे कर सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सम्मेलन में भारत की प्राथमिकताओं को सुरक्षा, संपर्क और अवसर के रूप में रख रहे हैं।
लेकिन असली सवाल भाषण का नहीं है।
सवाल यह है कि भारत बातचीत की मेज पर कितना मांगता है और बदले में कितना देता है?
यहीं से SCO भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर भी बन सकता है और एक और खोया हुआ मौका भी।
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दुनिया बदल रही है, भारत को भी अपनी विदेश नीति बदलनी होगी
एक समय था जब भारत की विदेश नीति का बड़ा हिस्सा पश्चिम, विशेषकर अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत करने के इर्द-गिर्द देखा जाता था। अमेरिका भारत के लिए महत्वपूर्ण है और रहेगा। तकनीक, निवेश, शिक्षा, रक्षा और बाजार—इन सभी क्षेत्रों में अमेरिका की भूमिका को नकारना मूर्खता होगी।
लेकिन अमेरिका का मित्र होना और अमेरिकी रणनीतिक प्राथमिकताओं का अनुसरण करना—दो अलग बातें हैं।
भारत का राष्ट्रीय हित किसी दूसरे देश की विदेश नीति की परछाईं नहीं हो सकता।
आज रूस भारत के लिए ऊर्जा और रक्षा का महत्वपूर्ण साझेदार है। चीन भारत का सबसे बड़ा चुनौतीपूर्ण पड़ोसी होने के साथ-साथ एक विशाल व्यापारिक शक्ति भी है। ईरान भारत को मध्य एशिया तक पहुंच देने वाला महत्वपूर्ण द्वार है। मध्य एशिया ऊर्जा, खनिज और नए बाजारों का क्षेत्र है।
SCO इन सभी को एक ही मेज पर बैठाता है।
यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
भारत को इस मंच का इस्तेमाल किसी अमेरिका-विरोधी गठबंधन में शामिल होने के लिए नहीं, बल्कि अमेरिकी निर्भरता से रणनीतिक स्वतंत्रता हासिल करने के लिए करना चाहिए।
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भारत के पास Bargaining Power है—लेकिन क्या वह उसका इस्तेमाल करेगा?
कूटनीति में केवल दोस्ती नहीं होती, लेन-देन भी होता है।
भारत रूस के लिए बड़ा बाजार है।
चीन के लिए बड़ा उपभोक्ता बाजार है।
मध्य एशिया के लिए बड़ा आर्थिक साझेदार बन सकता है।
ईरान के लिए भारत निवेश और व्यापार का महत्वपूर्ण स्रोत है।
भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी आबादियों में से एक है, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और एक विशाल उपभोक्ता बाजार है।
फिर भारत बातचीत में सिर्फ यह क्यों कहे कि हम आपके साथ व्यापार बढ़ाना चाहते हैं?
भारत को कहना चाहिए—
हम व्यापार बढ़ाएंगे, लेकिन हमारे किसान को बाजार मिलेगा या नहीं?
हम आयात बढ़ाएंगे, लेकिन हमारे छोटे उद्योग का क्या होगा?
हम निवेश लेंगे, लेकिन रोजगार कहां बनेगा?
हम आपके बाजार खोलेंगे, लेकिन हमारे उत्पाद आपके बाजार में कितने जाएंगे?
यही असली bargaining है।
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चीन के साथ सबसे बड़ा सवाल—व्यापार या व्यापार घाटा?
भारत और चीन का व्यापार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
2025-26 में भारत ने चीन को लगभग 19.47 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि चीन से लगभग 131.63 अरब डॉलर का आयात किया। व्यापार घाटा करीब 112.16 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है।
यह भारत के छोटे उद्योगों, निर्माताओं और व्यापारियों की कहानी भी है।
यदि चीन भारत को मशीनें, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, सोलर उपकरण, औद्योगिक सामान और दूसरे उत्पाद बेचता रहे, लेकिन भारत के किसान, दवा उद्योग, खाद्य उत्पादक, इंजीनियरिंग उद्योग और छोटे निर्माता चीन में अपना माल न बेच सकें, तो यह मुक्त व्यापार नहीं—एकतरफा बाजार खोलना है।
भारत को SCO की मेज पर चीन से पूछना चाहिए:
भारतीय कृषि उत्पादों के लिए आपका बाजार कितना खुलेगा?
भारतीय दवाओं के लिए कितनी regulatory बाधाएं हटेंगी?
भारतीय MSME उत्पादों को कितनी बाजार पहुंच मिलेगी?
भारत से चीन को value-added exports कितने बढ़ेंगे?
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी चीन के साथ बाजार पहुंच और व्यापार असंतुलन के मुद्दे को उठाया है।
इसलिए अब केवल सीमा पर शांति की बात पर्याप्त नहीं है।
सीमा पर शांति के साथ व्यापार में न्याय भी चाहिए।
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और इस पूरे खेल में किसान कहां है?
यही वह सवाल है जिसे भारत अक्सर अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों में भूल जाता है।
जब सरकार विदेशी बाजारों की बात करती है तो आंकड़ों में अरबों डॉलर दिखाई देते हैं।
लेकिन किसान को दिखाई देता है—
उसकी फसल का भाव।
यदि SCO के सदस्य देशों से सस्ता कृषि आयात भारत में आता है, तो उसका असर सीधे किसान पर पड़ता है।
इसलिए भारत को किसी भी व्यापारिक समझौते में यह देखना होगा कि:
भारतीय किसान की MSP और लागत संरचना सुरक्षित रहे;
संवेदनशील कृषि उत्पादों पर अंधाधुंध आयात न हो;
भारतीय दाल, तिलहन, फल, सब्जी, डेयरी और प्रसंस्कृत खाद्य को नए बाजार मिलें;
किसान उत्पादक संगठनों को सीधे विदेशी बाजारों से जोड़ा जाए;
छोटे खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को निर्यात नेटवर्क मिले।
भारत को यह समझना होगा कि किसान केवल subsidy लेने वाला व्यक्ति नहीं है; वह संभावित exporter भी है।
यदि मध्य एशिया के बाजार में भारतीय मसाले, चावल, फल, दवाएं, कपड़ा, मशीनरी और processed food जा सकते हैं, तो SCO भारत के गांवों के लिए नया बाजार बन सकता है।
लेकिन यदि SCO केवल बड़ी कंपनियों के लिए व्यापार खोलता है और किसान वही पुरानी मंडी में लागत से नीचे बेचता रहता है, तो ऐसी विदेश नीति का लाभ किसे मिला?
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छोटे व्यापारी की भी परीक्षा है
भारत में करोड़ों छोटे व्यापारी और MSME हैं।
उनके लिए चीन से आने वाला सस्ता माल कभी अवसर है तो कभी खतरा।
सस्ता कच्चा माल उनके लिए लाभदायक हो सकता है, लेकिन यदि तैयार माल इतनी मात्रा में आयात हो कि भारतीय छोटे निर्माता उत्पादन बंद कर दें, तो वही व्यापार उनकी रोजी-रोटी छीन सकता है।
इसलिए भारत को SCO में “Import More” नहीं, “Trade Fairer” की नीति रखनी चाहिए।
भारत को अपने छोटे व्यापारियों के लिए:
बाजार चाहिए, सिर्फ आयात नहीं।
Central Asia में भारतीय MSME के लिए विशेष व्यापार गलियारे बन सकते हैं। भारतीय डिजिटल भुगतान व्यवस्था, दवाइयां, चिकित्सा सेवाएं, शिक्षा, कृषि मशीनरी, कपड़ा, ऑटो कंपोनेंट और खाद्य प्रसंस्करण उत्पाद वहां पहुंच सकते हैं।
विशेषज्ञों ने भी Central Asia में भारत के लिए trade, healthcare, digital infrastructure और critical minerals जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक अवसरों की ओर संकेत किया है।
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Central Asia: भारत की अगली आर्थिक सीमा
कजाखस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान भारत के लिए केवल नक्शे पर दूर बैठे देश नहीं हैं।
वे भविष्य के बाजार हैं।
वे uranium, energy, minerals और अन्य रणनीतिक संसाधनों से समृद्ध हैं।
भारत को वहां चीन से मुकाबला करने के बजाय अपना अलग economic model प्रस्तुत करना चाहिए।
चीन infrastructure देता है।
भारत technology, pharmaceuticals, education, healthcare, digital public infrastructure और human capital दे सकता है।
यह भारत की वास्तविक ताकत है।
लेकिन इसके लिए सड़क चाहिए, रेल चाहिए, बंदरगाह चाहिए और व्यापारिक भुगतान की व्यवस्था चाहिए।
यहीं Chabahar और International North-South Transport Corridor महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
भारत यदि ईरान के रास्ते Central Asia तक पहुंच बनाता है तो पाकिस्तान पर निर्भरता कम होगी और भारत के उत्पादों के लिए एक नया भू-आर्थिक रास्ता खुलेगा। INSTC लगभग 7,200 किलोमीटर लंबे बहु-माध्यमीय नेटवर्क के रूप में भारत, ईरान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप को जोड़ने की परिकल्पना करता है।
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रूस के साथ संबंध: केवल तेल और हथियार से आगे
भारत-रूस संबंधों में भी नई आर्थिक सोच की जरूरत है।
बिश्केक में मोदी और पुतिन की मुलाकात में व्यापार, अर्थव्यवस्था, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा हुई।
भारत को यहां भी bargaining करनी चाहिए।
यदि भारत रूस से ऊर्जा खरीदता है तो बदले में भारतीय कृषि उत्पाद, दवाएं, मशीनरी, engineering goods और सेवाओं की बाजार पहुंच क्यों न बढ़े?
भारत को रूस के साथ ऐसा व्यापार मॉडल बनाना चाहिए जिसमें कच्चा माल रूस से और value addition भारत में हो।
इससे किसान, उद्योग और रोजगार—तीनों को लाभ हो सकता है।
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ईरान के साथ व्यापार: अमेरिका की छाया से निकलने की असली परीक्षा
ईरान के साथ भारत का रिश्ता इस पूरी रणनीति का सबसे संवेदनशील हिस्सा है।
अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत और ईरान व्यापार बढ़ाने पर बात कर रहे हैं। बिश्केक में मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने व्यापार को बढ़ाने और विविध बनाने पर चर्चा की।
यहां भारत को बेहद सावधानी लेकिन उतनी ही स्पष्टता से काम करना होगा।
भारत की ईरान नीति Washington से अनुमति लेकर भी नहीं चलनी चाहिए।
भारत का हित जहां हो, वहां भारत को अपने विकल्प खुले रखने चाहिए।
यही strategic autonomy है।
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SCO भारत को अमेरिका से दूर नहीं, अमेरिका से स्वतंत्र बना सकता है
यह फर्क समझना जरूरी है।
भारत को अमेरिका छोड़ने की जरूरत नहीं।
भारत को चीन के साथ किसी सैन्य या राजनीतिक गुट में जाने की भी जरूरत नहीं।
भारत को रूस का पक्षधर बनने की भी जरूरत नहीं।
भारत को केवल इतना करना है कि किसी भी शक्ति-केंद्र को यह अधिकार न मिले कि वह भारत के विकल्प सीमित कर दे।
यदि भारत के पास अमेरिका है, तो रूस भी हो।
यदि अमेरिका है, तो ईरान से संबंध भी हों।
यदि चीन से प्रतिस्पर्धा है, तो चीन से व्यापार भी हो।
यदि पश्चिमी बाजार हैं, तो Central Asian बाजार भी हों।
यही बहुध्रुवीय भारत है।
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लेकिन खतरा भी बड़ा है—भारत कहीं फिर चूक न जाए
SCO में भारत की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी भौगोलिक connectivity और सीमित आर्थिक संसाधन हैं। Gateway House के विश्लेषण में भी Central Asia तक भारत की कमजोर परिवहन connectivity और वित्तीय संसाधनों की कमी को प्रमुख बाधाओं में गिना गया है।
इसलिए केवल समझौते करना पर्याप्त नहीं।
भारत को हर समझौते के साथ समयसीमा, निवेश, जिम्मेदार एजेंसी और परिणाम का लक्ष्य तय करना चाहिए।
वरना सम्मेलन खत्म होगा।
घोषणाएं होंगी।
फोटो आएंगी।
संयुक्त बयान जारी होगा।
और भारत का किसान अगले दिन फिर अपनी मंडी में उसी पुराने सवाल के साथ खड़ा होगा—
“मेरी फसल का दाम कौन तय करेगा?”
छोटा व्यापारी पूछेगा—
“मेरे माल का बाजार कहां है?”
युवा पूछेगा—
“नौकरी कहां है?”
और देश पूछेगा—
“इतनी बड़ी कूटनीति का फायदा जमीन पर किसे मिला?”
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इस बार भारत को ‘डील’ नहीं, ‘बर्गेनिंग’ करनी चाहिए
SCO भारत के लिए सफल तभी होगा जब भारत वहां मांगने नहीं, सौदा करने जाए।
भारत कहे—
हम आपका बाजार खोलेंगे, आप अपना बाजार खोलिए।
हम आपकी ऊर्जा खरीदेंगे, आप हमारे उत्पाद खरीदिए।
हम निवेश करेंगे, लेकिन स्थानीय रोजगार और technology transfer सुनिश्चित होगा।
हम connectivity बनाएंगे, लेकिन वह केवल किसी एक देश की रणनीतिक परियोजना नहीं होगी।
हम व्यापार बढ़ाएंगे, लेकिन किसान और छोटे उद्योग की कीमत पर नहीं।
यही वह सोच है जो भारत को एक बड़े बाजार से एक बड़ी आर्थिक शक्ति में बदल सकती है।
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अंतिम सवाल: क्या भारत इस बार किसान को याद रखेगा?
मेरी नजर में यही बिश्केक सम्मेलन की सबसे बड़ी परीक्षा है।
भारत ने वर्षों में अपनी विदेश नीति में काफी आत्मविश्वास अर्जित किया है। अब उस आत्मविश्वास को आर्थिक bargaining power में बदलने का समय है।
SCO भारत को अमेरिका की छाया से बाहर निकलने का अवसर देता है—अमेरिका के खिलाफ जाकर नहीं, बल्कि किसी भी एक शक्ति पर निर्भरता से मुक्त होकर।
यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में परिपक्वता होगी।
और यदि इस स्वतंत्रता का इस्तेमाल भारत ने अपने किसानों, छोटे व्यापारियों, MSME और रोजगार के हित में किया, तो SCO केवल विदेश नीति की उपलब्धि नहीं रहेगा।
वह गांव और बाजार तक पहुंचने वाली आर्थिक नीति बन सकता है।
लेकिन यदि भारत ने फिर बड़े भू-राजनीतिक शब्दों के पीछे छोटे भारतीय की जरूरतों को भुला दिया, तो इतिहास यही कहेगा—
भारत के पास अवसर था, ताकत भी थी, दुनिया की मेज पर सीट भी थी—लेकिन वह अपनी कीमत तय करना भूल गया।
इसलिए बिश्केक में भारत की असली परीक्षा यह नहीं है कि मोदी कितने प्रभावशाली भाषण देते हैं।
असली परीक्षा यह है कि भारत बातचीत की मेज से अपने किसान के लिए बाजार, अपने छोटे व्यापारी के लिए अवसर, अपने उद्योग के लिए कच्चा माल, अपनी अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा और अपनी विदेश नीति के लिए स्वतंत्रता लेकर लौटता है या नहीं।
**अगर bargaining मजबूत हुई, तो यह SCO भारत के लिए सिर्फ एक सम्मेलन नहीं—रणनीतिक स्वतंत्रता की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।**
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