“1,678 गलतियाँ और एक भूख हड़ताल: क्या सरकारी जवाबदेही को जगाने के लिए नागरिक का भूखा रहना जरूरी है?”
ओडिशा की सरकारी पाठ्यपुस्तकों में 1,678 से अधिक गलतियों ने शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक लापरवाही और सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ₹380 करोड़ की लागत, महीनों की खामोशी और आखिरकार भूख हड़ताल—क्या व्यवस्था को जगाने के लिए नागरिक का भूखा रहना जरूरी है?
By- Ch. Sudhir Taliyan
यह विडंबना ही कही जाएगी कि जिन गलतियों का होना ही नहीं चाहिए था, वे सरकारी स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में हो गईं। और उससे भी बड़ी विडंबना यह है कि जब इतनी बड़ी संख्या में गलतियाँ सामने आईं, तब सरकारी मशीनरी ने उन्हें स्वतः पहचानकर तत्काल ठीक करने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के बजाय मामले को लंबे समय तक खिंचने दिया। अंततः यदि किसी आम नागरिक को अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए भूख हड़ताल जैसे कठोर लोकतांत्रिक रास्ते का सहारा लेना पड़े, तो यह केवल उस व्यक्ति के संघर्ष की कहानी नहीं है—यह सरकारी जवाबदेही, प्रशासनिक संवेदनशीलता और संस्थागत जिम्मेदारी के लगातार कमजोर होते जाने का संकेत है।
ओडिशा की सरकारी स्कूलों की नई पाठ्यपुस्तकों का विवाद इसी सवाल को हमारे सामने खड़ा करता है।
नई पुस्तकों में 1,678 से अधिक तथ्यात्मक, भाषाई, मुद्रण और संदर्भ संबंधी त्रुटियां सामने आने की रिपोर्टों ने शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। मामला केवल एक-दो छपाई की भूलों तक सीमित नहीं है। इतिहास, भूगोल, विज्ञान, चित्रों और सामान्य ज्ञान से जुड़ी गलतियों ने यह सवाल पैदा किया कि आखिर इन पुस्तकों को बच्चों के हाथों तक पहुंचने से पहले किस स्तर की जांच से गुजरना पड़ा था।
गलती होना और गलती को होने देना—दो अलग बातें हैं
किसी भी मानवीय व्यवस्था में गलती की संभावना को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। लेकिन शिक्षा की पाठ्यपुस्तक कोई सामान्य दस्तावेज नहीं होती।
एक सरकारी पाठ्यपुस्तक बच्चे के लिए ज्ञान का आधिकारिक स्रोत होती है। बच्चा किताब में लिखी बात को सही मानता है। शिक्षक उसी के आधार पर पढ़ाता है। अभिभावक उसी पर भरोसा करते हैं और परीक्षा व्यवस्था भी उसी पाठ्यक्रम के आसपास चलती है।
ऐसे में यदि किसी पुस्तक में कोई तथ्य गलत छप जाए तो यह सिर्फ प्रिंटिंग की गलती नहीं है। यह उस बच्चे के ज्ञान में गलत सूचना डालने की संभावना है।
और यदि ऐसी गलतियां एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों और हजारों हों, तो मामला और गंभीर हो जाता है।
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल फिर भी गलतियों की संख्या नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल है—इन गलतियों को पकड़ा क्यों नहीं गया?
किताब लिखने वाला व्यक्ति गलती कर सकता है। संपादक गलती कर सकता है। अनुवादक गलती कर सकता है। प्रूफरीडर गलती कर सकता है।
लेकिन जब लेखक से लेकर संपादक, विषय विशेषज्ञ, प्रूफरीडर, समीक्षा समिति और सरकारी अधिकारी—इतने स्तर मौजूद हों, तब इतनी बड़ी संख्या में गलतियां अंतिम पुस्तक तक कैसे पहुंच गईं?
यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर जनता को चाहिए।
सरकारी मशीनरी का काम नागरिक के भूखे रहने के बाद शुरू नहीं होना चाहिए
लोकतंत्र में सरकार से अपेक्षा होती है कि वह नागरिकों की समस्याओं का संज्ञान समय रहते ले।
सरकार का पूरा प्रशासनिक ढांचा इसलिए बनाया गया है कि समस्याओं का समाधान लोगों के आंदोलन को चरम पर पहुंचने से पहले हो जाए।
यदि किसी स्कूल की किताब में गलत तथ्य छपता है तो शिक्षक उसे विभाग तक पहुंचा सकता है। शिक्षा अधिकारी रिपोर्ट भेज सकते हैं। विभाग जांच कर सकता है। विशेषज्ञों से समीक्षा कराई जा सकती है। सरकार तत्काल संशोधन जारी कर सकती है।
यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है।
लेकिन यदि यह सब तब होता है जब कोई व्यक्ति भूख हड़ताल पर बैठने को मजबूर हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रशासन आखिर किसका इंतजार कर रहा था?
क्या सरकार को कार्रवाई करने के लिए नागरिक का भूखा रहना जरूरी है?
क्या किसी मुद्दे की गंभीरता का पैमाना यह हो गया है कि जब तक कोई व्यक्ति अपनी जान और स्वास्थ्य को जोखिम में नहीं डालता, तब तक फाइलें नहीं चलतीं?
यदि ऐसा है तो यह लोकतंत्र और प्रशासन दोनों के लिए चिंताजनक स्थिति है।
भूख हड़ताल सिर्फ विरोध नहीं, व्यवस्था के लिए आईना है
भूख हड़ताल कोई सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। कोई व्यक्ति लंबे समय तक भोजन त्यागने का निर्णय आसानी से नहीं लेता।
जब कोई नागरिक इस स्तर तक जाने का निर्णय करता है, तो उसके पीछे यह भावना होती है कि सामान्य प्रशासनिक और लोकतांत्रिक रास्तों से उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही।
यही कारण है कि मैनवर अली का आंदोलन केवल एक व्यक्ति की मांग के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसकी असली जांच यह होनी चाहिए कि आखिर ऐसी कौन-सी प्रशासनिक परिस्थितियां बनीं कि एक नागरिक को अपनी बात मनवाने के लिए भूख हड़ताल का सहारा लेना पड़ा?
यदि सरकार समय पर कार्रवाई कर देती, यदि संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा जाता, यदि गलत पुस्तकों को लेकर स्पष्ट निर्णय लिया जाता और यदि बच्चों के शैक्षणिक नुकसान की चिंता तत्काल की जाती, तो शायद भूख हड़ताल की नौबत ही नहीं आती।
महीनों की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल है
पाठ्यपुस्तक विवाद जून में सार्वजनिक रूप से सामने आया। सरकार ने जांच समिति बनाई। अधिकारियों पर कार्रवाई हुई। बाद में मामला Crime Branch की जांच तक पहुंचा।
लेकिन इसके बावजूद यदि नागरिकों और छात्र संगठनों को लगातार आंदोलन करना पड़े, तो यह प्रश्न सरकार से पूछा जाना चाहिए कि प्रशासनिक कार्रवाई और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच इतनी दूरी क्यों है?
सरकार को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि उसने जांच समिति बना दी।
जनता जानना चाहती है:
- किताबें तैयार करने की जिम्मेदारी किसकी थी?
- समीक्षा किसने की?
- प्रूफरीडिंग किसने की?
- अंतिम मंजूरी किस अधिकारी ने दी?
- इतनी बड़ी संख्या में गलतियां किस स्तर पर छूटीं?
- सार्वजनिक धन का कितना उपयोग हुआ?
- गलत पुस्तकों के कारण कितना अतिरिक्त खर्च होगा?
- बच्चों को हुए शैक्षणिक नुकसान की भरपाई कैसे होगी?
- क्या जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के अधिकारियों तक सीमित रहेगी?
- क्या वरिष्ठ स्तर पर भी जवाबदेही तय होगी?
इन सवालों के जवाब केवल विभागीय प्रेस विज्ञप्ति से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और सार्वजनिक दस्तावेजों से मिलने चाहिए।
₹380 करोड़ का सवाल भी केवल रकम का सवाल नहीं
रिपोर्टों के अनुसार इन 55 नई पाठ्यपुस्तकों की छपाई पर लगभग ₹380 करोड़ खर्च होने की बात सामने आई है।
यह रकम अपने आप में बड़ी है। लेकिन असली सवाल यह नहीं कि पैसा कितना खर्च हुआ।
असली सवाल यह है कि इतना सार्वजनिक धन खर्च करने के बाद सरकार बच्चों को कैसी किताब दे रही है?
यदि किताबें गलत हैं, उन्हें सुधारना है, फिर दोबारा छापना है, स्कूलों तक पहुंचाना है और पूरी प्रक्रिया पर फिर से खर्च करना है, तो जनता पर दोहरी आर्थिक मार पड़ती है।
पहली बार गलत प्रक्रिया पर खर्च।
दूसरी बार उसे सुधारने पर खर्च।
और यदि जांच में वित्तीय अनियमितता सामने आती है तो तीसरा सवाल भी खड़ा होता है—उस नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
सार्वजनिक धन किसी अधिकारी या सरकार की निजी संपत्ति नहीं है। यह जनता के टैक्स का पैसा है।
बच्चे प्रयोगशाला के चूहे नहीं हैं
शिक्षा नीति में जल्दबाजी की कीमत सबसे पहले बच्चों को चुकानी पड़ती है।
एक आठवीं कक्षा का बच्चा किसी इतिहास, भूगोल या विज्ञान के तथ्य को पढ़कर उसे इंटरनेट या विश्वसनीय स्रोत से सत्यापित नहीं करता। वह अपनी किताब पर भरोसा करता है।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
अगर किताब उसे गलत बताती है, तो गलती बच्चे की नहीं है।
यदि परीक्षा उसी पाठ्यक्रम से होती है, तब स्थिति और गंभीर हो जाती है।
सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि गलत पाठ्यपुस्तकों के कारण किसी विद्यार्थी को शैक्षणिक नुकसान न हो। किसी बच्चे को गलत पढ़ने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
जवाबदेही का अर्थ केवल निलंबन नहीं है
कुछ अधिकारियों को निलंबित कर देना आवश्यक कदम हो सकता है, लेकिन यह अंतिम जवाबदेही नहीं है।
जवाबदेही का मतलब है कि पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी तय हो।
किस स्तर पर निर्णय गलत हुआ?
किसने दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए?
किसने अंतिम मंजूरी दी?
किसने गुणवत्ता की पुष्टि की?
और यदि प्रणालीगत विफलता थी, तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है?
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जांच का उद्देश्य केवल कुछ कर्मचारियों को दंडित करके मामला बंद करना न हो।
व्यवस्था की बीमारी का इलाज केवल एक-दो अधिकारियों को निलंबित करने से नहीं होगा।
प्रक्रिया को बदलना होगा।
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सरकार को आलोचना से नहीं, जवाबदेही से डरना चाहिए
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना सरकार विरोधी गतिविधि नहीं है।
यदि विद्यार्थी, शिक्षक, अभिभावक और नागरिक पूछते हैं कि सरकारी किताब में इतनी गलतियां कैसे आईं, तो सरकार को नाराज होने के बजाय जवाब देना चाहिए।
विरोध को दबाने या आलोचना को राजनीतिक रंग देने से समस्या समाप्त नहीं होती।
समस्या तब समाप्त होगी जब सरकार यह साबित करेगी कि:
गलती हुई है, गलती स्वीकार की गई है, जिम्मेदारी तय की गई है, बच्चों का नुकसान रोका गया है और भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी।
यही सुशासन है।
भूख हड़ताल की जरूरत ही क्यों पड़ी?
सबसे असहज सवाल आखिर यही है।
यदि एक नागरिक को सरकारी स्कूलों की किताबों की गलतियों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए भूख हड़ताल करनी पड़े, तो हमें केवल उस व्यक्ति से यह नहीं पूछना चाहिए कि वह इतना कठोर कदम क्यों उठा रहा है।
हमें सरकार से भी पूछना चाहिए—
“आपने उसकी बात समय पर क्यों नहीं सुनी?”
सरकार की शक्ति इस बात में नहीं है कि उसके पास पुलिस, प्रशासन और कानून है।
सरकार की असली ताकत इस बात में है कि नागरिक को अपनी बात कहने के लिए अपने शरीर को संघर्ष का हथियार न बनाना पड़े।
अगर कोई व्यक्ति भूखा बैठकर सरकार को यह याद दिलाने को मजबूर है कि बच्चों की किताबें सही होनी चाहिए, अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और सार्वजनिक धन का सम्मान होना चाहिए, तो यह उस व्यक्ति की विफलता नहीं है।
यह शासन व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का क्षण है।
लोकतंत्र में सरकार को नागरिक की आखिरी चीख सुनने के लिए उसकी भूख हड़ताल का इंतजार नहीं करना चाहिए।
क्योंकि जिस दिन किसी आम आदमी को अपनी जायज बात मनवाने के लिए भूखा रहना पड़े, उस दिन सवाल केवल किताबों में छपी गलतियों का नहीं रहता।
सवाल यह बन जाता है कि क्या शासन व्यवस्था ने अपनी सबसे बुनियादी जिम्मेदारी—नागरिक के प्रति जवाबदेही—को ही कहीं खो तो नहीं दिया है?
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