GDP की चमक के पीछे आम आदमी की हकीकत: अर्थव्यवस्था, राजनीतिक फंडिंग और मतदाता अधिकार पर बड़े सवाल
भारत की 7.8% GDP वृद्धि, आम जनता की आर्थिक स्थिति, राजनीतिक फंडिंग, BJP की संपत्ति और Form 7 के जरिए मतदाता सूची से नाम हटाने के आरोपों पर सवाल उठाता विश्लेषण।
कल सुबह जब अपने काम के लिए निकलने के बाद आठ घंटे, दस घंटे, बारह घंटे, आप अपनी रीढ़ तोड़कर मेहनत करेंगे। महीने के आखिर में जब आपका वेतन आएगा, तो उसमें से पहले ही TDS काटा जा चुका होगा। फिर आप बाज़ार से तेल, आटा, साबुन और दूसरी ज़रूरी चीज़ें खरीदेंगे, तो उन पर 18 से 28 प्रतिशत तक GST दे चुके होंगे। बाइक में लगभग 100 रुपये में पेट्रोल भरवाएँगे।
यह सब करने के बाद महीने के आखिर में आपकी बचत कितनी होगी? ज़्यादातर परिवारों से अगर आप यह सवाल करेंगे, तो जवाब होगा लगभग शून्य, या कर्ज बढ रहा है....
तो फिर सरकार टीवी पर चिल्ला-चिल्लाकर कैसे बता रही है कि देश की GDP 7.8 प्रतिशत की रफ्तार से बढ रही है?
अगर देश में समृद्धि की बाढ़ आई हुई है, तो देश के 80 करोड़ लोग पाँच किलो मुफ्त राशन की लाइन में क्यों खड़े हैं?
अगर विकास ऐतिहासिक है, तो देश के 45 प्रतिशत युवा बेरोज़गारीका शिकार क्यों हैं?
ये सब विपक्षी दलों के आरोप नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने कहा, समाजवादी पार्टी ने कहा या DMK ने कहा।
भारत सरकार के पूर्व वित्त सचिव और आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने आधिकारिक आँकड़ों का विश्लेषण करते हुए NDTV पर यह कहा है कि सरकार जिस 7.8 या 8 प्रतिशत की विकास दर का ढोल पीट रही है, वह ज़मीनी हकीकत नहीं, बल्कि सांख्यिकी मंत्रालय के GDP Deflator से जुड़ा एक distortion हो सकता है।
गर्ग के मुताबिक, अगर इस distortion को हटा दिया जाए, तो मोदी सरकार के पिछले पाँच वर्षों की वास्तविक औसत विकास दर लगभग 4 से 4.1 प्रतिशत के बीच ठहरती है, जो 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत के सबसे सुस्त दरों में से एक हो सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा आम जनता के खर्च से चलता है। पिछले दो वर्षों में निजी उपभोग की विकास दर लगभग 3 से 4 प्रतिशत के बीच रेंगती रही है। यानी लोग ज़रूरत की चीज़ें बडी मुश्किल से खरीद रहे हैं, क्यो की उनकी खर्च करने की क्षमता पहले जैसी नहीं रही है।
देश की टॉप 500 लिस्टेड कंपनियों की Revenue Growth सिंगल डिजिट यानी लगभग 5 से 6 प्रतिशत के आसपास सिमटती दिखाई देती है।
अगर देश में उत्पादन 8 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, तो फैक्ट्रियों का माल बिक क्यो नही रहा है?
भारत की अर्थव्यवस्था की असली कमर छोटे कारोबारी, छोटे कारीगर, रेहड़ी-पटरी वाले और छोटी वर्कशॉप हैं।
लेकिन सवाल यह है कि इन लोगों का डेटा इन सरकारी तिमाहियों में कितना दिखाई देता है? क्या इन्हें पर्याप्त रूप से गिना जाता है ?
कागज़ों पर देश दौड़ रहा है। सोशल मीडिया पर रील बन रही हैं, ट्वीट हो रहे हैं, प्रचार हो रहा है। लेकिन ज़मीन पर आम नागरिक क्या झेल रहा है—यह एक बड़ा सवाल है।
अब एक दूसरी हकीकत देखते हैं।
यह है राजनीतिक फंडिंग और राजनीतिक संपत्ति की हकीकत।
Association for Democratic Reforms यानी ADR की रिपोर्ट आपने कई बार सुनी होगी।
वित्त वर्ष 2024-25 में आई रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा की कुल संपत्ति 12,171 करोड़ रुपये के पार चली गई। पिछले 10-12 वर्षों में संपत्ति में 1,450 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि का दावा किया गया है।
बताइए, दुनिया की कौन-सी कंपनी इतनी तेज़ी से बड़ी हुई है?
और अब आय का आँकड़ा देखिए।
वित्त वर्ष 2024-25 में देश की छह मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टियों यानी BJP, Congress, AAP, CPM, BSP और NPA की कुल आय लगभग 7,960 करोड़ रुपये रही।
इस 7,960 करोड़ रुपये में अकेले BJP की आय 6,769 करोड़ रुपये थी। यानी कुल राजनीतिक आय का लगभग 85 प्रतिशत।
जहा भाजपा को 6,769 करोड मिले तो देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को केवल 918 करोड़ रुपये मिले।
और अब उस आँकड़े पर आइए, जो इस पूरी रिपोर्ट का केंद्र है याने भाजप को मिलने वाला — ब्याज।
वित्त वर्ष 2023-24 के उपलब्ध ऑडिट आँकड़ों के अनुसार, भाजपाने बैंकों में जमा अपनी हजारों करोड़ रुपये की फिक्स्ड Deposits से लगभग 369 करोड़ रुपये का ब्याज कमाया। यानी लगभग हर दिन 1 करोड़ रुपये।
यह BJP की ब्याज से होने वाली कमाई का आकडा है।
भारत के एक अकेली पार्टी की सिर्फ एक साल की बैंक ब्याज से होने वाली कमाई विपक्ष को आर्थिक रूप से पीछे छोड़ने के लिए पर्याप्त है।
अब इसमें एक और परत जोड़िए। 800 से ज्यादा कॉरपोरेट जैसे पार्टी कार्यालय और डेटा आधारित चुनावी संगठन का नेटवर्क।
एक तार्किक नागरिक के तौर पर सोचकर देखिए—एक राजनीतिक दल इतने पैसे का क्या करता है?
जब किसी कंपनी के पास जरूरत से ज्यादा surplus capital आ जाता है, तो वह monopoly की तरफ बढ़ती है। वह बाजार में ऐसे barriers खड़े करती है कि कोई दूसरा competitor उसके सामने खड़ा न हो सके।
आरोप यह है कि राजनीति में भी कुछ ऐसा ही ढाँचा तैयार किया गया है।
2015-16 में शुरू हुई भारतीय जनता पार्टी की कार्यालय निर्माण योजना का परिणाम क्या हुआ?
देश के 800 से ज्यादा संगठनात्मक जिलों में पार्टी के अपने आधुनिक, एयर-कंडीशंड, बहुमंजिला और कॉरपोरेट शैली के कार्यालय खड़े हो गए हैं या खड़े किए जा रहे हैं।
अब वहाँ दरी बिछाने वाला कार्यकर्ता नहीं है।
वहाँ leased-line internet है, server rack है, 24 घंटे का data monitoring room है और दिल्ली स्थित केंद्रीय कार्यालय से जुड़ा हुआ वीडियो सिस्टम है।
और इस infrastructure का आखिरी इस्तेमाल क्या है?
यहीं आकर यह कहानी आपके voting rights से टकराती है।
कई जगहों पर चुनावी डेटा से जुड़े संगठनात्मक ढाँचे बनाए जाने का दावा किया जाता है।
हर जिला कार्यालय में एक data cell होने की बात कही जाती है। इस data cell के नीचे काम करता है एक पन्ना प्रमुख।
पन्ना प्रमुख का काम अब सिर्फ प्रचार करना नहीं बताया जाता।
उसका काम अपने पन्ने के 30-40 मतदाताओं का डिजिटल एक्स-रे निकालना और यह पहचानना बताया जाता है कि कौन-सा नागरिक सरकार की नीतियों, बेरोज़गारी या महँगाई की वजह से सत्ता के खिलाफ वोट कर सकता है।
और जैसे ही यह पहचान पूरी होती है, सक्रिय होता है चुनाव आयोग की प्रक्रिया से जुड़ा एक कानूनी प्रावधान जिसका नाम है Form No. 7.
Representation of the People Act, 1950 की धारा 22 के तहत यह फॉर्म मतदाता सूची से किसी नाम को हटाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल किया जाता है।
झारखंड से लेकर उत्तर प्रदेश तक Block Level Officers यानी BLOs के अनुभवों को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
आरोप है कि पार्टी कार्यालयों से बड़ी संख्या में Form 7 भरकर एक सामान्य प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक यानी BLO की टेबल पर पहुँचा दिए जाते हैं।
उसमें सिर्फ एक बॉक्स पर टिक होता है—
“यह व्यक्ति यहाँ नहीं रहता, इसका नाम काटा जाए।”
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
झारखंड में जब BLOs ने इसका विरोध किया, तो कुछ मामलों में यह सामने आया कि जिन लोगों को बाहर का निवासी बताकर फॉर्म भरे गए थे, वे पीढ़ियों से उसी स्थान पर रह रहे थे।
चूँकि झारखंड में विपक्ष की सरकार थी, इसलिए BLOs के विरोध के कारण मामला सामने आ गया।
लेकिन उन राज्यों की कल्पना कीजिए, जहाँ डबल इंजन की सरकार है।
क्या चुनाव से ठीक छह महीने पहले, बिना पर्याप्त नोटिस और सुनवाई के, किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटाया जा सकता है?
यह सवाल सिर्फ किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है। यह सवाल लोकतंत्र और मताधिकार का है।
दुनिया में लोकतंत्र तब तक ज़िंदा रहता है, जब तक सरकारें जनता के पसीने पर निर्भर होती हैं।
https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
टैक्स के ज़रिए पैसा आता है। जनता काम करती है। जनता खुश होगी तो अर्थव्यवस्था चलेगी और सरकार का खजाना भरेगा।
लेकिन अगर एक ऐसा Corporate Syndicate बन जाए, जो रोज़ाना करोड़ों रुपये सिर्फ ब्याज से कमाने की क्षमता रखता हो, तो क्या होगा?
जब सत्ता के पास हजारों करोड़ रुपये की Balance Sheet हो,
जब सत्ता देश के सैकड़ों जिलों में Tech Company जैसे कार्यालय खड़े कर दे, तो उसे आपकी नाराज़गी की परवाह क्यों होगी? उसे फर्क नहीं पड़ेगा कि देश की असली GDP कितनी है।
उसे फर्क नहीं पड़ेगा कि आप गैस सिलेंडर के लिए कितना पैसा देते हैं।
उसे फर्क नहीं पड़ेगा कि आपकी नौकरी चली गई या आपके बेटे को नौकरी मिली या नहीं।
क्योंकि चुनाव जीतने के लिए अब शायद उसे आपके समर्थन की उतनी जरूरत नहीं रह जाएगी। चुनाव जीतने के लिए उसके पास वित्तीय बारूद मौजूद है, जिससे वह हर Narrative को प्रभावित कर सकती है। हर चैनल पर विज्ञापन चला सकती है।
और अगर फिर भी बात न बने, तो Form 7 की कथित “शांत Surgical Strike” के जरिए आपका नाम मतदाता सूची से गायब किया जा सकता है। जैसा कि पश्चिम बंगाल, दिल्ली और महाराष्ट्र में भी आरोपों के रूप में सामने आया है।
तो कल सुबह जब आपका अलार्म बजे और आप काम पर निकलने के लिए अपने जूतों के फीते बाँध रहे हों, तो बस इतना याद रखिए की, आप इस देश में काम इसलिए कर रहे हैं कि आपका भविष्य बेहतर हो सके।
लेकिन सवाल यह है कि क्या आपकी मेहनत से सिर्फ आपकी जिंदगी बेहतर हो रही है या पूरी व्यवस्था की सांख्यिकी चल रही है?
जब बिना कोई काम किए रोज़ करोड़ों रुपये कमाने वाली एक व्यवस्था यह तय करने लगे कि कल आप इस देश के नागरिक रहेंगे या सिर्फ मतदाता सूची से डिलीट किया हुआ एक नाम बन जाएँगे, तब सवाल पूछना जरूरी है।
डेटा आपकी स्क्रीन पर है। फाइलें खुली हुई हैं। बहस चल रही है।
आप सोचिए कि आपको इस समय क्या करना है।
एक तरफ सरकार की ओर से 7.8 प्रतिशत GDP का जमकर प्रचार-प्रसार हो रहा है। दूसरी तरफ विपक्ष एक पूर्व सचिव के बयान को लेकर सवाल उठा रहा है।
कई लोगों को इसमें BJP के बड़े-बड़े दफ्तर दिखाई देंगे।
लेकिन असली सवाल इन इमारतों से बड़ा है।
सवाल यह है की लोकतंत्र में जनता की ताकत कितनी बची है?
और क्या लोकतंत्र केवल नाम मात्र बचा है ?
प्रकाश कमळताई गोपाळराव पोहरे
98225 93921
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