“बच्चे गायब होते रहे, सरकार सोती रही! अब बच्चों की सुरक्षा के लिए भी सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा?”
भारत में बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल। गुमशुदा और अपहृत बच्चों के आंकड़े बताते हैं कि सरकार को जो व्यवस्था पहले बनानी चाहिए थी, उसके लिए अब PIL क्यों?
By- Ch. Sudhir Talyan
जिस देश में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की पहली जिम्मेदारियों में होना चाहिए, वहां अब बच्चों के अपहरण और गुमशुदगी की जांच के लिए भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। इससे बड़ा प्रशासनिक विफलता का प्रमाण और क्या हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका ने एक ऐसा सवाल देश के सामने रख दिया है जिसे सरकारें वर्षों से टालती रही हैं—जब कोई बच्चा गायब होता है तो देश की पूरी सरकारी मशीनरी एक साथ क्यों नहीं जागती?
मुद्दा केवल एक PIL का नहीं है। मुद्दा उस व्यवस्था का है जिसमें कानून मौजूद हैं, पुलिस मौजूद है, मंत्रालय मौजूद हैं, बाल संरक्षण संस्थाएं मौजूद हैं और अदालतें लगातार दिशा-निर्देश देती रही हैं, लेकिन फिर भी बच्चे गायब होते हैं और उनके परिवार व्यवस्था के दरवाजे पर भटकते रहते हैं।
यह केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं है। यह राज्य की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
हजारों नहीं, लाखों बच्चों का सवाल
बच्चों के गायब होने की समस्या को “कुछ घटनाओं” तक सीमित करके देखना वास्तविकता से आंखें चुराना है।
NCRB के Crime in India 2023 से संबंधित उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में वर्ष 2023 के दौरान 43,706 बच्चे missing के रूप में दर्ज हुए। इनमें 28,248 लड़कियां और 15,458 लड़के थे।
यानी औसतन हर दिन लगभग 120 बच्चे missing report हुए।
यह केवल एक औसत है। इसके पीछे हजारों परिवारों की ऐसी त्रासदी है जिसकी कोई राष्ट्रीय सुर्खी नहीं बनती।
इसी वर्ष kidnapping और abduction के मामलों में 82,106 child victims दर्ज किए गए। Crime Against Children के तहत kidnapping and abduction of children के 79,884 मामले दर्ज हुए।
इन आंकड़ों को पढ़ते समय सबसे खतरनाक गलती यह होगी कि इन्हें सिर्फ सरकारी तालिका का हिस्सा मान लिया जाए।
हर संख्या के पीछे एक बच्चा है।
और हर बच्चे के पीछे एक परिवार।
2013 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था—FIR दर्ज करो
अब सबसे शर्मनाक सवाल।
बच्चों की गुमशुदगी को गंभीरता से लेने के लिए क्या सरकार को 2026 में किसी PIL की जरूरत थी?
नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने Bachpan Bachao Andolan v. Union of India मामले में 2013 में ही स्पष्ट निर्देश दिए थे कि missing child की शिकायत मिलने पर FIR दर्ज की जाए और तत्काल follow-up investigation हो।
यानी आज जो बात PIL के जरिए दोबारा उठाई जा रही है, उसकी बुनियाद देश की सर्वोच्च अदालत लगभग 13 वर्ष पहले रख चुकी थी।
फिर सवाल है—इतने वर्षों में क्या बदला?
क्या हर थाने में व्यवस्था सुधर गई?
क्या हर missing child के मामले में तत्काल जांच शुरू होती है?
क्या हर परिवार को बिना दबाव और बिना भागदौड़ के FIR मिलती है?
अगर जवाब हां है तो फिर ऐसी PIL की आवश्यकता क्यों पड़ी?
और अगर जवाब नहीं है तो जवाबदेह कौन है?
यही वह प्रश्न है जिससे सरकारों को भागना नहीं चाहिए।
गरीब का बच्चा गायब होता है तो आवाज कितनी दूर जाती है?
यह समस्या केवल अपराध की नहीं, सामाजिक असमानता की भी है।
किसी बड़े कारोबारी, प्रभावशाली अधिकारी या राजनीतिक परिवार का बच्चा गायब हो जाए तो प्रशासन की पूरी मशीनरी सक्रिय दिखाई देती है। वरिष्ठ अधिकारी फोन उठाते हैं, टीमें बनती हैं, CCTV खंगाले जाते हैं और हर संभावित रास्ते की तलाश शुरू होती है।
लेकिन गरीब मजदूर का बच्चा?
फुटपाथ पर रहने वाले परिवार का बच्चा?
ईंट-भट्ठे पर काम करने वाले परिवार का बच्चा?
झुग्गी में रहने वाले बच्चे का परिवार?
ग्रामीण गरीब का बच्चा?
इन परिवारों के पास न महंगा वकील है, न राजनीतिक पहुंच और न प्रशासन पर दबाव डालने की ताकत।
गरीब परिवार की सबसे बड़ी समस्या गरीबी ही नहीं, उसकी आवाज का कमजोर होना है।
और जब राज्य की मशीनरी भी उसकी आवाज को पर्याप्त महत्व नहीं देती, तब बच्चा अपराधियों के लिए और अधिक आसान लक्ष्य बन जाता है।
यह स्वीकार करना होगा कि भारत में हर बच्चा समान रूप से सुरक्षित नहीं है।
कानून भले समान हो, लेकिन कानून तक पहुंच समान नहीं है।
“Missing” शब्द के पीछे छिपी भयावहता
किसी बच्चे के गायब होने को सिर्फ एक administrative entry समझना खतरनाक मानसिकता है।
बच्चा घर से गायब हुआ है तो वह रास्ते में हो सकता है, किसी परिचित के साथ जा सकता है, बहला-फुसलाया जा सकता है या किसी संगठित अपराध का शिकार हो सकता है।
इसलिए शुरुआती घंटों में हर मिनट महत्वपूर्ण है।
CCTV फुटेज समय के साथ overwrite हो सकता है। डिजिटल evidence बदल सकता है। संदिग्ध व्यक्ति शहर या राज्य छोड़ सकता है। बच्चा दूसरे स्थान पर पहुंचाया जा सकता है।
फिर भी यदि परिवार को पहले यह साबित करने में समय लगाना पड़े कि उसका बच्चा वास्तव में “लापता” है और मामला दर्ज किया जाना चाहिए, तो यह व्यवस्था की क्रूर विफलता है।
बच्चा गायब हुआ है तो जांच तुरंत शुरू होनी चाहिए—किसी अधिकारी की कृपा से नहीं, व्यवस्था के नियम से।
कानूनों का जंगल, लेकिन कार्रवाई का अकाल
भारत में कानूनों की कमी बताकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती।
BNS में kidnapping के अपराध के प्रावधान हैं। BNSS में FIR और investigation की प्रक्रिया है। बाल संरक्षण के लिए संस्थागत तंत्र है। गृह मंत्रालय ने राज्यों को advisories जारी की हैं। सुप्रीम कोर्ट पहले ही missing children के मामलों पर निर्देश दे चुका है।
तो फिर कमी कहां है?
कमी implementation में है।
और implementation की कमी का अर्थ है accountability की कमी।
सरकार जितनी आसानी से नया कानून बनाने की बात करती है, उतनी ही मजबूती से उसे यह बताना चाहिए कि पुराने कानून और निर्देश कितने प्रभावी ढंग से लागू हो रहे हैं।
हर बार नया कानून मांगना आसान है।
मौजूदा कानून लागू करवाना कठिन है।
लेकिन लोकतंत्र में सरकार को कठिन काम ही करना होता है।
केवल Special Court से न्याय नहीं मिलेगा
PIL में बच्चों के अपहरण के मामलों के लिए विशेष अदालत और एक साल में मुकदमे के निपटारे जैसी मांगें महत्वपूर्ण हैं।
लेकिन यह समझना होगा कि अदालत मुकदमे के अंत में आती है।
यदि पुलिस ने शुरुआती 24 घंटे गंवा दिए तो विशेष अदालत उन घंटों को वापस नहीं ला सकती।
यदि CCTV evidence सुरक्षित नहीं रहा तो अदालत नया footage पैदा नहीं कर सकती।
यदि interstate coordination में देरी हुई तो अदालत बच्चे को समय पीछे ले जाकर नहीं खोज सकती।
इसलिए Fast Track Justice से पहले Fast Track Investigation चाहिए।
यही सरकार की पहली जिम्मेदारी है।
देश को एक राष्ट्रीय Child Missing Response System चाहिए
भारत को अब कागजी advisories से आगे बढ़ना होगा।
हर missing child के लिए एक National Child Missing Response Protocol होना चाहिए।
शिकायत दर्ज होते ही:
- FIR और digital case entry तत्काल हो।
- बच्चे की फोटो और विवरण राष्ट्रीय database में पहुंचे।
- CCTV और digital evidence तत्काल सुरक्षित किया जाए।
- रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और अन्य transport points को अलर्ट किया जाए।
- जरूरत पड़ने पर दूसरे राज्यों की पुलिस को स्वतः सूचना मिले।
- वरिष्ठ अधिकारी निर्धारित समय पर investigation review करे।
- परिवार को जांच की प्रगति की जानकारी मिले।
- गरीब परिवारों को मुफ्त कानूनी और सहायता व्यवस्था मिले।
- बच्चे की बरामदगी के बाद rehabilitation को अनिवार्य बनाया जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—हर कदम की डिजिटल time-stamp accountability हो।
किस अधिकारी ने क्या किया, कब किया और क्या नहीं किया—इसका रिकॉर्ड होना चाहिए।
तभी “जांच चल रही है” जैसे खोखले जवाब खत्म होंगे।
सरकार को PIL की जरूरत क्यों पड़ रही है?
यह इस पूरे विवाद का सबसे कड़वा सवाल है।
क्या सरकार को पता नहीं कि बच्चे गायब होते हैं?
क्या उसे पता नहीं कि गरीब परिवार न्याय व्यवस्था तक पहुंचने में कठिनाई झेलते हैं?
क्या उसे पता नहीं कि trafficking और organized crime में समय सबसे महत्वपूर्ण factor है?
क्या उसे पता नहीं कि देश में हर साल बड़ी संख्या में बच्चे missing report होते हैं?
यदि सरकार को सब पता है तो फिर राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत, समान और जवाबदेह व्यवस्था पहले क्यों नहीं बनाई गई?
और अगर सरकार को पता नहीं था तो यह उससे भी गंभीर समस्या है।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
क्योंकि शासन का मतलब केवल बजट बनाना, योजनाएं घोषित करना और आंकड़े जारी करना नहीं है।
शासन का मतलब है—सबसे कमजोर नागरिक के संकट के समय राज्य उसके साथ खड़ा दिखाई दे।
बच्चों की सुरक्षा VIP सुविधा नहीं हो सकती
भारत में अक्सर सुरक्षा भी सामाजिक हैसियत के हिसाब से दिखाई देती है।
प्रभावशाली व्यक्ति की शिकायत पर अधिकारी तत्काल सक्रिय हो जाते हैं और गरीब परिवार की शिकायत कई बार फाइलों में दब जाती है।
बच्चों के मामले में यह भेदभाव किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
बच्चे की सुरक्षा उसके पिता की जेब, उसकी मां की सामाजिक हैसियत या परिवार की राजनीतिक पहुंच से तय नहीं हो सकती।
एक मजदूर का बच्चा और एक करोड़पति का बच्चा—राज्य की नजर में दोनों की जिंदगी की कीमत बराबर होनी चाहिए।
यदि ऐसा नहीं है तो संविधान में लिखी समानता जमीन पर अधूरी है।
अब अदालत नहीं, सरकार को पहल करनी चाहिए
सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल हो गई है।
अब सरकार के सामने दो रास्ते हैं।
https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
पहला—अदालत में जवाब दाखिल करना, कुछ आंकड़े देना और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करना।
दूसरा—इस PIL को चेतावनी की तरह लेना और बिना किसी न्यायिक आदेश की प्रतीक्षा किए पूरे देश के लिए एक मजबूत child protection response mechanism तैयार करना।
दूसरा रास्ता ही जिम्मेदार शासन का रास्ता है।
सरकार चाहे तो सभी राज्यों के पुलिस प्रमुखों की बैठक बुलाकर एक समान protocol लागू कर सकती है। Missing children के मामलों की राष्ट्रीय स्तर पर monitoring हो सकती है। कमजोर जिलों की पहचान की जा सकती है। पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय हो सकती है। अदालतों में लंबित मामलों की समीक्षा हो सकती है।
इसके लिए किसी आदेश की जरूरत नहीं—सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।
निष्कर्ष: बच्चे सरकार की फाइल नहीं, देश की जिम्मेदारी हैं
किसी बच्चे का गायब होना केवल एक FIR number नहीं है।
वह एक परिवार का टूटना है।
वह एक मां की बेचैनी है।
वह एक पिता की अंतहीन तलाश है।
वह उस समाज के सामने सवाल है जो अपने बच्चों को सुरक्षित रखने का दावा करता है।
और जब ऐसे मामलों में प्रभावी व्यवस्था बनाने के लिए नागरिक को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़े तो सरकार को इसे अपनी उपलब्धि नहीं, अपनी विफलता का आईना समझना चाहिए।
भारत को अब घोषणाओं की नहीं, जवाबदेह व्यवस्था की जरूरत है।
हर missing child के लिए तत्काल कार्रवाई।
हर परिवार के लिए समान न्याय।
हर जांच के लिए समयसीमा।
हर अधिकारी के लिए जवाबदेही।
और हर बच्चे के लिए सुरक्षा।
सरकार को यह काम बहुत पहले कर देना चाहिए था।
अब कम से कम इतना तो हो कि अगली बार किसी बच्चे की सुरक्षा के लिए किसी नागरिक को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा न खटखटाना पड़े।
क्योंकि सवाल अदालत तक पहुंचने का नहीं है।
सवाल यह है कि बच्चे के गायब होने से पहले राज्य उसके आसपास सुरक्षा का ऐसा घेरा क्यों नहीं बना पाया, जिसमें उसका गायब होना ही कठिन हो?
और जब देश में गरीब बच्चे सबसे कमजोर कड़ी बने हुए हैं, तब किसी भी सरकार के लिए इससे बड़ा सामाजिक और प्रशासनिक सवाल दूसरा नहीं हो सकता।
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