“सत्ता का सुपर-केंद्र: महाराष्ट्र से दिल्ली तक क्या लोकतंत्र की ताकत जनता से निकलकर कुर्सियों में सिमट रही है?” “सत्ता ऊपर जाती रही, जनता नीचे रह गई
महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री की बढ़ती शक्तियों से लेकर केंद्र-राज्य संबंधों तक, यह लेख भारत में बढ़ते सत्ता-केंद्रीकरण और कमजोर होते विकेंद्रीकरण की पड़ताल करता है। सवाल है—क्या लोकतंत्र में सत्ता जनता के करीब जा रही है या कुछ शक्तिशाली केंद्रों में सिमटती जा रही है?
महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री की बढ़ती शक्ति से उठता बड़ा सवाल: क्या भारत का लोकतंत्र फिर से केंद्रीकरण की ओर जा रहा है?
By- Ch. Sudhir Taliyan
लोकतंत्र का सबसे सुंदर दृश्य संसद की भव्य इमारत नहीं है। वह दृश्य किसी दूर-दराज के गांव की चौपाल पर दिखाई देता है—जहां एक किसान अपनी सड़क की शिकायत करता है, एक महिला पंचायत से पानी की मांग करती है, कोई मजदूर रोजगार की बात करता है और कोई बुजुर्ग पेंशन के लिए अपने चुने हुए प्रतिनिधि के दरवाजे पर जाता है।
वहीं लोकतंत्र की असली परीक्षा होती है।
दिल्ली में बैठी सरकार के लिए वह गांव एक आंकड़ा हो सकता है। राज्य की राजधानी के लिए वह एक प्रशासनिक इकाई हो सकता है। लेकिन गांव के लिए वही सड़क, वही नाली, वही स्कूल, वही अस्पताल और वही रोजगार जीवन का प्रश्न है।
यही कारण है कि लोकतंत्र में सत्ता को केवल ऊपर से नीचे भेजना पर्याप्त नहीं है। सत्ता को उस व्यक्ति के सबसे निकट पहुंचना चाहिए जिसके जीवन को वह प्रभावित करती है।
इसी बुनियादी प्रश्न को महाराष्ट्र सरकार के नए Rules of Business, 2026 ने फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।
14 अगस्त 2026 को अधिसूचित नए नियमों के तहत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को यह शक्ति दी गई है कि वे सार्वजनिक हित में किसी मंत्री के निर्णय को override कर सकते हैं, बशर्ते उसके कारण लिखित रूप में दर्ज किए जाएं। नए नियमों ने 1975 के पुराने Rules of Business को प्रतिस्थापित किया है।
कानूनी दृष्टि से यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह व्यवस्था अपने-आप संविधान-विरोधी है। संविधान का अनुच्छेद 166 राज्य सरकार के कामकाज के लिए Rules of Business बनाने की व्यवस्था करता है। लेकिन लोकतंत्र की दृष्टि से इससे एक कहीं बड़ा प्रश्न अवश्य पैदा होता है—
क्या शासन का उद्देश्य निर्णयों को तेज करना है या सत्ता को केंद्रित करना?
और यह प्रश्न केवल महाराष्ट्र का नहीं है।
यह दिल्ली से लेकर मुंबई, लखनऊ से लेकर जयपुर और राज्य सचिवालय से लेकर ग्राम पंचायत तक भारतीय लोकतंत्र के भविष्य का प्रश्न है।
केंद्रीकरण हमेशा आदेश से शुरू नहीं होता
केंद्रीकरण का अर्थ केवल यह नहीं होता कि किसी एक व्यक्ति के हाथ में सारी शक्तियां आ जाएं।
कभी-कभी केंद्रीकरण धीरे-धीरे आता है।
पहले कहा जाता है—“निर्णय में तेजी चाहिए।”
फिर कहा जाता है—“नीतियों में एकरूपता चाहिए।”
फिर कहा जाता है—“अलग-अलग स्तरों पर निर्णय से भ्रम पैदा होता है।”
फिर कहा जाता है—“जनहित में अंतिम निर्णय किसी एक सक्षम केंद्र के पास होना चाहिए।”
और देखते-देखते लोकतंत्र में सहमति की जगह आदेश, वितरण की जगह नियंत्रण और स्थानीय निर्णय की जगह केंद्रीय निर्देश लेने लगते हैं।
यही केंद्रीकरण का मनोविज्ञान है।
महाराष्ट्र का नया नियम इसी कारण महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री को किसी मंत्री के निर्णय को सार्वजनिक हित में पलटने की स्पष्ट शक्ति देना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का विषय नहीं है; यह सत्ता के भीतर निर्णय लेने की संस्कृति के बारे में भी सवाल उठाता है। 2023 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने पुराने नियमों के तहत तत्कालीन मुख्यमंत्री के एक मंत्री के निर्णय में हस्तक्षेप को यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया था कि मुख्यमंत्री को ऐसी स्वतंत्र समीक्षा/संशोधन शक्ति प्राप्त नहीं थी। 2026 के नए नियमों ने अब उस स्थिति को बदल दिया है।
यहां लोकतंत्र को एक बात याद रखनी होगी—
शक्ति का होना और शक्ति का स्वस्थ होना, दो अलग-अलग बातें हैं।
संविधान ने सत्ता को बांटने की कोशिश क्यों की?
भारत के संविधान निर्माताओं ने देश को केवल एक प्रशासनिक मशीन के रूप में नहीं देखा था।
उन्होंने एक ऐसे लोकतंत्र की कल्पना की थी जिसमें सत्ता जनता से निकलती है और जनता तक वापस पहुंचती है।
संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 40 राज्य को ग्राम पंचायतों को संगठित करने और उन्हें स्वशासन की आवश्यक शक्तियां देने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है।
बाद में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने इस विचार को नई संवैधानिक ताकत दी।
73वें संशोधन ने पंचायतों के लिए संविधान में Part IX जोड़ा और 11वीं अनुसूची में 29 विषयों को पंचायतों से जोड़ने की संवैधानिक व्यवस्था की।
74वें संशोधन ने नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा दिया और Part IX-A के माध्यम से शहरी स्थानीय स्वशासन की संरचना स्थापित की।
यह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं था।
यह लोकतंत्र की दिशा बदलने का प्रयास था।
दिल्ली से गांव की ओर।
राजधानी से पंचायत की ओर।
सरकार से जनता की ओर।
यही विकेंद्रीकरण का मूल दर्शन है।
सत्ता का मतलब केवल कानून बनाने की शक्ति नहीं
हम अक्सर सत्ता को बहुत संकीर्ण अर्थ में समझते हैं।
हमें लगता है कि जिसके पास कानून बनाने की शक्ति है वही शक्तिशाली है।
लेकिन असली सत्ता तीन चीजों से बनती है—
निर्णय लेने की शक्ति, संसाधनों पर नियंत्रण और जवाबदेही तय करने की शक्ति।
यदि ग्राम पंचायत को सड़क की जिम्मेदारी दे दी जाए लेकिन पैसा जिला या राज्य स्तर पर अटका रहे, तो पंचायत केवल नाम की सरकार है।
यदि नगरपालिका को शहर की सफाई का दायित्व दे दिया जाए लेकिन वित्तीय निर्णय ऊपर से तय हों, तो नगरपालिका केवल implementation agency है।
यदि राज्य को कोई सामाजिक योजना लागू करनी हो लेकिन धन, शर्तें और प्राथमिकताएं केंद्र से निर्धारित हों, तो संघीय ढांचा कागज पर मजबूत और व्यवहार में कमजोर हो सकता है।
यही कारण है कि विकेंद्रीकरण केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है।
विकेंद्रीकरण का अर्थ है—3F: Functions, Funds और Functionaries।
अर्थात—
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काम स्थानीय स्तर पर,
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धन स्थानीय स्तर पर,
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कर्मचारी और प्रशासनिक क्षमता भी स्थानीय स्तर पर।
इसके बिना स्थानीय लोकतंत्र अधूरा है।
केंद्रीकरण की दूसरी कहानी दिल्ली में लिखी जा रही है
महाराष्ट्र की घटना को केवल राज्य सरकार के भीतर शक्ति-संतुलन के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
केंद्र और राज्यों के संबंधों में भी लंबे समय से यही बहस चल रही है—सहकारी संघवाद या नियंत्रित संघवाद?
संविधान ने केंद्र को शक्तिशाली बनाया है, इसमें कोई संदेह नहीं। भारत का संघीय ढांचा अमेरिकी मॉडल जैसा नहीं है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि राज्यों को केंद्र की प्रशासनिक शाखा बना दिया जाए।
संघवाद का अर्थ ही है कि अलग-अलग स्तर की सरकारों के पास अपनी संवैधानिक भूमिका हो।
आज वित्तीय संघवाद इस बहस का एक बड़ा क्षेत्र है।
GST ने भारत के अप्रत्यक्ष कर ढांचे को एकीकृत किया, जिसके कई आर्थिक लाभ हैं, लेकिन इसके साथ राज्यों की स्वतंत्र कर-निर्धारण क्षमता को लेकर चिंता भी बढ़ी है। 2026 में प्रकाशित शोध और विश्लेषणों में GST, cess/surcharge और Centrally Sponsored Schemes को राज्यों की fiscal autonomy से जुड़े प्रमुख प्रश्नों के रूप में रेखांकित किया गया है।
यह बहस राजनीतिक आरोप से आगे जाकर संवैधानिक प्रश्न बन जाती है।
यदि राज्य के पास खर्च करने की जिम्मेदारी ज्यादा हो लेकिन उसके पास स्वतंत्र संसाधन कम हों, तो कागज पर अधिकार और व्यवहार में निर्भरता के बीच अंतर पैदा होता है।
योजनाएं केंद्र की, जिम्मेदारी राज्य की—तो लोकतंत्र किसका?
केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं यानी Centrally Sponsored Schemes का उद्देश्य राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को राज्यों तक पहुंचाना है।
यह अपने आप में गलत नहीं है।
देश में स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, ग्रामीण विकास या बुनियादी ढांचे जैसी समस्याओं के लिए राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मानक आवश्यक हो सकते हैं।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब केंद्र धन देता है और उसके साथ इतनी शर्तें जोड़ देता है कि राज्य अपनी स्थानीय जरूरत के अनुसार नीति बनाने की क्षमता खोने लगे।
एक नीति विश्लेषण के अनुसार, CSS के माध्यम से केंद्र यह प्रभाव डाल सकता है कि राज्य अपने संसाधनों को किन गतिविधियों पर खर्च करें, जिससे राज्य की स्वायत्तता सीमित हो सकती है।
महाराष्ट्र ने स्वयं 16वें वित्त आयोग के सामने वित्तीय हस्तांतरण को लेकर चिंता जताई है। राज्य के अनुसार 2024-25 में उसे प्राप्त grants-in-aid अनुमान से काफी कम रहे और कई केंद्रीय योजनाओं में राज्य का वित्तीय हिस्सा बढ़ा। महाराष्ट्र ने राज्यों के लिए केंद्रीय करों में हिस्सेदारी 41% से बढ़ाकर 50% करने की मांग भी रखी।
यहां सवाल यह नहीं है कि केंद्र राज्य को पैसा क्यों देता है।
सवाल यह है—
पैसा किसका है, निर्णय किसका है और जवाबदेही किसकी है?
यदि पैसा केंद्र का, शर्त केंद्र की, योजना केंद्र की और जनता के सामने जवाबदेही राज्य सरकार की—तो लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का संतुलन बिगड़ सकता है।
केंद्रीकरण का सबसे बड़ा नुकसान जनता को होता है
केंद्रीकरण का पहला नुकसान राजनीतिक दलों को नहीं होता।
वह जनता को होता है।
क्योंकि जब निर्णय दूर चला जाता है, तो नागरिक की आवाज भी दूर चली जाती है।
मान लीजिए किसी गांव में सिंचाई की छोटी नहर टूट गई।
स्थानीय पंचायत जानती है कि समस्या क्या है।
ब्लॉक अधिकारी जानता है कि समस्या क्या है।
जिला प्रशासन जानता है कि समस्या क्या है।
लेकिन यदि निर्णय राज्य राजधानी या केंद्र के स्तर पर फाइलों के चक्र में फंस जाए तो समाधान की गति धीमी होगी।
यही कारण है कि subsidiarity का सिद्धांत दुनिया के लोकतांत्रिक शासन में महत्वपूर्ण माना जाता है—जिस काम को निचला स्तर प्रभावी ढंग से कर सकता है, उसे अनावश्यक रूप से ऊपर नहीं ले जाना चाहिए।
भारत के स्थानीय स्वशासन संबंधी संवैधानिक ढांचे का उद्देश्य भी निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधियों को अपने समुदाय के लिए जवाबदेह बनाना है। सुप्रीम कोर्ट ने K. Krishna Murthy मामले में स्थानीय स्वशासन को राजनीतिक शक्ति के अधिक व्यापक साझाकरण और स्थानीय समुदायों की जवाबदेही के संदर्भ में देखा।
यानी पंचायत केवल सरकारी योजना लागू करने वाली संस्था नहीं है।
वह लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है।
अगर गांव कमजोर है तो संसद मजबूत नहीं हो सकती
यह बात सुनने में उलटी लग सकती है, लेकिन यही लोकतंत्र का मूल सत्य है।
संसद में कानून बनता है।
विधानसभा में नीति बनती है।
लेकिन जनता की रोजमर्रा की जिंदगी का बड़ा हिस्सा स्थानीय संस्थाओं से जुड़ा होता है।
पानी।
कचरा।
गली।
नाली।
स्थानीय सड़क।
प्राथमिक स्वास्थ्य।
स्थानीय बाजार।
स्कूल के आसपास की व्यवस्था।
सामुदायिक संसाधन।
इनमें से अनेक समस्याओं का समाधान दिल्ली या राज्य सचिवालय में बैठकर नहीं किया जा सकता।
यदि हर निर्णय ऊपर जाएगा तो शासन भारी होता जाएगा।
और भारी शासन अंततः जनता से दूर हो जाता है।
केंद्रीकरण का एक खतरनाक भ्रम—“एक नेता, एक निर्णय, तेज विकास”
आज के राजनीतिक वातावरण में एक लोकप्रिय धारणा बन रही है कि मजबूत नेता ही तेज विकास कर सकता है।
यह धारणा आधी सच्चाई है।
मजबूत नेतृत्व जरूरी है।
लेकिन मजबूत संस्थाएं उससे भी ज्यादा जरूरी हैं।
एक नेता गलती कर सकता है।
एक मंत्री गलती कर सकता है।
एक अधिकारी गलती कर सकता है।
लेकिन यदि निर्णय कई संस्थाओं, विशेषज्ञों, निर्वाचित प्रतिनिधियों और जनता के स्तर से गुजरता है तो गलती पकड़ने की संभावना बढ़ जाती है।
Power-sharing कभी-कभी निर्णय को धीमा करता है।
लेकिन वही power-sharing निर्णय को बेहतर भी बना सकता है।
हालिया अकादमिक शोध में भारत के संदर्भ में यह संकेत मिला है कि कई निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच checks and balances कुछ परिस्थितियों में आर्थिक गतिविधि, सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक परिणामों को बेहतर कर सकते हैं।
इसलिए लोकतंत्र की गति का अर्थ केवल decision speed नहीं है।
सच्ची प्रशासनिक दक्षता का अर्थ है—
सही निर्णय + समय पर निर्णय + जवाबदेह निर्णय।
“Public Interest” किसका हित है?
महाराष्ट्र के नए नियम में सबसे आकर्षक और सबसे संवेदनशील शब्द है—
Public Interest.
मुख्यमंत्री किसी मंत्री के निर्णय को सार्वजनिक हित में override कर सकते हैं, और कारण लिखित रूप में दर्ज करना होगा।
लिखित कारण दर्ज करने की शर्त स्वागतयोग्य safeguard है।
लेकिन लोकतंत्र में एक और प्रश्न होना चाहिए—
क्या वह कारण जनता को भी पता चलेगा?
क्योंकि “जनहित” का दावा हर सरकार कर सकती है।
सरकार कह सकती है—यह जनहित में है।
विपक्ष कह सकता है—यह राजनीतिक हित में है।
मंत्री कह सकता है—मेरे विभाग का निर्णय सही था।
अधिकारी कह सकता है—फाइल में कुछ और तथ्य हैं।
और अंततः जनता पूछेगी—
जनहित का प्रमाण क्या है?
इसीलिए लोकतंत्र में discretion के साथ transparency जरूरी है।
यदि शक्ति बढ़ती है तो पारदर्शिता भी बढ़नी चाहिए।
यदि मुख्यमंत्री को override power मिलती है तो legislative scrutiny भी मजबूत होनी चाहिए।
यदि केंद्र राज्यों को निर्देश देता है तो inter-governmental consultation भी मजबूत होना चाहिए।
यदि राज्य पंचायतों को जिम्मेदारी देता है तो उनके वित्तीय अधिकार भी बढ़ने चाहिए।
विकेंद्रीकरण का अर्थ सत्ता कमजोर करना नहीं है
यह एक बहुत बड़ा भ्रम है।
विकेंद्रीकरण का अर्थ सरकार को कमजोर करना नहीं है।
बल्कि यह सरकार को अधिक सक्षम बनाता है।
जब स्थानीय सरकार अपने क्षेत्र की समस्याओं पर निर्णय ले सकती है तो:
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फाइलें कम घूमती हैं,
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स्थानीय प्राथमिकताएं बेहतर समझी जाती हैं,
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नागरिक की भागीदारी बढ़ती है,
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जवाबदेही स्पष्ट होती है,
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भ्रष्टाचार के कुछ अवसर कम किए जा सकते हैं,
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नवाचार की संभावना बढ़ती है।
एक ही नीति पूरे देश पर थोपना आसान हो सकता है।
लेकिन भारत जैसा विशाल और विविध देश एक ही प्रशासनिक पैमाने से नहीं चल सकता।
कश्मीर की समस्या और केरल की समस्या एक जैसी नहीं।
राजस्थान की पानी की चुनौती और असम की बाढ़ एक जैसी नहीं।
महाराष्ट्र का शहरीकरण और बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक जैसी नहीं।
पूर्वांचल की बेरोजगारी और मुंबई की housing crisis एक ही प्रशासनिक prescription से हल नहीं होगी।
भारत की विविधता केंद्रीकृत शासन के खिलाफ सबसे बड़ा तर्क है।
केंद्र भी मजबूत हो, राज्य भी मजबूत हों और पंचायत भी
हमें “केंद्र बनाम राज्य” की राजनीति से आगे बढ़ना होगा।
सही मॉडल है—
मजबूत केंद्र + मजबूत राज्य + मजबूत स्थानीय सरकार।
इनमें से किसी एक को कमजोर करके दूसरे को मजबूत करना लोकतंत्र का समाधान नहीं है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए केंद्र मजबूत होना चाहिए।
राष्ट्रीय आर्थिक नीति के लिए केंद्र मजबूत होना चाहिए।
अंतरराज्यीय समन्वय के लिए केंद्र मजबूत होना चाहिए।
लेकिन कृषि, स्थानीय स्वास्थ्य, स्थानीय जल प्रबंधन, पंचायत विकास, नगर नियोजन, स्थानीय परिवहन और अनेक सामाजिक क्षेत्रों में राज्य और स्थानीय सरकारों की भूमिका मजबूत होनी चाहिए।
इसी तरह राज्य सरकार को यह समझना होगा कि पंचायत उसका “अधीनस्थ कार्यालय” नहीं है।
और केंद्र को यह समझना होगा कि राज्य उसका “क्षेत्रीय विभाग” नहीं है।
भारत का लोकतंत्र “दिल्ली से भारत” नहीं, “भारत से दिल्ली” होना चाहिए
लोकतंत्र का प्रवाह ऊपर से नीचे नहीं होना चाहिए।
उसका प्रवाह नीचे से ऊपर भी होना चाहिए।
गांव की आवाज जिला प्रशासन तक पहुंचे।
जिले की आवाज राज्य तक पहुंचे।
राज्य की आवाज केंद्र तक पहुंचे।
और केंद्र की नीति फिर जनता तक वापस आए।
इसे ही वास्तविक democratic feedback loop कहा जा सकता है।
लेकिन यदि पूरा तंत्र उल्टा हो जाए—
दिल्ली नीति बनाए,
राज्य उसे लागू करे,
जिला उसे execute करे,
पंचायत उसे बताए,
और जनता केवल लाभार्थी बनकर रह जाए—
तो लोकतंत्र धीरे-धीरे citizen-centric government से beneficiary-centric administration में बदल सकता है।
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
नागरिक अधिकार मांगता है।
लाभार्थी सुविधा मांगता है।
https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
लोकतंत्र नागरिक बनाता है।
अत्यधिक केंद्रीकृत शासन लाभार्थी पैदा करता है।
इसलिए महाराष्ट्र की घटना को केवल महाराष्ट्र तक सीमित करना भूल होगी
देवेंद्र फडणवीस को मिली नई शक्ति का संवैधानिक परीक्षण आने वाले समय में न्यायपालिका, विधानसभा और राजनीतिक संस्थाओं के सामने हो सकता है। लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न राजनीतिक संस्कृति का है।
आज मुख्यमंत्री को मंत्री पर अधिक शक्ति मिलती है।
कल केंद्र को राज्य पर अधिक शक्ति मिल सकती है।
आज राज्य सरकार पंचायत पर अधिक नियंत्रण रख सकती है।
कल कोई और सरकार स्थानीय निकायों की वित्तीय स्वतंत्रता सीमित कर सकती है।
यदि हर स्तर पर ऊपर वाला स्तर नीचे वाले स्तर की शक्ति अपने पास खींचता रहा तो अंततः लोकतंत्र का सबसे कमजोर व्यक्ति सबसे अधिक शक्तिहीन होगा।
और वह व्यक्ति कोई राजनीतिक दल नहीं होगा।
वह होगा—
साधारण नागरिक।
समाधान क्या है?
भारत को अब “decentralisation 2.0” की जरूरत है।
केवल पंचायत चुनाव पर्याप्त नहीं।
स्थानीय सरकारों को वास्तविक शक्ति देनी होगी।
पहला—वित्तीय विकेंद्रीकरण
स्थानीय निकायों को predictable और पर्याप्त वित्तीय संसाधन मिलने चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/new/lal-kile-se-bade-sapne-zameen-par-jankalyan-ki-khamoshi
दूसरा—कार्यात्मक विकेंद्रीकरण
11वीं और 12वीं अनुसूची में जिन कार्यों को स्थानीय निकायों से जोड़ने की कल्पना की गई, उन्हें वास्तविक रूप से transfer करना होगा।
तीसरा—प्रशासनिक विकेंद्रीकरण
केवल कार्य सौंपना पर्याप्त नहीं। कर्मचारी और विशेषज्ञता भी स्थानीय संस्थाओं के नियंत्रण में होनी चाहिए।
चौथा—पारदर्शिता
मुख्यमंत्री, मंत्री, राज्य और केंद्र—सभी स्तरों पर महत्वपूर्ण discretionary decisions के कारण सार्वजनिक scrutiny के योग्य होने चाहिए।
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पांचवां—विधानमंडलीय निगरानी
सरकार के भीतर शक्ति बढ़े तो विधानसभा और संसद की committees भी मजबूत होनी चाहिए।
छठा—केंद्र-राज्य संवाद
Inter-State Council, GST Council और Finance Commission जैसे संस्थानों को राजनीतिक संघर्ष के मंच के बजाय genuine federal dialogue का माध्यम बनाना चाहिए।
सातवां—स्थानीय लोकतंत्र की नियमितता
पंचायत और नगरपालिका चुनाव समय पर हों। निर्वाचित स्थानीय सरकारों को लंबे समय तक bureaucratic administration के अधीन नहीं रखा जाना चाहिए।
आठवां—जनता की भागीदारी
Gram Sabha और Ward Committees को वास्तविक अधिकार दिए जाने चाहिए।
लोकतंत्र की अंतिम कसौटी
महाराष्ट्र का नया नियम हमें एक बहुत बड़ा प्रश्न पूछने के लिए मजबूर करता है।
क्या हमें ऐसा शासन चाहिए जिसमें हर महत्वपूर्ण निर्णय अंततः एक केंद्रीय सत्ता की ओर देखे?
या ऐसा लोकतंत्र चाहिए जिसमें निर्णय उस स्तर पर हो जहां समस्या पैदा होती है?
यदि दिल्ली में बैठा व्यक्ति गांव की हर समस्या का निर्णय लेने लगे तो दिल्ली शक्तिशाली हो सकती है, लेकिन गांव लोकतांत्रिक रूप से कमजोर हो जाएगा।
यदि मुख्यमंत्री हर विभाग के निर्णय का अंतिम केंद्र बन जाए तो मुख्यमंत्री शक्तिशाली हो सकता है, लेकिन मंत्रिपरिषद की सामूहिकता कमजोर हो सकती है।
यदि राज्य हर नगरपालिका की वित्तीय स्वतंत्रता अपने हाथ में ले ले तो सचिवालय मजबूत हो सकता है, लेकिन शहर कमजोर हो सकता है।
और यदि केंद्र राज्यों के नीति-निर्णय की गुंजाइश लगातार कम करता जाए तो संघ मजबूत दिखाई दे सकता है, लेकिन संघवाद कमजोर हो सकता है।
इसलिए लोकतंत्र में शक्ति का प्रश्न केवल “किसके पास कितनी शक्ति है?” नहीं है।
असल प्रश्न है—
“किस स्तर पर कितनी शक्ति होनी चाहिए?”
और उससे भी महत्वपूर्ण—
“उस शक्ति के सामने जनता की आवाज कितनी मजबूत है?”
अंततः बात महाराष्ट्र से आगे की है
महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री को मिली नई override power पर राजनीतिक दल अपने-अपने पक्ष में तर्क देंगे। सरकार इसे प्रशासनिक दक्षता बताएगी। विपक्ष इसे सत्ता के केंद्रीकरण के रूप में देख सकता है। संविधान विशेषज्ञ इसके दायरे और सीमाओं पर बहस करेंगे।
लेकिन जनता को इस बहस का तीसरा रास्ता चुनना चाहिए।
वह रास्ता है—
सत्ता का लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण।
भारत को कमजोर सरकार नहीं चाहिए।
भारत को मजबूत सरकार चाहिए।
लेकिन मजबूत सरकार का अर्थ एक मजबूत कुर्सी नहीं है।
मजबूत सरकार का अर्थ है—
मजबूत संसद, मजबूत विधानसभाएं, मजबूत पंचायतें, मजबूत नगरपालिकाएं, स्वतंत्र संस्थाएं, सक्षम न्यायपालिका, जवाबदेह प्रशासन और जागरूक नागरिक।
भारत का लोकतंत्र तब मजबूत नहीं होगा जब दिल्ली सबसे शक्तिशाली होगी।
भारत का लोकतंत्र तब मजबूत होगा जब दिल्ली की शक्ति, राज्य की शक्ति और गांव की शक्ति—तीनों संविधान की मर्यादा में एक-दूसरे को संतुलित करें।
क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता का अंतिम मालिक कोई मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, मंत्री या अधिकारी नहीं है।
अंतिम मालिक जनता है।
और जनता के लोकतंत्र की सबसे पहली चौकी संसद नहीं—
ग्रामसभा है।
इसलिए आज आवश्यकता किसी एक नेता को कमजोर करने की नहीं, बल्कि हर नागरिक को मजबूत करने की है।
केंद्रीकरण सत्ता को एक जगह जमा करता है।
विकेंद्रीकरण सत्ता को समाज में फैलाता है।
पहला मॉडल शासन को तेज दिखा सकता है।
दूसरा मॉडल शासन को लोकतांत्रिक बनाता है।
और भारत जैसे विविध, विशाल और बहुस्तरीय समाज में अंततः वही शासन टिकाऊ होगा जिसमें सत्ता जनता से दूर जाने के बजाय जनता के और करीब आती जाए।
लोकतंत्र की दिशा ऊपर की ओर नहीं, जनता की ओर होनी चाहिए।
सत्ता का केंद्रीकरण शासन को शक्तिशाली बना सकता है; सत्ता का विकेंद्रीकरण नागरिक को शक्तिशाली बनाता है।
और किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि सरकार की शक्ति नहीं—
नागरिक की शक्ति होती है।
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