भडल से सत्ता को खुली चुनौती! 60+ संगठनों का ऐलान—किसान कर्जमुक्त होने और बाजार में हिस्सेदारी मिलने तक आर-पार की लड़ाई!

बागपत के भडल में ग्रामीण भारत स्वाभिमान मंच के सम्मेलन में 60 से अधिक संगठनों ने किसान कर्जमुक्ति, बाजार में हिस्सेदारी, गन्ना किसानों के आर्थिक अधिकार और संवैधानिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष तेज करने का संकल्प लिया। 17 नवंबर 2026 को बड़ी पंचायत का ऐलान।

भडल से सत्ता को खुली चुनौती! 60+ संगठनों का ऐलान—किसान कर्जमुक्त होने और बाजार में हिस्सेदारी मिलने तक आर-पार की लड़ाई!

किसान के कर्ज से मुक्ति और बाजार में हिस्सेदारी तक जारी रहेगा संघर्ष:

भडल में तीन दिवसीय सामाजिक एवं राजनीतिक चिंतन सम्मेलन का समापन; दिल्ली में जारी आंदोलन, नागरिक अधिकारों पर कथित हमलों और सत्ता के अहंकार के खिलाफ राष्ट्रीय किसान एवं सामाजिक संगठनों ने उठाई आवाज; 17 नवंबर 2026 को बड़ी पंचायत बुलाने और आंदोलन तेज करने का ऐलान।

भडल, बागपत | 19 अक्टूबर 2026

By- Chaudhary Sudhir Talyan

ग्रामीण भारत के आर्थिक अधिकारों, किसान की स्वायत्तता, संवैधानिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के सवालों पर आयोजित तीन दिवसीय सामाजिक एवं राजनीतिक चिंतन सम्मेलन का समापन एक व्यापक आंदोलनकारी संकल्प के साथ हुआ। ग्रामीण भारत स्वाभिमान मंच के तत्वावधान में ग्राम भडल, जनपद बागपत में आयोजित इस सम्मेलन में 60 से अधिक संगठनों के राष्ट्रीय अध्यक्षों और सैकड़ों ग्रामीणों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने कृषि संकट, किसानों की कर्जग्रस्तता, भूमि अधिग्रहण, बिजली, गन्ना आधारित उद्योगों में किसानों की हिस्सेदारी, मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर विस्तार से विचार रखे।

सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि प्रस्तुत एजेंडे को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया और इन मांगों के लिए सामूहिक संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया गया। प्रतिभागियों ने 17 नवंबर 2026 को एक बड़ी पंचायत आयोजित करने तथा आंदोलन को और व्यापक एवं तीखा बनाने का निर्णय लिया।

सम्मेलन का संदेश स्पष्ट था—किसान को कर्ज से मुक्ति, अपनी उपज के बाजार में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी और सम्मानजनक जीवन का अधिकार मिलने तक संघर्ष समाप्त नहीं होगा।

दिल्ली का घटनाक्रम और लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार

सम्मेलन में दिल्ली में जारी आंदोलन और सरकार की कार्यशैली को लेकर गंभीर आपत्तियां व्यक्त की गईं। उपस्थित संगठनों के अध्यक्षों ने सरकार द्वारा आंदोलनकारियों से निपटने के तरीके, बल प्रयोग की शिकायतों और नागरिकों की आवाज को दबाने की कथित प्रवृत्ति की निंदा की। वक्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र में जनता को सरकार से सवाल पूछने, नीतियों का विरोध करने और अपने अधिकारों की मांग करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।

सम्मेलन में व्यक्त विचारों के अनुसार, जब नागरिक अपने अधिकारों और आजीविका से जुड़े प्रश्न उठाते हैं, तब उनका उत्तर संवाद और जवाबदेही के माध्यम से दिया जाना चाहिए, न कि भय, दबाव अथवा दमन की आशंका पैदा करके।

सरकारें जनता के मत से बनती हैं। इसलिए जनादेश को जनता के प्रति जवाबदेही से मुक्ति का प्रमाणपत्र नहीं माना जा सकता। सत्ता में बैठने का अधिकार जनता देती है, लेकिन उसी जनता के सवालों से बचने का अधिकार किसी सरकार को नहीं मिलता।

सम्मेलन में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि आंदोलनकारियों पर दबाव बनाने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करती है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण असहमति को व्यवस्था के लिए खतरा मानने के बजाय उसे नीतिगत कमियों की पहचान करने का अवसर समझा जाना चाहिए।

लोकतंत्र की परीक्षा इस बात से नहीं होती कि सरकार अपने समर्थकों की आवाज कितनी जोर से सुनती है, बल्कि इससे होती है कि वह अपने आलोचकों की बात कितने धैर्य और निष्पक्षता से सुनती है।

जनता को जनता से लड़ाने की राजनीति पर चिंता

सम्मेलन में सामाजिक एकता को कमजोर करने वाली राजनीति पर भी कड़ी आपत्ति जताई गई। वक्ताओं ने कहा कि किसान, मजदूर, ग्रामीण परिवार और आम नागरिक महंगाई, बेरोजगारी, कर्ज तथा आर्थिक असुरक्षा जैसी साझा समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ऐसे में सामाजिक समूहों के बीच अविश्वास और टकराव बढ़ना जनहित के विरुद्ध है।

प्रतिभागियों ने आरोप लगाया कि जनता के वास्तविक आर्थिक प्रश्नों से ध्यान हटाकर सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्तियां व्यापक जनहित को नुकसान पहुंचाती हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसानों की समस्याओं का समाधान किसी जाति, समुदाय या राजनीतिक विचारधारा के विरुद्ध अभियान चलाकर नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण नीतियों और सामूहिक एकजुटता के माध्यम से किया जा सकता है।

सम्मेलन का दृष्टिकोण स्पष्ट रहा कि किसान आंदोलन को सामाजिक सद्भाव, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

वक्ताओं ने सत्ता के अहंकार और नागरिकों को अधीनस्थ मानने वाली मानसिकता की भी आलोचना की। उनका कहना था कि जनता किसी सरकार की प्रजा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक आधारशिला है।

किसान का संकट केवल खेती का संकट नहीं

सम्मेलन के आर्थिक विमर्श का केंद्र किसान की लगातार बिगड़ती वित्तीय स्थिति रही। वक्ताओं ने कहा कि खेती की लागत, बाजार के उतार-चढ़ाव, प्राकृतिक जोखिम और उपज के अपेक्षाकृत कमजोर प्रतिफल के कारण अनेक किसान परिवार आर्थिक दबाव झेलते हैं।

किसान फसल पैदा करता है, जोखिम उठाता है और उत्पादन के लिए पूंजी लगाता है, लेकिन अंतिम बाजार मूल्य के निर्धारण, प्रसंस्करण, भंडारण तथा वितरण की व्यवस्था में उसकी भागीदारी अक्सर सीमित रहती है। इस असमानता के कारण कृषि उत्पादन से पैदा होने वाले कुल आर्थिक मूल्य का उचित हिस्सा उत्पादक तक पहुंचने का प्रश्न गंभीर बना हुआ है।

सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि किसान की समस्या का समाधान केवल कर्ज बांटने, ब्याज में राहत देने या सीमित आर्थिक सहायता देने से नहीं होगा। जब तक कृषि को लाभकारी आर्थिक गतिविधि बनाने, लागत और आय के बीच संतुलन स्थापित करने तथा बाजार में किसान की स्थिति मजबूत करने के लिए ठोस बदलाव नहीं किए जाते, तब तक संकट की बुनियादी वजहें बनी रहेंगी।

किसान को केवल उत्पादन करने वाला श्रमिक मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। उसे कृषि अर्थव्यवस्था का निर्णायक और सम्मानित भागीदार बनाना होगा।

इसी विचार के आधार पर सम्मेलन में किसान की कर्जमुक्ति को आंदोलन का केंद्रीय लक्ष्य घोषित किया गया। प्रतिभागियों ने कहा कि किसानों को ऐसी आर्थिक व्यवस्था चाहिए जिसमें वे हर फसल के बाद नए कर्ज की तलाश करने के बजाय अपनी आय से उत्पादन लागत, पारिवारिक जरूरतों और भविष्य के निवेश की व्यवस्था कर सकें।

कृषि आधारित उद्योगों में किसान की हिस्सेदारी का सवाल

सम्मेलन में कृषि को उद्योग का दर्जा देने तथा कृषि आधारित औद्योगिक गतिविधियों में किसानों की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग पर विस्तार से चर्चा हुई।

वक्ताओं ने कहा कि कृषि का आर्थिक महत्व खेत से मंडी तक सीमित नहीं है। खाद्य प्रसंस्करण, शीत भंडारण, परिवहन, पैकेजिंग, खुदरा कारोबार और निर्यात तक फैली पूरी श्रृंखला में व्यापक आर्थिक गतिविधियां होती हैं। यदि किसान केवल कच्चा माल उपलब्ध कराने तक सीमित रहता है, जबकि मूल्य संवर्धन से होने वाले लाभ में उसकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आर्थिक असमानता बनी रहती है।

सम्मेलन में कृषि आधारित उद्योगों में किसान की हिस्सेदारी बढ़ाने, उत्पादक संगठनों को मजबूत करने और लाभ के वितरण में पारदर्शिता स्थापित करने की जरूरत पर जोर दिया गया।

विशेष रूप से गन्ना आधारित उद्योगों से होने वाली आय में किसानों को 70 प्रतिशत हिस्सेदारी देने के प्रस्ताव को एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया। चीनी, एथेनॉल, बिजली, शीरा और अन्य सह-उत्पादों से होने वाली आय का न्यायसंगत वितरण किस प्रकार सुनिश्चित किया जाए, इस पर नीति आधारित व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता जताई गई।

यह मांग केवल गन्ने के मूल्य तक सीमित नहीं है। इसका मूल प्रश्न यह है कि जिस कृषि उपज पर उद्योग की आर्थिक गतिविधि निर्भर करती है, उसके उत्पादक को उस गतिविधि से उत्पन्न मूल्य में उचित स्थान क्यों नहीं मिलना चाहिए?

भूमि अधिग्रहण से प्रभावित किसान को दीर्घकालिक न्याय

भूमि अधिग्रहण के प्रश्न पर सम्मेलन में कहा गया कि किसान की भूमि केवल बाजार में खरीदी-बेची जाने वाली संपत्ति नहीं, बल्कि उसकी आजीविका, सामाजिक सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का आधार भी है।

वक्ताओं ने मांग की कि भूमि अधिग्रहण से प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजे के साथ परियोजनाओं के दीर्घकालिक आर्थिक लाभ में हिस्सेदारी देने के विकल्प विकसित किए जाएं। परियोजना से होने वाली आय में भागीदारी, रोजगार, पुनर्वास और आजीविका सुरक्षा के प्रभावी प्रावधान इस व्यवस्था का हिस्सा होने चाहिए।

सम्मेलन में यह भी रेखांकित किया गया कि विकास का मूल्यांकन केवल सड़कों, औद्योगिक क्षेत्रों और परियोजनाओं के निर्माण से नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि विकास से प्रभावित किसान परिवारों की आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर हुई या वे अपनी जमीन खोने के बाद अधिक असुरक्षित हो गए।

विकास तभी न्यायपूर्ण कहा जा सकता है, जब उसके लाभ और उसकी कीमत का वितरण भी न्यायसंगत हो।

बिजली, छोटी जोत और ग्रामीण आर्थिक सुरक्षा

सम्मेलन के एजेंडे में ग्रामीण घरेलू बिजली को बुनियादी आवश्यकता मानते हुए सभी श्रेणियों के घरेलू उपभोग के लिए निःशुल्क बिजली उपलब्ध कराने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने कहा कि ऊर्जा की बढ़ती जरूरतों के बीच ग्रामीण परिवारों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना सार्वजनिक नीति का महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए।

इस प्रस्ताव के वित्तीय ढांचे, पात्रता और क्रियान्वयन के व्यावहारिक विकल्पों पर आगे विस्तृत नीति निर्माण की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण होगी।

छोटी जोत वाले किसानों की आय सुरक्षा पर चर्चा के दौरान प्रस्ताव रखा गया कि पात्र छोटे किसानों को न्यूनतम प्रतिव्यक्ति आय के कम से कम आधे के बराबर आर्थिक संरक्षण देने की व्यवस्था विकसित की जाए। वक्ताओं ने कहा कि कृषि आय की अनिश्चितता का सबसे अधिक दबाव उन परिवारों पर पड़ता है जिनके पास सीमित भूमि और वैकल्पिक रोजगार के कम अवसर हैं।

सम्मेलन ने इन मुद्दों को केवल घोषणाओं तक सीमित न रखकर ठोस नीतिगत प्रस्तावों में बदलने की आवश्यकता पर बल दिया।

संवैधानिक स्वतंत्रता और आंदोलन का अधिकार

सम्मेलन में नागरिक स्वतंत्रताओं, मानवाधिकारों, पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि किसी भी लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना, शांतिपूर्ण विरोध करना और सार्वजनिक नीतियों पर प्रश्न उठाना नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हिस्सा है।

इसी क्रम में सीईसी के विरुद्ध चल रहे आंदोलन को सम्मेलन में समर्थन देने का निर्णय लिया गया। प्रतिभागियों ने संबंधित संस्थागत कार्यप्रणाली पर उठाए जा रहे सवालों के निष्पक्ष परीक्षण, पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता पर जोर दिया।

सम्मेलन का संदेश था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास केवल दावों से नहीं, बल्कि उनके निष्पक्ष आचरण और सार्वजनिक जवाबदेही से मजबूत होता है।

यह भी आवश्यक है कि किसी संस्था या पदाधिकारी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों का परीक्षण तथ्यों, प्रमाणों और विधिसम्मत प्रक्रियाओं के आधार पर हो। लोकतंत्र में जवाबदेही और निष्पक्ष जांच एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।

17 नवंबर की पंचायत: संघर्ष को नई दिशा देने की तैयारी

सम्मेलन के समापन पर उपस्थित संगठनों के प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने एजेंडे के सभी प्रमुख मुद्दों पर सामूहिक संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया। सर्वसम्मति से पारित एजेंडे को आगे की आंदोलनकारी गतिविधियों का आधार बनाने पर सहमति बनी।

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निर्णय लिया गया कि 17 नवंबर 2026 को एक बड़ी पंचायत आयोजित की जाएगी, जिसमें किसान अधिकारों, आर्थिक न्याय, नागरिक स्वतंत्रताओं और आंदोलन की आगामी रणनीति पर आगे की दिशा तय की जाएगी। आयोजकों के अनुसार, आगामी पंचायत के माध्यम से आंदोलन को अधिक व्यापक और प्रभावी बनाने का प्रयास किया जाएगा।

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ग्रामीण भारत स्वाभिमान मंच के इस सम्मेलन ने स्पष्ट कर दिया कि किसान का प्रश्न केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य, गन्ना भुगतान या बिजली बिल तक सीमित नहीं है। यह भूमि, पूंजी, बाजार, आय, सामाजिक सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।

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किसान को कर्जमुक्त करने की बात तभी सार्थक होगी, जब उसे ऐसी आर्थिक व्यवस्था मिले जिसमें उसकी मेहनत का उचित प्रतिफल सुनिश्चित हो। बाजार में हिस्सेदारी का अधिकार तभी प्रभावी होगा, जब मूल्य निर्धारण, प्रसंस्करण और वितरण की श्रृंखला में किसान की भूमिका मजबूत होगी। और लोकतंत्र तभी जीवंत रहेगा, जब जनता बिना भय के सवाल पूछ सके।

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भडल सम्मेलन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि ग्रामीण भारत अब केवल समस्याएं गिनाने तक सीमित नहीं रहना चाहता। वह अपने अधिकारों, आर्थिक हिस्सेदारी और संवैधानिक स्वतंत्रता के लिए संगठित होकर आवाज उठाने का संकल्प व्यक्त कर रहा है।

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कर्ज से मुक्ति, बाजार में हिस्सेदारी, किसान का सम्मान और जनता के संवैधानिक अधिकार—इन मांगों पर संघर्ष जारी रखने का संकल्प सम्मेलन की केंद्रीय घोषणा बनकर सामने आया।

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अब इस संकल्प की असली परीक्षा उसके क्रियान्वयन में होगी। 17 नवंबर की पंचायत, संगठनों के बीच समन्वय, मांगों का ठोस नीतिगत प्रारूप और लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ने वाली आंदोलनकारी रणनीति यह निर्धारित करेगी कि भडल में बनी सहमति ग्रामीण भारत के लिए कितना प्रभावी परिवर्तनकारी कदम बन पाती है।

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