द्रोणागिरी गांव की अनोखी परंपरा: जहां हनुमान नहीं, पर्वत हैं संकटमोचक; क्यों सिर्फ तीन दिन होती है रामलीला?
उत्तराखंड के चमोली जिले का द्रोणागिरी गांव अपनी अनोखी धार्मिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है, जहां स्थानीय मान्यताओं के अनुसार हनुमानजी की पूजा नहीं की जाती और रामलीला का मंचन केवल तीन दिन होता है। जानिए संजीवनी बूटी की पौराणिक कथा, पर्वतराज हिमालय से जुड़ी लोकमान्यता और प्रकृति संरक्षण का संदेश।
द्रोणागिरी गांव, जहां हनुमान नहीं, पर्वत हैं संकटमोचक
डॉ बृजेश सती
इन दिनों देशभर में शारदीय नवरात्र की धूम है। देवी दुर्गा की आराधना के साथ ही विभिन्न स्थानों पर रामलीला का मंचन किया जा रहा है।
रामलीला, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा होने के साथ ही परंपरागत संचार का सशक्त माध्यम भी है। खासतौर से नवरात्र के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में रामलीला देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। लेकिन उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित द्रोणागिरी गांव की परंपरा इससे कुछ अलग है।
द्रोणागिरी पर्वत की तलहटी में द्रोणागिरि गांव स्थित है। अपनी विशिष्ट धार्मिक परंपराओं के कारण इसकी देश में अलग पहचान है। यह भारत का इकलौता ऐसा गांव है। जहां रामलीला का मंचन केवल तीन दिन तक होता है। यद्यपि हनुमानजी को संकटमोचक माना जाता है, लेकिन द्रोणागिरि गांव अपवाद है।
ऐसा नहीं कि ग्रामीणों ने राम लीला मंचन का प्रयास नहीं किया, लेकिन अनुभव ठीक नहीं रहा। क्षेत्र को प्राकृतिक और दैवीय आपदा का सामना करना पड़ा।
भारत-तिब्बत सीमा के निकट बसा है द्रोणागिरी गांव
उत्तराखंड के चमोली जिले के सीमांत क्षेत्र में स्थित द्रोणागिरी गांव अपनी विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों, प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। हिमालय की ऊंची पर्वत शृंखलाओं के बीच बसे इस क्षेत्र का संबंध स्थानीय लोककथाओं और पौराणिक प्रसंगों से भी जोड़ा जाता है। यहां की संस्कृति और परंपराओं में प्रकृति, पर्वत और देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था दिखाई देती है।
द्रोणागिरी गांव की मान्यताओं में एक हनुमान से जुड़ी है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में हनुमान जी को संकटमोचन और भगवान राम के परम भक्त के रूप में पूजा जाता है, वहीं इस गांव में उनसे संबंधित एक अलग लोकविश्वास प्रचलित है। इसी मान्यता के कारण गांव की धार्मिक परंपराओं और रामलीला के आयोजन को विशेष नजरिये से देखा जाता है।
संजीवनी बूटी की कथा से जुड़ा है पूरा प्रसंग
रामायण के अनुसार, लंका युद्ध के दौरान मेघनाद के प्रहार से लक्ष्मण मूर्छित हो गए। उनकी प्राण रक्षा के लिए, सुषेण वैद्य ने हिमालय क्षेत्र में मिलने वाली संजीवनी बूटी लाने की सलाह दी। इस कार्य के लिए राम भक्त हनुमान संजीवनी बूटी की खोज में हिमालय की ओर रवाना हुए।
मान्यता है कि हनुमान, जब द्रोणागिरी पर्वत पर पहुंचे, तो वे संजीवनी बूटी की पहचान नहीं कर पाए। उपचार में देरी न हो, इसलिए वे पर्वत के एक हिस्से को उठाकर लंका ले गए। इस प्रसंग को द्रोणागिरी क्षेत्र की स्थानीय मान्यता से जोड़कर देखा जाता है।
रामलीला को लेकर अलग परंपरा
द्रोणागिरी गांव का यह प्रसंग, इसलिए चर्चा में है। क्योंकि यहां हनुमान की पूजा को लेकर परंपरागत रूप से अलग दृष्टिकोण है। स्थानीय मान्यतानुसार ग्रामीण हनुमानजी को उस घटना से जोड़कर देखते हैं। जिसमें संजीवनी बूटी लाने के लिए पर्वत का एक हिस्सा ले जाया गया। इसी वजह से गांव में हनुमान जी की पूजा नहीं करने की परंपरा है।
इसका असर रामलीला के आयोजन पर भी है। देश के विभिन्न हिस्सों में रामलीला का मंचन कई दिनों तक चलता है। इसके विपरीत, द्रोणागिरी गांव में पूरी रामलीला के मंचन को लेकर एक अलग परंपरा प्रचलित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहां रामलीला का पूर्ण आयोजन नहीं हो पाता और सीमित अवधि के मंचन होता है।
इस बारे में स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि पूर्व में प्रयास किया गया। लेकिन इसके बाद क्षेत्रीय लोगों को दैवीय और प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ा। इसके बाद यहां रामलीला का पूरा मंचन नहीं किया जाता है।
द्रोणागिरी पर्वत और औषधीय संपदा
द्रोणागिरी पर्वत को दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों का भंडार माना जाता रहा है। आयुर्वेद और स्थानीय परंपराओं में यहां का उल्लेख मिलता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां अनेक ऐसी जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं, जिनमें औषधीय गुण मौजूद हैं।
पौराणिक मान्यताओं के कारण यह पर्वत केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है। यही कारण है कि द्रोणागिरी का नाम सुनते ही लोगों के मन में संजीवनी बूटी और हनुमान जी की कथा जीवंत हो उठती है।
वचन पूरा करने आते हैं हनुमान
द्रोणागिरी गांव के प्रो नंदन सिंह रावत बताते हैं कि हम लोग प्रकृति उपासक सनातन धर्मावलंबी हैं।
पर्वतराज हिमालय (शिव) ग्राम ईष्ट के रूप में पूजित है, जो कि जीवन दायिनी संजीवनी के रक्षक हैं। वो बताते हैं कि त्रेता युग में जब हनुमानजी द्रोणागिरी पहुंचे, तो वे संजीवनी बूटी नहीं पहचान पाये। समय की कमी के कारण वो पर्वतराज हिमालय की अनुमति के बिना पर्वत के एक भाग को ले गए। हनुमानजी के इस कृत्य एवं पर्वत को हुए नुकसान से पर्वतराज हिमालय नाराज हो गये। हनुमानजी द्वारा प्रयोजन बताया गया। उन्होंने अपने कृत्य के प्रायश्चित हेतु वापस आने का वचन दिया।
नंदन सिंह के मुताबिक हनुमानजी, अपने वचन को पूरा करने के लिए हर साल वानर रूप में द्रोणागिरी आते हैं। एक या दो दिन प्रवास के बाद चले जाते हैं। गांव के कुछ लोग वानर को देखते और कुछ नहीं।
आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश
द्रोणागिरी पर्वत के एक हिस्से को केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं किया जा सकता। बल्कि इसके पीछे स्थानीय लोगों की पर्यावरण के प्रति संजीदगी का संदेश भी छिपा है। जिसका उल्लेख कम हो पाता है।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
निश्चित रूप से संजीवनी बूटी की कथा और पर्वत से जुड़े लोकविश्वास ने एक ऐसी परंपरा को जन्म दिया। जो देश के अन्य हिस्सों में प्रचलित रामलीला की परंपरा से अलग दिखाई देती है।
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