जंतर-मंतर पर सरकारी ताला! जनता की आवाज से क्यों डर रही सत्ता? सरकार के इन हथकंडों से किसी का भला नहीं होगा
जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के फैसले पर उठे गंभीर सवाल। क्या जनता की आवाज से डर रही सरकार? जानिए कैसे विरोध के अधिकार, लोकतंत्र और सरकारी जवाबदेही पर यह निर्णय नई बहस खड़ी करता है।
प्रदर्शन स्थल बदलने से जनाक्रोश समाप्त नहीं होता। लोकतंत्र में सरकार का काम असहमति को दूर धकेलना नहीं, जनता की शिकायतें सुनना और अपनी नीतियों का हिसाब देना है।
By- Chaudhary Sudhir Talyan
लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावी रैलियों, सत्ता के भव्य समारोहों और सरकारी उपलब्धियों के विज्ञापनों में नहीं होती। उसकी वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब किसान अपनी फसल का उचित मूल्य मांगता है, मजदूर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाता है, छात्र शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है और नागरिक सरकार की नीतियों के विरुद्ध सड़क पर उतरता है। सत्ता को उस समय तय करना होता है कि वह जनता की आवाज सुनेगी या उसे नियंत्रित करने के लिए प्रशासनिक आदेशों की दीवार खड़ी करेगी।
दिल्ली का जंतर-मंतर इसी लोकतांत्रिक परीक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां अलग-अलग विचारधाराओं, संगठनों और सामाजिक समूहों ने अपनी मांगें उठाई हैं। लेकिन अब जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने और रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान तथा CBD मैदान जैसे वैकल्पिक स्थलों की व्यवस्था करने के फैसले ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सवाल केवल एक मैदान का नहीं है। सवाल उस राजनीतिक सोच का है, जो जनता की असहमति को लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के बजाय प्रशासन के लिए परेशानी समझने लगती है।
सरकार को यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि विरोध का स्थान बदल देने से विरोध के कारण समाप्त हो जाएंगे। जनता की समस्याएं किसी मैदान की मोहताज नहीं होतीं।
जंतर-मंतर हटाया, लेकिन सवाल कहां जाएंगे?
जंतर-मंतर वर्षों से उन नागरिकों का मंच रहा है, जिनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक सामान्य परिस्थितियों में नहीं पहुंच पाती। यहां आने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी राजनीतिक दल का समर्थक नहीं होता। अनेक लोग ऐसे होते हैं, जिनके पास न संसाधन हैं, न प्रभावशाली संपर्क और न ही अपनी शिकायतों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने का कोई दूसरा प्रभावी माध्यम।
ऐसे लोगों के लिए सार्वजनिक प्रदर्शन केवल भीड़ इकट्ठी करने की गतिविधि नहीं, बल्कि अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का लोकतांत्रिक साधन है।
यदि प्रशासन किसी पुराने प्रदर्शन स्थल को बदलने का निर्णय लेता है, तो उसे यह साबित करना चाहिए कि वैकल्पिक व्यवस्था नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए सार्वजनिक व्यवस्था भी बनाए रखेगी। केवल तीन मैदानों के नाम घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। उनकी पहुंच, परिवहन, सुरक्षा, सुविधाओं और अनुमति की प्रक्रिया का स्पष्ट विवरण भी जरूरी है।
यदि नए स्थानों तक पहुंचना महंगा हो, सार्वजनिक परिवहन अपर्याप्त हो या अनुमति प्राप्त करना कठिन बना दिया जाए, तो कागज पर उपलब्ध अधिकार व्यवहार में कमजोर पड़ सकते हैं।
सरकार को बताना चाहिए कि क्या उसने छोटे संगठनों, किसानों, मजदूरों, छात्रों और आर्थिक रूप से कमजोर प्रदर्शनकारियों की परिस्थितियों का आकलन किया है। क्या नए स्थलों पर पर्याप्त सुविधाएं हैं? क्या अनुमति के नियम सार्वजनिक होंगे? क्या अनुमति अस्वीकार करने पर कारण बताए जाएंगे?
इन प्रश्नों का जवाब दिए बिना किसी प्रशासनिक बदलाव को जनहित का निर्णय बताना आत्मप्रशंसा से अधिक कुछ नहीं होगा।
सार्वजनिक व्यवस्था या असहमति को नियंत्रित करने की व्यवस्था?
सरकार और पुलिस का दायित्व सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना है। इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा और नागरिकों की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से सीमित करना दो अलग बातें हैं।
प्रशासन को यातायात, सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन की समस्याओं का समाधान करना चाहिए। यदि किसी प्रदर्शन से वास्तविक जोखिम पैदा होता है, तो परिस्थितियों के अनुरूप उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। लेकिन हर समस्या का समाधान प्रदर्शनकारियों को दूर भेज देना नहीं हो सकता।
यही वह बिंदु है जहां सरकार की प्राथमिकताओं की परीक्षा होती है।
क्या प्रशासन का उद्देश्य नागरिकों की समस्याओं को सुनने की व्यवस्था बनाना है, या ऐसी व्यवस्था खड़ी करना है जिसमें नागरिकों की आवाज सत्ता के लिए कम असुविधाजनक हो जाए?
यदि किसी विरोध से यातायात प्रभावित होता है, तो बेहतर यातायात प्रबंधन कीजिए। यदि सुरक्षा की चिंता है, तो पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था कीजिए। यदि प्रदर्शनकारियों के लिए सुविधाओं की कमी है, तो सुविधाएं बढ़ाइए। लेकिन प्रशासनिक सुविधा को नागरिक अधिकारों पर स्वतः सर्वोच्चता देने का अधिकार किसी सरकार को नहीं है।
जनता सरकार के लिए बाधा नहीं है। जनता ही सरकार के अस्तित्व का आधार है।
संविधान सत्ता की सुविधा का दस्तावेज नहीं
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है। इन अधिकारों पर संविधान के तहत निर्धारित उचित प्रतिबंध लागू हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रशासन अपनी सुविधा के अनुसार नागरिकों की असहमति को सीमित करने के लिए स्वतंत्र है।
सुप्रीम कोर्ट ने Mazdoor Kisan Shakti Sangathan बनाम Union of India मामले में 2018 में शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर विचार किया था।
इस न्यायिक दृष्टिकोण का अर्थ यह नहीं कि नागरिकों को किसी भी स्थान पर, किसी भी परिस्थिति में प्रदर्शन करने का असीमित अधिकार प्राप्त है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि सरकार किसी स्थान को बदलकर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती है।
मौजूदा विवाद में महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या वैकल्पिक स्थलों की व्यवस्था नागरिकों को प्रभावी ढंग से अपनी मांग रखने का अवसर देती है और क्या प्रशासनिक निर्णय आवश्यक, उचित तथा आनुपातिक है।
अदालत को इन पहलुओं पर विचार करना है। इसलिए किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष से पहले निर्णय की वैधता पर अंतिम फैसला सुनाना उचित नहीं होगा।
लेकिन सरकार को यह समझना चाहिए कि प्रशासनिक आदेश जारी कर देना और संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी कर देना एक ही बात नहीं है।
किसानों, मजदूरों और छात्रों की आवाज आखिर सुनेगा कौन?
देश का किसान फसल के उचित मूल्य, बढ़ती लागत और कर्ज के बोझ से जूझ रहा है। मजदूर रोजगार, वेतन और सामाजिक सुरक्षा की मांग कर रहा है। छात्र शिक्षा की गुणवत्ता, फीस और रोजगार के अवसरों को लेकर चिंतित हैं। बेरोजगार युवा भविष्य को लेकर सवाल उठा रहे हैं। सामाजिक संगठनों को अनेक मामलों में अपने अधिकारों और मांगों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
इन सभी समस्याओं का समाधान किसी प्रदर्शन स्थल को बदलने से नहीं होगा।
यदि किसान की मांग जायज है, तो उसकी सुनवाई होनी चाहिए। यदि मजदूर शोषण की शिकायत करता है, तो जांच होनी चाहिए। यदि छात्र शिक्षा व्यवस्था की कमियां उजागर करता है, तो सरकार को जवाब देना चाहिए। यदि नागरिक किसी सरकारी नीति को जनविरोधी मानता है, तो सरकार को उस नीति का सार्वजनिक औचित्य स्पष्ट करना चाहिए।
लोकतांत्रिक शासन में विरोध सरकार की विफलता का स्वतः प्रमाण नहीं है। लेकिन विरोध को सुनने से लगातार बचना, शिकायतों का समाधान न करना और आलोचना को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखना शासन की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न अवश्य खड़े करता है।
सत्ता को यह तय करने का अधिकार नहीं कि केवल प्रशंसा स्वीकार की जाएगी और आलोचना को असुविधाजनक मानकर किनारे कर दिया जाएगा।
जनता की आवाज को दूर धकेलना समाधान नहीं
प्रदर्शन का महत्व उसके स्थान, समय और उद्देश्य से जुड़ा होता है। किसी सरकारी संस्था के निकट प्रदर्शन करने से नागरिक अपनी मांगों को सीधे सार्वजनिक विमर्श में ला सकते हैं। स्थान बदलने से यह प्रभाव कितना घटेगा, इसका आकलन तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।
लेकिन यह स्पष्ट है कि किसी समस्या को सार्वजनिक दृष्टि से दूर कर देना, उसका समाधान कर देना नहीं है।
यदि किसान की समस्या बनी हुई है, तो वह किसी दूसरे मैदान में भी उठेगी। यदि बेरोजगार युवा निराश है, तो उसका प्रश्न किसी प्रशासनिक आदेश से समाप्त नहीं होगा। यदि नागरिकों को किसी नीति पर आपत्ति है, तो उन्हें चुप करा देने से नीति सही साबित नहीं हो जाती।
सरकारें अक्सर व्यवस्था और अनुशासन की भाषा में अपने निर्णयों का बचाव करती हैं। लेकिन अनुशासन का अर्थ नागरिकों की चुप्पी नहीं है। व्यवस्था का अर्थ असहमति का अंत नहीं है। और विकास का अर्थ यह नहीं कि जनता को अपनी समस्याएं उठाने के लिए भी प्रशासन की सुविधा के अनुसार स्थान तलाशना पड़े।
किसी लोकतांत्रिक सरकार की ताकत इस बात में नहीं कि वह कितनी आसानी से प्रदर्शन को नियंत्रित कर सकती है। उसकी ताकत इस बात में है कि वह आलोचना सुनने, गलतियों को स्वीकार करने और नीतियों में सुधार करने का कितना साहस रखती है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने केवल स्थान का नहीं, अधिकारों की प्रभावशीलता का प्रश्न
जंतर-मंतर से संबंधित विवाद में सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रशासनिक निर्णय की वैधता और वैकल्पिक स्थलों की उपयुक्तता महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। दिल्ली में हालिया प्रदर्शनों के संदर्भ में हिरासत, पुलिस कार्रवाई और पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार को लेकर उठे सवाल भी नागरिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के व्यापक विमर्श का हिस्सा हैं। इन आरोपों की जांच तथ्यों और कानून के आधार पर होनी चाहिए।
न्यायपालिका की भूमिका यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की सरकारी शक्ति संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहे। दूसरी ओर, प्रशासन को भी न्यायिक निर्देशों और नागरिक अधिकारों का सम्मान करते हुए स्पष्ट, पारदर्शी तथा निष्पक्ष व्यवस्था बनानी चाहिए।
प्रदर्शन स्थलों की सूची, अनुमति के नियम, सुविधाओं का विवरण और प्रतिबंध लगाने के आधार सार्वजनिक किए जाने चाहिए। किसी भी शिकायत पर निष्पक्ष सुनवाई और प्रभावी उपचार की व्यवस्था होनी चाहिए।
यह मांग किसी एक राजनीतिक दल, संगठन या विचारधारा की नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक के हित में है, क्योंकि आज जिस अधिकार का उपयोग कोई दूसरा व्यक्ति कर रहा है, कल उसी अधिकार की आवश्यकता किसी भी नागरिक को पड़ सकती है।
सरकार को याद रखना चाहिए: जनता मालिक है, सत्ता जवाबदेह
लोकतंत्र में सरकार जनता पर एहसान करने के लिए नहीं बैठती। उसे संविधान के अनुसार शासन करना है, सार्वजनिक संसाधनों का जवाबदेही से उपयोग करना है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी है।
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का निर्णय यदि वास्तव में सार्वजनिक सुरक्षा और बेहतर सुविधाओं के लिए लिया गया है, तो सरकार को उसके समर्थन में ठोस तथ्य सार्वजनिक करने चाहिए। उसे साबित करना चाहिए कि वैकल्पिक स्थल केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि प्रभावी और सुलभ विरोध के लिए तैयार किए गए हैं।
यदि व्यवस्था में कमियां हैं, तो उन्हें दूर करना चाहिए। यदि निर्णय से नागरिकों के अधिकारों पर असंगत प्रभाव पड़ता है, तो उसमें सुधार करना चाहिए। यदि प्रशासनिक प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है, तो उसे समाप्त करना चाहिए।
लेकिन जनता की आवाज को नियंत्रित करने को शासन की सफलता समझना घातक भूल होगी।
सरकार के इन हथकंडों से किसी का भला नहीं होगा। न इससे किसानों की समस्याएं समाप्त होंगी, न बेरोजगारी दूर होगी, न महंगाई घटेगी और न ही नागरिकों का असंतोष खत्म होगा। उलटे, यदि लोगों को यह महसूस होने लगे कि उनकी शिकायतों को सुनने के बजाय उन्हें दूर धकेला जा रहा है, तो सरकार और जनता के बीच विश्वास की खाई और गहरी हो सकती है।
जंतर-मंतर केवल एक स्थान का नाम नहीं है। वह उस लोकतांत्रिक भावना का प्रतीक है, जिसमें साधारण नागरिक भी सत्ता के सामने खड़े होकर सवाल पूछ सकता है।
सरकार को इस आवाज से डरने के बजाय इसका सम्मान करना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं, बल्कि जवाबदेह शासन की अनिवार्य शर्त है।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
सत्ता को याद रखना चाहिए—मैदान बदले जा सकते हैं, रास्ते रोके जा सकते हैं और अनुमति की शर्तें बदली जा सकती हैं; लेकिन जनता की समस्याओं को प्रशासनिक आदेश से समाप्त नहीं किया जा सकता। जनता की आवाज सुनना सरकार की मजबूरी नहीं, उसका संवैधानिक और लोकतांत्रिक दायित्व है।
https://politicsinsightindia.com/supreme-court-se-bharosa-utha-kapil-sibal-ka-bayan
Source:
- 9 अक्टूबर का सुप्रीम कोर्ट आदेश: सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पाठ
- जंतर-मंतर से संबंधित याचिका और नए प्रदर्शन स्थलों का विवाद: Bar & Bench की रिपोर्ट
- दिल्ली पुलिस का आदेश और वैकल्पिक स्थलों का विवरण: The Indian Express की रिपोर्ट
- 13 अक्टूबर की सुनवाई और 15 अक्टूबर तक स्थगन: LiveLaw की रिपोर्ट
- शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का 2018 का फैसला: Mazdoor Kisan Shakti Sangathan बनाम Union of India
- पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई: LiveLaw की रिपोर्ट
- दिल्ली में पत्रकारों की हिरासत और प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े आरोप: Reuters की रिपोर्ट
Disclaimer:
यह लेख जनहित, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित संपादकीय एवं विचारात्मक विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। न्यायिक कार्यवाही और संबंधित घटनाओं की जानकारी उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित है। किसी व्यक्ति, संस्था या सरकार के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य न माना जाए। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों एवं विश्वसनीय स्रोतों से तथ्यों की पुष्टि करें।
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