गन्ना नीति से किसान बर्बाद, उद्योग मालामाल, किसान नाराज: 2027 में पश्चिमी यूपी में भाजपा के लिए सत्ता की राह कठिन
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसान कर्ज और घटती आय से परेशान हैं। गन्ना नीति में किसान की हिस्सेदारी, चीनी उद्योग के लाभ और योगी सरकार की नीतियों पर उठते सवालों के बीच जानिए क्यों 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बड़ा राजनीतिक नुकसान हो सकता है।
2027 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का चुनावी हिसाब बिगाड़ सकती है गलत नीति
लेखक: चौधरी सुधीर ताल्यान| PII.News संपादकीय
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में गन्ना केवल एक फसल नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के ग्रामीण कारोबार, लाखों परिवारों की आजीविका और किसानों की आर्थिक स्वतंत्रता का सवाल है। इसीलिए गन्ना किसानों की नाराजगी को किसी सामान्य शिकायत की तरह खारिज करना राजनीतिक अदूरदर्शिता होगी। किसानों के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सरकार ने गन्ने का मूल्य कितना घोषित किया, बल्कि यह है कि गन्ने से पैदा होने वाली कुल आर्थिक कमाई में किसान का हिस्सा कितना है और चीनी उद्योग को कितना लाभ मिल रहा है।
यही वह बुनियादी सवाल है, जिससे उत्तर प्रदेश की गन्ना नीति की निष्पक्षता परखनी चाहिए।
यदि एक क्विंटल गन्ने से उद्योग को लगभग 1,400 रुपये की सकल आय प्राप्त होती है, जबकि किसान को मात्र 365 रुपये मिलते हैं और खेती की लागत लगभग 227 रुपये प्रति क्विंटल बैठती है, तो इस आर्थिक ढांचे की गंभीर समीक्षा आवश्यक है। हालांकि, इन आंकड़ों के आधार पर वास्तविक लाभ का अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले चीनी, शीरा, एथेनॉल, बिजली और अन्य सह-उत्पादों से प्राप्त आय, प्रसंस्करण लागत तथा अन्य खर्चों का स्वतंत्र आकलन भी जरूरी है।
लेकिन मूल प्रश्न अपनी जगह कायम है: गन्ने की पूरी मूल्य-श्रृंखला से पैदा होने वाली आर्थिक समृद्धि में किसान की उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित क्यों नहीं की जाती?
1. FRP की घोषणा नहीं, किसान की आर्थिक स्थिति महत्वपूर्ण है
सरकारें अक्सर गन्ने के उचित एवं लाभकारी मूल्य यानी FRP में वृद्धि को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उत्तर प्रदेश में राज्य परामर्शित मूल्य यानी SAP भी किसानों को मिलने वाली कीमत निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मगर किसी मूल्य की घोषणा अपने आप यह साबित नहीं करती कि किसान आर्थिक रूप से मजबूत हो गया है।
किसान की वास्तविक स्थिति उसके खर्च, प्राप्त भुगतान, कर्ज और खेती से बचने वाली शुद्ध आय से तय होती है।
यदि खाद, बीज, सिंचाई, डीजल, मजदूरी, मशीनरी और भूमि संबंधी खर्च लगातार बढ़ते हैं, तो घोषित मूल्य में वृद्धि के बावजूद किसान की आर्थिक स्थिति कमजोर रह सकती है। भुगतान में देरी इस संकट को और गंभीर बनाती है। किसान को खेती के लिए दोबारा पैसा चाहिए, लेकिन उसकी पिछली फसल का भुगतान ही अटका हुआ हो, तो वह कर्ज लेने के लिए मजबूर होता है।
इसलिए सरकार को केवल यह बताकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाना चाहिए कि उसने गन्ने का मूल्य बढ़ा दिया है। उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि लागत और जोखिम घटाने के बाद किसान के पास कितनी वास्तविक आय बच रही है।
किसान को मूल्य की घोषणा नहीं, ऐसी आर्थिक व्यवस्था चाहिए जिसमें खेती घाटे और कर्ज का स्थायी स्रोत न बने।
2. गन्ना नीति में किसान कमजोर, उद्योग का आर्थिक हित सर्वोपरि?
गन्ना नीति की सबसे बड़ी आलोचना उसके लाभ वितरण के आधार पर की जानी चाहिए। किसान जमीन, पानी, श्रम और पूंजी लगाता है। मौसम की अनिश्चितता, बीमारी, उत्पादन संबंधी जोखिम और खेती के खर्च का बोझ भी मुख्यतः उसी पर पड़ता है। इसके बाद उसकी उपज चीनी उद्योग के लिए कच्चे माल का आधार बनती है।
लेकिन किसान को मिलने वाली कीमत और उद्योग की पूरी मूल्य-श्रृंखला से प्राप्त आय के बीच अंतर का आकलन किए बिना यह तय नहीं किया जा सकता कि आर्थिक जोखिम और लाभ का वितरण न्यायसंगत है या नहीं।
यदि उद्योग को गन्ने से बनने वाली चीनी, एथेनॉल, शीरा और बिजली जैसे सह-उत्पादों से पर्याप्त कमाई होती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उस आर्थिक मूल्य में गन्ना उत्पादक की हिस्सेदारी किस आधार पर तय होती है।
सरकार की जिम्मेदारी उद्योग के अस्तित्व की रक्षा करना भर नहीं है। उसे किसान और उद्योग के बीच ऐसा संतुलन स्थापित करना चाहिए जिसमें कच्चा माल पैदा करने वाला किसान आर्थिक रूप से कमजोर न होता जाए।
यदि नीति का व्यावहारिक परिणाम यह हो कि उद्योग अपने व्यावसायिक हितों की रक्षा कर ले, लेकिन किसान लगातार कर्ज में डूबता रहे, तो उस नीति की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाना पूरी तरह जायज है।
3. किसान का कर्ज व्यक्तिगत विफलता नहीं, व्यवस्था की समस्या भी है
किसान पर बढ़ते कर्ज को केवल उसकी आर्थिक अनुशासनहीनता या गलत निर्णयों का परिणाम बताना अन्यायपूर्ण होगा।
किसान खेती इसलिए करता है कि परिवार का जीवन चले, बच्चों की शिक्षा हो, स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें पूरी हों और अगली फसल बोई जा सके। लेकिन जब उसकी कृषि आय इन आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ हो जाती है, तब कर्ज उसके लिए विकल्प नहीं, मजबूरी बन जाता है
इस तरह किसान की आर्थिक समस्या एक चक्र में बदल जाती है।
जब आमदनी सीमित हो, खर्च बढ़ रहे हों और अगली फसल के लिए फिर निवेश करना हो, तब केवल व्यक्तिगत प्रयास से इस चक्र से बाहर निकलना कठिन हो जाता है।
ऐसी परिस्थिति में सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उसे कृषि लागत, लाभकारी मूल्य, भुगतान की समयबद्धता, संस्थागत ऋण और ग्रामीण रोजगार की व्यवस्था में सुधार करना चाहिए।
जिस किसान की आय व्यवस्था की खामियों के कारण लगातार दबाव में हो, उसे केवल कर्ज चुकाने की सलाह देना समस्या का समाधान नहीं है।
4. किसान और उद्योग के बीच लाभांश की बहस अब टाली नहीं जा सकती
गन्ना किसानों की मांग केवल कीमत बढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें उस आर्थिक मूल्य में उचित हिस्सेदारी मिलनी चाहिए, जो उनकी उपज से पूरी औद्योगिक श्रृंखला में पैदा होता है।
इसके लिए सरकार को चीनी मिलों की आय और लागत संबंधी आंकड़ों की पारदर्शी समीक्षा करानी चाहिए। चीनी, एथेनॉल, शीरा और बिजली से होने वाली आय तथा संबंधित उत्पादन लागत का स्वतंत्र मूल्यांकन सार्वजनिक होना चाहिए।
इसके आधार पर यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि गन्ने का मूल्य किसान की लागत, उचित प्रतिफल और उद्योग की वास्तविक आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर कैसे तय किया जाए।
इसके साथ ही भुगतान में देरी पर प्रभावी कार्रवाई, बकाया राशि की पारदर्शिता और किसानों की शिकायतों के त्वरित निस्तारण की व्यवस्था जरूरी है।
किसान को उद्योग का विरोधी बनाना समाधान नहीं है। सवाल यह है कि उद्योग की आर्थिक स्थिरता और किसान की आर्थिक सुरक्षा को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा किए बिना न्यायपूर्ण व्यवस्था कैसे बनाई जाए।
लेकिन यदि किसान की आर्थिक सुरक्षा को लगातार नजरअंदाज किया जाता है, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में असमानता और अविश्वास बढ़ना स्वाभाविक है।
5. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने राजनीतिक चुनौती
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान और गन्ना भुगतान लंबे समय से महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। ऐसे क्षेत्र में कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़ी शिकायतों को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा की सीटें घटकर 33 रह गईं, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतीं। यह परिणाम बताता है कि राज्य में भाजपा को मजबूत राजनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ा। हालांकि, लोकसभा चुनाव के परिणामों से 2027 के विधानसभा चुनाव का नतीजा सीधे निर्धारित नहीं किया जा सकता।
आगामी चुनाव में गन्ना किसानों का असंतोष कितना निर्णायक होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उनकी आर्थिक समस्याएं कितनी गंभीर हैं, वे किसे जिम्मेदार मानते हैं और विपक्ष उनके सामने कितना विश्वसनीय विकल्प रखता है।
फिर भी, भाजपा सरकार के लिए चेतावनी स्पष्ट है: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की शिकायतों को केवल राजनीतिक विरोध या विपक्षी प्रचार बताकर खारिज करना भारी पड़ सकता है।
किसान को अपने खेत में आर्थिक सुरक्षा चाहिए। उसे अपनी फसल का उचित मूल्य चाहिए। उसे भुगतान के लिए अनिश्चित इंतजार और कर्ज के सहारे जीवन चलाने की मजबूरी से मुक्ति चाहिए।
यदि सरकार इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं करती, तो किसान का असंतोष चुनावी समर्थन में बदलाव का कारण बन सकता है।
6. 2027 से पहले नीति बदलिए, वरना राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है
योगी सरकार के पास अभी यह साबित करने का अवसर है कि उसकी कृषि नीति केवल घोषणाओं पर आधारित नहीं, बल्कि किसानों की वास्तविक आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए प्रतिबद्ध है।
इसके लिए गन्ना मूल्य निर्धारण की समीक्षा, लागत और आय के स्वतंत्र आकलन, उद्योग की मूल्य-श्रृंखला में पारदर्शिता, समयबद्ध भुगतान और किसान की आर्थिक भागीदारी सुनिश्चित करने वाले ठोस कदम उठाने होंगे।
किसानों के कर्ज की समस्या को भी व्यापक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। जहां नीतिगत कमियों और लगातार कम आय ने किसानों को कर्ज के जाल में धकेला है, वहां राहत, पुनर्गठन और दीर्घकालिक समाधान पर गंभीर विचार आवश्यक है।
सरकार को यह भी समझना चाहिए कि किसान केवल चुनाव के समय याद किया जाने वाला मतदाता नहीं है। वह देश की खाद्य व्यवस्था, ग्रामीण बाजार और कृषि आधारित उद्योगों की आर्थिक नींव है।
यदि उसी की आर्थिक स्थिति कमजोर होती जाती है, तो ग्रामीण समृद्धि के सरकारी दावे खोखले दिखाई देने लगते हैं।
निष्कर्ष: किसान की अनदेखी की कीमत चुनाव में चुकानी पड़ सकती है
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को 2027 के विधानसभा चुनाव में कितना नुकसान होगा, इसका निश्चित दावा अभी नहीं किया जा सकता। लेकिन यह कहना उचित है कि गन्ना किसानों का असंतोष सरकार के लिए गंभीर राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
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किसान की समस्या का समाधान केवल FRP या SAP बढ़ाने की घोषणा में नहीं है। जरूरत ऐसी नीति की है जो वास्तविक लागत, उचित प्रतिफल, भुगतान की समयबद्धता और उद्योग की पूरी मूल्य-श्रृंखला में किसान की आर्थिक हिस्सेदारी को महत्व दे।
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यदि सरकार किसानों की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेती और उद्योग तथा किसान के बीच आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाती, तो 2027 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसे राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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किसान को घाटे में रखकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती। किसान को कर्ज में धकेलकर कृषि समृद्धि का दावा नहीं किया जा सकता। और किसान की अनदेखी करके पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक बढ़त बनाए रखने की गारंटी भी नहीं दी जा सकती।
अब सवाल यह नहीं कि सरकार ने गन्ने का मूल्य कितना घोषित किया। असली सवाल यह है कि उस मूल्य से किसान का जीवन कितना सुधरा।
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यदि इस सवाल का जवाब किसानों के अनुभव में नहीं मिलता, तो सरकार को अपनी नीति बदलनी ही होगी।
Disclaimer:
यह लेख लेखक के निजी विचारों पर आधारित संपादकीय विश्लेषण है। इसमें उल्लिखित आर्थिक आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। 2027 के चुनाव संबंधी निष्कर्ष अनुमान हैं, निश्चित भविष्यवाणी नहीं। उद्देश्य किसान हितों, नीतिगत पारदर्शिता और आर्थिक न्याय पर चर्चा को बढ़ावा देना है।
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