GSLV सफल हुआ, लेकिन ISRO के अंदर क्यों उठा तूफान? रॉकेट बनाने से हटेगा ISRO, निजी हाथों में जाएगी कमान?

GSLV लॉन्च के बाद ISRO के 9 कर्मचारी संगठनों ने अंतरिक्ष के निजीकरण पर सवाल उठाए। क्या रॉकेट निर्माण निजी हाथों में जाएगा और ISRO की भूमिका घटेगी?

GSLV सफल हुआ, लेकिन ISRO के अंदर क्यों उठा तूफान? रॉकेट बनाने से हटेगा ISRO, निजी हाथों में जाएगी कमान?

 अंतरिक्ष में भारत आत्मनिर्भर होगा या अपनी क्षमता निजी हाथों में सौंप देगा?

By- Ch. Sudhir Talyan

एक तरफ GSLV की सफल उड़ान, दूसरी तरफ ISRO के नौ कर्मचारी संगठनों का पत्र—भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के भविष्य पर उठे सवाल अब केवल कर्मचारियों की चिंता नहीं, राष्ट्रीय संपत्ति और तकनीकी संप्रभुता का सवाल हैं।

भारत ने जब GSLV-F17/EOS-05 मिशन की सफलता का जश्न मनाया, उसी समय भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO के नौ कर्मचारी संगठनों ने एक ऐसा सवाल उठा दिया जिसे सरकार आसानी से टाल नहीं सकती।

सवाल सीधा है—अगर ISRO ने दशकों की मेहनत, सार्वजनिक धन और वैज्ञानिक प्रतिभा से लॉन्च व्हीकल तकनीक विकसित की है, तो क्या भविष्य में वही ISRO इन रॉकेटों का निर्माण नहीं करेगा?

और अगर ऐसा है, तो फिर ISRO की वास्तविक भूमिका क्या रह जाएगी?

यह प्रश्न किसी राजनीतिक दल ने नहीं उठाया। इसे उन कर्मचारियों ने उठाया है जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को प्रयोगशाला से लॉन्चपैड तक पहुंचाने वाली व्यवस्था का हिस्सा हैं।

4 सितंबर 2026 को नौ कर्मचारी संगठनों ने ISRO अध्यक्ष एवं Department of Space के सचिव वी. नारायणन को संयुक्त पत्र भेजकर अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी की दिशा पर स्पष्टता मांगी। विवाद का तत्काल कारण IN-SPACe के अध्यक्ष पवन गोयनका का वह सार्वजनिक बयान बना, जिसमें उन्होंने कहा था कि भविष्य में ISRO लॉन्च व्हीकल का निर्माण नहीं करेगा और यह काम निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा किया जाएगा।

यहीं से मामला गंभीर हो जाता है।

क्योंकि यह केवल एक रॉकेट बनाने की फैक्ट्री का सवाल नहीं है।

यह तकनीकी क्षमता, संस्थागत ज्ञान, सार्वजनिक निवेश और राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है।


निजी क्षेत्र आए—लेकिन ISRO क्यों पीछे हटे?

भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने का विरोध करना न तो व्यावहारिक है और न ही समय की जरूरतों के अनुकूल।

Indian Space Policy 2023 ने निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए रास्ता स्पष्ट किया है। सरकार चाहती है कि भारत एक बड़ा commercial space ecosystem बनाए। यह लक्ष्य उचित है।

लेकिन समस्या वहां शुरू होती है जहां “निजी क्षेत्र की भागीदारी” और “सरकारी तकनीकी क्षमता से पीछे हटना” एक ही नीति मान ली जाती है।

निजी कंपनियां रॉकेट बनाएं—बिल्कुल।

निजी कंपनियां satellite बनाएं—बिल्कुल।

निजी कंपनियां launch services दें—बिल्कुल।

लेकिन क्या इसका अर्थ यह भी होना चाहिए कि ISRO स्वयं operational launch vehicles के निर्माण से बाहर हो जाए?

यही वह सवाल है जिस पर सरकार को चुप्पी तोड़नी चाहिए।

किसी देश की अंतरिक्ष एजेंसी को केवल research laboratory में बदल देना और उसकी engineering तथा manufacturing capability धीरे-धीरे उद्योग को सौंप देना एक साधारण administrative reform नहीं है। यह संस्था के चरित्र में बुनियादी बदलाव है।


ISRO कोई सामान्य सरकारी विभाग नहीं है

ISRO को किसी सामान्य सरकारी manufacturing unit की तरह देखना खतरनाक भूल होगी।

एक launch vehicle केवल लोहे, composite material, electronics और software का ढांचा नहीं है।

उसके पीछे दशकों का अनुभव है।

एक failure के बाद कारण खोजने की क्षमता है। हजारों परीक्षणों से निकला institutional knowledge है। propulsion की समझ है। avionics की समझ है। systems integration का अनुभव है। launch operations का कौशल है।

और सबसे महत्वपूर्ण—वह tacit knowledge है जो किसी technology-transfer document में पूरी तरह नहीं लिखा जा सकता।

किसी कंपनी को drawing, design और production technology transfer की जा सकती है।

लेकिन किसी संस्था की दशकों में बनी engineering culture को एक contract के साथ transfer नहीं किया जा सकता।

यही कारण है कि दुनिया के बड़े अंतरिक्ष कार्यक्रम अपनी commercial companies को बढ़ाते हुए भी अपनी core sovereign capabilities को पूरी तरह खत्म नहीं करते।


2023 की Space Policy ने क्या कहा था?

यहां सरकार से एक असुविधाजनक लेकिन जरूरी सवाल पूछा जाना चाहिए।

Indian Space Policy 2023 में ISRO की भूमिका को advanced research, नई technologies और national priorities की ओर केंद्रित करने की बात है। साथ ही mature operational systems को industry द्वारा commercial exploitation के लिए transfer करने का रास्ता बनाया गया है।

इसका मतलब यह नहीं कि हर सरकारी manufacturing activity हमेशा ISRO के पास ही रहे।

लेकिन यह जरूर पूछा जा सकता है कि “mature technology का commercialisation” कब “institutional withdrawal” में बदल जाता है?

SSLV technology और production ecosystem के industry transfer की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है। PSLV और LVM3 जैसे अधिक महत्वपूर्ण launch vehicles के production को भी उद्योग की ओर ले जाने की चर्चा सार्वजनिक रूप से हो चुकी है।

यहीं पारदर्शिता की जरूरत पैदा होती है।

सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि:

क्या केवल production transfer होगा?

या

design, integration, testing और launch operations भी धीरे-धीरे बाहर जाएंगे?

इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।


कर्मचारी संगठनों ने असल में क्या पूछा?

नौ कर्मचारी संगठनों की मांग को केवल “नौकरी बचाने की कोशिश” कह देना आसान है।

लेकिन ऐसा करना पूरे विवाद को छोटा कर देना होगा।

उन्होंने यह जानना चाहा है कि PSLV, LVM3, SSLV और भविष्य के launch vehicles में ISRO की वास्तविक भूमिका क्या रहेगी।

कौन design करेगा?

कौन develop करेगा?

कौन integrate करेगा?

कौन test करेगा?

कौन launch करेगा?

और कौन manufacture करेगा?

इन सवालों का स्पष्ट उत्तर इसलिए जरूरी है क्योंकि यदि इन सभी चरणों को क्रमशः उद्योग को सौंप दिया जाता है, तो ISRO के पास केवल technology development और scientific missions का हिस्सा बचेगा।

तब सवाल उठेगा—

जिस संस्था ने भारत को launch-capable nation बनाया, क्या उसे भविष्य में अपने ही विकसित launch systems की production chain से बाहर कर दिया जाएगा?

यदि जवाब हां है, तो सरकार को यह निर्णय खुले तौर पर देश के सामने रखना चाहिए।

यदि जवाब नहीं है, तो सरकार को भी उतनी ही स्पष्टता से कहना चाहिए कि ISRO की कौन-सी capabilities स्थायी रूप से उसके पास रहेंगी।


“Private sector” कोई जादुई शब्द नहीं है

आज नीति-निर्माण में “private sector” शब्द का इस्तेमाल ऐसे किया जा रहा है जैसे निजी हाथों में जाने भर से efficiency पैदा हो जाती है।

यह धारणा अधूरी है।

निजी क्षेत्र प्रतिस्पर्धा ला सकता है।

निजी क्षेत्र लागत कम कर सकता है।

निजी क्षेत्र innovation को गति दे सकता है।

निजी कंपनियां global markets में तेजी से प्रवेश कर सकती हैं।

लेकिन निजी कंपनी का मूल उद्देश्य commercial return होता है।

राष्ट्र का उद्देश्य हमेशा commercial return नहीं होता।

कभी-कभी सरकार को ऐसी capability भी बनाए रखनी पड़ती है जो सामान्य बाजार की दृष्टि से महंगी हो, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अनिवार्य हो।

अगर किसी दिन geopolitical संकट के कारण commercial launch provider उपलब्ध न हो तो क्या होगा?

अगर कोई निजी कंपनी आर्थिक संकट में चली जाए तो क्या होगा?

अगर international supply chain टूट जाए तो क्या होगा?

अगर किसी strategic satellite को तत्काल launch करना पड़े तो क्या होगा?

ऐसे समय में देश को केवल “market capacity” नहीं चाहिए।

उसे sovereign capacity चाहिए।


सार्वजनिक पैसे से बनी तकनीक, निजी मुनाफे के लिए?

यह इस विवाद का सबसे असुविधाजनक सवाल है।

ISRO की अधिकांश प्रमुख क्षमताएं वर्षों के सार्वजनिक निवेश से बनी हैं।

करदाताओं के पैसे से laboratories बनीं।

सरकारी संस्थानों ने परीक्षण infrastructure बनाया।

वैज्ञानिकों और engineers ने technology विकसित की।

सरकार ने launch facilities बनाई।

अब यदि वही technology निजी कंपनियों को commercial production के लिए transfer होती है तो यह अपने आप में गलत नहीं है।

लेकिन शर्त क्या होगी?

Technology की कीमत कौन तय करेगा?

Royalty कौन लेगा?

Public infrastructure के उपयोग की लागत कौन देगा?

Intellectual property के अधिकार किसके पास रहेंगे?

क्या technology आगे किसी विदेशी कंपनी को transfer की जा सकेगी?

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े restrictions क्या होंगे?

अगर निजी कंपनी public infrastructure का इस्तेमाल करके अरबों रुपये का commercial business करती है तो जनता को उसका उचित economic return कैसे मिलेगा?

इन प्रश्नों का जवाब केवल press conference में नहीं, सार्वजनिक policy framework में होना चाहिए।


सबसे बड़ा खतरा—Institutional memory का क्षरण

सरकार यदि कहती है कि manufacturing निजी क्षेत्र कर सकता है, तो वह आर्थिक दृष्टि से सही हो सकती है।

लेकिन manufacturing से पूरी तरह हटना एक अलग बात है।

मान लीजिए आज ISRO के पास एक launch vehicle के design से लेकर launch तक की पूरी क्षमता है।

दस वर्ष बाद:

  • design ISRO में,
  • manufacturing private sector में,
  • integration industry में,
  • testing industry में,
  • launch operations भी commercial provider के पास।

तब ISRO के पास कागज पर technology हो सकती है, लेकिन क्या वही operational mastery भी रहेगी?

Technology ownership और technology competence एक चीज नहीं हैं।

किसी देश की असली शक्ति उसके पास रखे patent documents से नहीं, बल्कि उस technology को संकट की स्थिति में खुद विकसित, सुधार और deploy करने की क्षमता से तय होती है।


रोजगार का सवाल भी वास्तविक है

कर्मचारी संगठनों ने recruitment, sanctioned posts, promotion और career opportunities पर भी चिंता जताई है।

यह चिंता केवल सरकारी नौकरी बचाने की मानसिकता मानकर खारिज नहीं की जानी चाहिए।

यदि ISRO में manufacturing और routine production लगातार कम होते हैं, तो आने वाले वर्षों में नई technical recruitment का pattern बदल सकता है।

इससे एक और समस्या पैदा हो सकती है।

युवा engineers किस तरह के संगठन में काम करना चाहेंगे?

ऐसे संगठन में जहां उन्हें end-to-end mission development का अनुभव मिले?

या ऐसे संगठन में जहां design हो लेकिन production और operational execution लगातार बाहर चला जाए?

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एक वैज्ञानिक संस्था की ताकत केवल उसके buildings और laboratories नहीं होते।

उसकी अगली पीढ़ी की प्रतिभा भी उसकी संपत्ति होती है।


रास्ता निजीकरण रोकना नहीं, सीमा तय करना है

इस पूरे विवाद का समाधान यह नहीं है कि private sector को space sector से बाहर कर दिया जाए।

भारत को private space industry चाहिए।

बहुत बड़ी चाहिए।

लेकिन साथ-साथ ISRO की minimum sovereign capability भी स्पष्ट रूप से सुरक्षित होनी चाहिए।

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एक बेहतर मॉडल यह हो सकता है:

ISRO — advanced R&D, strategic missions, core launch technology और sovereign technical capability।

PSUs — strategic और बड़े पैमाने का manufacturing।

Private companies — commercial manufacturing, launch services, satellite applications और global market expansion।

IN-SPACe — authorisation, promotion और sectoral facilitation।

NSIL — commercialisation और market interface।

इस मॉडल में private sector ISRO को replace नहीं करता।

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वह ISRO के आसपास बनी क्षमता को scale करता है।


अब गेंद सरकार के पाले में है

GSLV की सफलता के बाद देश को गर्व होना चाहिए।

लेकिन उसी क्षण ISRO कर्मचारियों द्वारा उठाया गया सवाल भी सुना जाना चाहिए।

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क्योंकि लोकतंत्र में सार्वजनिक संस्थानों के कर्मचारियों का यह अधिकार है कि वे उस संस्था के भविष्य को लेकर सवाल पूछें जिसमें उन्होंने अपना जीवन लगाया है।

सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि पवन गोयनका का “ISRO launch vehicles manufacture नहीं करेगा” वाला बयान केवल एक policy interpretation था या सरकार का औपचारिक निर्णय।

अगर यह निर्णय है तो इसकी पूरी नीति देश के सामने रखी जानी चाहिए।

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अगर निर्णय नहीं है तो भ्रम दूर किया जाना चाहिए।

और यदि सरकार सचमुच ISRO को मुख्यतः R&D संस्था बनाना चाहती है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा, strategic launches, emergency situations और technological sovereignty के लिए permanent government capability कौन संभालेगा।


निष्कर्ष: रॉकेट निजी हो सकता है, लेकिन अंतरिक्ष की संप्रभुता नहीं

भारत को दुनिया की बड़ी space economy बनना है तो private capital, entrepreneurship और competition की जरूरत होगी।

लेकिन आर्थिक विकास की दौड़ में यह भूलना घातक होगा कि अंतरिक्ष केवल बाजार नहीं है।

यह संचार है।

https://politicsinsightindia.com/ews-mein-gareeb-kaun-upsc-104-chayan-ne-khole-aarakshan-vyavastha-ke-sawal

यह navigation है।

यह मौसम है।

यह कृषि है।

यह आपदा प्रबंधन है।

यह रक्षा है।

https://politicsinsightindia.com/drdo-missile-technology-private-sector-rajnath-singh-public-money-private-profit

यह राष्ट्रीय सुरक्षा है।

और सबसे बढ़कर—यह technological sovereignty है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि निजी कंपनियां रॉकेट क्यों बनाएं?

सवाल यह है कि ISRO को अपने ही बनाए रॉकेटों की क्षमता से कितना दूर किया जाए?

https://politicsinsightindia.com/education-cess-ka-hisab-government-schools-badhaal

अगर सरकार का उत्तर है कि ISRO केवल नई technology बनाएगा और industry उसका commercial production करेगी, तो यह मॉडल स्पष्ट नियमों के साथ सफल हो सकता है।

लेकिन यदि धीरे-धीरे design से लेकर manufacturing, integration, testing और launch तक हर operational capability बाहर चली गई, तो देश को एक दिन यह महसूस हो सकता है कि उसके पास दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित अंतरिक्ष संस्थाओं में से एक का नाम तो है—लेकिन उसके हाथों में वह operational क्षमता नहीं है जिसने उस नाम को प्रतिष्ठा दी थी।

https://politicsinsightindia.com/beej-khad-dawa-kisan-hi-jahar-ka-doshi-kyon

निजीकरण की गति से ज्यादा महत्वपूर्ण है राष्ट्रीय क्षमता की सीमा।

भारत को निजी अंतरिक्ष उद्योग का निर्माण करना चाहिए।

लेकिन ऐसा करते हुए उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि ISRO कभी केवल सलाह देने वाली संस्था न बन जाए।

क्योंकि रॉकेट का कारोबार बाजार चला सकता है।

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लेकिन अंतरिक्ष में संप्रभुता बाजार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।

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