एक पोस्ट पर FIR, सैकड़ों करोड़ के चंदे पर खामोशी! आम जनमत पार्टी मामले में किसका संरक्षण?
₹620 करोड़ के राजनीतिक चंदे, सीमित चुनावी प्रदर्शन और वित्तीय अनुपालन पर उठे सवालों के बीच आम जनमत पार्टी की जांच अब तक क्यों नहीं हुई? पढ़िए पूरी पड़ताल।
विशेष पड़ताल | सितंबर 2026
By- Ch. Sudhir Talyan
भारत में राजनीतिक दल बनाना लोकतांत्रिक अधिकार है। छोटी पार्टी का चुनाव हारना भी कोई अपराध नहीं और किसी राजनीतिक दल को जनता से चंदा मिलना भी अपने आप में गैरकानूनी नहीं। लेकिन जब एक ऐसी पार्टी, जिसका चुनावी प्रभाव बेहद सीमित रहा हो, उसके खाते में कुछ ही वर्षों में सैकड़ों करोड़ रुपये के राजनीतिक चंदे का रिकॉर्ड सामने आए और उसी समय उसके वित्तीय दस्तावेजों, दानदाताओं, कार्यालय और नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े हों, तो मामला केवल राजनीति का नहीं रह जाता। यह पारदर्शिता, चुनावी व्यवस्था और वित्तीय नियमन का प्रश्न बन जाता है।
आम जनमत पार्टी इसी सवाल के केंद्र में है।
Association for Democratic Reforms (ADR) के विश्लेषण के अनुसार पार्टी ने वित्त वर्ष 2022-23 में लगभग ₹220 करोड़ के राजनीतिक donations प्राप्त किए। अगले वित्त वर्ष 2023-24 में उसके contribution report में ₹20,000 से अधिक के donations लगभग ₹620.24 करोड़ बताए गए। ADR के अनुसार उस वर्ष जिन 14 Registered Unrecognised Political Parties के donation reports उपलब्ध थे, उनमें आम जनमत पार्टी और प्रबल भारत पार्टी के ₹20,000 से अधिक वाले donations मिलाकर ₹680.655 करोड़ थे—कुल का 99 प्रतिशत से अधिक।
सवाल यह नहीं है कि पैसा मिलना अपराध है या नहीं।
सवाल यह है कि इतना पैसा आया कहां से, किसने दिया, क्यों दिया, किस बैंक खाते में गया, किस काम में खर्च हुआ और क्या प्रत्येक रुपये का वैधानिक हिसाब उपलब्ध है?
और उससे भी बड़ा सवाल—
जब सार्वजनिक रिकॉर्ड में इतने गंभीर प्रश्न मौजूद हैं, तो अब तक किसी सक्षम एजेंसी ने इसकी व्यापक जांच क्यों नहीं की?
चुनावी ताकत छोटी, चंदा सैकड़ों करोड़
आम जनमत पार्टी का चुनावी इतिहास उसके वित्तीय आंकड़ों के साथ रखकर देखना जरूरी है।
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सात उम्मीदवार मैदान में उतारे। किसी उम्मीदवार को जीत नहीं मिली। ADR के रिकॉर्ड में पार्टी के उम्मीदवारों के संबंध में चुनावी और आपराधिक पृष्ठभूमि का विवरण भी उपलब्ध है।
इसके बाद 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी की चुनावी मौजूदगी भी सीमित रही। दूसरी ओर, उसके financial disclosures में अचानक सैकड़ों करोड़ रुपये के donations दिखाई देते हैं।
यही वह असामान्य अंतर है जिसे जांच एजेंसियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
एक राजनीतिक दल के पास पैसा होना कोई अपराध नहीं है। लेकिन कम चुनावी गतिविधि और असाधारण वित्तीय प्रवाह का मेल स्वतः एक red flag बन सकता है, जिसकी स्वतंत्र जांच से स्थिति साफ हो सकती है।
₹620 करोड़ का मतलब क्या है?
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है।
₹620.24 करोड़ को सीधे "पार्टी की कुल आय" कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। ADR के उपलब्ध विश्लेषण में यह ₹20,000 से अधिक के disclosed donations की राशि है। पूर्ण audit report और contribution report अलग-अलग दस्तावेज होते हैं।
फिर भी संख्या इतनी बड़ी है कि इसे सामान्य राजनीतिक चंदे के आंकड़े की तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ADR ने 2022-23 के संबंध में यह भी पाया कि आम जनमत पार्टी की income statement में लगभग ₹220 करोड़ की आय थी, लेकिन donor details वाली contribution report में ₹20,000 से अधिक के donations के लिए लगभग ₹21 करोड़ के ही donor details उपलब्ध थे।
यही वह जगह है जहां जांच की जरूरत और बढ़ जाती है।
अगर पैसा वास्तविक है तो उसका पूरा trail सामने आना चाहिए।
अगर दानदाता वास्तविक हैं तो उनकी पहचान सत्यापित होनी चाहिए।
अगर पैसा वैध है तो जांच से पार्टी को ही क्लीन चिट मिल सकती है।
लेकिन अगर कहीं फर्जी दानदाता, accommodation entries, circular transactions या tax-benefit के लिए donation-routing हुआ है, तो वह भी जांच से सामने आना चाहिए।
क्या फंड फ्रॉड की आशंका है?
यहां पत्रकारिता की जिम्मेदारी है कि आरोप को तथ्य न बनाया जाए।
लेकिन यह कहना पूरी तरह उचित है कि financial irregularity की आशंका की जांच करने लायक परिस्थितियां मौजूद हैं।
ADR की पड़ताल में राजनीतिक donations को tax exemption के लिए कथित तौर पर route करने के आरोपों का उल्लेख किया गया है। ADR के अनुसार Income Tax Department, Jharkhand में ऐसे मामलों के संबंध में जांच की खबरें सामने आई थीं, जिसमें कुछ chartered accountants पर राजनीतिक donations के माध्यम से tax evasion facilitate करने के आरोप थे और आम जनमत पार्टी का नाम भी इस संदर्भ में आया।
यदि ये आरोप गलत हैं तो सबसे आसान रास्ता है—
जांच कराइए और गलत साबित कर दीजिए।
यदि आरोप सही हैं तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
लोकतंत्र में जांच किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में नहीं होती। जांच का उद्देश्य सत्य तक पहुंचना होता है।
लेकिन जांच कहां है?
यही इस पूरे मामले का सबसे असहज सवाल है।
बिहार के Chief Electoral Officer के आधिकारिक रिकॉर्ड में आम जनमत पार्टी के financial compliance को लेकर कई communications दर्ज हैं।
28 सितंबर 2022 को वित्त वर्ष 2020-21 के audited annual accounts, contribution report और election expenditure details को लेकर नोटिस दर्ज है। रिकॉर्ड में यह भी लिखा है कि डाक से भेजा गया communication "INSUFFICIENT ADDRESS" के कारण वापस आया।
22 दिसंबर 2022 को वित्त वर्ष 2021-22 के audited accounts और contribution report को लेकर फिर communication हुआ।
14 नवंबर 2024 को वित्त वर्ष 2023-24 के audited annual accounts, contribution report और 2024 लोकसभा चुनाव के election expenditure statement को लेकर लंबित होने की बात दर्ज है।
6 फरवरी 2026 को भी RUPPs को contribution reports, audited accounts और election expenditure statements निर्धारित समय और तरीके से जमा कराने के संबंध में communication दर्ज है।
यानी सवाल आज पैदा नहीं हुआ।
सरकारी रिकॉर्ड में compliance से जुड़े सवाल वर्षों से मौजूद हैं।
फिर सवाल है—
क्या इन communications के बाद केवल पत्राचार हुआ या वास्तविक financial verification भी हुई?
अगर जांच हुई तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं है?
अगर जांच नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई?
एक और बड़ा सवाल: पार्टी का पता आखिर है कहां?
सरकारी रिकॉर्ड और पार्टी की वेबसाइट के बीच भी एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।
अक्टूबर 2025 की सरकारी सूची में आम जनमत पार्टी का headquarters:
HIG Flat No. 7HF/25, Bahadurpur Housing Colony, Patna, Bihar – 800026
दर्ज है।
दूसरी ओर पार्टी की वर्तमान वेबसाइट अहमदाबाद का पता देती है:
FF-17, Raghuvir Apartment, Near Swaminarayan Mandir, Bapasitaram Chowk, New Naroda, Ahmedabad, Gujarat – 382345.
पार्टी की वेबसाइट वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में गौरव मिश्रा का नाम देती है।
BBC की हालिया पड़ताल में अहमदाबाद स्थित बताए गए कार्यालय के बंद मिलने की बात सामने आई और पार्टी की पूर्व अध्यक्ष अनामिका पासवान ने दावा किया कि उन्होंने 2022 में पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। BBC के अनुसार उन्होंने ऐसे दस्तावेज दिखाए जिनमें पार्टी का base पटना से अहमदाबाद स्थानांतरित होने और गौरव मिश्रा के अध्यक्ष होने का उल्लेख था।
तो सीधा सवाल है:
जिस पार्टी के खाते में सैकड़ों करोड़ रुपये के donations का रिकॉर्ड है, उसका वास्तविक कार्यालय कौन सा है?
और यदि registered address बदला गया है तो संबंधित चुनावी रिकॉर्ड में उसका अद्यतन विवरण कब और कैसे दर्ज हुआ?
पूर्व अध्यक्ष अब भाजपा में, क्या इससे सवाल और गंभीर नहीं हो जाता?
यह तथ्य भी सार्वजनिक रिकॉर्ड में है कि पार्टी की founding president बताई जाने वाली अनामिका पासवान अब भाजपा की बिहार प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। 2025 और 2026 की भाजपा संगठनात्मक सूचियों में उनका नाम प्रदेश उपाध्यक्ष के रूप में आया है।
BBC के अनुसार अनामिका पासवान का दावा है कि उन्होंने 2022 में आम जनमत पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।
यहां एक बेहद महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है।
केवल इसलिए कि कोई पूर्व राजनीतिक पदाधिकारी बाद में भाजपा में शामिल हो गईं, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी जांच को राजनीतिक संरक्षण मिला।
ऐसा कहना बिना प्रमाण के आरोप होगा।
लेकिन लोकतंत्र में इससे एक वैध सार्वजनिक प्रश्न जरूर पैदा होता है:
क्या राजनीतिक दलों के वित्तीय मामलों में जांच का पैमाना सबके लिए समान है?
यदि यही वित्तीय रिकॉर्ड किसी विपक्षी दल से जुड़ा होता तो क्या जांच एजेंसियों की सक्रियता इतनी ही धीमी रहती?
यदि किसी सोशल मीडिया पोस्ट पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में पुलिस तत्काल FIR दर्ज कर सकती है, लोगों को हिरासत में लिया जा सकता है और जांच एजेंसियां सक्रिय हो सकती हैं, तो सैकड़ों करोड़ रुपये के संदिग्ध या असामान्य राजनीतिक donations के सवाल पर वही संस्थागत तत्परता क्यों दिखाई नहीं देती?
यही तुलना आज जनता पूछ रही है।
जांच एजेंसियां पोस्ट पर तेज, करोड़ों के सवाल पर धीमी क्यों?
भारत में हाल के वर्षों में सोशल मीडिया पोस्ट, राजनीतिक टिप्पणी और सार्वजनिक बयान को लेकर पुलिस और जांच एजेंसियों की सक्रियता कई बार देखने को मिली है।
यहां प्रश्न किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने या मुकदमा दर्ज करने का नहीं है।
प्रश्न प्राथमिकता और समानता का है।
एक सोशल मीडिया पोस्ट की शिकायत पर अगर यह पता लगाने की कोशिश की जा सकती है कि पोस्ट किसने लिखी, किस खाते से डाली, उसका उद्देश्य क्या था और उससे कानून का उल्लंघन हुआ या नहीं—
तो राजनीतिक दल के बैंक खाते में सैकड़ों करोड़ रुपये आने पर यह पता लगाना कठिन क्यों है कि:
- पैसा किसने भेजा?
- दानदाता अस्तित्व में है या नहीं?
- उसके पास इतनी राशि देने की आर्थिक क्षमता थी या नहीं?
- क्या PAN और address वास्तविक हैं?
- पैसा पार्टी के खाते से आगे कहां गया?
- क्या किसी donor को बदले में पैसा वापस मिला?
- क्या tax exemption का दुरुपयोग हुआ?
- क्या चुनावी खर्च में इसका पूरा हिसाब दिया गया?
- क्या audited accounts और contribution reports आपस में मेल खाते हैं?
ये सभी सवाल दस्तावेजों से जांचे जा सकते हैं।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
फिर देरी किस बात की?
चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल
यहां सिर्फ Income Tax Department या अन्य जांच एजेंसियों को कटघरे में खड़ा करना पर्याप्त नहीं होगा।
Election Commission और संबंधित Chief Electoral Officer की भूमिका भी सवालों से परे नहीं हो सकती।
ADR के अनुसार चुनाव आयोग की 2014 transparency and accountability guidelines राजनीतिक दलों को proper books of accounts रखने और annual audit reports तथा contribution reports जमा करने की व्यवस्था से जोड़ती हैं। ADR ने यह भी कहा कि ऐसे reports को public viewing के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
आयोग ने निष्क्रिय और statutory obligations पूरा नहीं करने वाली कई Registered Unrecognised Political Parties के खिलाफ कार्रवाई भी की है। ADR के अनुसार 2022 में 253 RUPPs को inactive चिह्नित किया गया और 2025 में 345 RUPPs को delist किया गया। साथ ही ADR ने स्पष्ट किया कि ECI की powers के संदर्भ में delisting और deregistration अलग बातें हैं।
https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
तो सवाल सीधा है:
जब आयोग दूसरी RUPPs के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है, तो आम जनमत पार्टी के financial disclosures पर उठे असाधारण सवालों का परिणाम क्या निकला?
नोटिस जारी करना कार्रवाई की शुरुआत हो सकती है।
लेकिन जनता को यह जानने का अधिकार है कि नोटिस के बाद हुआ क्या?
आयोग को किन सवालों के जवाब देने चाहिए?
आम जनमत पार्टी के मामले में निर्वाचन आयोग को सार्वजनिक रूप से कम से कम इन सवालों का जवाब देना चाहिए:
पहला— क्या 2022-23 में घोषित लगभग ₹220 करोड़ के donations की donor-wise verification हुई?
दूसरा— 2023-24 के लगभग ₹620.24 करोड़ के ₹20,000 से अधिक donations की स्वतंत्र जांच हुई या नहीं?
तीसरा— क्या party के bank statements, audited accounts और contribution reports का reconciliation किया गया?
चौथा— क्या सभी प्रमुख donors के PAN, address और financial capacity का सत्यापन हुआ?
पांचवां— क्या Income Tax Department को कोई reference भेजा गया?
छठा— क्या 2020-21, 2021-22 और 2023-24 के compliance issues पर अंतिम निर्णय लिया गया?
सातवां— पार्टी का आधिकारिक headquarters पटना है या अहमदाबाद?
आठवां— वर्तमान नेतृत्व परिवर्तन के दस्तावेज निर्वाचन आयोग के पास विधिवत जमा हैं या नहीं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
नौवां— क्या आयोग मानता है कि इतनी बड़ी राशि और इतनी छोटी चुनावी गतिविधि के बीच का अंतर स्वतंत्र scrutiny का विषय है?
सवाल पार्टी से भी हैं
जांच केवल सरकारी संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं।
आम जनमत पार्टी को भी सार्वजनिक रूप से सामने आकर जवाब देना चाहिए।
पार्टी को बताना चाहिए कि:
₹620 करोड़ से अधिक के disclosed donations किसने दिए?
उन donors की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं दिखाई देती?
यदि सभी transactions वैध हैं तो bank statements और audited records के आधार पर सवालों का जवाब देने में परेशानी क्या है?
पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष गौरव मिश्रा को भी सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि पार्टी का वर्तमान organizational और financial control किसके पास है।
BBC की पड़ताल में उनसे संपर्क करने की कोशिशों का जवाब नहीं मिलने की बात सामने आई। पार्टी के कोषाध्यक्ष धर्मेंद्र वैष्णव ने BBC से कहा कि वित्तीय सवालों के जवाब गौरव मिश्रा से पूछे जाएं।
https://politicsinsightindia.com/noida-workers-protest-nsa-du-student-aakriti-chaudhary-high-court
इतने बड़े वित्तीय आंकड़ों के मामले में चुप्पी संदेह उत्पन्न करती है।
निष्कर्ष: सवाल उठे हैं तो जवाब भी देना होगा
आम जनमत पार्टी को दोषी ठहराना इस रिपोर्ट का उद्देश्य नहीं है।
उद्देश्य इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है—एक समान लोकतांत्रिक और वित्तीय जवाबदेही की मांग।
अगर पार्टी का पैसा पूरी तरह वैध है, donors वास्तविक हैं, transactions genuine हैं, tax rules का पालन हुआ है और सभी financial statements सही हैं, तो स्वतंत्र जांच के बाद पार्टी को स्पष्ट रूप से क्लीन चिट मिलनी चाहिए।
लेकिन अगर कहीं donation-routing, accommodation entries, फर्जी donors, tax evasion, money laundering अथवा चुनावी कानूनों के उल्लंघन का मामला है, तो उसकी पहचान भी होनी चाहिए।
लोकतंत्र में किसी पार्टी का समर्थक होना उसे जांच से ऊपर नहीं रखता।
और किसी पार्टी का विपक्षी होना भी उसे जांच का स्वतः पात्र नहीं बनाता।
कानून का पैमाना एक होना चाहिए।
आज असली सवाल यह नहीं है कि आम जनमत पार्टी भाजपा के करीब है या विपक्ष के।
असली सवाल है—
₹220 करोड़ और फिर ₹620 करोड़ के चंदे का हिसाब कहां है?
दानदाताओं की पूरी पहचान कहां है?
वित्तीय अनुपालन की अंतिम जांच कहां है?
चुनाव आयोग की कार्रवाई का परिणाम कहां है?
और यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक है, तो सरकारी एजेंसियां यह बात सार्वजनिक रूप से बताने में संकोच क्यों कर रही हैं?
जनता से जुड़े हर मामले में सरकार और संस्थाओं से जवाब मांगा जाता है। राजनीतिक दल भी जनता से ही वैधता प्राप्त करते हैं।
इसलिए यह मांग किसी पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि राजनीतिक वित्त की पारदर्शिता के पक्ष में है।
सवाल उठ चुके हैं। अब जवाब भी देना होगा।
और यदि जवाब देने के बजाय फाइलें खामोश रहेंगी, तो संदेह और गहरा होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज केवल भ्रष्टाचार नहीं होती—
उससे भी खतरनाक है ऐसा संदेह, जिसकी जांच करने की जिम्मेदारी रखने वाली संस्थाएं ही मौन हो जाएं।
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