“Education Cess: जनता से हजारों करोड़ वसूले, फिर भी सरकारी स्कूल क्यों बदहाल?”
2014 से 2026 तक Education Cess से जुटाए गए हजारों करोड़ के बावजूद सरकारी स्कूलों की बदहाली, सुविधाओं की कमी, dropout और private schools की बढ़ती ओर रुख पर गंभीर सवाल।
Education Cess: The Tax India Paid, the Schools India Never Got
करदाता ने पैसा दिया, सरकार ने उपकर बढ़ाया—फिर भी सरकारी स्कूल क्यों नहीं बने भारत के सबसे अच्छे स्कूल?
By- Ch. Sudhir Taliyan
भारत में शिक्षा पर बहस अक्सर एक सुविधाजनक बहाने के साथ समाप्त कर दी जाती है—“पैसा कम है।”
लेकिन 2014 से 2026 तक के आंकड़ों को सामने रखकर देखें तो यह बहाना अब स्वीकार करने लायक नहीं है।
भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ी। सरकार का कर-संग्रह बढ़ा। शिक्षा के नाम पर अलग से Education Cess वसूला गया। 2018 में इसे बढ़ाकर 4% Health and Education Cess किया गया। शिक्षा के लिए अलग-अलग कोष बनाए गए। Samagra Shiksha, PM POSHAN, PM SHRI और अनेक योजनाओं के माध्यम से हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए।
फिर भी 2024-25 में देश में 1,04,125 single-teacher schools थे और इन स्कूलों में 33,76,769 बच्चे पढ़ रहे थे। यह आंकड़ा स्वयं UDISE+ का है।
तो सवाल यह नहीं है कि सरकार ने शिक्षा पर पैसा खर्च किया या नहीं।
सवाल कहीं अधिक असहज है—
इतना पैसा खर्च करने के बाद भी सरकारी स्कूल वह स्कूल क्यों नहीं बन पाया जिसमें भारत का हर माता-पिता अपने बच्चे को भेजना चाहे?
शिक्षा के नाम पर अलग कर क्यों?
2004 में केंद्र सरकार ने 2% Education Cess लगाया था। बाद में यह 3% हुआ और 2018 में इसे 4% Health and Education Cess में बदल दिया गया।
यह कोई सामान्य कर नहीं था। इसकी राजनीतिक और नैतिक बुनियाद यही थी कि नागरिकों से अतिरिक्त पैसा लिया जा रहा है ताकि शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाए जा सकें।
यानी सरकार का तर्क था—
देश के बच्चों का भविष्य बनाने के लिए अतिरिक्त पैसा चाहिए।
नागरिकों ने पैसा दिया।
लेकिन दो दशक बाद भी हमें पूछना पड़ रहा है—
उस पैसे ने स्कूलों को कितना बदला?
यदि किसी परिवार से कहा जाए कि उसके बच्चे की शिक्षा के लिए अतिरिक्त पैसा लिया जा रहा है, तो उस परिवार को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उस पैसे से स्कूल में क्या बदला।
कितने कमरे बने?
कितनी प्रयोगशालाएं बनीं?
कितनी libraries बनीं?
कितने computers आए?
कितने schools में internet पहुंचा?
कितने teachers नियुक्त हुए?
कितने playground बने?
कितने toilets functional हुए?
कितने बच्चों ने पढ़ना और गणित सीखना शुरू किया?
यही असली हिसाब है।
₹84,339 करोड़ एक साल में—फिर भी सवाल वही
CAG की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में Health and Education Cess से लगभग ₹84,339 करोड़ की प्राप्ति हुई। CAG ने यह भी दर्ज किया कि पिछले वर्ष की तुलना में HEC collection में 18.52% वृद्धि हुई।
यह छोटी रकम नहीं है।
यह ऐसा पैसा है जिसे देखकर किसी भी सरकार को कहना चाहिए था—
अब देश के किसी बच्चे को जर्जर या सुविधाहीन सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
लेकिन तस्वीर इतनी चमकदार नहीं है।
CAG ने 2024-25 में Prarambhik Shiksha Kosh यानी प्राथमिक शिक्षा से जुड़े reserve fund में ₹1,270 करोड़ के short transfer की ओर भी संकेत किया। रिपोर्ट के अनुसार PSK के लिए ₹42,170 करोड़ की cess collection के मुकाबले ₹40,900 करोड़ transfer दर्ज हुआ।
यह पैसा चोरी हुआ—ऐसा कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
लेकिन यह पूछना बिल्कुल जायज है:
जब पैसा शिक्षा के लिए निर्धारित है, तो collection और designated fund transfer के बीच अंतर क्यों है?
और यदि सरकार के अपने हिसाब में reconciliation की जरूरत पड़ती है, तो नागरिक किससे जवाब मांगे?
सबसे बड़ा सवाल—पैसा खर्च हुआ तो स्कूल बदले क्यों नहीं?
सरकार यह कह सकती है कि शिक्षा पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
निश्चित रूप से हुए हैं।
School infrastructure में सुधार भी हुआ है। बिजली, पानी, शौचालय, library और अन्य सुविधाओं की coverage वर्षों में बढ़ी है।
लेकिन समस्या यह है कि भारत को केवल “कुछ बेहतर स्कूल” नहीं चाहिए।
भारत को चाहिए—
हर बच्चे के लिए गुणवत्तापूर्ण सरकारी स्कूल।
UDISE+ के आंकड़े बताते हैं कि 2023-24 में लगभग 91.8% schools में electricity थी, लगभग 53.9% में internet और लगभग 57.2% में computer facility थी। CWSN toilets जैसी inclusive सुविधा केवल लगभग एक-तिहाई schools तक पहुंची थी।
तो 2026 के भारत से यह सवाल क्यों न पूछा जाए:
क्या आज भी देश के आधे से अधिक स्कूलों को digital connectivity के लिए इंतजार करना चाहिए?
क्या laboratory, library, playground, computer और internet विलासिता हैं?
नहीं।
आज के समय में ये शिक्षा की बुनियादी आवश्यकताएं हैं।
जिस बच्चे के स्कूल में computer नहीं है, internet नहीं है, laboratory नहीं है और पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, उससे Artificial Intelligence, coding, digital economy और 21वीं सदी की नौकरियों की प्रतिस्पर्धा में आगे निकलने की उम्मीद करना एक क्रूर मजाक है।
सरकारी स्कूल गरीब की मजबूरी क्यों बन गया?
भारत की सबसे बड़ी विडंबना यही है।
सरकार का school system देश की सबसे बड़ी public institution है। लेकिन समाज में धीरे-धीरे ऐसी धारणा बनाई गई कि सरकारी स्कूल गरीबों के लिए हैं और private schools बेहतर भविष्य के लिए।
यह धारणा अचानक पैदा नहीं हुई।
जब किसी सरकारी स्कूल में शिक्षक कम हों, भवन जर्जर हो, अंग्रेजी और computer education कमजोर हो, laboratory न हो, खेल की सुविधा न हो और parent-teacher communication कमजोर हो, तो परिवार विकल्प तलाशता है।
और वह विकल्प अक्सर private school होता है।
ASER 2024 इस बदलाव का बेहद महत्वपूर्ण संकेत देता है। ग्रामीण भारत में 6–14 वर्ष के बच्चों में government-school enrollment share 2018 में 65.6% था। कोविड के दौरान 2022 में यह बढ़कर 72.9% हुआ, लेकिन 2024 में घटकर फिर 66.8% हो गया।
यह आंकड़ा सरकार के लिए आईना है।
कोविड के दौरान जब लाखों परिवार private-school fees देने की स्थिति में नहीं थे, बच्चे सरकारी स्कूलों में आए।
जैसे ही परिस्थितियां सामान्य हुईं, सरकारी स्कूलों का share फिर नीचे चला गया।
इससे कम-से-कम इतना सवाल तो उठता ही है:
क्या बड़ी संख्या में परिवार सरकारी स्कूल को अपनी पहली पसंद नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी की स्थिति में उपलब्ध विकल्प मानते हैं?
सरकारी स्कूलों को private schools से बेहतर क्यों नहीं बनाया गया?
यह प्रश्न किसी निजी स्कूल के खिलाफ नहीं है।
Private schools का अस्तित्व लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था में हो सकता है। लेकिन सरकार की जिम्मेदारी उससे कहीं बड़ी है।
क्योंकि private school वह सेवा बेचता है जिसके लिए परिवार भुगतान करता है।
सरकारी स्कूल नागरिक को अधिकार देता है।
और अधिकार की गुणवत्ता आय पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।
अगर भारत में एक गरीब किसान के बच्चे और एक बड़े अधिकारी के बच्चे को अलग-अलग गुणवत्ता की शिक्षा मिलती है, तो यह केवल शिक्षा का अंतर नहीं है।
यह भविष्य का वर्ग-विभाजन है।
एक बच्चा महंगे school में:
- English
- Computer
- Science laboratory
- Sports
- Smart classroom
- Internet
- Career counselling
पाता है।
दूसरा बच्चा ऐसे सरकारी स्कूल में बैठा है जहां एक शिक्षक कई कक्षाओं को संभाल रहा है।
फिर दोनों बच्चों से समान प्रतियोगी परीक्षा में बराबर प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है।
यह समान अवसर नहीं है।
GDP बढ़ी—तो शिक्षा की गुणवत्ता क्यों नहीं बढ़ी?
भारत की GDP और राजस्व क्षमता में वर्षों के दौरान बड़ी वृद्धि हुई है।
लेकिन शिक्षा पर Centre और States का combined expenditure अभी भी लगभग 4.1% GDP के आसपास है, जबकि National Education Policy 2020 ने सार्वजनिक शिक्षा expenditure को 6% GDP तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा था।
यही सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय प्रश्न है।
जब देश infrastructure, defence, highways, airports, digital networks और अन्य क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश कर सकता है, तो शिक्षा को लगातार लक्ष्य से नीचे क्यों रखा जाता है?
क्या सड़क देश का भविष्य है?
हां।
क्या airport देश का भविष्य है?
हां।
क्या technology देश का भविष्य है?
हां।
लेकिन सबसे पहले—
बच्चा देश का भविष्य है।
और बच्चे का भविष्य school में बनता है।
Education Cess का पैसा Education System में ही क्यों नहीं दिखाई देता?
यहां सरकार को एक साफ जवाब देना चाहिए।
यदि किसी विशेष उद्देश्य से cess लगाया गया है, तो उसके पैसे को सामान्य सरकारी खर्च की धुंध में गायब नहीं होना चाहिए।
Education component की राशि को strictly ring-fenced किया जाना चाहिए।
हर वर्ष जनता को बताया जाना चाहिए:
कुल cess collection कितना?
↓
Education component कितना?
↓
केंद्र के पास कितना?
↓
राज्यों को कितना?
↓
किस जिले को कितना?
↓
किस school को कितना?
↓
किस मद में खर्च?
↓
कितने teachers?
↓
कितने classrooms?
↓
कितनी laboratories?
↓
कितनी libraries?
↓
कितने computers?
↓
कितने बच्चों के learning outcomes सुधरे?
आज हमारे पास UDISE+ जैसा विशाल education database है, जिसमें school infrastructure, students और teachers की जानकारी दर्ज होती है।
फिर क्यों नहीं बनाया जा सकता—
National Education Money-to-Outcome Dashboard?
सिर्फ पैसा खर्च करना उपलब्धि नहीं है
यह बात सरकारों को समझनी होगी।
अगर ₹1,000 करोड़ खर्च हुए लेकिन school में learning नहीं सुधरी, तो केवल expenditure certificate उपलब्धि नहीं है।
यदि ₹500 करोड़ की building बनी लेकिन teacher नहीं है, तो वह शिक्षा सुधार नहीं है।
यदि computer खरीदे गए लेकिन internet नहीं है, तो वह digital education नहीं है।
यदि toilet बना लेकिन पानी नहीं है, तो वह sanitation नहीं है।
यदि laboratory बनी लेकिन science teacher नहीं है, तो वह laboratory शिक्षा का भ्रम है।
Input को Outcome समझना बंद करना होगा।
2024-25 में भी 1,04,125 single-teacher schools क्यों?
यह सवाल सरकार से सीधे पूछा जाना चाहिए।
UDISE+ 2024-25 के अनुसार:
1,04,125 single-teacher schools
और उनमें:
33,76,769 students
थे।
यह केवल teacher recruitment का प्रश्न नहीं है।
यह school planning का प्रश्न है।
जहां बच्चे कम हैं, वहां school consolidation और transport की नीति चाहिए।
जहां बच्चे पर्याप्त हैं, वहां पर्याप्त teachers चाहिए।
जहां school दूर है, वहां safe transport चाहिए।
जहां girls की संख्या ज्यादा है, वहां महिला teachers और सुरक्षित infrastructure चाहिए।
जहां disabled children हैं, वहां accessible classrooms और toilets चाहिए।
अर्थात:
एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति को केवल “कितने schools हैं” नहीं, बल्कि “हर school में बच्चे को क्या मिल रहा है” पूछना चाहिए।
Dropout को केवल बच्चे की गलती मत बनाइए
जब बच्चा school छोड़ता है तो अक्सर दोष बच्चे, परिवार या गरीबी पर डाल दिया जाता है।
लेकिन सरकार को भी आईने में देखना होगा।
अगर school में:
- quality teaching नहीं,
- secondary level तक पर्याप्त सुविधा नहीं,
- laboratory नहीं,
- sports नहीं,
- digital exposure नहीं,
- career guidance नहीं,
- सुरक्षित transport नहीं,
तो क्या हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि हर बच्चा बारहवीं तक उसी उत्साह से स्कूल जाएगा?
Dropout केवल attendance register का आंकड़ा नहीं है।
वह इस बात का संकेत भी हो सकता है कि education system बच्चे को अपने भविष्य से जोड़ पाने में असफल हो रहा है।
सरकार को सरकारी स्कूलों में वही सुविधा देनी होगी जो private sector बेचता है
यदि private school parent को English-medium, computer, smart classroom, sports, laboratory, discipline और communication का वादा करता है, तो सरकार को कहना चाहिए:
हम इससे बेहतर देंगे—और मुफ्त या अत्यंत कम लागत पर देंगे।
सरकारी school को “गरीबों का school” नहीं, बल्कि:
भारत का Best Public School
बनाना होगा।
हर block में कम-से-कम एक उत्कृष्ट composite school हो।
हर cluster में shared laboratory, library, sports complex और digital learning centre हो।
हर सरकारी school में पर्याप्त teachers हों।
हर school में functional electricity, water, toilets और internet हो।
हर बच्चे के लिए books और learning material उपलब्ध हो।
और सबसे महत्वपूर्ण—
सरकारी स्कूल की गुणवत्ता को राजनीतिक प्राथमिकता बनाया जाए।
सरकार के पास पैसा है—अब बहाना नहीं चलेगा
2026-27 में Ministry of Education के लिए ₹1.39 लाख करोड़ का allocation है। 2025-26 में Ministry को ₹1,28,650 करोड़ मिले थे। PRS के अनुसार 2024-25 में Ministry का expenditure budgeted राशि से लगभग 5% कम रहने का अनुमान था; school education में underspending लगभग 7% था।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
यही वह बिंदु है जहां सवाल और तीखा हो जाता है:
जब स्कूलों को पैसे की जरूरत है, तो allocated money भी पूरी तरह खर्च क्यों नहीं हो पाता?
यानी समस्या केवल allocation की नहीं।
समस्या है:
allocation + release + utilisation + procurement + implementation + monitoring + accountability.
सरकार यदि बजट में पैसा रखकर उसे समय पर खर्च नहीं कर पाती, तो कागज पर बड़ा budget बच्चों की शिक्षा नहीं बदलता।
अब Education Cess का नया हिसाब होना चाहिए
सरकार को 2026 से एक स्पष्ट नीति घोषित करनी चाहिए:
Education Cess का Education Component केवल Education System पर खर्च होगा।
उसका पैसा:
- स्कूल भवन
- https://politicsinsightindia.com/beej-khad-dawa-kisan-hi-jahar-ka-doshi-kyon
- teachers
- laboratories
- libraries
- computers
- internet
- sports
- girls' facilities
- disability access
- drinking water
- sanitation
- learning materials
- teacher training
- school maintenance
पर ही खर्च हो।
और प्रत्येक रुपये का public audit हो।
https://politicsinsightindia.com/cheeni-ke-daam-mein-aag-kisan-pisa-upbhokta-luta-sarkar-ki-niti
CAG की observations के बाद तो यह और जरूरी हो जाता है।
सरकारी स्कूल बचाना क्यों जरूरी है?
क्योंकि सरकारी स्कूल केवल स्कूल नहीं हैं।
वे सामाजिक बराबरी का सबसे बड़ा माध्यम हैं।
वे उस बच्चे को अवसर देते हैं जिसके माता-पिता महंगी फीस नहीं दे सकते।
वे ग्रामीण भारत में सामाजिक गतिशीलता का रास्ता हैं।
वे लड़कियों की शिक्षा का आधार हैं।
वे गरीब परिवार को शिक्षा के कारण कर्ज में जाने से बचा सकते हैं।
वे लोकतंत्र को शिक्षित नागरिक देते हैं।
https://politicsinsightindia.com/garib-bachchon-ke-school-badhaal-viksit-bharat-par-sawal
और सबसे महत्वपूर्ण—
वे भारत को दो अलग-अलग शिक्षा-व्यवस्थाओं में टूटने से रोक सकते हैं।
एक शिक्षा व्यवस्था अमीरों के लिए।
दूसरी गरीबों के लिए।
अगर यह विभाजन गहरा हुआ, तो आने वाले भारत में केवल income inequality नहीं होगी—
education inequality पीढ़ियों की inequality बन जाएगी।
अंतिम सवाल: पैसा कहां गया नहीं—पैसे से बदला क्या?
सरकार से अब यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि:
“आपने शिक्षा पर कितना खर्च किया?”
सवाल बदलना चाहिए:
आपने कितने स्कूलों को उत्कृष्ट बनाया?
कितने schools में सभी आवश्यक सुविधाएं पहुंचीं?
कितने single-teacher schools खत्म हुए?
कितने बच्चों का learning level सुधरा?
कितने बच्चे dropout से बचे?
कितने परिवारों ने private school छोड़कर सरकारी school को चुना?
Education Cess की प्रत्येक राशि का outcome क्या रहा?
यही असली हिसाब है।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता सरकार को केवल tax नहीं देती।
वह सरकार को विश्वास देती है।
और Education Cess उस विश्वास पर लगाया गया एक विशेष दावा था।
अब सरकार को तय करना होगा
या तो वह Education Cess को केवल revenue collection का साधन माने।
या फिर उसे वास्तव में:
भारत के सार्वजनिक शिक्षा पुनर्निर्माण का राष्ट्रीय कोष
बनाए।
हर गांव में अच्छा school।
हर बच्चे के लिए पर्याप्त शिक्षक।
हर school में laboratory।
हर school में library।
हर बच्चे के लिए computer और digital access।
हर लड़की के लिए सुरक्षित toilet और transport।
हर दिव्यांग बच्चे के लिए accessible infrastructure।
हर school में खेल का मैदान।
हर classroom में सीखने का वातावरण।
और सबसे ऊपर—
ऐसी गुणवत्ता कि माता-पिता अपने बच्चे को private school भेजने को मजबूर न हों।
भारत की आर्थिक शक्ति बढ़ चुकी है।
https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
कर-संग्रह बढ़ चुका है।
Education Cess से सरकार ने विशाल संसाधन जुटाए हैं।
अब समय आ गया है कि सरकार नागरिक से एक और tax justification न मांगे।
अब उसे परिणाम देना होगा।
क्योंकि—
गरीब के बच्चे को घटिया सरकारी स्कूल देना और अमीर के बच्चे को उत्कृष्ट निजी शिक्षा देना “समान अवसर” नहीं है।
Education Cess की असली परीक्षा यह नहीं कि सरकार ने कितने करोड़ जमा किए। असली परीक्षा यह है कि उन करोड़ों से कितने बच्चों का भविष्य बदला।
और 2026 में भी जब 1,04,125 single-teacher schools मौजूद हैं, तब यह सवाल पूछना कोई सरकार-विरोधी राजनीति नहीं है।
यह उस taxpayer का अधिकार है जिसने वर्षों तक शिक्षा के नाम पर अपना पैसा दिया है।
सरकार को अब बताना ही होगा—
“Education Cess से भारत के स्कूलों को कितना मिला, कितना खर्च हुआ, कितना बचा, कितना transfer नहीं हुआ और उस पैसे से बच्चे को वास्तव में क्या मिला?”
जब तक इस सवाल का रुपये-रुपये और स्कूल-दर-स्कूल जवाब नहीं मिलता, तब तक Education Cess की कहानी पूरी नहीं होगी।
क्योंकि करदाता ने पैसा दिया था।
उसे सिर्फ हिसाब नहीं—एक बेहतर स्कूल चाहिए था।
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