‘न्यायपालिका का डर्टी सीक्रेट’! महिला जजों के यौन उत्पीड़न से Adultery Law तक—आखिर अदालत खुद कितनी जवाबदेह?
यह ब्लॉग भारतीय न्यायपालिका में महिला न्यायाधीशों के कथित यौन उत्पीड़न, संस्थागत सत्ता-संतुलन और जवाबदेही के सवालों की पड़ताल करता है। इंदिरा जयसिंह के ‘डर्टी सीक्रेट’ वाले बयान से लेकर *Joseph Shine* फैसले में व्यभिचार को अपराध मानने वाली धारा 497 खत्म किए जाने तक, लेख सवाल उठाता है कि जो न्यायपालिका नागरिकों की गरिमा और समानता की रक्षा करती है, क्या उसे अपने भीतर भी वही संवैधानिक कसौटी लागू नहीं करनी चाहिए?
जब न्याय देने वाली संस्था अपने भीतर के सवालों से बचने लगे
By- Ch. Sudhir Talyan
वरिष्ठ अधिवक्ता Indira Jaising का हालिया बयान भारतीय न्यायपालिका के लिए सामान्य आलोचना नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण की कठोर घंटी है। उन्होंने कहा है कि कई महिला न्यायाधीश पुरुष न्यायाधीशों द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायतें लेकर उनके पास आईं और इसी अनुभव के कारण उन्होंने अपनी पुस्तक में यौन उत्पीड़न को भारतीय न्यायपालिका का “डर्टी सीक्रेट” कहा—ऐसा सच, जिस पर संस्था के भीतर खुलकर बात करने से लोग बचते हैं। (Live Law)
यह आरोप जितना गंभीर है, उतना ही जरूरी है कि इसे सनसनी में बदलने के बजाय संस्था, सत्ता, कानून और जवाबदेही के सवाल के रूप में देखा जाए।
और इसी बहस का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे अक्सर सुविधानुसार भुला दिया जाता है—भारतीय न्यायपालिका ने स्वयं कई पुराने कानूनों को संविधान की कसौटी पर कसकर समाप्त किया है।
व्यभिचार यानी adultery को अपराध बनाने वाली धारा इसका बड़ा उदाहरण है।
लेकिन यहां एक बुनियादी तथ्य साफ रखना होगा: न्यायपालिका ने विवाह संस्था या व्यभिचार को समाप्त नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने केवल व्यभिचार को अपराध मानने वाली औपनिवेशिक दंड व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किया। 2018 के Joseph Shine v. Union of India फैसले में IPC की धारा 497 और उससे संबंधित CrPC की धारा 198 को अनुच्छेद 14, 15(1) और 21 के विरुद्ध घोषित किया गया। (Indian Kanoon)
यही अंतर इस पूरे विमर्श को समझने की कुंजी है।
न्यायपालिका दूसरों के लिए संविधान की कसौटी तय करती है—तो स्वयं उस कसौटी से ऊपर कैसे हो सकती है?
लोकतंत्र में न्यायपालिका को असाधारण सम्मान इसलिए मिलता है क्योंकि उसके पास संविधान की व्याख्या करने की शक्ति है।
वह संसद के बनाए कानून को रद्द कर सकती है।
वह सरकार के आदेश को असंवैधानिक ठहरा सकती है।
वह नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा कर सकती है।
वह कह सकती है कि कोई पुराना कानून बदलते समाज और संविधान के मूल्यों से टकरा रहा है।
लेकिन इसी शक्ति के साथ एक और सिद्धांत आता है:
जो संस्था दूसरों से संवैधानिकता मांगती है, उसे स्वयं भी संवैधानिक जवाबदेही से मुक्त नहीं किया जा सकता।
यही वह बिंदु है जहां इंदिरा जयसिंह का बयान असुविधाजनक बन जाता है।
उनका कहना है कि महिला न्यायाधीशों ने उन्हें पुरुष न्यायाधीशों द्वारा कथित यौन उत्पीड़न की शिकायतें बताईं। उन्होंने न्यायिक व्यवस्था की अंदरूनी पदानुक्रम को भी इसके लिए जिम्मेदार बताया। (Live Law)
अगर वरिष्ठता ही शक्ति बन जाए और शक्ति ही शिकायतकर्ता के भविष्य का निर्धारण करने लगे, तो कानून की किताब में मौजूद सुरक्षा और वास्तविक जीवन में मौजूद सुरक्षा के बीच खाई पैदा हो जाती है।
और न्यायपालिका के लिए इससे ज्यादा खतरनाक स्थिति कोई नहीं हो सकती।
‘आइटम नंबर’ वाला मामला: आरोप, जांच और न्यायिक फैसला—तीनों को अलग रखना होगा
जयसिंह ने एक महिला न्यायाधीश का उदाहरण दिया जिसे उन्होंने प्रतिनिधित्व किया था। उनके अनुसार उस महिला न्यायाधीश ने एक वरिष्ठ पुरुष न्यायाधीश के पारिवारिक समारोह में “आइटम नंबर” पर नृत्य करने से इनकार किया और इसके बाद उसके खिलाफ ऐसी परिस्थितियां पैदा हुईं कि उसने न्यायिक सेवा छोड़ दी। (Moneycontrol)
यह विवरण मध्य प्रदेश की एक पूर्व अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के पुराने मामले की घटनाओं से मिलता-जुलता है।
इस मामले में महिला न्यायाधीश ने हाई कोर्ट के एक न्यायाधीश के खिलाफ यौन उत्पीड़न सहित कई आरोप लगाए थे। संबंधित न्यायाधीश ने आरोपों से इनकार किया था। जांच समिति ने यौन उत्पीड़न के आरोपों को सिद्ध नहीं पाया। (Moneycontrol)
लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा और भी महत्वपूर्ण है।
महिला न्यायाधीश के तबादले और इस्तीफे की परिस्थितियां बाद में सुप्रीम कोर्ट के सामने आईं। 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी परिस्थितियों को देखते हुए उनके इस्तीफे को स्वैच्छिक मानने से इनकार किया और पुनः नियुक्ति तथा सेवा निरंतरता का आदेश दिया। (Moneycontrol)
इसका मतलब साफ है:
यौन उत्पीड़न का आरोप सिद्ध नहीं हुआ, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल जरूर खड़े हुए।
यही सूक्ष्म अंतर पूरी बहस में बनाए रखना चाहिए।
असली बीमारी: न्यायपालिका की सामंती मानसिकता
जयसिंह ने केवल यौन उत्पीड़न की बात नहीं की।
उन्होंने उस संस्कृति की आलोचना की जिसमें कथित तौर पर जिला न्यायालयों की महिला न्यायाधीशों से वरिष्ठ पुरुष न्यायाधीशों के स्वागत में कतार लगाने, एक जैसे रंग की साड़ियां पहनने और फूल बरसाने जैसी अपेक्षाओं का जिक्र किया गया। (Live Law)
अगर किसी संस्था में पद के कारण व्यक्ति से ऐसी अधीनस्थ भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है, तो समस्या कपड़े या फूल की नहीं है।
समस्या सत्ता की भाषा है।
न्यायाधीश संविधान की शपथ लेता है, किसी व्यक्ति की निजी सत्ता की नहीं।
जिला न्यायाधीश हाई कोर्ट के न्यायाधीश के अधीन प्रशासनिक संरचना में हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी गरिमा समाप्त हो जाए।
और जब यह अपेक्षा विशेष रूप से महिलाओं से की जाती है, तो मामला और गंभीर हो जाता है।
न्यायपालिका यदि बाहर समाज को समानता सिखाती है और भीतर लैंगिक अधीनता की संस्कृति को सहन करती है, तो यह कानून और व्यवहार के बीच खतरनाक द्वंद्व है।
फिर वही न्यायपालिका व्यभिचार का कानून क्यों खत्म करती है?
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने Joseph Shine मामले में IPC की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
पुरानी धारा में व्यभिचार को एक अपराध माना गया था, लेकिन उसकी संरचना बेहद असमान थी।
कानून के अनुसार विवाहित महिला के साथ संबंध बनाने वाला पुरुष अपराधी बन सकता था, लेकिन महिला को उसी अर्थ में अपराधी नहीं माना जाता था। और सबसे विचित्र बात यह थी कि पति की सहमति या मिलीभगत कई परिस्थितियों में अपराध की संरचना को प्रभावित करती थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इसे महिलाओं की समानता, गरिमा और स्वायत्तता के विरुद्ध माना। (Indian Kanoon)
अदालत ने कहा कि महिला पति की संपत्ति नहीं है।
यह फैसला भारतीय संवैधानिक इतिहास में महत्वपूर्ण था क्योंकि उसने लगभग डेढ़ सदी पुरानी औपनिवेशिक सोच को चुनौती दी।
अदालत ने व्यभिचार को सही नहीं कहा था
यह बात विशेष रूप से समझनी जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि विवाह में विश्वासघात अच्छा है।
उसने यह भी नहीं कहा कि पति-पत्नी के बीच निष्ठा का कोई महत्व नहीं।
अदालत ने मूलतः कहा कि हर नैतिक गलती को आपराधिक अपराध बनाना राज्य का काम नहीं है।
व्यभिचार अब भी विवाह-विच्छेद यानी divorce का आधार हो सकता है। वह वैवाहिक संबंधों में civil consequence पैदा कर सकता है। (Indian Express)
अर्थात अदालत ने अपराध हटाया, विवाह की नैतिकता नहीं।
यही संवैधानिक उदारवाद है।
और सिर्फ एक धारा नहीं गई—उससे जुड़ी प्रक्रिया भी गई
Joseph Shine का महत्व केवल IPC की धारा 497 तक सीमित नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने CrPC की धारा 198 को भी असंवैधानिक घोषित किया, क्योंकि वह व्यभिचार की शिकायत के लिए “aggrieved person” की व्यवस्था को उसी असमान ढांचे से जोड़ती थी। (Indian Kanoon)
अर्थात न्यायपालिका ने substantive criminal provision के साथ उसकी procedural व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया।
बाद में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन रणबीर दंड संहिता की समान प्रकृति वाली धारा 497 को भी सुप्रीम कोर्ट ने Joseph Shine के आधार पर असंवैधानिक घोषित किया। (Sci API)
यह उदाहरण दिखाता है कि न्यायपालिका जब संवैधानिक समीक्षा करती है तो केवल कानून की भाषा नहीं देखती; वह कानून के पीछे छिपी सत्ता की मानसिकता को भी देख सकती है।
तो फिर यही कसौटी न्यायपालिका के अपने व्यवहार पर क्यों नहीं लागू होनी चाहिए?
संविधान बाहर के लिए है या भीतर के लिए भी?
यही सबसे कठोर प्रश्न है।
यदि अदालत कह सकती है कि एक कानून महिला की गरिमा का उल्लंघन करता है, तो अदालत के भीतर महिला की गरिमा का उल्लंघन भी उतना ही गंभीर विषय होना चाहिए।
यदि अदालत कह सकती है कि महिला को पति की संपत्ति समझना असंवैधानिक है, तो न्यायिक पदानुक्रम में महिला न्यायाधीश को किसी पुरुष वरिष्ठ की सामाजिक अधीनस्थ समझना भी अस्वीकार्य होना चाहिए।
यदि अदालत कहती है कि व्यक्ति की dignity और privacy महत्वपूर्ण हैं, तो शिकायत करने वाली महिला न्यायाधीश की dignity और procedural fairness भी उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
संविधान अदालत की दीवारों के बाहर खत्म नहीं होता।
वह अदालत के भीतर भी लागू होता है।
सबसे खतरनाक चीज यौन उत्पीड़न से भी पहले शुरू होती है
किसी महिला को अनुचित टिप्पणी करना गंभीर है।
यौन संकेत देना गंभीर है।
अनुचित निमंत्रण देना गंभीर है।
पद का दुरुपयोग करना गंभीर है।
लेकिन इन सबके पीछे जो संस्कृति होती है, वह और खतरनाक है।
वह संस्कृति कहती है:
“मैं वरिष्ठ हूं, इसलिए तुम विरोध नहीं कर सकती।”
यहीं से उत्पीड़न शुरू होता है।
और यही कारण है कि केवल POSH समिति बना देने से समस्या खत्म नहीं होगी।
जब तक सत्ता की भाषा नहीं बदलेगी, शिकायत तंत्र कागज पर मौजूद रहेगा और भय वास्तविक जीवन में।
महिला न्यायाधीश की ‘ना’ का मूल्य क्या है?
एक सामान्य कर्मचारी के लिए “ना” कहना कठिन हो सकता है।
लेकिन न्यायिक अधिकारी के लिए स्थिति और पेचीदा है।
जिस व्यक्ति को वह मना कर रही है, वह यदि उसकी प्रशासनिक संरचना में ऊपर है तो उसका प्रभाव पोस्टिंग, मूल्यांकन, कार्य-वितरण और करियर पर पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में शिकायतकर्ता के सामने दो रास्ते दिखाई दे सकते हैं:
चुप रहो और सुरक्षित रहो।
या
सच बोलो और परिणाम भुगतो।
अगर संस्थागत वातावरण किसी महिला को पहला रास्ता चुनने के लिए मजबूर करता है, तो फिर शिकायत समिति की मौजूदगी मात्र दिखावा बन जाती है।
न्यायपालिका के लिए अलग पैमाना क्यों?
न्यायपालिका की आलोचना करते समय अक्सर कहा जाता है कि इससे संस्था की प्रतिष्ठा खराब होगी।
लेकिन यह तर्क खतरनाक है।
संस्था की प्रतिष्ठा सच छिपाने से नहीं, सच का सामना करने से बचती है।
अगर किसी अस्पताल में डॉक्टर के खिलाफ शिकायत हो तो जांच होनी चाहिए।
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
अगर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के खिलाफ शिकायत हो तो जांच होनी चाहिए।
अगर मंत्रालय में अधिकारी के खिलाफ शिकायत हो तो जांच होनी चाहिए।
तो न्यायपालिका में शिकायत होने पर भी जांच होनी चाहिए।
judicial independence को judicial impunity में बदलना लोकतंत्र के लिए विनाशकारी होगा।
न्यायपालिका ने समाज को बदला है—अब उसे खुद भी बदलना होगा
भारत की संवैधानिक न्यायपालिका ने कई सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी है।
व्यभिचार को अपराध बनाने वाली पुरानी व्यवस्था को उसने समाप्त किया।
समलैंगिकता के अपराधीकरण पर सवाल उठाया।
https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership
निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मजबूत किया।
तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराया।
महिला की गरिमा को संविधान के केंद्र में रखा।
लेकिन परिवर्तन की सबसे कठिन परीक्षा अदालत के बाहर नहीं होती।
वह अदालत के भीतर होती है।
क्योंकि दूसरों को बदलने का आदेश देना आसान है।
अपने संस्थागत व्यवहार को बदलना कठिन।
अब जरूरत ‘न्यायपालिका की प्रतिष्ठा बचाने’ की नहीं, न्यायपालिका की प्रतिष्ठा मजबूत करने की है
प्रतिष्ठा और पारदर्शिता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
बल्कि वास्तविक प्रतिष्ठा पारदर्शिता से पैदा होती है।
न्यायपालिका को चाहिए कि:
-
यौन उत्पीड़न की शिकायतों का anonymised वार्षिक डेटा जारी हो।
-
शिकायतकर्ता के खिलाफ प्रतिशोध को गंभीर misconduct माना जाए।
- https://politicsinsightindia.com/jab-sarkar-so-rahi-ho-aur-samaj-chup-ho-jaye-to-yuva-mobile-nasha-kaid-galati-kiski
-
शिकायत के बाद तबादले की स्वतंत्र समीक्षा हो।
-
जांच समितियों में वास्तविक स्वतंत्रता सुनिश्चित हो।
-
शिकायतकर्ता को प्रक्रिया की जानकारी मिले।
-
जरूरत पड़ने पर सहायता और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था हो।
-
जांच की समयसीमा तय हो।
-
महिला न्यायाधीशों को प्रशासनिक निर्णयों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले।
-
वरिष्ठ न्यायाधीशों के लिए भी gender-sensitisation अनिवार्य हो।
- https://politicsinsightindia.com/vijay-shah-case-sit-prosecution-sanction-government-vs-justice
-
अदालतों में मौजूद सामंती और लैंगिक परंपराओं की पहचान कर उन्हें समाप्त किया जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—
शिकायतकर्ता को दुश्मन न समझा जाए।
किसी संस्था की आलोचना संस्था-विरोध नहीं होती।
कई बार वह संस्था को बचाने की कोशिश होती है।
निष्कर्ष: न्याय का सिंहासन संविधान से बड़ा नहीं हो सकता
इंदिरा जयसिंह का बयान जांच से परे कोई अंतिम फैसला नहीं है। किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोपों को सत्य मान लेना न्याय का सिद्धांत नहीं है।
लेकिन शिकायतों को इसलिए दबा देना कि आरोपी न्यायपालिका का हिस्सा है—यह भी न्याय नहीं है।
भारतीय संविधान ने न्यायपालिका को असाधारण शक्ति दी है, लेकिन उसी संविधान ने समानता, गरिमा, स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार को भी सर्वोच्च स्थान दिया है।
https://politicsinsightindia.com/education-cess-ka-hisab-government-schools-badhaal
Joseph Shine में सुप्रीम कोर्ट ने एक पुराने कानून को इसलिए हटाया क्योंकि वह महिला को समान नागरिक के रूप में नहीं देखता था। अदालत ने साफ किया कि व्यभिचार नैतिक रूप से गलत हो सकता है, वैवाहिक विवाद का आधार हो सकता है, लेकिन हर नैतिक गलती को जेल भेजने योग्य अपराध नहीं बनाया जा सकता। (Indian Kanoon)
यही संवैधानिक सोच न्यायपालिका पर भी लागू होनी चाहिए।
जिस न्यायपालिका ने कहा कि पत्नी किसी पुरुष की संपत्ति नहीं है, उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कोई महिला न्यायाधीश किसी पुरुष न्यायाधीश की सत्ता की अधीनस्थ वस्तु न बने।
जिस न्यायपालिका ने नागरिकों को गरिमा का अधिकार दिया है, उसे अपनी संस्था में भी गरिमा सुनिश्चित करनी होगी।
और जिस न्यायपालिका ने पुराने कानूनों की मानसिकता को बदलने का साहस दिखाया है, उसे अपनी पुरानी संस्थागत मानसिकताओं को बदलने का साहस भी दिखाना होगा।
क्योंकि न्यायालय की सबसे बड़ी ताकत उसकी इमारत नहीं।
उसकी सबसे बड़ी ताकत यह विश्वास है कि वहां सत्ता नहीं—न्याय चलता है।
और अगर महिला न्यायाधीश को न्याय मांगने के लिए उसी सत्ता से लड़ना पड़े, जिससे उसे न्याय की उम्मीद है, तो सवाल केवल एक शिकायत का नहीं रह जाता।
सवाल पूरी न्याय व्यवस्था के चरित्र का बन जाता है।
Get every story on your phone
Join our channel and never miss an update.
What's Your Reaction?