"चुनाव में 'मंगलसूत्र' बचाने की बात हुई थी, अब सोना चाहिए? क्या बदल रही है सरकार की सोच? गोल्ड मोनेटाइजेशन पर बड़े सवाल"

मंगलसूत्र' की राजनीति से गोल्ड मोनेटाइजेशन तक—क्या यह सिर्फ आर्थिक सुधार है या निजी संपत्ति अधिकारों पर नई बहस? पढ़िए तथ्य, तर्क और आलोचनात्मक विश्लेषण।

"चुनाव में 'मंगलसूत्र' बचाने की बात हुई थी, अब सोना चाहिए? क्या बदल रही है सरकार की सोच? गोल्ड मोनेटाइजेशन पर बड़े सवाल"

By- Sudhir Taliyan Chaudhary Talan Khap

क्या अब देश के सोने पर सरकार की नज़र है? 'मंगलसूत्र' की राजनीति से गोल्ड मोनेटाइजेशन तक—विश्वास, संपत्ति और सत्ता पर सबसे बड़ा सवाल

"चुनाव में कहा गया था—'वे आपके मंगलसूत्र तक छीन लेंगे।' आज सरकार कह रही है—'घरों में पड़ा सोना अर्थव्यवस्था के काम आना चाहिए।' क्या इन दोनों बातों के बीच कोई विरोधाभास है, या यह केवल राजनीति और अर्थशास्त्र की अलग-अलग भाषाएँ हैं?"

भारत केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं है, बल्कि यह दुनिया का सबसे बड़ा घरेलू स्वर्ण भंडार रखने वाले देशों में भी गिना जाता है। अनुमान है कि भारतीय परिवारों और मंदिरों के पास हजारों टन सोना है, जिसकी कीमत कई ट्रिलियन डॉलर के बराबर बैठती है। सरकार का कहना है कि यह सोना निष्क्रिय पड़ा है, जबकि देश हर वर्ष भारी मात्रा में सोने का आयात करता है। इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है और व्यापार घाटा बढ़ता है।

इसी तर्क के साथ गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को फिर से सक्रिय बनाने की चर्चा हो रही है। खबरें बताती हैं कि सरकार जौहरियों की अधिक भागीदारी के माध्यम से इस योजना को प्रभावी बनाना चाहती है।

कागज़ पर यह एक आर्थिक नीति है।

लेकिन जनता के मन में यह केवल आर्थिक नीति नहीं है।

यह विश्वास का प्रश्न है।

यह संपत्ति का प्रश्न है।

यह उस सोने का प्रश्न है जिसे भारतीय परिवार "निवेश" नहीं, बल्कि "सुरक्षा" मानते हैं।

और सबसे बढ़कर, यह उस राजनीतिक स्मृति का प्रश्न है जिसे देश अभी भूला नहीं है।

जब "मंगलसूत्र" चुनावी मुद्दा बना

लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री ने कई सभाओं में यह आरोप लगाया कि यदि विपक्ष सत्ता में आया तो महिलाओं के "मंगलसूत्र" तक सुरक्षित नहीं रहेंगे। यह एक शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक था। भारतीय समाज में मंगलसूत्र केवल गहना नहीं, वैवाहिक संबंध, पारिवारिक सम्मान और व्यक्तिगत स्वामित्व का भावनात्मक प्रतीक है।

उस समय संदेश साफ़ था—आपकी निजी संपत्ति खतरे में पड़ सकती है।

आज, जब सरकार निष्क्रिय सोने को अर्थव्यवस्था में लाने की बात करती है, तो आलोचक स्वाभाविक रूप से पूछते हैं—क्या यह राजनीतिक भाषा और सरकारी नीति के बीच विरोधाभास नहीं है?

इस प्रश्न का उत्तर "हाँ" या "नहीं" में देना आसान नहीं है।

क्योंकि वर्तमान गोल्ड मोनेटाइजेशन योजना स्वैच्छिक बताई जाती है। सरकार किसी नागरिक को कानून के बल पर अपना सोना जमा कराने के लिए बाध्य नहीं करती।

लेकिन क्या केवल "स्वैच्छिक" शब्द लिख देने से सारी आशंकाएँ समाप्त हो जाती हैं?

यही वह प्रश्न है जिस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।

"स्वैच्छिक"—यह शब्द जितना सरल दिखता है, उतना है नहीं

सरकारी दस्तावेज़ों में "स्वैच्छिक" शब्द आश्वस्त करता है। इसका अर्थ है कि निर्णय नागरिक का होगा।

लेकिन लोकतांत्रिक समाज में केवल कानूनी स्वैच्छिकता ही पर्याप्त नहीं होती। सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ भी नागरिक के निर्णय को प्रभावित करती हैं।

कल्पना कीजिए—

यदि लगातार यह संदेश दिया जाए कि घर में रखा सोना "निष्क्रिय" है, "राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी नहीं" है, या "देश के हित में इसे उत्पादक बनाया जाना चाहिए", तो क्या इससे लोगों पर नैतिक या सामाजिक दबाव नहीं बन सकता?

यही वह बिंदु है जहाँ बहस केवल कानून की नहीं, बल्कि राज्य और नागरिक के संबंध की हो जाती है।

सरकार का अधिकार कहाँ तक है?

और नागरिक की निजी पसंद कहाँ से शुरू होती है?

लोकतंत्र इन्हीं सीमाओं का नाम है।

क्या हर निजी संपत्ति को आर्थिक संसाधन मानना उचित है?

राज्य का दृष्टिकोण स्वाभाविक रूप से आर्थिक होता है। अर्थशास्त्री निष्क्रिय संपत्ति को उत्पादक बनाने की बात करते हैं। यह तर्क नया नहीं है।

लेकिन नागरिक का दृष्टिकोण अलग होता है।

उसके लिए घर की अलमारी में रखा सोना "डेड एसेट" नहीं है।

वह उसकी माँ की याद हो सकता है।

वह बेटी की शादी की तैयारी हो सकता है।

वह बीमारी के समय का सहारा हो सकता है।

वह पीढ़ियों की मेहनत का परिणाम हो सकता है।

हर संपत्ति की कीमत बाज़ार तय नहीं करता; कई संपत्तियों का मूल्य भावनाएँ तय करती हैं।

यहीं सरकार और समाज की सोच अलग-अलग रास्तों पर खड़ी दिखाई देती है।

क्या नागरिकों का भरोसा कमज़ोर हुआ है?

यदि यह योजना वास्तव में इतनी लाभकारी है, तो अब तक इसमें अपेक्षित भागीदारी क्यों नहीं हुई?

क्या लोग आर्थिक लाभ नहीं चाहते?

या उन्हें अपने सोने से अधिक अपने भरोसे की चिंता है?

यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर केवल ब्याज दरें नहीं दे सकतीं।

भारत जैसे देश में जहाँ लाखों लोग बैंकिंग व्यवस्था से अपेक्षाकृत देर से जुड़े, जहाँ अनौपचारिक बचत आज भी व्यापक है, वहाँ सोना केवल निवेश नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।

कई परिवारों के लिए बैंक खाता एक सुविधा है।

लेकिन सोना अंतिम सुरक्षा है।

यही कारण है कि सरकार की आर्थिक भाषा और नागरिकों की सामाजिक मनोविज्ञान के बीच दूरी दिखाई देती है।

संकट के समय लोग बैंक पर ज़्यादा भरोसा करते हैं या सोने पर?

इतिहास बताता है कि विभिन्न देशों में वित्तीय संकटों के दौरान लोगों ने अलग-अलग प्रकार की सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख किया। कई बार सोने की कीमतें बढ़ीं क्योंकि निवेशकों ने उसे अपेक्षाकृत सुरक्षित माना। दूसरी ओर अनेक देशों में सरकारों और केंद्रीय बैंकों ने बैंकिंग व्यवस्था को बचाने के लिए हस्तक्षेप भी किया और जमाकर्ताओं की सुरक्षा के उपाय किए।

यानी इतिहास एकतरफ़ा नहीं है।

लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है—भारत के करोड़ों परिवार आज भी सोने को केवल निवेश नहीं, बल्कि आपातकालीन सुरक्षा मानते हैं।

यही सामाजिक वास्तविकता है जिसे कोई भी आर्थिक नीति नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती।

क्या सरकार का तर्क पूरी तरह गलत है?

नहीं।

सरकार का कहना है कि यदि निष्क्रिय सोने का एक छोटा हिस्सा भी वित्तीय प्रणाली में आए तो सोने के आयात पर निर्भरता कम हो सकती है, विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है और अर्थव्यवस्था को लाभ मिल सकता है।

यह एक वैध आर्थिक तर्क है।

लेकिन लोकतंत्र में सही आर्थिक तर्क भी तभी सफल होता है जब उसके साथ भरोसा जुड़ा हो।

और भरोसा केवल विज्ञापनों से नहीं बनता।

भरोसा अनुभव से बनता है।

भरोसा पारदर्शिता से बनता है।

भरोसा इस विश्वास से बनता है कि नागरिक की संपत्ति पर अंतिम निर्णय उसी का रहेगा।

सबसे बड़ा प्रश्न: क्या यह बहस केवल सोने की है?

शायद नहीं।

असल बहस यह है कि क्या राज्य को नागरिक की निजी बचत के बारे में केवल सलाह देने तक सीमित रहना चाहिए, या उसे सक्रिय रूप से ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए जिनका उद्देश्य लोगों की निष्क्रिय संपत्तियों को आर्थिक गतिविधि में लाना हो?

यहीं से लोकतांत्रिक विमर्श शुरू होता है।

आज यह बहस सोने पर है।

कल यह किसी और प्रकार की निष्क्रिय परिसंपत्ति पर भी हो सकती है—यह एक नीति-संबंधी प्रश्न है, कोई स्थापित तथ्य नहीं। इसलिए नागरिकों का यह पूछना स्वाभाविक है कि राज्य की भूमिका की सीमा कहाँ समाप्त होती है और निजी स्वामित्व की स्वतंत्रता कहाँ से शुरू होती है।

यदि इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर समाज और सरकार मिलकर नहीं खोजते, तो हर नई आर्थिक नीति के साथ अविश्वास भी बढ़ सकता है।

क्या सरकार की नज़र केवल सोने पर है, या सोच कुछ और है?

यही वह सवाल है जिससे असली बहस शुरू होती है।

आज सरकार कह रही है कि घरों में रखा सोना अर्थव्यवस्था के काम आना चाहिए।

कल कोई अर्थशास्त्री कह सकता है कि देश में करोड़ों खाली पड़े मकान हैं, उन्हें भी "उत्पादक" बनाया जाना चाहिए।

परसों कोई कह सकता है कि करोड़ों एकड़ कृषि भूमि पूरी क्षमता से उपयोग नहीं हो रही, इसलिए सरकार को उसमें भी दखल देना चाहिए।

यहाँ स्पष्ट करना ज़रूरी है कि ऐसी किसी नीति की अभी घोषणा नहीं हुई है। लेकिन लोकतंत्र में नागरिकों का यह पूछना पूरी तरह उचित है कि राज्य की आर्थिक सोच की सीमा क्या है? क्या हर निजी संपत्ति को केवल आर्थिक उपयोगिता की कसौटी पर देखा जाएगा, या व्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी स्वामित्व भी उतने ही महत्वपूर्ण रहेंगे?

क्योंकि जब सरकार किसी निजी संपत्ति को "डेड एसेट" कहती है, तब सवाल केवल सोने का नहीं रह जाता।

सवाल सोच का हो जाता है।

क्या राज्य यह तय करेगा कि नागरिक अपनी मेहनत की कमाई का उपयोग कैसे करे?

या यह अधिकार केवल नागरिक के पास रहेगा?

यही लोकतंत्र और नियंत्रित अर्थव्यवस्था के बीच सबसे बड़ा अंतर है।

आखिर "डेड एसेट" किसे कहते हैं?

सरकार और कुछ अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि अलमारी या लॉकर में रखा सोना अर्थव्यवस्था में उत्पादन नहीं करता, इसलिए वह निष्क्रिय संपत्ति है।

लेकिन क्या हर ऐसी चीज़ जो बाज़ार में पैसा न कमा रही हो, वास्तव में "निष्क्रिय" है?

एक माँ अपनी बेटी के लिए जो गहने बनवाती है, क्या वह डेड एसेट हैं?

एक किसान अपनी पत्नी के लिए जो दो चूड़ियाँ खरीदता है, क्या वह अर्थव्यवस्था पर बोझ हैं?

एक मध्यमवर्गीय परिवार जो हर महीने थोड़ा-थोड़ा सोना खरीदकर भविष्य की सुरक्षा बनाता है, क्या उसकी बचत "अनुत्पादक" है?

आर्थिक पुस्तकों का उत्तर अलग हो सकता है।

लेकिन भारतीय समाज का उत्तर बिल्कुल अलग है।

भारत में सोना बैंक बैलेंस नहीं है।

यह विश्वास है।

यह आत्मसम्मान है।

यह संकट की घड़ी का साथी है।

गरीब और मध्यम वर्ग सबसे अधिक क्यों डरता है?

यह सवाल बहुत कम पूछा जाता है।

जब भी कोई नई आर्थिक नीति आती है, सबसे पहले चिंता किसे होती है?

बहुत बड़े उद्योगपति को?

या उस मध्यमवर्गीय परिवार को जिसने तीस साल की बचत से दस तोले सोना खरीदा है?

जिसके पास करोड़ों की संपत्ति है, उसके पास विकल्प भी हैं।

वह निवेश बदल सकता है।

वह विदेश में संपत्ति खरीद सकता है।

वह वित्तीय सलाहकार रख सकता है।

लेकिन एक छोटे व्यापारी, किसान, शिक्षक, कर्मचारी या मजदूर के पास क्या विकल्प हैं?

उसकी पूरी जीवनभर की बचत शायद कुछ गहनों में ही सिमटी होती है।

इसीलिए जब भी सरकार निजी संपत्ति से जुड़ी कोई नई बात करती है, सबसे पहले बेचैनी इसी वर्ग में दिखाई देती है।

इतिहास क्या कहता है?

इतिहास यह बताता है कि आर्थिक संकटों में लोग केवल सरकारों पर भरोसा नहीं करते।

वे अपनी सुरक्षित मानी जाने वाली संपत्तियों की ओर भी लौटते हैं।

दुनिया के अनेक वित्तीय संकटों के दौरान निवेशकों ने सोने की ओर रुख किया।

इसके पीछे कारण केवल लाभ कमाना नहीं था।

कारण था—अनिश्चितता।

हाँ, यह भी सच है कि कई देशों में सरकारों और केंद्रीय बैंकों ने बैंकिंग व्यवस्था को बचाया और जमाकर्ताओं की सुरक्षा की।

लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि कई देशों में बैंकिंग संकटों के दौरान निकासी पर अस्थायी प्रतिबंध लगे, पूंजी नियंत्रण लागू हुए या लोगों का अपनी जमा राशि तक पहुँचना कठिन हुआ।

यानी बैंकिंग प्रणाली और सरकार पर भरोसा महत्वपूर्ण है, लेकिन नागरिकों का यह सोचना भी अस्वाभाविक नहीं कि उनके पास कुछ ऐसी संपत्ति हो जिस पर उनका सीधा नियंत्रण रहे।

भारत में सोना अक्सर उसी भावना का प्रतीक माना जाता है।

आखिर लोग बैंक से ज़्यादा सोने पर भरोसा क्यों करते हैं?

क्योंकि बैंक एक संस्था है।

सोना एक वस्तु है।

बैंक किसी नियम से चल सकता है।

सोना किसी सरकारी आदेश की प्रतीक्षा नहीं करता।

बैंक खाते में लिखा अंक तभी उपयोगी है जब पूरी वित्तीय व्यवस्था सामान्य रूप से काम कर रही हो।

सोना आपके हाथ में होता है।

यही कारण है कि भारतीय परिवारों ने सदियों से इसे केवल गहना नहीं, बल्कि "अंतिम सुरक्षा" माना है।

इसका अर्थ यह नहीं कि बैंक बेकार हैं।

बैंक आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भारत में करोड़ों लोग बैंक और सोना—दोनों को साथ लेकर चलते हैं।

वे किसी एक पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते।

क्या सरकार पहले विश्वास बनाए या पहले सोना माँगे?

यही इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।

यदि सरकार चाहती है कि लोग स्वेच्छा से अपना सोना जमा करें, तो सबसे पहले उसे यह विश्वास दिलाना होगा कि नागरिक की निजी संपत्ति पर उसका नियंत्रण कभी कमज़ोर नहीं होगा।

लोग केवल ब्याज देखकर निर्णय नहीं लेते।

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वे विश्वास देखकर निर्णय लेते हैं।

यदि किसी नीति पर जनता का भरोसा नहीं बनता, तो सबसे आकर्षक योजना भी कागज़ों तक सीमित रह जाती है।

और गोल्ड मोनेटाइजेशन योजना का अब तक का अनुभव यही संकेत देता है कि आर्थिक तर्क अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं।

विश्वास सबसे बड़ी पूँजी है।

यदि वह नहीं है, तो सोना लॉकर से बाहर नहीं आएगा।

और यदि विश्वास है, तो सरकार को बार-बार लोगों को समझाने की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

यही किसी भी लोकतांत्रिक आर्थिक नीति की सबसे बड़ी परीक्षा है।

संविधान क्या कहता है? क्या निजी संपत्ति सचमुच पूरी तरह सुरक्षित है?

बहुत से लोग यह मानते हैं कि भारत में संपत्ति का अधिकार समाप्त हो चुका है।

यह पूरी तरह सही नहीं है।

संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल कानून के अधिकार (authority of law) के आधार पर ही वंचित किया जा सकता है।

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यानी सरकार केवल प्रशासनिक इच्छा से किसी की संपत्ति नहीं ले सकती; उसके लिए विधिक आधार आवश्यक है।

यही कारण है कि वर्तमान गोल्ड मोनेटाइजेशन योजना को कानूनी दृष्टि से "जबरन संपत्ति लेना" नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसे स्वैच्छिक योजना के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

लेकिन संवैधानिक बहस यहीं समाप्त नहीं होती।

लोकतंत्र में केवल कानून ही नहीं, सहमति और विश्वास भी महत्वपूर्ण होते हैं।

यदि किसी नीति पर जनता को बार-बार यह आश्वासन देना पड़े कि "यह पूरी तरह स्वैच्छिक है", तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठ सकता है कि आखिर लोगों के मन में संदेह क्यों है।

स्वैच्छिक योजना सफल क्यों नहीं हुई?

यदि कोई योजना लोगों के लिए लाभकारी है, तो सामान्यतः लोग स्वयं उसमें भाग लेते हैं।

फिर गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम अपेक्षित सफलता क्यों नहीं पा सकी?

क्या वजह केवल ब्याज दर है?

या लोगों का अपने सोने से भावनात्मक लगाव अधिक है?

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या फिर यह विश्वास का संकट है?

भारतीय परिवारों के लिए सोना केवल आर्थिक परिसंपत्ति नहीं है। यह पीढ़ियों की स्मृतियों, सामाजिक परंपराओं और आपातकालीन सुरक्षा का प्रतीक भी है। इसलिए यह मान लेना कि लोग केवल आर्थिक गणना के आधार पर निर्णय लेंगे, शायद भारतीय सामाजिक वास्तविकता को पूरी तरह नहीं समझता।

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती

सरकार के सामने चुनौती केवल सोना जुटाने की नहीं है।

सबसे बड़ी चुनौती है—विश्वास जुटाने की।

यदि लोग मानते हैं कि उनकी निजी संपत्ति पर अंतिम अधिकार उन्हीं का है और किसी भी परिस्थिति में यह सिद्धांत नहीं बदलेगा, तो वे स्वेच्छा से भी आर्थिक योजनाओं में भाग ले सकते हैं।

लेकिन यदि उन्हें लगे कि सरकार उनकी बचत को केवल आर्थिक संसाधन के रूप में देख रही है, तो अविश्वास बढ़ सकता है।

आर्थिक नीति और लोकतांत्रिक वैधता के बीच संतुलन यहीं बनता है।

क्या भारत को सोना चाहिए या विश्वास?

भारत दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा रखता है।

लेकिन किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी पूँजी केवल सोना, विदेशी मुद्रा या बैंकिंग प्रणाली नहीं होती।

सबसे बड़ी पूँजी होती है—नागरिकों का भरोसा।

जिस देश के नागरिक अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित मानते हैं, वहाँ निवेश भी बढ़ता है, बचत भी बढ़ती है और आर्थिक भागीदारी भी।

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विश्वास खोना आसान है।

उसे वापस पाना कठिन।

अंतिम सवाल

यह लेख यह दावा नहीं करता कि सरकार लोगों का सोना छीन रही है।

यह भी दावा नहीं करता कि भविष्य में सरकार निश्चित रूप से अन्य निजी संपत्तियों के लिए भी ऐसी नीतियाँ लाएगी।

लेकिन लोकतंत्र में नागरिकों का यह पूछना पूरी तरह वैध है—

  • क्या आर्थिक आवश्यकता के नाम पर राज्य की भूमिका लगातार बढ़नी चाहिए?

  • क्या निजी बचत को केवल राष्ट्रीय आर्थिक संसाधन मानना पर्याप्त दृष्टिकोण है?

  • क्या नागरिक की भावनात्मक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं का भी उतना ही सम्मान होना चाहिए?

  • और सबसे महत्वपूर्ण—क्या हर नई आर्थिक नीति के साथ सरकार को नागरिकों का विश्वास पहले अर्जित करना चाहिए?

इन प्रश्नों के उत्तर अलग-अलग हो सकते हैं।

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लेकिन एक बात स्पष्ट है—

लोकतंत्र में किसी भी नीति की असली परीक्षा केवल उसके आर्थिक लाभ से नहीं होती।

उसकी परीक्षा इस बात से होती है कि क्या वह नागरिकों की स्वतंत्रता, निजी संपत्ति के सम्मान और राज्य पर भरोसे—इन तीनों को एक साथ मजबूत करती है।

यदि यह संतुलन बना रहता है, तो नीति टिकाऊ होती है।

यदि यह संतुलन टूटता है, तो बहस केवल सोने की नहीं रहती।

वह राज्य और नागरिक के बीच विश्वास की बहस बन जाती है।

और लोकतंत्र में विश्वास, किसी भी खजाने से अधिक मूल्यवान होता है।

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