मजहबी गठबंधन: मानवता के लिए घातक स्थिति, जब विश्व एक नए धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रहा है
**Summary** वैश्विक राजनीति में गठबंधन हमेशा से शक्ति संतुलन, सुरक्षा और आर्थिक हितों का महत्वपूर्ण माध्यम रहे हैं। लेकिन जब गठबंधन धार्मिक पहचान और भावनात्मक ध्रुवीकरण पर आधारित होने लगते हैं, तब वे स्थिरता और शांति के बजाय संघर्ष और विभाजन का कारण बन सकते हैं। हाल ही में ईरान से इस्लामिक देशों को एकजुट होने की अपील ने इस बहस को फिर से जीवित कर दिया है कि क्या दुनिया एक नए प्रकार के “मजहबी NATO” की ओर बढ़ रही है। लेख में बताया गया है कि इतिहास में धार्मिक आधार पर बने कई संगठन और संघर्ष — जैसे क्रूसेड्स, मध्य-पूर्व के सांप्रदायिक युद्ध और दक्षिण एशिया का विभाजन — लंबे समय तक हिंसा और अस्थिरता का कारण बने। धर्म आस्था और भावना का विषय है, जबकि राजनीति को तर्क, संवाद और व्यवहारिक निर्णयों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि मजहबी गठबंधन अक्सर जनहित, विकास और लोकतांत्रिक संतुलन को प्राथमिकता नहीं दे पाते। लेख यह भी स्वीकार करता है कि अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों की कई नीतियों ने मध्य-पूर्व में अस्थिरता बढ़ाई है। इराक और अफगानिस्तान जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि बाहरी हस्तक्षेपों ने क्ष
Sudhir Taliyan
Chaudhary- Talan Khap
21वीं सदी की वैश्विक राजनीति केवल सीमाओं, संसाधनों और सैन्य शक्ति की राजनीति नहीं रह गई है। आज दुनिया ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहाँ विचारधाराएँ, पहचान और धार्मिक भावनाएँ भी अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों को प्रभावित कर रही हैं। हाल ही में ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में प्रभावशाली माने जाने वाले मोजतबा खामेनेई द्वारा इस्लामिक देशों से “इस्लामिक रिज़ॉल्यूशन” के नाम पर एकजुट होने की अपील ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या दुनिया एक नए प्रकार के मजहबी गठबंधन की ओर बढ़ रही है।
पहली नज़र में यह अपील पश्चिमी शक्तियों, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल की आक्रामक नीतियों के खिलाफ एक रक्षात्मक प्रतिक्रिया प्रतीत हो सकती है। मध्य-पूर्व के देशों ने लंबे समय तक युद्ध, प्रतिबंध, सत्ता परिवर्तन और बाहरी हस्तक्षेप झेले हैं। इराक, लीबिया, सीरिया और अफगानिस्तान जैसे उदाहरण बताते हैं कि महाशक्तियों की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने कई देशों की सामाजिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन परिस्थितियों का समाधान मजहबी गठबंधन हो सकता है? क्या धार्मिक पहचान पर आधारित वैश्विक संगठन वास्तव में शांति, स्थिरता और जनहित ला सकते हैं?
इतिहास, राजनीति विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन से प्राप्त अनुभव बताते हैं कि मजहबी गठबंधन प्रायः भावनात्मक लामबंदी तो कर लेते हैं, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता और समावेशी विकास देने में असफल रहते हैं।
गठबंधन क्यों बनते हैं?
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन कोई नई चीज़ नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने दो बड़े शक्ति समूह देखे — NATO और वारसा संधि। इन गठबंधनों का आधार धार्मिक नहीं बल्कि सामरिक और राजनीतिक हित थे। NATO https://politicsinsightindia.com/new/islamic-nato-asia-global-war-geopolitics का उद्देश्य सोवियत विस्तारवाद को रोकना था, जबकि वारसा संधि साम्यवादी देशों की सुरक्षा व्यवस्था थी।
इसी प्रकार आज भी दुनिया में कई क्षेत्रीय संगठन मौजूद हैं जैसे यूरोपीय संघ, ASEAN और G20। इन संगठनों का मूल उद्देश्य आर्थिक सहयोग, व्यापार, सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता है। इनके निर्णय व्यावहारिक आवश्यकताओं पर आधारित होते हैं।
यही कारण है कि अधिकांश सफल गठबंधन साझा आर्थिक हित, सुरक्षा चिंताएँ और विकास की रणनीति पर टिके होते हैं। वे नागरिकों की रोज़मर्रा की समस्याओं — रोजगार, ऊर्जा, व्यापार, तकनीक, शिक्षा और स्वास्थ्य — को प्राथमिकता देते हैं। इसके विपरीत मजहबी गठबंधन प्रायः पहचान की राजनीति पर आधारित होते हैं, जहाँ भावनात्मक एकता को तर्कसंगत नीति निर्माण से ऊपर रखा जाता है।
मजहबी राजनीति की मूल समस्या
धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है। यह मनुष्य को आध्यात्मिक दिशा दे सकता है, नैतिकता सिखा सकता है और सामाजिक एकजुटता पैदा कर सकता है। लेकिन जब धर्म राजनीतिक शक्ति का आधार बन जाता है, तब समस्या शुरू होती है।
राजनीति का मूल स्वभाव समझौता, बहस और व्यवहारिक निर्णय है। जबकि मजहबी ढाँचे में “दैवीय सत्य” को अंतिम माना जाता है। वहाँ सवाल, आलोचना और वैकल्पिक दृष्टिकोण के लिए सीमित स्थान बचता है। यही कारण है कि मजहबी संगठन अक्सर लोकतांत्रिक बहुलता को स्वीकार नहीं कर पाते।
राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुअल हंटिंगटन ने अपनी चर्चित अवधारणा “Clash of Civilizations” में कहा था कि शीत युद्ध के बाद भविष्य के संघर्ष वैचारिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान पर आधारित हो सकते हैं। यद्यपि इस सिद्धांत की आलोचना भी हुई, लेकिन आज विश्व राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति इस आशंका को पूरी तरह खारिज भी नहीं करती।
इतिहास क्या बताता है?
इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ धार्मिक पहचान पर बने समूह अंततः हिंसा और अस्थिरता का कारण बने।
मध्यकालीन यूरोप में हुए “क्रूसेड्स” धार्मिक युद्धों के सबसे चर्चित उदाहरण हैं। लगभग दो सौ वर्षों तक चले इन युद्धों में लाखों लोग मारे गए। उद्देश्य “पवित्र भूमि” पर नियंत्रण था, लेकिन परिणाम विनाश, विभाजन और दीर्घकालिक शत्रुता के रूप में सामने आया।
इसी प्रकार पश्चिम एशिया में सुन्नी-शिया संघर्ष ने दशकों से क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित किया है। इराक, सीरिया और यमन में कई संघर्षों के पीछे केवल भू-राजनीति नहीं बल्कि धार्मिक पहचान भी एक बड़ा कारक रही है।
दक्षिण एशिया भी इससे अछूता नहीं रहा। भारत ने विभाजन की त्रासदी देखी, जहाँ धार्मिक आधार पर राष्ट्र निर्माण ने लाखों लोगों को विस्थापित किया और व्यापक हिंसा हुई। बाद के दशकों में भी उपमहाद्वीप मजहबी कट्टरता और उग्रवाद की चुनौतियों से जूझता रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न रिपोर्टों और वैश्विक आतंकवाद सूचकांकों में यह पाया गया है कि चरमपंथी संगठनों द्वारा धार्मिक पहचान का उपयोग भर्ती और हिंसक लामबंदी के लिए किया जाता रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि धर्म हिंसा सिखाता है, बल्कि यह कि राजनीतिक उद्देश्य प्राप्त करने के लिए धार्मिक भावनाओं का उपयोग अत्यंत प्रभावशाली हथियार बन जाता है।
क्या धार्मिक संगठन जनहित दे पाए?
यदि हम आधुनिक इतिहास का विश्लेषण करें तो पाएँगे कि जिन देशों ने वैज्ञानिक सोच, संस्थागत लोकतंत्र और आर्थिक सुधारों को प्राथमिकता दी, वे अधिक स्थिर और समृद्ध बने। दूसरी ओर जहाँ राजनीति अत्यधिक धार्मिक नियंत्रण में गई, वहाँ अक्सर नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित हुईं।
उदाहरण के लिए, पश्चिम एशिया के कई देशों में राजनीतिक इस्लाम की विभिन्न धाराओं ने शासन व्यवस्था को प्रभावित किया, लेकिन वहाँ बेरोज़गारी, शिक्षा, तकनीकी विकास और लैंगिक समानता जैसे मुद्दे अभी भी गंभीर चुनौतियाँ बने हुए हैं। केवल धार्मिक एकता आर्थिक प्रगति की गारंटी नहीं बन सकी।
इसके विपरीत जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देशों ने सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए भी आधुनिक शिक्षा, तकनीक और आर्थिक नीतियों को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप वे वैश्विक विकास मॉडल बन गए।
अमेरिका और पश्चिम की गलतियाँ भी वास्तविक हैं
यह कहना भी गलत होगा कि वर्तमान संकटों के लिए केवल धार्मिक राजनीति जिम्मेदार है। पश्चिमी शक्तियों, विशेषकर अमेरिका की नीतियों ने भी कई क्षेत्रों में अस्थिरता को बढ़ाया है।
2003 में इराक पर अमेरिकी आक्रमण इसका प्रमुख उदाहरण है। उस युद्ध का आधार “Weapons of Mass Destruction” बताया गया, लेकिन बाद में ऐसे हथियार नहीं मिले। इस युद्ध में लाखों लोग प्रभावित हुए, क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ी और चरमपंथी संगठनों को विस्तार का अवसर मिला।
इराक युद्ध के बाद मध्य-पूर्व में सत्ता शून्यता और सांप्रदायिक संघर्ष बढ़े। कई विश्लेषकों का मानना है कि इसी अस्थिरता ने बाद में ISIS जैसे खतरनाक संगठन को उभरने का अवसर दिया।
अफगानिस्तान में दो दशकों तक चले युद्ध के बाद भी स्थायी लोकतांत्रिक ढाँचा स्थापित नहीं हो सका। लीबिया में सत्ता परिवर्तन के बाद राज्य संरचना कमजोर हुई। इन घटनाओं ने पश्चिमी हस्तक्षेपों की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि बाहरी हस्तक्षेप की गलतियों का समाधान मजहबी ध्रुवीकरण नहीं हो सकता। यदि एक पक्ष सामरिक वर्चस्व की राजनीति करता है और दूसरा धार्मिक पहचान आधारित वैश्विक संगठन बनाता है, तो परिणाम केवल नए प्रकार के टकराव के रूप में सामने आएँगे।
“मजहबी NATO” क्यों खतरनाक अवधारणा हो सकती है?
यदि विश्व स्तर पर किसी धर्म आधारित सामरिक गठबंधन का निर्माण होता है, तो उसके कई गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
1. वैश्विक ध्रुवीकरण बढ़ेगा
दुनिया पहले ही अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-पश्चिम संघर्ष और क्षेत्रीय तनावों से जूझ रही है। यदि धार्मिक आधार पर सैन्य या राजनीतिक गुट बनते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय संबंध और अधिक विभाजित हो जाएँगे।
2. अल्पसंख्यकों पर प्रभाव
धार्मिक गठबंधन अक्सर “हम बनाम वे” की मानसिकता को जन्म देते हैं। इससे उन देशों में रहने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति जटिल हो सकती है।
3. नीति निर्माण भावनात्मक हो सकता है
व्यावहारिक मुद्दों — जैसे जल संकट, जलवायु परिवर्तन, व्यापार और रोजगार — पर वैज्ञानिक नीति की आवश्यकता होती है। मजहबी ध्रुवीकरण इन विषयों को पीछे धकेल सकता है।
4. उग्रवादी समूह वैधता खोज सकते हैं
जब धार्मिक पहचान अंतरराष्ट्रीय राजनीति का आधार बनती है, तब कट्टरपंथी संगठन स्वयं को “बड़े मिशन” का हिस्सा बताकर समर्थन जुटाने की कोशिश करते हैं।
भारत का अनुभव क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत दुनिया के सबसे विविध देशों में से एक है। यहाँ अनेक धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ सह-अस्तित्व में हैं। भारत का संवैधानिक मॉडल धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र पर आधारित है, जहाँ राज्य किसी एक धर्म के आधार पर संचालित नहीं होता।
भारत ने दशकों तक सांप्रदायिक हिंसा, आतंकवाद और कट्टरता की चुनौतियाँ देखी हैं। इस अनुभव ने यह सिखाया कि धार्मिक पहचान को राजनीतिक हथियार बनाने से समाज में अविश्वास बढ़ता है। जब राजनीति नागरिकता और विकास की जगह धार्मिक भावनाओं के इर्द-गिर्द घूमने लगती है, तब सामाजिक एकता कमजोर होती है।
इसी कारण भारत जैसे बहुलतावादी देशों के लिए यह आवश्यक है कि वे वैश्विक स्तर पर भी धार्मिक ध्रुवीकरण से दूरी बनाए रखें और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आर्थिक, तकनीकी और मानवीय आधारों पर आगे बढ़ाएँ।
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भविष्य की दुनिया कैसी होनी चाहिए?
दुनिया को आज जिस चीज़ की सबसे अधिक आवश्यकता है, वह है सहयोग आधारित बहुध्रुवीय व्यवस्था। जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, ऊर्जा संकट और आर्थिक असमानता जैसी चुनौतियाँ किसी एक धर्म या राष्ट्र तक सीमित नहीं हैं। इनके समाधान के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पारदर्शी संस्थाएँ और वैश्विक सहयोग चाहिए।
यदि विश्व धार्मिक पहचान आधारित गुटों में विभाजित होता गया, तो संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की भूमिका कमजोर होगी और वैश्विक राजनीति अधिक अस्थिर हो सकती है।
सफल भविष्य वही होगा जहाँ गठबंधन “मजहब” पर नहीं बल्कि “मानव हित” पर आधारित हों। जहाँ देशों का उद्देश्य नागरिकों का जीवन बेहतर बनाना हो, न कि भावनात्मक ध्रुवीकरण के माध्यम से शक्ति प्राप्त करना।
निष्कर्ष
मोजतबा खामेनेई की अपील केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि उस बदलती वैश्विक मानसिकता का संकेत है जहाँ धार्मिक पहचान फिर से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केंद्रीय भूमिका लेने की कोशिश कर रही है। यह समझना आवश्यक है कि पश्चिमी हस्तक्षेपों और सामरिक वर्चस्व की आलोचना पूरी तरह उचित हो सकती है, लेकिन उसका समाधान मजहबी गठबंधन नहीं है।
इतिहास बताता है कि धार्मिक भावनाओं पर आधारित राजनीतिक संरचनाएँ लंबे समय तक स्थिरता नहीं दे पातीं। वे समाजों को भावनात्मक रूप से संगठित तो कर सकती हैं, लेकिन व्यवहारिक शासन, समावेशी विकास और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए आवश्यक संस्थागत संतुलन बनाने में संघर्ष करती हैं।
दुनिया को नए “मजहबी NATO” की नहीं बल्कि ऐसे वैश्विक सहयोग की आवश्यकता है जो मानवता, विज्ञान, लोकतंत्र और न्याय पर आधारित हो। क्योंकि अंततः स्थायी शांति किसी एक धर्म की विजय से नहीं बल्कि विविधताओं के सम्मान और व्यावहारिक सहयोग से ही संभव है।
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