डोडीताल है भगवान गणेश का जन्मस्थान! डोडी राजा के नाम से होती है पूजा, उत्तराखंड में छिपे हैं गणपति से जुड़े ये रहस्य
उत्तराखंड का डोडीताल भगवान गणेश का जन्मस्थान माना जाता है, जहां गणेशजी को ‘डोडी राजा’ के नाम से पूजा जाता है। डोडीताल से लेकर बदरीनाथ, केदारनाथ, सिरकटा गणेश और बैजनाथ तक गणपति से जुड़े प्राचीन मंदिरों, पौराणिक मान्यताओं और अनोखी धार्मिक परंपराओं की पूरी कहानी।
डोडी ताल है गणेश का जन्म स्थान
डोडी राजा के नाम से जाने जाते हैं, गणेश
डॉ. बृजेश सती
उत्तरकाशी जनपद का डोडीताल गणेशजी का जन्म स्थान है। यहां प्राचीन मंदिर है। डोडी ताल स्थित अन्न पूर्णा मंदिर देश का इकलौता मंदिर है। जहां गणपति, माता अन्नपूर्णा के साथ विराजते हैं। खास बात यह है कि यहां गणेश को विसर्जित नहीं किया जाता। बल्कि प्रतिवर्ष काष्ठ की नई मूर्ति बनाकर प्रतिष्ठित किया जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी ताल के तट पर माता पार्वती ने उबटन से गणेश जी को उत्पन्न किया था।
उत्तराखंड में विघ्नहर्ता गणेशजी की पूजा केवल मंदिरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की प्राचीन भवन निर्माण शैली में घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर गणेश की मूर्ति को अंकित करने की पौराणिक परंपरा है। खासतौर से पर्वतीय भवन निर्माण की पारंपरिक शैली में, मुख्य द्वार (स्थानीय भाषा में खोली कहा जाता है) पर गणेशजी की प्रतिमा को उकेरा जाता है। इसे स्थानीय भाषा में खोली का गणेश कहा जाता है। हालांकि, बदलते सामाजिक परिवेश और आधुनिकता के दौर में अब यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होने के कगार पर है।
बदरीनाथ मंदिर परिसर में गणेश मंदिर और गुफा
बदरीनाथ मंदिर के परिक्रमा पथ में भगवान गणेशजी का प्राचीन मंदिर है। जहां कपाट खुलने से कपाट बंद होने की प्रक्रिया के पहले दिन तक पूजा अर्चना की जाती है। बदरीनाथ मंदिर के कपाट कपाट बंद होने की परंपरा के तहत सबसे पहले गणेश मंदिर के द्वार बंद होते हैं।
बदरीनाथ धाम से तीन किलोमीटर की दूरी पर सरस्वती नदी के समीप गणेश गुफा है। ऐसी पौराणिक एवं धार्मिक मान्यता है कि इसी गुफा में बैठकर गणेशजी ने वेदव्यासजी के अनुसार वेद पुराण और महाभारत का लेखन कार्य किया। वेदव्यासजी अपनी गुफा में बैठकर बोलये थे और गणेशजी अपनी गुफा में बैठकर इसको लिपिबद्ध करते थे।
व्यास गुफा के समीप ही गणेश गुफा है।
सिरकटा गणेश (विनायक तीर्थ)
सोनप्रयाग और गौरी कुण्ड के बीच में रूद्रप्रयाग-गौरीकुण्ड राष्ट्रीय राजमार्ग से कुछ दूरी पर सिरकटा गणेश का पौराणिक और धार्मिक महत्व का मंदिर है। स्थानीय लोग इसे मुडकटया गणेश कहते हैं। इस स्थान पर गणेशजी की सिरविहीन मूर्ति है।
यह भारतवर्ष का इकलौता गणेश मंदिर है, जहां गणेशजी की इस रूप में पूजा की जाती है।
स्कन्दपुराण में इसे विनायक तीर्थ कहा गया है। अपने उबटन से उत्पन्न गणेश की धृष्टता से गुस्साये भगवान शिव ने गणेशजी का सिर काट दिया तथा वह शिवक्षेत्र में निपतित हुआ। शिवजी को अपने कृत्य पर अफ़सोस हुआ। उन्होंने धड़ की जगह हाथी के बच्चे का मुंह लगा दिया।
यह स्थान धार्मिक दृष्टिकोण से अति महत्वपूर्ण है। मंदिर में स्थाई पुजारी न होने से पूजा व्यवस्था नियमित नहीं है।
गणपति केदार, केदारनाथ धाम
केदारनाथ मंदिर के मुख्य द्वार के बाईं ओर गणेशजी की पत्थर से बनी मूर्ति विराजमान है। यह गणपति केदार के नाम से जानी जाती है। भगवान केदारनाथ के दर्शन से पहले गणपति केदार के दर्शन का माहात्म्य है।
केदारनाथ में आपदा में भी गणपति केदार की प्राचीन मूर्ति सुरक्षित रही।
गणपति केदार की पाषाण से बनी मूर्ति लगभग 2 फीट ऊंची है। एक ही शिला पर गणेशजी की आकृति को उकेरा गया है।
कलुआ (केलवा) विनायक
कलुआ या केलवा विनायक का मंदिर उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले रूपकुंड ट्रेक पर है। इसके बारे में कहा जाता है कि यह विश्व का सबसे ऊंचाई पर स्थित गणेश मंदिर है। मंदिर समुद्र की गहराई से से लगभग 14,500 फीट की ऊंचाई पर है। यह रूपकुंड ट्रेक का एक प्रमुख पड़ाव है। यहां पत्थरों से बना एक छोटा मंदिर है। जिसमें गणेशजी की काली शिला से बनी प्रतिमा है। प्रतिमा काले रंग की है। इसलिए इसे कलुवा विनायक कहा जाता है।
रूप कुंड जाने वाले पर्यटक और स्थानीय लोग कलुआ विनायक की पूजा अर्चना के बाद ही आगे बढ़ते हैं।
गणेश मंदिर डोडी ताल (धुंडीताल)
यह मंदिर उत्तरकाशी जनपद में है। समुद्र तल से तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मूलरूप से यह माता अन्नपूर्णा का मंदिर है। यहां इसी मंदिर के गर्भ गृह में गणेशजी भी विराजमान हैं।
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यह मंदिर डोडीताल झील के निकट घने जंगलों के बीच है। हिंदू पौराणिक कथाओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, डोडीताल को भगवान गणेश का जन्मस्थान माना जाता है। इस मंदिर के कपाट प्रतिवर्ष गंगोत्री मंदिर के कपाट खुलने से 15 दिन पहले खुलते हैं।
डोडीताल को धुंडीताल भी कहते हैं। इसको गणेश का ताल भी कहते हैं।
स्थानीय जानकारों के मुताबिक क्षेत्र स्थानीय निवासी भगवान गणेश को डोडी राजा के रूप में पूजते हैं। ऐसी मान्यता है कि माता पार्वती इस मीठे पानी की झील में नियमित रूप से स्नान करती थीं।
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डोडीताल में जिस स्थान पर यह मंदिर है। वह कैलासू के नाम से जाना जाता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि यह, कैलाश का अपभ्रंश है।
इस ताल की गहराई के बारे में कहते हैं कि कुछ वर्ष पूर्व वैज्ञानिकों का एक दल इसकी गहराई नापने के लिए आया था। लेकिन वह इसकी गहराई नहीं नाप सका।
मां के साथ विराजते हैं डोडी राजा
डोडी ताल स्थित अन्न पूर्णा मंदिर देश का इकलौता मंदिर है। जहां गणपति, माता अन्नपूर्णा के साथ विराजते हैं। मंदिर के गर्भ गृह में माता अन्नपूर्णा के साथ गणेशजी का विग्रह भी प्रतिष्ठित है। खास बात यह है कि यहां पार्वती की पूजा अन्न पूर्णा के रूप में होती है।
यहां गणेशजी डोडी राजा के नाम से पुकारा जाता है।
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गणेश मंदिर बैजनाथ
बैजनाथ मंदिर परिसर में भगवान गणेश की नृत्य करती हुई प्रतिमा स्थापित है। जो कलात्मक दृष्टि से बेजोड़ है। बैजनाथ में मंदिरों का समूह है। मुख्य मंदिर भगवान शिव का है। उनके साथ ही गणेशजी, माता पार्वती, कुबेर, सूर्य और ब्रह्माजी के मंदिर भी स्थित हैं।
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