जनता ने डरना छोड़ा, सत्ता से सवाल शुरू! क्या डगमगा रहा है सत्ता का किला?

भारत में बढ़ते जनआक्रोश, बेरोजगारी, पेपर लीक, चुनावी पारदर्शिता, राजनीतिक फंडिंग और संस्थाओं की जवाबदेही पर उठते सवालों के बीच क्या सत्ता के प्रति जनता का नजरिया बदल रहा है? विशेष संपादकीय लोकतंत्र में सवाल पूछने के अधिकार और जवाबदेही की पड़ताल करता है।

जनता ने डरना छोड़ा, सत्ता से सवाल शुरू! क्या डगमगा रहा है सत्ता का किला?

प्रकाश कमळताई गोपाळराव पोहरे

Owner and Chief Editor- देशोन्नति महाराष्ट्र 

लोकतंत्र में कोई भी सत्ता हमेशा के लिए नहीं होती। सत्ता जनता के विश्वास पर खड़ी होती है और जब वह जनता के सवालों को नजरअंदाज करने लगती है, तो उसके पैरों के नीचे की जमीन धीरे-धीरे खिसकने लगती है। आज देश में घट रही अनेक घटनाओं को इसी दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।

पिछले कुछ समय से सत्ता की व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली विभिन्न आवाजों को कभी राष्ट्रविरोधी, कभी नक्सली तो कभी देशद्रोही जैसे ठप्पों से चुप कराने का प्रयास किए जाने की भावना समाज में पैदा हुई है। लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा विरोधियों का होना नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाले को ही अपराधी मानने की मानसिकता है।

लेकिन इतिहास बताता है—डर कितना भी बड़ा क्यों न हो, एक क्षण ऐसा आता है जब वही डर जनता की मानसिकता में परिवर्तन का कारण बन जाता है।

दीपके और CJP प्रकरण का ‘टर्निंग पॉइंट’

अभिजीत दीपके और CJP से जुड़े आंदोलन ने ठीक ऐसा ही एक टर्निंग पॉइंट पैदा किया, ऐसा इस घटनाक्रम को देखने वालों का मानना है। किसी एक व्यक्ति या संस्था के आंदोलन को पूरे राजनीतिक परिवर्तन का श्रेय देना शायद अतिशयोक्ति होगी; लेकिन उस आंदोलन से जनता में सवाल पूछने का साहस बढ़ा, इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, सरकारी व्यवस्था, सरकारी संस्थान, फंड, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के संबंध में सवाल उठते हैं तो उनका जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी है। सवाल पूछने वाले को दुश्मन समझना लोकतंत्र का रास्ता नहीं है।

कभी सामान्य नागरिक सरकार से सवाल पूछने से पहले दस बार सोचता था। अब परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं।

“सरकार है, इसलिए सवाल मत पूछो” की मानसिकता के बजाय “सरकार है, इसलिए सवाल पूछो”—यह मानसिकता विकसित होना ही लोकतंत्र की असली ताकत है।

राहुल गांधी की भूमिका और विपक्ष के बदलते तेवर

इस पृष्ठभूमि में राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा को भी देखना होगा। 2024 के बाद उन्होंने लगातार सत्ता की व्यवस्था पर सवाल उठाए। “डरो मत” का संदेश और भारत जोड़ो यात्रा के माध्यम से प्रस्तुत “मोहब्बत की दुकान” की राजनीतिक भाषा ने विपक्ष की राजनीति को एक अलग स्वर दिया।

इसका अर्थ यह नहीं कि देश की हर राजनीतिक घटना का श्रेय किसी एक नेता को दिया जा सकता है। तस्वीर इससे कहीं अधिक व्यापक है।

कर्नाटक में डी. के. शिवकुमार और प्रियांक खरगे, तेलंगाना में रेवंत रेड्डी, तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन और अभिनेता-राजनेता विजय की राजनीतिक भूमिकाओं के साथ महाराष्ट्र के विभिन्न सामाजिक आंदोलनों ने अलग-अलग दिशाओं से सत्ता से सवाल किए।

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन ने मनोज जरांगे-पाटील के नेतृत्व में सड़क की ताकत दिखाई। युवाओं से लेकर किसानों तक अनेक मोर्चों पर असंतोष व्यक्त होता रहा।

इन सबका संयुक्त परिणाम क्या हुआ?

“सरकार से सवाल किया जा सकता है”—यह आत्मविश्वास जनता में पैदा हुआ।

पेपर लीक, चंदा और मंदिर व्यवस्था पर सवाल

पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं के गुस्से को बाहर ला दिया। सरकारी भर्ती में पारदर्शिता और योग्यता का सवाल सामने आया। धार्मिक संस्थाओं के चंदे और मंदिरों के प्रबंधन को लेकर उठे आरोपों और सवालों ने आस्था के नाम पर चलने वाली व्यवस्थाओं को भी जवाबदेही की कसौटी पर ला खड़ा किया।

यहां एक बात स्पष्ट होनी चाहिए—आरोप का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं है। किसी भी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध लगाए गए आरोप न्यायिक अथवा अधिकृत जांच में सिद्ध होना आवश्यक है। लेकिन केवल इसलिए कि आरोप लगे हैं, सवाल ही नहीं पूछे जाएं—यह भी लोकतंत्र स्वीकार नहीं कर सकता।

जनता का पैसा हो, मंदिर का चंदा हो या विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ी भर्ती प्रक्रिया—हिसाब मांगने का अधिकार जनता को है।

“नक्सली” का ठप्पा सवालों का जवाब नहीं हो सकता

सत्ता की आलोचना करने वालों को नक्सली, राष्ट्रद्रोही या देशविरोधी कहना आसान है। लेकिन इससे सवाल खत्म नहीं होते।

https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

कोई नागरिक सरकार की नीति की आलोचना करता है, इसलिए वह राष्ट्रद्रोही नहीं हो जाता। कोई पत्रकार भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाता है, इसलिए वह राष्ट्रविरोधी नहीं हो जाता। कोई विद्यार्थी पेपर लीक के विरोध में सड़क पर उतरता है, इसलिए वह व्यवस्था का दुश्मन नहीं बन जाता।

राष्ट्र का अर्थ सरकार नहीं है। राष्ट्र का अर्थ है—जनता, संविधान, संस्थाएं और इन सभी की स्वतंत्रता की रक्षा करने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था।

इसलिए सत्ता से सवाल करना राष्ट्र का विरोध नहीं; बल्कि कई बार वह राष्ट्रहित में निभाया जाने वाला कर्तव्य होता है।

अब सवाल सिर्फ सरकार का नहीं, संस्थाओं का भी है

मतदाता सूची में कथित अनियमितताएं, चुनाव प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवाल, EVM को लेकर व्यक्त की जा रही आशंकाएं, सरकारी भर्ती में पेपर लीक और राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता—इन सभी मुद्दों पर जनता को स्पष्ट और विश्वसनीय जवाब चाहिए।

शंका पैदा हो तो उसे दबाने के बजाय दूर करना लोकतांत्रिक संस्थाओं का कर्तव्य है।

https://politicsinsightindia.com/coaching-mafia-employability-crisis-government-education-marketisation

चुनाव आयोग पर सवाल उठते हैं तो आयोग को पारदर्शिता के साथ जवाब देना चाहिए। EVM को लेकर शंका है तो तकनीकी और स्वतंत्र तरीके से उस शंका का समाधान होना चाहिए। राजनीतिक दलों के फंड को लेकर सवाल हैं तो पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए।

संस्थाओं को मजबूत करने का एकमात्र रास्ता सवाल पूछने वालों को चुप कराना नहीं, बल्कि संस्थाओं पर जनता का विश्वास बढ़ाना है।

संघ का पंजीकरण हो या EVM—मांग पर फैसला जनता का

आज कुछ लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पंजीकरण की मांग कर रहे हैं, तो कुछ लोग EVM के स्थान पर अधिक पारदर्शी मतदान प्रणाली की मांग कर रहे हैं। इन मांगों पर मतभेद हो सकते हैं।

लेकिन लोकतंत्र में मांग करना अपराध नहीं है।

https://politicsinsightindia.com/satta-ka-super-kendra-maharashtra-se-delhi-tak-loktantra-ki-takat

सरकार या किसी संगठन को चुनौती देने वाली हर आवाज को दबाने के बजाय उसका जवाब देना अधिक प्रभावी होता है। क्योंकि आवाज दबाने से सवाल मरता नहीं—वह भीतर चला जाता है और बाद में और बड़े रूप में बाहर आता है।

“संयोग” कहें या जमा हुए असंतोष का विस्फोट?

आज एक साथ इतने अलग-अलग मुद्दों पर जनता सड़क पर क्यों आ रही है?

क्या यह केवल संयोग है?

हो सकता है कि कुछ घटनाएं संयोगवश एक ही समय में घटी हों। लेकिन हर संयोग के पीछे वर्षों से जमा हुए कारण होते हैं।

किसान असंतुष्ट है।
युवा रोजगार को लेकर परेशान है।

https://politicsinsightindia.com/nta-failure-government-accountability-students-future-exam-system-crisis
विद्यार्थी भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है।
करदाता सरकारी धन का हिसाब मांग रहा है।
मतदाता चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता चाहता है।
नागरिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर सवाल उठा रहा है।

इन सभी को केवल विपक्ष की साजिश बताकर खारिज कर दिया गया तो सत्ता असली संदेश को कभी समझ नहीं पाएगी।

सत्ता का टांगा किसने पलटा?

सत्ता का टांगा विपक्ष ने पलटा या जनता ने—अब यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है।

https://politicsinsightindia.com/lal-kile-se-bade-sapne-zameen-par-jankalyan-ki-khamoshi

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या वह डगमगाने लगा है?

और अगर डगमगा रहा है, तो उसका कारण खोजने की जिम्मेदारी सत्ता की है।

बाबा रामदेव जैसे प्रभावशाली सार्वजनिक व्यक्तित्व भी यदि सरकार के खिलाफ आंदोलन की भाषा बोलने की स्थिति में आ रहे हैं, तो सत्ताधारियों को इसे केवल राजनीतिक विरोध के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि व्यापक असंतोष के संकेत के रूप में देखना चाहिए।

क्योंकि सत्ता विरोधियों की संख्या से नहीं गिरती।

सत्ता तब गिरती है, जब आम आदमी मन से कहता है—“बस! अब सवाल पूछना ही होगा।”

https://politicsinsightindia.com/lucknow-mook-badhir-pradarshan-20-sutriya-maange-vidhan-sabha

और शायद आज भारत उसी मानसिक मोड़ पर खड़ा है।

अंततः किसी पार्टी की जीत या हार लोकतंत्र का अंतिम उद्देश्य नहीं है। लोकतंत्र की जीत ही अंतिम उद्देश्य है।

मोदी हों, राहुल गांधी हों या कल कोई और सत्ता में हो—जनता का सवाल पूछने का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए। सरकार को जवाब देना ही होगा। संस्थाओं को निष्पक्ष रहना होगा। और भ्रष्टाचार का आरोप है तो जांच होनी चाहिए।

क्योंकि जनता के सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले को ही अपराधी ठहराने की प्रवृत्ति किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

संघर्ष का यह दौर किसी एक व्यक्ति की जीत का नहीं; यह जनता के भयमुक्त होने का दौर है।

https://politicsinsightindia.com/mmdr-amendment-bill-2026-farmer-land-acquisition-partnership

और इसलिए—

जो कुछ हो रहा है, उसे केवल संयोग कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
वर्षों से जमा सवालों की गठरी में अब जनता का आक्रोश भर चुका है।
अब इस गठरी को खोलने का समय आ गया है।
हिसाब देना होगा—सत्ता को, संस्थाओं को और हर जिम्मेदार व्यवस्था को!

Was this article useful?

Get every story on your phone

Join our channel and never miss an update.

Join on WhatsApp Join on Telegram

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow