BRICS के सामने इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती: क्या दुनिया को नई दिशा देगा भारत?

विश्व तेजी से बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान-अमेरिका तनाव, ऊर्जा संकट और डॉलर आधारित आर्थिक दबावों ने वैश्विक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे समय में BRICS केवल एक आर्थिक समूह नहीं, बल्कि नई विश्व व्यवस्था की संभावित शक्ति बनकर उभर रहा है। ईरान ने भारत से BRICS मंच पर एशिया में शांति और संतुलन स्थापित करने के लिए निर्णायक भूमिका निभाने की अपील की है। भारत, रूस, चीन, ब्राज़ील और अन्य सदस्य देशों के सामने अब चुनौती है कि वे केवल बयानबाज़ी तक सीमित न रहें, बल्कि साझा मुद्रा, ऊर्जा सुरक्षा, वैकल्पिक व्यापार प्रणाली और युद्ध रोकने जैसे ठोस कदम उठाएँ। दुनिया की बड़ी आबादी और विशाल बाजार का प्रतिनिधित्व करने वाला BRICS यदि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाता है, तो वह डॉलर प्रभुत्व वाली व्यवस्था को चुनौती देकर अधिक संतुलित, न्यायपूर्ण और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था स्थापित कर सकता है। अब समय आ गया है कि BRICS शक्ति के साथ-साथ शांति और जनहित का भी वैश्विक केंद्र बने।

BRICS के सामने इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती: क्या दुनिया को नई दिशा देगा भारत?

ब्रिक्स अब सिर्फ आर्थिक मंच नहीं, विश्व व्यवस्था के पुनर्निर्माण की अंतिम उम्मीद बनता जा रहा है।
जब पश्चिम एशिया युद्ध की आग में झुलस रहा हो, रूस-यूक्रेन संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को थका दिया हो, अमेरिका प्रतिबंधों और टैरिफ की राजनीति से दुनिया को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा हो, तब दुनिया की निगाहें स्वाभाविक रूप से BRICS पर टिकती हैं।

इसी पृष्ठभूमि में भारत दौरे पर आए ईरान के विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी Baghaei की यह अपील अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारत ब्रिक्स मंच पर एशिया में शांति स्थापित करने के लिए निर्णायक भूमिका निभाए। यह केवल एक राजनयिक बयान नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत है।

आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ अमेरिका केंद्रित आर्थिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। डॉलर की वैश्विक प्रभुता ने दशकों तक विश्व व्यापार को नियंत्रित किया, लेकिन इसी व्यवस्था ने विकासशील देशों को कर्ज, प्रतिबंध और आर्थिक निर्भरता के जाल में भी फंसाया। रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों ने यह स्पष्ट कर दिया कि डॉलर आधारित वित्तीय ढांचा अब केवल आर्थिक प्रणाली नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार बन चुका है।

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रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को पहले ही ऊर्जा संकट, खाद्यान्न संकट और महंगाई की भयावह स्थिति में धकेल दिया था। यूरोप की अर्थव्यवस्थाएँ धीमी हुईं, विकासशील देशों की मुद्राएँ कमजोर पड़ीं और करोड़ों लोग बेरोजगारी तथा महंगाई से प्रभावित हुए। अब यदि ईरान-अमेरिका तनाव खुली जंग में बदलता है, तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा।

तेल की कीमतें अनियंत्रित होंगी। समुद्री व्यापार प्रभावित होगा। वैश्विक सप्लाई चेन टूटेगी। एशिया और अफ्रीका के गरीब देशों में आर्थिक अस्थिरता और गहरी होगी। विश्व बैंक और IMF पहले ही वैश्विक विकास दर को लेकर चिंता जता चुके हैं। ऐसे समय में BRICS की जिम्मेदारी केवल बयान जारी करने तक सीमित नहीं रह सकती।

भारत, चीन, रूस, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और नए शामिल देशों के पास अब वह जनसंख्या, संसाधन और बाजार है जो पश्चिमी प्रभुत्व वाली व्यवस्था को चुनौती दे सकता है। विश्व की लगभग आधी आबादी BRICS देशों में रहती है। वैश्विक GDP में इनकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। ऊर्जा संसाधनों, कृषि उत्पादन और औद्योगिक क्षमता के मामले में भी यह समूह अत्यंत प्रभावशाली हो चुका है।

लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या BRICS केवल आर्थिक आंकड़ों का समूह बना रहेगा, या वास्तव में वैकल्पिक विश्व व्यवस्था का नेतृत्व करेगा?

भारत की भूमिका यहाँ सबसे निर्णायक बनती है।
भारत आज पश्चिम और पूर्व दोनों के साथ संवाद बनाए रखने वाला शायद दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक राष्ट्र है। भारत रूस से भी संबंध रखता है, अमेरिका से भी रणनीतिक साझेदारी करता है, ईरान के साथ भी ऐतिहासिक संबंध हैं और अरब देशों के साथ भी मजबूत आर्थिक साझेदारी रखता है। यही संतुलन भारत को BRICS का स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता बनाता है।

यदि भारत चाहे तो BRICS को केवल व्यापारिक मंच से आगे बढ़ाकर शांति और सामूहिक सुरक्षा का वैश्विक केंद्र बना सकता है। इसके लिए सबसे पहले BRICS देशों को पश्चिम एशिया में तत्काल युद्धविराम और बहुपक्षीय वार्ता का संयुक्त प्रस्ताव लाना चाहिए।

दूसरा, डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए साझा भुगतान प्रणाली और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को तेज करना होगा। रूस और चीन पहले ही इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं। भारत ने भी कई देशों के साथ रुपया व्यापार की पहल की है। लेकिन अब समय छोटे प्रयोगों का नहीं, बल्कि बड़े और साहसिक निर्णयों का है।

साझा BRICS मुद्रा या कम से कम एक साझा डिजिटल सेटलमेंट सिस्टम पर गंभीर और समयबद्ध कार्य होना चाहिए। क्योंकि जब तक विश्व व्यापार पूरी तरह डॉलर नियंत्रित रहेगा, तब तक आर्थिक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।

तीसरा, ऊर्जा सुरक्षा पर सामूहिक नीति बनानी होगी।
ईरान, रूस और ब्राज़ील जैसे देशों के पास विशाल संसाधन हैं। भारत और चीन विशाल उपभोक्ता बाजार हैं। यदि BRICS ऊर्जा सहयोग, तेल आपूर्ति, गैस नेटवर्क और वैकल्पिक ऊर्जा निवेश पर एक साझा ढांचा बना ले, तो पूरी दुनिया की ऊर्जा राजनीति बदल सकती है।

चौथा, BRICS को केवल सरकारों का मंच नहीं बल्कि जनता के भविष्य का मंच बनना होगा।
आज दुनिया में बेरोजगारी, महंगाई, खाद्य संकट और सामाजिक असमानता तेजी से बढ़ रही है। युद्धों का सबसे बड़ा बोझ आम जनता उठाती है, जबकि लाभ हथियार उद्योग और भू-राजनीतिक शक्तियाँ ले जाती हैं। BRICS को यह स्पष्ट करना होगा कि उसका लक्ष्य केवल शक्ति संतुलन नहीं, बल्कि जनहित आधारित वैश्विक व्यवस्था है।

रूस की भूमिका इस पूरे समीकरण में अत्यंत दिलचस्प और जटिल है।
एक तरफ वह स्वयं यूक्रेन युद्ध में उलझा है, दूसरी तरफ वह पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ वैश्विक समर्थन जुटाना चाहता है। यदि रूस वास्तव में BRICS को मजबूत बनाना चाहता है, तो उसे यह साबित करना होगा कि यह समूह केवल पश्चिम विरोध का मंच नहीं, बल्कि शांति और स्थिरता का वास्तविक विकल्प है।

चीन के सामने भी बड़ी चुनौती है।
वह आर्थिक महाशक्ति बन चुका है, लेकिन उसके पड़ोसी देशों के साथ तनाव और अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा वैश्विक अस्थिरता को बढ़ाती है। BRICS के भीतर चीन को सहयोगात्मक नेतृत्व दिखाना होगा, प्रभुत्ववादी रवैया नहीं।

ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि BRICS केवल एशियाई शक्ति समूह बनकर न रह जाए, बल्कि वैश्विक दक्षिण की वास्तविक आवाज बने।

अब प्रश्न केवल राजनीति का नहीं, अस्तित्व का है।
यदि BRICS इस ऐतिहासिक अवसर पर भी केवल घोषणाएँ करता रहा, तो वह भी अनेक अंतरराष्ट्रीय संगठनों की तरह औपचारिक मंच बनकर रह जाएगा। लेकिन यदि यह समूह साहसिक निर्णय लेता है, तो आने वाले दशकों की विश्व व्यवस्था बदल सकती है।

आज दुनिया को किसी नए युद्ध गठबंधन की नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण संतुलन की आवश्यकता है।
दुनिया को ऐसी व्यवस्था चाहिए जहाँ व्यापार हथियार न बने, मुद्रा राजनीतिक दबाव का साधन न बने, और विकासशील देशों को केवल बाजार समझकर उनका शोषण न किया जाए।

BRICS के पास जनसंख्या है।
संसाधन हैं।

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बाजार है।
तकनीकी क्षमता है।
युवा शक्ति है।

अब केवल दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

भारत को इस क्षण की गंभीरता समझनी होगी।
यदि भारत केवल संतुलन साधने की कूटनीति तक सीमित रहता है, तो इतिहास उसे एक अवसर गंवाने वाले राष्ट्र के रूप में याद करेगा। लेकिन यदि भारत शांति, आर्थिक न्याय और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का नेतृत्व करता है, तो 21वीं सदी वास्तव में एशिया और वैश्विक दक्षिण की सदी बन सकती है।

अब समय आ गया है कि BRICS दुनिया को यह संदेश दे —
शक्ति का उद्देश्य वर्चस्व नहीं, संतुलन होना चाहिए।
अर्थव्यवस्था का उद्देश्य मुनाफा नहीं, मानव कल्याण होना चाहिए।
और राजनीति का उद्देश्य युद्ध नहीं, शांति होना चाहिए।

यदि BRICS यह साहस दिखाता है, तो आने वाला इतिहास इसे केवल एक संगठन नहीं, बल्कि विश्व पुनर्निर्माण की शुरुआत के रूप में याद करेगा।
अन्यथा, बढ़ते युद्ध, आर्थिक असमानता और वैश्विक अविश्वास के बीच मानवता का संकट और गहरा होता जाएगा।

अब निर्णय BRICS को लेना है —
क्या वह इतिहास बदलेगा,
या इतिहास के बोझ तले दब जाएगा।

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