पाकिस्तान की कुटिल चाल, पहले हिन्दुओं सिक्खों से माफ़ी मांगे, फिर आगे बढे,
पाकिस्तान की “लाहौर हेरिटेज रिवाइवल” योजना सतही तौर पर सांस्कृतिक विरासत बचाने की सकारात्मक पहल दिखाई देती है, क्योंकि इसके तहत लाहौर के पुराने हिंदू-सिख ऐतिहासिक नामों को पुनः बहाल किया जा रहा है। सांस्कृतिक दृष्टि से किसी भी देश के लिए अपनी ऐतिहासिक पहचान को संरक्षित करना आवश्यक है और भारत में भी इसी प्रकार नाम परिवर्तन की प्रक्रिया देखी गई है। लेकिन पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास, धार्मिक कट्टरता, आतंकवाद-समर्थक छवि और अल्पसंख्यकों के प्रति उसके व्यवहार को देखते हुए इस पहल की नीयत पर गंभीर सवाल उठते हैं। ब्लॉग में यह तर्क दिया गया है कि पाकिस्तान इस योजना का उपयोग अपनी वैश्विक छवि सुधारने, कट्टरवादी पहचान को नरम दिखाने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वैचारिक लाभ लेने के लिए कर सकता है। साथ ही यह भी कहा गया है कि जब तक पाकिस्तान अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, जबरन धर्मांतरण, ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर वास्तविक सुधार नहीं करता, तब तक केवल नाम बदलने से उसकी विश्वसनीयता स्थापित नहीं हो सकती।
लाहौर हेरिटेज रिवाइवल: संस्कृति की वापसी या पाकिस्तान की नई रणनीतिक चाल?
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में शुरू की गई “लाहौर हेरिटेज एरियाज रिवाइवल” योजना इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। इस योजना के अंतर्गत लाहौर की कई सड़कों, मोहल्लों और ऐतिहासिक स्थानों के पुराने नाम पुनः बहाल किए जा रहे हैं। कृष्ण नगर, संत नगर, धर्मपुरा, जैन मंदिर चौक, राम गली जैसे नामों की वापसी को पाकिस्तान सरकार सांस्कृतिक पुनर्जागरण और ऐतिहासिक पहचान की पुनर्स्थापना बता रही है। सतही तौर पर देखें तो यह पहल सकारात्मक प्रतीत होती है। किसी भी सभ्यता के लिए अपनी ऐतिहासिक पहचान, सांस्कृतिक स्मृति और स्थानीय विरासत को बचाना आवश्यक होता है। भारत में भी समय-समय पर अनेक शहरों, मार्गों और स्थानों के नाम बदले गए हैं ताकि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अस्मिता को पुनर्स्थापित किया जा सके। इसलिए केवल नाम बदलने के आधार पर किसी पहल का विरोध नहीं किया जा सकता।
लेकिन वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि लाहौर में नाम क्यों बदले जा रहे हैं। वास्तविक प्रश्न यह है कि यह काम कौन कर रहा है। जब यह पहल पाकिस्तान जैसे राष्ट्र द्वारा की जाती है, तब संदेह स्वाभाविक हो जाता है। क्योंकि पाकिस्तान का राजनीतिक इतिहास, उसकी सैन्य सोच, उसकी विदेश नीति और उसका धार्मिक कट्टरवाद यह भरोसा नहीं दिलाते कि यह केवल सांस्कृतिक संरक्षण का निष्कलुष प्रयास है। पाकिस्तान ने अपने इतिहास में शायद ही कोई ऐसा अवसर छोड़ा हो जब उसने किसी सकारात्मक पहल को रणनीतिक प्रचार, वैचारिक ध्रुवीकरण या अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने के हथियार के रूप में इस्तेमाल न किया हो। यही कारण है कि “लाहौर हेरिटेज रिवाइवल” को केवल सांस्कृतिक दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे छिपे राजनीतिक और वैचारिक संकेतों को समझना भी उतना ही आवश्यक है।
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हाल ही में पाकिस्तान की पंजाब सरकार ने कई ऐतिहासिक नाम पुनर्स्थापित करने की घोषणा की। रिपोर्टों के अनुसार इस योजना के तहत इस्लामपुरा को फिर से कृष्ण नगर, सुन्नत नगर को संत नगर और मुस्तफाबाद को धर्मपुरा बनाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। यह भी बताया गया कि जैन मंदिर रोड, लक्ष्मी चौक और राम गली जैसे पुराने नाम पुनः सामने लाए जा रहे हैं। इस पूरी परियोजना को “लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल” यानी LAHR के अंतर्गत आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसकी देखरेख पाकिस्तान के प्रभावशाली राजनीतिक परिवार और पंजाब सरकार के शीर्ष नेतृत्व के हाथों में है।
यहाँ प्रश्न उठता है कि जिस पाकिस्तान ने दशकों तक अपने ही इतिहास को मजहबी कट्टरता के रंग में रंगने की कोशिश की, वही पाकिस्तान अचानक बहुलतावाद और सांस्कृतिक विविधता का प्रवक्ता कैसे बन गया? जिस देश में विभाजन के बाद सुनियोजित तरीके से हिंदू, सिख और जैन पहचान वाले नाम मिटाए गए, मंदिर तोड़े गए, धार्मिक स्थलों पर कब्ज़े हुए और इतिहास को इस्लामी राष्ट्रवाद के अनुरूप ढाला गया, वही देश आज अचानक “साझी विरासत” की भाषा क्यों बोल रहा है?
सच्चाई यह है कि पाकिस्तान आज गंभीर वैश्विक छवि संकट से गुजर रहा है। आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, जबरन धर्मांतरण, ईशनिंदा कानूनों का दुरुपयोग और सेना-प्रेरित राजनीति ने पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता को लगातार कमजोर किया है। वर्षों से दुनिया पाकिस्तान को ऐसे देश के रूप में देखती रही है जिसने आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का उपकरण बनाया। ओसामा बिन लादेन का एबटाबाद में पाया जाना हो, संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकियों का खुलेआम घूमना हो या भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद — इन सबने पाकिस्तान की छवि को गहराई से प्रभावित किया है।
ऐसे में पाकिस्तान को यह समझ आ चुका है कि केवल सैन्य बयानबाज़ी और धार्मिक राष्ट्रवाद के आधार पर वह विश्व समुदाय में सम्मान नहीं पा सकता। इसलिए अब वह सांस्कृतिक उदारता और विरासत संरक्षण की भाषा का उपयोग करके अपनी कट्टरवादी छवि को नरम दिखाने का प्रयास कर रहा है। “लाहौर हेरिटेज रिवाइवल” इसी व्यापक छवि सुधार अभियान का हिस्सा प्रतीत होता है।
यदि पाकिस्तान वास्तव में सांस्कृतिक बहुलता और ऐतिहासिक न्याय के प्रति गंभीर होता, तो सबसे पहले वह अपने देश के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करता। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। पाकिस्तान में हिंदू, सिख, ईसाई और अहमदिया समुदाय लगातार असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और रिपोर्टों में यह चिंता लगातार व्यक्त की जाती रही है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को समान अधिकार व्यवहारिक रूप से प्राप्त नहीं हैं। ईशनिंदा कानूनों का दुरुपयोग अक्सर व्यक्तिगत दुश्मनी, धार्मिक उन्माद और सामाजिक दबाव के लिए किया जाता है। कई मामलों में केवल आरोप लगने भर से भीड़ हिंसक हो जाती है और कानून व्यवस्था मूक दर्शक बनी रहती है।
पाकिस्तान में जबरन धर्मांतरण का मुद्दा वर्षों से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है। विशेष रूप से सिंध प्रांत से हिंदू और सिख लड़कियों के अपहरण, धर्म परिवर्तन और निकाह के अनेक मामले सामने आते रहे हैं। आलोचकों का आरोप है कि पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था इस मुद्दे पर कठोर और स्पष्ट कानून बनाने से बचती रही है। यही कारण है कि पाकिस्तान जब सांस्कृतिक सहिष्णुता की बात करता है तो उस पर सहज विश्वास करना कठिन हो जाता है।
इतिहास भी पाकिस्तान की नीयत पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। विभाजन के समय पाकिस्तान में हिंदू और सिख आबादी उल्लेखनीय थी, लेकिन दशकों में यह संख्या तेजी से घटी। दूसरी ओर भारत में मुस्लिम आबादी निरंतर बढ़ी है और उन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। यह तुलना अक्सर दक्षिण एशिया की सामाजिक संरचना पर बहस का विषय बनती है। पाकिस्तान इस विषय पर कभी पारदर्शी राष्ट्रीय विमर्श खड़ा नहीं कर पाया कि आखिर उसके यहाँ धार्मिक अल्पसंख्यकों का विश्वास क्यों टूटा।
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि पाकिस्तान जिस बहुलतावादी विरासत को आज पुनर्जीवित करने का दावा कर रहा है, उसी विरासत को मिटाने का काम उसके भीतर दशकों तक चलता रहा। जिन नामों को आज “ऐतिहासिक पहचान” बताकर लौटाया जा रहा है, उन्हें पहले बदलने वाला कौन था? क्या वह भी पाकिस्तान की ही सत्ता संरचना नहीं थी? यदि पहले की नीति गलत थी तो क्या पाकिस्तान ने कभी आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि उसने सांस्कृतिक असहिष्णुता दिखाई थी? क्या उसने उन धार्मिक स्थलों और समुदायों के साथ हुए अन्याय पर कोई राष्ट्रीय आत्ममंथन किया? उत्तर स्पष्ट नहीं है। क्या इस अन्याय पर अल्पसंख्यकों से माफ़ी मांगी है.
भारत और पाकिस्तान की तुलना यहाँ स्वाभाविक रूप से सामने आती है। भारत में नाम परिवर्तन अक्सर ऐतिहासिक, भाषाई या सांस्कृतिक पहचान की पुनर्स्थापना के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। बंबई का मुंबई, मद्रास का चेन्नई, इलाहाबाद का प्रयागराज या औरंगाबाद का संभाजीनगर होना भारतीय समाज के भीतर लंबे समय से चल रही सांस्कृतिक बहसों का हिस्सा रहा है। इन परिवर्तनों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन भारत में यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक विमर्श, न्यायिक समीक्षा और सार्वजनिक बहस के बीच होती है। वहीं पाकिस्तान में सत्ता संरचना लंबे समय तक सैन्य प्रभाव और मजहबी राजनीति के दबाव में संचालित रही है। यही कारण है कि दोनों देशों की समान दिखने वाली प्रक्रियाओं को समान नैतिक संदर्भ में नहीं देखा जा सकता।
यह भी संभव है कि पाकिस्तान इस पहल का उपयोग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ वैचारिक प्रचार के लिए करे। वह यह दिखाने का प्रयास कर सकता है कि पाकिस्तान अपने “गैर-इस्लामी अतीत” को स्वीकार कर रहा है जबकि भारत कथित रूप से बहुलता से दूर जा रहा है। यह एक राजनीतिक नैरेटिव निर्माण की कोशिश हो सकती है। पाकिस्तान लंबे समय से वैश्विक मंचों पर चयनात्मक नैतिकता का उपयोग करता रहा है। कश्मीर पर मानवाधिकार की बातें करने वाला पाकिस्तान अपने ही देश में बलूच, पश्तून, सिंधी और अल्पसंख्यक समुदायों के प्रश्नों पर अक्सर कठोर रवैया अपनाता है। इसलिए उसके सांस्कृतिक उदारवाद के दावों को बिना जांचे स्वीकार करना गंभीर भूल होगी।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तान में कई पुराने नाम व्यवहारिक रूप से कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए थे। स्थानीय लोग आज भी लक्ष्मी चौक, कृष्ण नगर या धर्मपुरा जैसे नामों का प्रयोग करते रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सरकार अब केवल उन नामों को आधिकारिक रूप से पुनः मान्यता दे रही है जो जनता के बीच पहले से प्रचलित थे।
फिर भी, यह पहल एक महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ती है — क्या पाकिस्तान वास्तव में अपने अतीत से ईमानदार संवाद करने को तैयार है? यदि हाँ, तो उसे केवल नाम बदलने से आगे बढ़ना होगा। उसे अपने पाठ्यक्रमों में इतिहास का संतुलित चित्रण करना होगा। उसे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर कठोर कदम उठाने होंगे। उसे जबरन धर्मांतरण, ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग और धार्मिक उन्माद पर निर्णायक कार्रवाई करनी होगी। उसे यह साबित करना होगा कि उसकी सांस्कृतिक उदारता केवल बोर्ड बदलने तक सीमित नहीं है।
सिर्फ “राम गली” लिख देने से किसी समाज में राम के प्रति सम्मान पैदा नहीं हो जाता। “जैन मंदिर चौक” नाम वापस कर देने से धार्मिक सहिष्णुता स्थापित नहीं हो जाती। सांस्कृतिक पुनर्जागरण केवल प्रतीकों से नहीं आता, उसके लिए सामाजिक चेतना, संवैधानिक समानता और राजनीतिक ईमानदारी चाहिए। पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वहाँ प्रतीक और वास्तविकता के बीच विशाल दूरी है।
आज पाकिस्तान आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय अविश्वास से जूझ रहा है। ऐसे समय में “लाहौर हेरिटेज रिवाइवल” जैसी योजनाएँ उसकी सॉफ्ट इमेज बनाने का माध्यम भी बन सकती हैं। लेकिन विश्व समुदाय अब केवल प्रतीकों से प्रभावित होने वाला नहीं है। दुनिया यह देखती है कि किसी देश की वास्तविक नीतियाँ क्या हैं, वहाँ मानवाधिकारों की स्थिति कैसी है, अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित हैं और राज्य की संस्थाएँ कितनी निष्पक्ष हैं।
इसलिए लाहौर में पुराने नामों की वापसी को सांस्कृतिक दृष्टि से सकारात्मक कहा जा सकता है, लेकिन पाकिस्तान की नीयत पर सवाल उठाना भी उतना ही आवश्यक है। क्योंकि विश्वास केवल घोषणाओं से नहीं बनता, बल्कि इतिहास, व्यवहार और निरंतरता से बनता है। पाकिस्तान का इतिहास अभी तक ऐसा भरोसा पैदा नहीं करता कि वह रातों-रात उदार, बहुलतावादी और आत्मालोचन करने वाला राष्ट्र बन गया है।
यदि पाकिस्तान वास्तव में बदलना चाहता है तो उसे केवल शहरों के बोर्ड नहीं, अपनी सोच बदलनी होगी। उसे आतंकवाद की राजनीति छोड़नी होगी। उसे मजहबी कट्टरता से ऊपर उठना होगा। उसे अपने अल्पसंख्यकों को बराबरी का दर्जा देना होगा। उसे यह साबित करना होगा कि उसकी सांस्कृतिक पहल केवल विश्व मंच पर छवि चमकाने का उपकरण नहीं, बल्कि वास्तविक सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा है। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक “लाहौर हेरिटेज रिवाइवल” को लेकर संदेह बना रहेगा — और वह संदेह पाकिस्तान के अपने ही अतीत से पैदा हुआ है।
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