चीन की चाल, भारत की चुप्पी? शेरा-5 से गलवान तक की कड़वी हकीकत
शेरा-5 से गलवान तक भारत-चीन सीमा पर उठते गंभीर सवालों की पड़ताल। क्या रणनीतिक चुप्पी, बदलती जमीनी हकीकत और चीन की ‘सलामी स्लाइसिंग’ रणनीति भारत की सीमा सुरक्षा के लिए नई चुनौती बन रही है?
निमिषा सिंह
Correspondent Editor- Deshonnatti Maharashtra
आज़ादी के राष्ट्रीय पर्व के भाषणों और नारों का शोर थमते ही सरहदों की सुरक्षा से जुड़े असहज सवाल फिर सामने हैं। देश केवल नक्शे पर खिंची लकीर नहीं, बल्कि शून्य डिग्री में गश्त करते जवानों और सीमांत ग्रामीणों का अदम्य हौसला है। जब सामरिक चिंताएं हाशिए पर धकेल दी जाएं, तब इस सुविधाजनक खामोशी को तोड़कर ज़मीनी हकीकत का ईमानदार आत्ममंथन करना ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।
देश सिर्फ नक्शे पर बनी लकीर नहीं होता, वह उन आखिरी सरहदी गांवों में बसने वाले नागरिकों का हौसला और गश्त करते जवानों के कदमों के नीचे की मिट्टी होता है। आज जब सीमाओं से जुड़ी खबरें राष्ट्रीय विमर्श से लगभग गायब कर दी जाती हैं, तब यह जरूरी हो जाता है कि हम उस खामोशी को तोड़ें जो नीतिगत विफलता और रणनीतिक लापरवाही को देशभक्ति के शोर में छिपाने का काम करती रही है।
अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले का ताकसिंघ गांव, जो हमारे देश के सबसे दूरस्थ और सीमांत गांवों में से एक है, इन दिनों किसी बड़े बदलाव की गवाही दे रहा है। वहां से आगे जब आप बढ़ते हैं, तो सिर्फ दुर्गम चट्टानें, बर्फ और एक रणनीतिक चौकी दिखती है, जिसे सैन्य शब्दावली में 'शेरा-5' कहा जाता है। हाल ही में पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (पीपीए) की एक चार सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग टीम, जिसका नेतृत्व पूर्व मंत्री काफा बेंगिया कर रहे थे, ताकसिंघ, माज़ा और गोलेमु जैसे सीमावर्ती गांवों में पहुंची। स्थानीय ग्रामीणों, वरिष्ठ रक्षा कर्मियों और जवानों से लंबी बातचीत के बाद जो रिपोर्ट सामने आई, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। रिपोर्ट में दर्ज एक साधारण-सी पंक्ति पूरे देश की सुरक्षा नीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है—‘भारतीय सेना 2023 के टकराव के बाद से शेरा-5 पर वापस नहीं लौटी है।’ यह भी दावा किया गया कि वहां से भारतीय मार्करों को हटा दिया गया है और नंगा पहाड़ जैसी पारंपरिक जगहें, जहां सदियों से नाह और मारा समुदाय याक चराते और आजीविका तलाशते थे, अब प्रतिबंधित क्षेत्र बन चुकी हैं।
यह स्थिति किसी एक चौकी के हाथ से निकलने या खाली होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस वृहद रणनीतिक विफलता का संकेत है जिसे समझने के लिए हमें हालिया राजनीतिक बयानों के दायरे से बाहर निकलना होगा। रक्षा और गृह मंत्रालय में लंबे समय तक शीर्ष प्रशासनिक पदों पर रहे वरिष्ठ नेता आर. के. सिंह का यह सार्वजनिक सवाल कि 2014 के बाद से सरकार ने कितने पेट्रोलिंग पॉइंट्स छोड़े हैं और क्या प्रधानमंत्री की सहमति के बिना ऐसी रणनीतिक वापसी संभव है, हवा में उछाला गया कोई साधारण राजनीतिक बयान नहीं है। यह सीधे तौर पर सरकार की उस कार्यशैली को कटघरे में खड़ा करता है, जहां सीमाओं पर दबाव बढ़ने पर पारदर्शिता बरतने के बजाय चुप्पी साध ली जाती है। संसद भवन में विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री के बीच होने वाली गोपनीय बैठकें यह तो साबित करती हैं कि सरकार के भीतर चिंता की लहरें हैं, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर सब कुछ सामान्य दिखाने का जो पाखंड रचा जाता है, वह देशवासियों के साथ सबसे बड़ा धोखा है।
यदि हम इतिहास और कूटनीति के पन्नों को पलटें, तो यह समझ आता है कि सीमा पर पड़ोसियों के बीच की यह खींचतान कोई नई परिघटना नहीं है। लगभग तेईस सौ वर्ष पूर्व आचार्य चाणक्य ने अपने ‘अर्थशास्त्र’ में राजमंडल सिद्धांत का प्रतिपादन किया था, जिसका मूल तत्व यह है कि आपकी सीमा से सटा हुआ राज्य स्वाभाविक रूप से आपका प्रतिस्पर्धी होता है, क्योंकि भूमि, संसाधन और प्रभाव को लेकर टकराव अवश्यंभावी है। इसलिए सीमा नीति को किसी छिटपुट घटना के तौर पर नहीं, बल्कि एक सतत और दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए। पूर्व विदेश सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने अपनी पुस्तक ‘Choices: Inside the Making of India’s Foreign Policy’ में 1993 के बॉर्डर पीस एंड ट्रैंक्विलिटी एग्रीमेंट (BPTA) का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट लिखा है कि भारत-चीन सीमा प्रबंधन किसी स्पष्ट सीमांकन के आधार पर नहीं, बल्कि रणनीतिक अस्पष्टता और 'एम्बिग्युटी' के सहारे दशकों से चलाया जा रहा है। इसी अस्पष्टता का लाभ उठाकर चीन लगातार नए नाम गढ़ता है, नए बिंदु बनाता है और सीमा की यथास्थिति को अपनी सुविधा के अनुसार खिसकाता रहता है।
दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे देश में इस गंभीर सामरिक विषय को मुख्यधारा के मीडिया और राजनीतिक दलों द्वारा केवल 'भाजपा बनाम कांग्रेस' या 'पक्ष बनाम विपक्ष' के सतही आरोप-प्रत्यारोप में तब्दील कर दिया जाता है। जब भी कोई संकट आता है, तो एक तयशुदा पटकथा का मंचन शुरू हो जाता है—पहले सीमा पर कोई चिंताजनक घटना होती है, फिर सरकार पूरी तरह खामोश बैठ जाती है, उसके बाद एक आश्वस्त करने वाला आधिकारिक बयान जारी किया जाता है कि 'सब नियंत्रण में है', फिर जब विपक्षी दल या स्वतंत्र रिपोर्टर सवाल उठाते हैं, तो बयान की तोड़-मरोड़ कर सफाई दी जाने लगती है। पिछले नौ वर्षों में इस पटकथा को तीन बड़े घटनाक्रमों में हू-ब-हू दोहराया गया है।
पहला उदाहरण 2017 का डोकलाम विवाद है, जब चीनी सैनिकों ने भूटान और भारत के त्रिकोणीय क्षेत्र में सड़क निर्माण शुरू किया था। 73 दिनों के कड़े सैन्य गतिरोध के बाद जब दोनों पक्ष पीछे हटे, तो इसे सरकार ने एक ऐतिहासिक कूटनीतिक विजय के रूप में प्रचारित किया। लेकिन हकीकत यह रही कि उस तात्कालिक गतिरोध के समाप्त होने के बाद चीन ने पूरे इलाके में सड़कों, सैन्य बैरकों और लॉजिस्टिक्स के बुनियादी ढांचे का एक स्थायी जाल बिछा दिया। वह तथाकथित जीत महज़ एक अस्थायी विराम साबित हुई, जबकि चीन की दीर्घकालिक उपस्थिति मजबूत हो गई।
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दूसरा और सबसे त्रासद उदाहरण 2020 का गलवान घाटी संघर्ष है, जहां देश के बीस वीर जवानों ने अपनी शहादत दी। दशकों बाद हुए इस सबसे घातक खूनी टकराव के महज़ दो दिन बाद सर्वदलीय बैठक में देश के शीर्ष नेतृत्व ने यह बयान देकर सबको स्तब्ध कर दिया कि ‘ना वहां कोई हमारी सीमा में घुसा आया है, ना ही कोई घुसा हुआ है, ना ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्जे में है।’ इस बयान ने पूरे देश और विशेष रूप से शहीद जवानों के परिवारों को भ्रम में डाल दिया कि यदि कोई घुसा ही नहीं था, तो हमारे जवान किस जमीन की रक्षा करते हुए शहीद हुए? बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा स्पष्टीकरण जारी कर यह कहा गया कि बयान की गलत व्याख्या की गई है, लेकिन सच यह था कि उस बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के सामरिक दावे को कमजोर करने का ही काम किया।
तीसरा उदाहरण दिसंबर 2022 में अरुणाचल के तवांग स्थित यांग्त्से सेक्टर का है, जहां चीनी सैनिकों ने एक बार फिर एलएसी का उल्लंघन कर यथास्थिति बदलने की कोशिश की। संसद में रक्षा मंत्री ने यह कहकर देश को आश्वस्त किया कि किसी सैनिक की जान नहीं गई, लेकिन उसी सांस में यह भी स्वीकार किया कि चीनी सैनिकों ने एकतरफा अतिक्रमण का प्रयास किया था। संसद में जब भी इस पर खुली और सार्थक बहस की मांग की जाती है, तो सैनिकों के मनोबल की दुहाई देकर चर्चा के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं। सवाल यह है कि क्या सच बोलने और पारदर्शिता बरतने से सैनिकों का मनोबल गिरता है, या फिर उनकी कुर्बानियों और संघर्षों को राजनीतिक विमर्श से दबाने से?
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चीन की यह पूरी रणनीति दरअसल उस कूटनीतिक और सैन्य चाल का हिस्सा है जिसे विशेषज्ञ ‘सलामी स्लाइसिंग’ कहते हैं। यह कोई सीधा युद्ध नहीं है जिसमें तोपों की गूंज सुनाई दे, बल्कि यह धीरे-धीरे, टुकड़ों में जमीन हथियाने का खेल है। चीन इसे दो प्रमुख मोर्चों पर अंजाम दे रहा है। पहला, कंक्रीट की रणनीति यानी मॉडल सीमांत गांवों का निर्माण करना। वह सीमा के बिल्कुल करीब नागरिक बस्तियां बसाकर जमीन पर अपनी निर्विवाद मौजूदगी दर्ज कराता है ताकि सीधे सैन्य टकराव के बिना दावा पुख्ता हो जाए। दूसरा, ‘लॉफेयर’ यानी कानूनी और मनोवैज्ञानिक युद्ध। वह अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न हिस्सों के नाम बदलकर उन्हें अपने नक्शे में ‘जांगनान’ बताता है। हालांकि भारत का विदेश मंत्रालय इन दावों को हर बार सिरे से खारिज करता है, लेकिन जमीन पर भौतिक संरचनाओं के विस्तार को सिर्फ बयानों से रोक पाना असंभव है।
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यह शतरंज का कोई ऐसा खेल नहीं है जहाँ एक ही चाल में शह और मात हो जाती है, बल्कि यह वह चालबाज़ी है जहाँ प्रतिद्वंद्वी को धीरे-धीरे पीछे धकेला जाता है और जब तक वह संभलता है, तब तक ज़मीनी हकीकत बदल चुकी होती है। देश की संप्रभुता केवल चुनावी रैलियों में सीना ठोकने या सोशल मीडिया पर राष्ट्रवाद के नारे उछालने से सुरक्षित नहीं रह सकती। इसके लिए एक स्पष्ट, पारदर्शी और कठोर राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता होती है जिसमें अपनी गलतियों को स्वीकार करने और संसद को विश्वास में लेने का साहस हो।
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हम उस देश के वाशिंदे हैं जिसने अपनी एक-एक इंच जमीन के लिए पीढ़ियों का लहू बहाया है। सरहदों की हिफाजत केवल सीमा पर तैनात उस जवान की जिम्मेदारी नहीं है जो शून्य से नीचे के तापमान में बंदूक ताने खड़ा है, बल्कि यह संसद में बैठे नीति-नियंताओं और हम जैसे आम नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि हम सत्ता से कड़े और असहज सवाल पूछें। यदि हम आज ताकसिंघ, गलवान और शेरा-5 की हकीकत से आंखें मूंद लेंगे, तो आने वाला इतिहास हमारी इस चुप्पी को एक अक्षम्य अपराध के रूप में दर्ज करेगा। राष्ट्रभक्ति का तकाजा यही है कि सीमाओं की हर इंच ज़मीन का हिसाब माँगा जाए, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें कि जब देश की सरहदें खामोशी के साए में थीं, तब देश का विवेक जाग रहा था।
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