“देश की ‘सबसे बड़ी ताकत’... बैरिकेड के सामने खड़ा हुआ युवा?”
बेरोजगारी, पेपर लीक, अधूरी भर्तियों और बढ़ते ठेकाकरण के बीच जंतर-मंतर पर युवा आंदोलन ने सरकार की रोजगार नीति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ‘देश की सबसे बड़ी ताकत’ कहे जाने वाले युवाओं के सामने बैरिकेड क्यों हैं? यह लेख इसी विरोधाभास और टूटते भरोसे की पड़ताल करता है।
Writer- प्रकाश कमलताई गोपाळराव पोहरे
बेरोजगारी, पेपर लीक, ठेकाकरण और टूटे आश्वासनों के बीच जंतर-मंतर से उठती युवा आवाज
देश की राजधानी में घटने वाली हर घटना का एक राजनीतिक अर्थ होता है। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो केवल एक आंदोलन के दायरे में सीमित नहीं रहतीं; वे पूरी व्यवस्था को ही आईना दिखाती हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद की ओर निकले लाखों युवाओं के मार्च ने ऐसा ही एक आईना देश के सामने रखा है।
यह केवल विद्यार्थियों का मार्च नहीं था। यह बेरोजगारी, पेपर लीक, ठेकाकरण और टूटे हुए आश्वासनों के खिलाफ खड़ा हुआ असंतोष था।
मार्च की अनुमति नहीं थी। इसके बावजूद युवा संसद की ओर बढ़े। पुलिस ने बैरिकेड लगाए। लाठीचार्ज हुआ। संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन दिल्ली सचमुच पुलिस छावनी में बदल गई।
अपमान का शब्द और आंदोलन की पहचान
लेकिन इस आंदोलन की सबसे पीड़ादायक बात क्या है?
इन युवाओं को कुछ माध्यमों ने “कॉकरोच मूवमेंट” कहा। इस शब्द के पीछे एक न्यायालयीन टिप्पणी थी। सर्वोच्च न्यायालय में एक सुनवाई के दौरान बेरोजगार युवाओं और सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं के बारे में “कॉकरोच” और “परजीवी” जैसी उपमा का इस्तेमाल किया गया। अपमान करने के लिए इस्तेमाल किए गए इस शब्द को आंदोलनकारियों ने ही अपनी पहचान बना लिया।
इतिहास बताता है—जब सत्ता किसी समाज-घटक को अपमानित करती है, तो वही अपमान कभी-कभी आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीक बन जाता है।
लेकिन यह आक्रोश केवल एक शब्द के कारण नहीं हुआ। इसके पीछे एक दशक से जमा हुआ रोष है।
22 करोड़ आवेदन, केवल 7 लाख नौकरियां
सरकार द्वारा ही संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले आठ वर्षों में सरकारी नौकरियों के लिए 22 करोड़ आवेदन आए। उनमें से केवल 7 लाख उम्मीदवारों को नौकरी मिली।
इसका अर्थ क्या है?
सफलता का प्रतिशत 0.3 प्रतिशत से भी कम!
यह विपक्ष का आरोप नहीं है। यह सरकार का आधिकारिक आंकड़ा है।
इस आंकड़े को देखने के बाद एक सवाल सामने आता है—देश में नौकरियों की कमी है, या भर्ती प्रक्रिया की इच्छाशक्ति ही कमजोर पड़ रही है?
इसमें और इजाफा करता है पेपर लीक का रैकेट।
देश के विभिन्न राज्यों में भर्ती परीक्षाएं बार-बार रद्द हो रही हैं। लाखों युवा वर्षों तक पढ़ाई करते हैं, परीक्षा देते हैं; लेकिन परिणाम नहीं आता, भर्ती अटक जाती है या पेपर लीक होने के कारण पूरी प्रक्रिया रद्द कर दी जाती है।
इससे पैदा हुई भावना को एक वाक्य में व्यक्त किया जा सकता है—
“परीक्षा होगी... लेकिन परिणाम नहीं आएगा। परिणाम नहीं आया तो नौकरी देनी नहीं पड़ेगी।”
यह वाक्य केवल व्यंग्य नहीं है; यह लाखों बेरोजगारों के मन में पैदा हुआ डर है।
‘देश की सबसे बड़ी ताकत’ और बैरिकेड
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री एक भाषण में भारत के 70 करोड़ युवाओं को “देश की सबसे बड़ी ताकत” कहते हैं। भारत दुनिया को मानव संसाधन उपलब्ध कराने वाला सबसे बड़ा देश बनेगा, ऐसा कहते हैं।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्हीं युवाओं को संसद की ओर जाते समय बैरिकेड, लाठियों और आंसू गैस का सामना करना पड़ता है।
यह विरोधाभास बेचैन करने वाला है।
युवाओं को “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहना और रोजगार मांगने के लिए जब वे सड़कों पर उतरें तो उन्हें कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखना?
इन दो तस्वीरों के बीच केवल कुछ दिनों का अंतर है; लेकिन इस अंतर ने सरकार की रोजगार नीति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
रोजगार के आंकड़े बनाम नौकरी की सुरक्षा
हालांकि, इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है। सरकार का दावा है कि रोजगार बढ़े हैं, बेरोजगारी कम हुई है और अर्थव्यवस्था अधिक औपचारिक हो रही है।
तो आखिर सच क्या है?
आंकड़े गलत हैं, या आंकड़ों के अर्थ को लेकर लड़ाई शुरू हो गई है?
आज का मूलभूत सवाल यह है कि सरकार रोजगार पैदा कर रही है या स्थायी नौकरियों की जगह कंत्राटी रोजगार की व्यवस्था खड़ी कर रही है?
सरकार का कहना है कि रोजगार बढ़े हैं। श्रम मंत्रालय ने संसद में और विभिन्न मंचों पर रोजगार सृजन के आंकड़े भी प्रस्तुत किए हैं। सरकार के अनुसार, बेरोजगारी की दर कम हुई है और देश में करोड़ों रोजगार पैदा हुए हैं।
इन आंकड़ों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन यहीं से चर्चा का असली मुद्दा शुरू होता है।
रोजगार और सुरक्षित, सम्मानजनक, स्थायी नौकरी—ये दो अलग-अलग चीजें हैं।
यदि कोई युवा चार महीने, छह महीने या एक वर्ष के अनुबंध पर काम कर रहा है, उसे भविष्य निधि नहीं है, पेंशन नहीं है, नौकरी की गारंटी नहीं है, तो सरकारी आंकड़ों में उसे “रोजगार प्राप्त व्यक्ति” के रूप में गिना जाता है। लेकिन उसके जीवन की सुरक्षा फिर भी शून्य ही रहती है।
अग्निपथ और युवाओं की नौकरी की सुरक्षा
यहीं पर अग्निपथ योजना चर्चा का केंद्रबिंदु बन जाती है।
सरकार का दावा है कि इस योजना के कारण भारतीय सेना अधिक युवा, अधिक गतिशील और तकनीक के अनुकूल बनेगी। बढ़ते पेंशन खर्च पर नियंत्रण मिलेगा और आधुनिक हथियारों के लिए अधिक धन उपलब्ध हो सकेगा।
इस तर्क का कुछ अर्थशास्त्रियों और रक्षा विशेषज्ञों का समर्थन भी है।
उनका कहना है कि यदि रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा पेंशन पर ही खर्च होता रहेगा, तो आधुनिक युद्ध के लिए आवश्यक तकनीक, अनुसंधान और अत्याधुनिक हथियारों में निवेश कैसे होगा?
यह सवाल वाजिब है।
लेकिन इसी सवाल के सामने एक दूसरा सवाल भी उतनी ही मजबूती से खड़ा होता है।
देश के आर्थिक दबाव का बोझ हमेशा युवाओं की नौकरी की सुरक्षा पर ही क्यों डाला जाता है?
अग्निवीर चार वर्ष तक सेवा करेगा; लेकिन उसके बाद उनमें से अधिकांश फिर से रोजगार के बाजार में लौटेंगे। उनके पास अनुभव होगा; लेकिन स्थायी सेवा, पेंशन और दीर्घकालीन सुरक्षा नहीं होगी।
यह केवल सेना तक सीमित सवाल नहीं है।
रेलवे, बैंक, सार्वजनिक उपक्रम, विश्वविद्यालय, स्वास्थ्य सेवाएं, स्थानीय स्वराज्य संस्थाएं—अनेक स्थानों पर नियमित भर्ती के बजाय आउटसोर्सिंग, संविदा कर्मचारी और तृतीय पक्ष के माध्यम से भर्ती की व्यवस्था तेजी से बढ़ती हुई दिखाई दे रही है।
सरकार की दृष्टि से यह खर्च कम करने का एक रास्ता है।
लेकिन युवाओं की दृष्टि से यह भविष्य को असुरक्षित करने का रास्ता है।
यही अंतर जंतर-मंतर पर दिखाई दिया।
शिक्षा और बढ़ता आर्थिक बोझ
शिक्षा क्षेत्र में भी ऐसी ही स्थिति दिखाई देती है।
2017 में स्थापित हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी (एचइएफए) के माध्यम से सरकारी विश्वविद्यालयों को अनुदान के बजाय ऋण देने की व्यवस्था शुरू हुई। सरकार का तर्क था कि इससे विश्वविद्यालय अधिक जवाबदेह बनेंगे। लेकिन वास्तविकता में अनेक विश्वविद्यालयों ने इस ऋण का बोझ विद्यार्थियों पर शुल्क वृद्धि के रूप में डाला, ऐसी आलोचना लगातार होती रही है।
देश के अनेक केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी और आईआईएम में हुई शुल्क वृद्धि के विरोध में हुए आंदोलनों में यह मुद्दा प्रमुखता से सामने आया। इससे एक नई वास्तविकता उभरकर सामने आती है।
पहले सरकार अनुदान देती थी; अब ऋण देती है।
पहले नौकरी स्थायी होती थी; अब संविदा पर है।
पहले पेंशन एक अधिकार थी; अब वह अपवाद बनती जा रही है।
यह केवल आर्थिक बदलाव नहीं है; बल्कि राज्य की भूमिका में आया एक मूलभूत परिवर्तन है।
सवाल सरकार के सामने भी, व्यवस्था के सामने भी
बेशक, सरकार का पक्ष पूरी तरह खारिज करना भी उचित नहीं होगा। बढ़ती आबादी, सीमित राजस्व, रक्षा व्यय, बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और सामाजिक योजनाओं पर बढ़ता दबाव—इन सभी का सरकार को विचार करना ही होगा।
लेकिन सवाल केवल इतना है—
क्या इन तमाम आर्थिक समस्याओं का समाधान केवल युवाओं की नौकरियों को असुरक्षित बनाने में ही है? या इसके लिए अधिक दूरदर्शी, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक संतुलित विकल्प तलाशे जा सकते हैं?
जंतर-मंतर पर लगे नारों में यह सवाल स्पष्ट रूप से सुनाई दे रहा था।
युवा नौकरी नहीं, विश्वास मांग रहा है
युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहे थे।
वे विश्वास मांग रहे थे।
यह विश्वास—कि पढ़ाई की है तो परीक्षा होगी।
परीक्षा हुई तो परिणाम आएगा।
परिणाम आया तो भर्ती होगी।
और भर्ती हुई तो जीवन खड़ा करने लायक सुरक्षित नौकरी मिलेगी।
यदि यही विश्वास डगमगा गया, तो सड़कों पर उतरने वाले युवा किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं, बल्कि खतरे की घंटी होते हैं।
लोकतंत्र में हर आंदोलन सफल होगा ही, ऐसा नहीं है। हर मांग स्वीकार की जाएगी, ऐसा भी नहीं है। लेकिन हर बड़ा आंदोलन सत्ताधारियों से एक सवाल जरूर पूछकर जाता है। उस सवाल को नजरअंदाज किया गया, तो इतिहास उसकी कीमत वसूल करता है।
दिल्ली का इतिहास और संसद की ओर उठते कदम
दिल्ली ने यह इतिहास कई बार देखा है।
7 नवंबर 1966.....
संसद का सत्र चल रहा था। दिल्ली की सड़कों पर लाखों लोगों की भीड़ उतर आई थी। गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर हुए इस आंदोलन में नागा साधु अग्रिम पंक्ति में थे। हाथों में त्रिशूल, तलवारें और गदाएं लेकर संसद की ओर कूच किया गया। बैरिकेड तोड़े गए। संसद परिसर में तनाव पैदा हो गया। पुलिस ने गोलीबारी की। इसमें जान-माल का नुकसान हुआ। सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया।
उस आंदोलन का स्वरूप धार्मिक था।
आज के जंतर-मंतर आंदोलन का स्वरूप आर्थिक और प्रशासनिक है।
दोनों की तुलना करना उचित नहीं होगा।
लेकिन इतिहास एक बात सिखाता है—
दिल्ली की सड़कों पर खड़ा हुआ जनक्षोभ, संसद की दीवारों के बाहर हमेशा के लिए नहीं रुकता। उसके राजनीतिक प्रभाव देर-सवेर सामने आते ही हैं।
आज सड़कों पर साधु नहीं हैं।
आज सड़क पर देश का युवा है।
हाथ में त्रिशूल नहीं है।
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हाथ में डिग्री का प्रमाणपत्र है।
हाथ में तलवार नहीं है।
हाथ में प्रतियोगी परीक्षा का प्रवेशपत्र है।
हाथ में गदा नहीं है।
हाथ में पेपर लीक के कारण रद्द हुई परीक्षा का हॉल टिकट है।
यह तस्वीर किसी भी संवेदनशील सरकार को बेचैन करने वाली होनी चाहिए।
11 जून को देश के युवाओं को “भारत की सबसे बड़ी ताकत” कहा जाता है।
और कुछ ही सप्ताह में वही ताकत संसद की ओर जाते समय पुलिस के बैरिकेड के सामने खड़ी कर दी जाती है।
यह केवल विरोधाभास नहीं है।
यह विश्वासघात होने की भावना पैदा करने वाला प्रसंग है।
युवा पूछता है—मेरे जीवन की सजा मुझे क्यों?
आज का युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा है।
वह न्यायपूर्ण अवसर मांग रहा है।
वह पूछता है—
मैंने पढ़ाई की।
प्रतियोगी परीक्षा दी।
पेपर लीक हुआ, उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं था।
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भर्ती रुकी, उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं था।
वर्षों तक प्रक्रिया लंबित रही, उसके लिए भी मैं जिम्मेदार नहीं था।
फिर मेरे जीवन की सजा मुझे क्यों?
यह सवाल केवल सरकार तक सीमित नहीं है।
यह सवाल पूरी प्रशासनिक व्यवस्था से है।
आज भारत में रोजगार पर चर्चा होती है।
लेकिन रोजगार की गुणवत्ता पर चर्चा कम होती है।
आंकड़े बताते हैं कि रोजगार बढ़े।
युवा कहता है—सुरक्षित भविष्य कम हो गया।
सरकार कहती है—अर्थव्यवस्था बढ़ रही है।
युवा पूछता है—मेरा जीवन कब संभलेगा?
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यही वास्तविक खाई है।
आंकड़ों और अनुभवों के बीच लोकतंत्र
लोकतंत्र में सरकार के पास आंकड़े होते हैं।
लेकिन जनता के पास अनुभव होते हैं।
चुनाव अक्सर आंकड़ों पर जीते जाते हैं; लेकिन जनमत अनुभवों से बनता है।
जंतर-मंतर के आंदोलन ने यही दिखाकर दिया है।
यह आंदोलन सरकार गिराएगा या नहीं, यह अलग सवाल है।
लेकिन यह सरकार को सावधान करेगा, इसमें कोई संदेह नहीं।
क्योंकि इतिहास बताता है—
सत्ता अक्सर विरोधियों से पराजित नहीं होती।
वह जनता की अपेक्षाओं को समझने में विफल रहने के कारण पराजित होती है।
आज का युवा सड़क पर है।
कल वह मतदान केंद्र में होगा।
और लोकतंत्र में लाठी से अधिक शक्तिशाली मतपत्र होता है।
सरकार ने इस आंदोलन को केवल कानून और व्यवस्था का प्रश्न माना, तो यह उसकी भूल होगी।
क्योंकि यह भीड़ किराए पर लाई हुई नहीं थी।
यह भीड़ किसी एक दल की नहीं थी।
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यह भीड़ थी—
अधूरी भर्तियों की...
रद्द हुई परीक्षाओं की...
पेपर लीक की...
कंत्राटी नौकरियों की...
और टूटे हुए आश्वासनों की।
आश्वासन नहीं, विश्वास की गारंटी
आज सरकार के सामने चुनाव है।
युवाओं को आश्वासनों की भाषा सुनानी है या विश्वास की गारंटी देनी है?
क्योंकि देश का भविष्य केवल “डेमोग्राफिक डिविडेंड” जैसे भाषणों से नहीं बनता।
वह बनता है—
समय पर होने वाली भर्तियों से...
पारदर्शी परीक्षाओं से...
कौशल को न्याय देने वाली व्यवस्था से...
और युवाओं के भविष्य को सुरक्षा देने वाली नीतियों से।
अन्यथा जंतर-मंतर पर नारे थम जाएं, फिर भी सवाल नहीं रुकेंगे।
इतिहास बताता है—
संसद की ओर निकला हर मार्च संसद नहीं जीतता; लेकिन वह जनमत की दिशा अवश्य बदल देता है।
आज की इस आवाज को सरकार ने विरोधियों की आवाज के रूप में नहीं, बल्कि देश की भावी पीढ़ी की चेतावनी के रूप में सुना, तो अभी भी देर नहीं हुई है।
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