"क्या मच्छर अब रिपेलेंट से नहीं डरते? Google की करोड़ों बैक्टीरिया-युक्त मच्छर छोड़ने की योजना ने मचाई हलचल"
Journal of Experimental Biology की नई रिसर्च में मच्छरों के व्यवहार को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। वहीं Google की सहयोगी कंपनी करोड़ों Wolbachia बैक्टीरिया-युक्त मच्छर छोड़ने की अनुमति मांग रही है। जानिए इसके पीछे का विज्ञान, फायदे, जोखिम और पूरी कहानी।
Sudhir Taliyan
Chaudhary- Talan Khap
Google करोड़ों बैक्टीरिया-युक्त मच्छर छोड़ना चाहता है?
मच्छरों के खिलाफ इंसानों की लड़ाई का नया अध्याय
हर गर्मी और बरसात के मौसम में एक दुश्मन फिर लौट आता है — मच्छर। डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, जीका और वेस्ट नाइल वायरस जैसी बीमारियों के पीछे यही छोटे से जीव सबसे बड़े वाहक माने जाते हैं। दुनिया भर में हर साल करोड़ों लोग मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का शिकार होते हैं।
दशकों से इंसान मच्छरों को भगाने के लिए DEET जैसे रिपेलेंट, कॉइल, स्प्रे, लिक्विड वेपराइजर और मच्छरदानियों का इस्तेमाल करता रहा है। लेकिन अब वैज्ञानिकों के सामने एक नया सवाल खड़ा हो गया है — क्या मच्छर इन रिपेलेंट्स के “आदी” होते जा रहे हैं?
इसी बीच एक और खबर ने दुनिया का ध्यान खींचा है। Google की पैरेंट कंपनी Alphabet की लाइफ साइंस यूनिट Verily ने अमेरिका में करोड़ों विशेष बैक्टीरिया-युक्त मच्छर छोड़ने की अनुमति मांगी है। उद्देश्य है मच्छरों की आबादी को कम करना और खतरनाक बीमारियों को रोकना।
क्या ये दोनों घटनाएं आपस में जुड़ी हुई हैं? क्या इंसान अब मच्छरों के खिलाफ नई रणनीति अपनाने जा रहा है?
आइए समझते हैं।
जब मच्छर रिपेलेंट को पहचानने लगे
हाल ही में Journal of Experimental Biology में प्रकाशित एक शोध ने वैज्ञानिक समुदाय को चौंका दिया। अध्ययन में पाया गया कि कुछ परिस्थितियों में मच्छर DEET जैसे लोकप्रिय रिपेलेंट को भोजन से जोड़कर सीख सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में मच्छरों को ऐसी स्थिति में रखा जहां उन्हें गर्म रक्त और DEET की गंध एक साथ महसूस हुई। बाद में देखा गया कि लगभग 60 प्रतिशत मच्छर DEET की गंध की ओर आकर्षित होने लगे।
यह सुनने में किसी साइंस-फिक्शन कहानी जैसा लगता है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यह “लर्निंग बिहेवियर” है, न कि पूरी तरह विकसित प्रतिरोध (Resistance)।
सरल भाषा में कहें तो मच्छर यह सीख सकते हैं कि किसी खास गंध के आसपास भोजन मिलने की संभावना है।
क्या इसका मतलब है कि रिपेलेंट बेकार हो गए?
बिल्कुल नहीं।
शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि DEET सामान्य परिस्थितियों में अभी भी प्रभावी है। यह प्रभाव मुख्य रूप से नियंत्रित लैब प्रयोगों में देखा गया है। वास्तविक जीवन में मच्छरों को कई प्रकार की गंध, तापमान और पर्यावरणीय संकेत मिलते हैं, इसलिए उनका व्यवहार अधिक जटिल होता है।
फिर भी यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण संकेत देता है।
यदि मच्छर सीख सकते हैं, अनुकूलित हो सकते हैं और समय के साथ कुछ रसायनों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया बदल सकते हैं, तो भविष्य में केवल रिपेलेंट पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा।
प्रतिरोध की समस्या पहले से मौजूद है
असल में यह पहली बार नहीं है जब वैज्ञानिकों ने मच्छरों की अनुकूलन क्षमता पर चिंता जताई हो।
कई अध्ययनों में पाया गया है कि मच्छरों की कुछ प्रजातियों में कीटनाशकों और कुछ रासायनिक रिपेलेंट्स के प्रति प्रतिक्रिया बदल रही है। विशेष रूप से मलेरिया फैलाने वाले Anopheles mosquitoes में कीटनाशक प्रतिरोध एक बड़ी समस्या बन चुका है।
इसका मतलब यह नहीं कि सारे रिपेलेंट बेकार हो चुके हैं, बल्कि यह कि मच्छर और इंसान के बीच एक जैविक “हथियारों की दौड़” चल रही है।
हम नई तकनीक बनाते हैं।
मच्छर धीरे-धीरे उसके खिलाफ अनुकूलन विकसित करने की कोशिश करते हैं।
फिर वैज्ञानिक नई तकनीक विकसित करते हैं।
और यही चक्र चलता रहता है।
यहीं से शुरू होती है Google की कहानी
जब रसायनों की सीमाएं सामने आने लगीं, तब वैज्ञानिकों ने सोचना शुरू किया कि क्या मच्छरों को मारे बिना उनकी आबादी कम की जा सकती है?
इसी सोच से जन्म हुआ Verily के “Debug Project” का।
Verily, Alphabet समूह की एक लाइफ साइंस कंपनी है। हाल ही में उसने अमेरिका की Environmental Protection Agency (EPA) से अनुमति मांगी है कि वह कैलिफोर्निया और फ्लोरिडा में लगभग 3.2 करोड़ विशेष मच्छर छोड़े।
पहली नजर में यह खबर डरावनी लग सकती है।
लेकिन असल कहानी थोड़ी अलग है।
ये मच्छर आखिर हैं क्या?
इन मच्छरों में Wolbachia नामक एक प्राकृतिक बैक्टीरिया मौजूद होता है। यह बैक्टीरिया दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत कीटों में पाया जाता है और वैज्ञानिकों के अनुसार यह मनुष्यों या जानवरों को बीमार नहीं करता।
महत्वपूर्ण बात यह है कि छोड़े जाने वाले मच्छर केवल नर (Male) होंगे। नर मच्छर इंसानों को नहीं काटते।
जब ये नर मच्छर जंगली मादा मच्छरों से प्रजनन करते हैं, तो अंडे विकसित नहीं हो पाते और अगली पीढ़ी पैदा नहीं होती। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे उस क्षेत्र में मच्छरों की आबादी कम होने लगती है।
क्या ये जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) मच्छर हैं?
यह सबसे बड़ा भ्रम है।
CDC के अनुसार Wolbachia वाले मच्छर जेनेटिकली मॉडिफाइड नहीं हैं। इनमें केवल एक प्राकृतिक बैक्टीरिया का उपयोग किया जाता है।
हालांकि दुनिया के कुछ हिस्सों में GM मच्छरों पर भी प्रयोग हुए हैं, लेकिन Verily की मौजूदा योजना मुख्य रूप से Wolbachia तकनीक पर आधारित बताई जा रही है।
क्या यह तकनीक पहले सफल हुई है?
हाँ।
Verily के पुराने परीक्षणों में कुछ क्षेत्रों में मादा मच्छरों की आबादी में 90 प्रतिशत से अधिक कमी दर्ज की गई थी। सामुदायिक रिपोर्टों और परीक्षणों के अनुसार Wolbachia-आधारित कार्यक्रमों ने कई स्थानों पर सकारात्मक परिणाम दिखाए हैं।
इसी सफलता के कारण अब बड़े पैमाने पर प्रयोग की बात हो रही है।
लेकिन सवाल भी कम नहीं हैं
हर नई तकनीक अपने साथ सवाल लेकर आती है।
आलोचकों का कहना है कि किसी भी जीव की आबादी में बड़े स्तर पर हस्तक्षेप करने से पहले दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों का गहराई से अध्ययन होना चाहिए।
कुछ वैज्ञानिकों ने यह भी कहा है कि मच्छरों की पारिस्थितिकी बेहद जटिल है। यदि किसी प्रजाति की संख्या तेजी से घटती है तो उसके अप्रत्यक्ष प्रभावों को समझना जरूरी होगा।
हालांकि स्वास्थ्य एजेंसियों का तर्क है कि जिन मच्छरों को निशाना बनाया जा रहा है वे मुख्य रूप से बीमारी फैलाने वाली प्रजातियां हैं और उनका नियंत्रण सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकता है।
भविष्य की लड़ाई: रसायन बनाम जैविक नियंत्रण
आज दुनिया दो समानांतर रास्तों पर चल रही है।
पहला रास्ता है रासायनिक नियंत्रण — स्प्रे, रिपेलेंट, कीटनाशक और मच्छरदानी।
दूसरा रास्ता है जैविक नियंत्रण — Wolbachia, स्टेराइल मच्छर तकनीक, जीन आधारित हस्तक्षेप और पर्यावरणीय प्रबंधन।
संभव है कि भविष्य में इन दोनों का मिश्रण ही सबसे प्रभावी रणनीति साबित हो।
केवल स्प्रे से समस्या हल नहीं होगी।
केवल बैक्टीरिया-युक्त मच्छरों से भी नहीं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब “इंटीग्रेटेड वेक्टर मैनेजमेंट” की बात कर रहे हैं, जिसमें कई तकनीकों को साथ इस्तेमाल किया जाता है।
सोशल मीडिया का डर बनाम विज्ञान की वास्तविकता
Google द्वारा करोड़ों मच्छर छोड़ने की खबर वायरल होते ही सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे वैज्ञानिक उपलब्धि बताया, तो कुछ ने संभावित खतरे की आशंका जताई।
लेकिन किसी भी वायरल दावे को स्वीकार करने से पहले यह समझना जरूरी है कि परियोजना अभी नियामक समीक्षा के चरण में है और इसके लिए सरकारी अनुमति आवश्यक है।
विज्ञान में हर नई तकनीक को व्यापक परीक्षण, निगरानी और मूल्यांकन से गुजरना पड़ता है।
निष्कर्ष
मच्छरों के खिलाफ इंसानों की लड़ाई अब केवल स्प्रे और कॉइल तक सीमित नहीं रही। Journal of Experimental Biology का नया अध्ययन संकेत देता है कि मच्छरों का व्यवहार हमारी अपेक्षा से अधिक जटिल और सीखने योग्य हो सकता है।
दूसरी ओर, Google की सहयोगी कंपनी Verily द्वारा Wolbachia-युक्त मच्छरों की योजना दिखाती है कि विज्ञान अब समस्या को जड़ से नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।
आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि क्या जैविक तकनीकें मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बनेंगी।
एक बात तय है—
मच्छर छोटे हैं, लेकिन उनके खिलाफ चल रही वैज्ञानिक जंग मानव इतिहास की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य लड़ाइयों में से एक बन चुकी है।
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