बापू के व्रत पर आजीवन अडिग रहे शुभकरण बाबू: गांधीवादी जीवन, सेवा और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरक गाथा

गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी शुभकरण चूड़ीवाला का जीवन त्याग, सेवा, स्वदेशी और राष्ट्रनिर्माण की अद्भुत मिसाल है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर भूदान, राहत कार्यों, शिक्षा और सामाजिक संस्थाओं के निर्माण तक गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों को आजीवन जिया। यह लेख उनके प्रेरक व्यक्तित्व और विरासत का विस्तृत परिचय है।

बापू के व्रत पर आजीवन अडिग रहे शुभकरण बाबू: गांधीवादी जीवन, सेवा और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरक गाथा

कुमार कृष्णन

इतिहास केवल उन लोगों को याद नहीं रखता जिन्होंने सत्ता हासिल की, बल्कि उन्हें भी याद रखता है जिन्होंने सत्ता से दूरी बनाकर समाज की आत्मा को बचाए रखा। स्वतंत्रता आंदोलन की विराट कथा में ऐसे अनेक नाम हैं जो राष्ट्रीय स्मृति के हाशिये पर चले गए, जबकि उनके बिना उस आंदोलन की नैतिक ऊँचाई की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भागलपुर के गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी शुभकरण चूड़ीवाला ऐसे ही व्यक्तित्व थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया, जेल गए, भूमिगत रहे, अपनी संपत्ति और श्रम राष्ट्रहित में समर्पित किया, लेकिन स्वतंत्रता के बाद कभी सत्ता, पद या प्रतिष्ठा की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ीं। उनके लिए आज़ादी कोई राजनीतिक उपलब्धि नहीं थी; वह मनुष्य और समाज के नैतिक पुनर्निर्माण का अवसर थी।

आज जब राजनीति सेवा से अधिक सत्ता का पर्याय बनती जा रही है, जब सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की जगह अवसरवाद और उपभोग की संस्कृति ने ले ली है, तब शुभकरण बाबू का जीवन हमें गांधी की उस मूल चेतना की याद दिलाता है जिसमें संघर्ष और रचना एक-दूसरे के पूरक थे। गांधी कहते थे कि केवल अंग्रेजों को हटाने से भारत स्वतंत्र नहीं होगा; स्वतंत्रता तब सार्थक होगी जब भारतीय समाज अपने भीतर की बुराइयों, असमानताओं और निर्भरता से भी मुक्त होगा। शुभकरण बाबू ने इस विचार को भाषणों में नहीं, बल्कि अपने पूरे जीवन में जीकर दिखाया।

बीसवीं सदी के दूसरे दशक में भारतीय राजनीति निर्णायक मोड़ पर थी। 1919 का रॉलेट एक्ट औपनिवेशिक शासन के दमनकारी चरित्र का सबसे स्पष्ट उदाहरण था। बिना मुकदमे गिरफ्तारी, बिना अपील सज़ा और बिना न्यायिक प्रक्रिया के दमन—यह कानून केवल नागरिक अधिकारों का नहीं, मनुष्य की गरिमा का भी अपमान था। महात्मा गांधी ने इसके विरुद्ध सत्याग्रह का आह्वान किया और पूरे देश में पहली बार व्यापक जनप्रतिरोध की चेतना विकसित हुई। उसी वर्ष जलियांवाला बाग का नरसंहार हुआ। अंग्रेजी शासन की क्रूरता ने लाखों भारतीयों को भीतर तक झकझोर दिया। रविन्द्रनाथ ठाकुर ने 'सर' की उपाधि लौटाकर यह स्पष्ट कर दिया कि सम्मान से बड़ा स्वाभिमान होता है।

इन्हीं उथल-पुथल भरे वर्षों में गांधी का 1920 में भागलपुर आगमन हुआ। टिल्हा कोठी की ऐतिहासिक सभा में उन्होंने राजनीतिक स्वतंत्रता से अधिक आर्थिक स्वावलंबन, स्वदेशी, चरखा, नैतिक अनुशासन, अस्पृश्यता उन्मूलन और सामाजिक पुनर्निर्माण पर बल दिया। उनके शब्दों में केवल भाषण का आकर्षण नहीं था; वह जीवन बदल देने वाली नैतिक शक्ति थी। सभा में उपस्थित युवा व्यापारी शुभकरण चूड़ीवाला ने वहीं विदेशी वस्त्रों की होली जलाई और स्वदेशी का ऐसा व्रत लिया जिसे उन्होंने जीवन की अंतिम सांस तक नहीं छोड़ा।

यहीं से शुभकरण बाबू का दूसरा जन्म आरंभ हुआ। व्यापारी परिवार का यह युवक धीरे-धीरे गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों का कर्मयोगी बन गया। उसने समझ लिया कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं होगी; उसके लिए समाज के भीतर आत्मनिर्भरता, श्रम की प्रतिष्ठा, नैतिक साहस और सामुदायिक चेतना भी विकसित करनी होगी।

22 नवंबर 1898 को भागलपुर के एक प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार में जन्मे शुभकरण बाबू का जीवन बचपन से ही संघर्षों से घिरा रहा। तीन वर्ष की आयु में पिता का निधन हो गया। उनका पालन-पोषण गोरखपुर में नाना और मामा के संरक्षण में हुआ। महाजनी शिक्षा प्राप्त करते हुए भी उनका मन केवल व्यापार में नहीं लगा। किशोरावस्था से ही सामाजिक कार्यों के प्रति उनका झुकाव स्पष्ट दिखाई देने लगा। बाद में यही संवेदनशीलता उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा तक ले गई।

उत्तर प्रदेश में बाबू शिवप्रसाद गुप्त, महामना मदनमोहन मालवीय, पुरुषोत्तमदास टंडन, आचार्य नरेंद्र देव, संपूर्णानंद और हनुमान प्रसाद पोद्दार जैसे राष्ट्रनिर्माताओं का सान्निध्य मिला। भागलपुर लौटने पर दीपनारायण सिंह, पटल बाबू, प्रभुदयाल हिम्मतसिंहका, रामेश्वर नारायण अग्रवाल और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ उनका गहरा संबंध बना। धीरे-धीरे उनका घर केवल एक निजी आवास नहीं रहा; वह राष्ट्रीय आंदोलन का विश्वासपात्र केंद्र बन गया, जहाँ योजनाएँ बनती थीं, आंदोलनकारियों को आश्रय मिलता था और राष्ट्र के भविष्य पर गंभीर चर्चाएँ होती थीं।

गांधी का प्रभाव उनके भीतर केवल राजनीतिक प्रतिरोध तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने खादी अपनाई, चरखे को सम्मान दिया, भंगी-मुक्ति आंदोलन से जुड़े, अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान चलाया और समाज-सुधार को स्वतंत्रता आंदोलन का अभिन्न हिस्सा माना। 1923 में उन्होंने मारवाड़ी सुधार समिति के गठन में अग्रणी भूमिका निभाई। यह संस्था केवल समुदाय की संस्था नहीं थी; यह सामाजिक जागरण का मंच थी। 1938 में इसी पहल से मारवाड़ी व्यायामशाला की स्थापना हुई, क्योंकि उनका विश्वास था कि राष्ट्र को ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जिनके शरीर में शक्ति, मन में अनुशासन और चरित्र में सेवा का संस्कार हो।

शुभकरण बाबू का जीवन इस बात का प्रमाण है कि गांधीवाद केवल राजनीतिक विचारधारा नहीं, बल्कि जीवन की संपूर्ण साधना है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को केवल अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष नहीं माना, बल्कि मनुष्य के भीतर बैठे स्वार्थ, भय, भेदभाव और नैतिक पतन के विरुद्ध भी एक सतत अभियान समझा। शायद यही कारण है कि वे स्वतंत्रता सेनानी भर नहीं, बल्कि गांधी के रचनात्मक भारत के जीवंत प्रतिनिधि बनकर उभरे।

स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल जेल यात्राओं और आंदोलनों का इतिहास नहीं है। वह उन असंख्य अनाम सेवकों का भी इतिहास है जिन्होंने संकट की हर घड़ी में समाज के साथ खड़े होकर यह सिद्ध किया कि राष्ट्र केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि मानवीय करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व से बनता है। शुभकरण बाबू इसी परंपरा के प्रतिनिधि थे। उनके लिए गांधी का अर्थ केवल सत्याग्रह नहीं था; सेवा भी उतनी ही बड़ी साधना थी।

1934 में जब बिहार ने अपने इतिहास के सबसे भीषण भूकंपों में से एक का सामना किया, तब हजारों लोग मारे गए, लाखों बेघर हुए और पूरा उत्तर बिहार तथा मुंगेर-भागलपुर क्षेत्र तबाही के मंजर में बदल गया। उन दिनों अंग्रेजी अखबार द स्टेट्समैन ने मुंगेर की भयावह स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा था—"मुंगेर सीटी इज नो मोर" लेकिन इसी विनाश के बीच कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीने का निर्णय लिया। शुभकरण बाबू उनमें अग्रणी थे।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें बिहार सेंट्रल रिलीफ कमेटी की जिम्मेदारी सौंपी। तीन महीने तक वे स्वयंसेवक की तरह मलबे में दबे शवों को निकालने, उनका अंतिम संस्कार कराने, घायलों तक सहायता पहुँचाने और राहत कार्यों के संगठन में जुटे रहे। उस समय न प्रचार था, न कैमरे और न राजनीतिक लाभ की कोई संभावना। सेवा ही उनका धर्म थी। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जब राहत कार्यों का निरीक्षण करने पहुँचे तो उन्होंने शुभकरण बाबू के समर्पण की खुले मन से सराहना की। यह सम्मान किसी पद का नहीं, बल्कि कर्म का सम्मान था।

गांधी बार-बार कहते थे कि सत्याग्रही का चरित्र केवल संघर्ष के दिनों में नहीं, बल्कि आपदा के समय सबसे अधिक परखा जाता है। शुभकरण बाबू ने इस कसौटी पर स्वयं को खरा सिद्ध किया। इसलिए वे केवल आंदोलनकारी नहीं, समाज के विश्वसनीय संरक्षक बनकर उभरे।

1937 में जब भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों में अंग्रेजी शासन ने सत्याग्रहियों पर दमनचक्र तेज किया, तब शुभकरण बाबू फिर अग्रिम पंक्ति में दिखाई देते हैं। विहपुर सत्याग्रह के दौरान पुलिस ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर निर्ममता से लाठियाँ बरसाईं। डॉ. राजेंद्र प्रसाद सहित अनेक नेता घायल हुए। राजेंद्र बाबू ने अपनी आत्मकथा में इस घटना का उल्लेख भी किया है। घायल नेताओं के उपचार की व्यवस्था गुप्त रूप से जिन स्थानों पर की गई, उनमें शुभकरण बाबू का निवास भी शामिल था। स्वतंत्रता आंदोलन केवल सार्वजनिक सभाओं में नहीं, ऐसे ही जोखिम भरे मौन सहयोगों के सहारे आगे बढ़ता था।

विहपुर का स्वराज आश्रम हो या पटना का सदाकत आश्रम—इन संस्थाओं के निर्माण और संचालन में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। उनके लिए संस्थाएँ केवल भवन नहीं थीं; वे राष्ट्रीय चेतना के विद्यालय थीं, जहाँ स्वतंत्र भारत का चरित्र गढ़ा जाना था।

1940 में रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना। इस अधिवेशन में शुभकरण बाबू और रामेश्वर नारायण अग्रवाल को भोजन व्यवस्था का दायित्व सौंपा गया। यह जिम्मेदारी देखने में भले साधारण लगे, लेकिन गांधी की दृष्टि में संगठन का प्रत्येक कार्य समान महत्व रखता था। स्वयं गांधी श्रम की गरिमा को नेतृत्व का आधार मानते थे। यही कारण था कि शुभकरण बाबू ने कभी किसी कार्य को छोटा नहीं समझा। सेवा उनके लिए नेतृत्व का दूसरा नाम थी।

असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने जिला परिषद की सदस्यता से त्यागपत्र देकर यह स्पष्ट कर दिया कि औपनिवेशिक सत्ता से प्राप्त सम्मान उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। वे सरकार द्वारा मनोनीत सदस्य थे, लेकिन गांधी के आह्वान पर बिना किसी हिचकिचाहट के पद छोड़ दिया। उस दौर में पद छोड़ना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं था; वह नैतिक प्रतिरोध की उद्घोषणा थी।

1942 का 'भारत छोड़ो आंदोलन' शुभकरण बाबू के जीवन का सबसे जोखिमपूर्ण अध्याय सिद्ध हुआ। क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद जब पूरे देश में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष छिड़ा, तब उन्हें भागलपुर, मुंगेर और संथाल परगना क्षेत्र में आंदोलन के संचालन और आर्थिक प्रबंधन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। आंदोलन को चलाने के लिए जितनी आवश्यकता साहसी कार्यकर्ताओं की थी, उतनी ही आवश्यकता ऐसे विश्वसनीय लोगों की भी थी जो संसाधन, संपर्क और संगठन को जीवित रख सकें। शुभकरण बाबू ने यह भूमिका अद्भुत दक्षता से निभाई।

अंग्रेजी सरकार पहले ही उन पर क्रांतिकारियों और सियाराम दल की सहायता करने का संदेह कर चुकी थी। गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्हें पत्नी गिनिया देवी के साथ जसीडीह के आरोग्य भवन में महीनों भूमिगत रहना पड़ा। वहीं से आंदोलन की योजनाएँ बनतीं, गुप्त बैठकें होतीं और संदेश विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँचाए जाते। सियाराम सिंह, अनुग्रह नारायण सिंह, आचार्य बद्रीनाथ वर्मा, वासुकी राय और अनेक सेनानी वहाँ आकर रणनीति बनाते थे। यह वह समय था जब स्वतंत्रता आंदोलन केवल सार्वजनिक नारों का नहीं, बल्कि साहस, गोपनीयता और विश्वास का भी संघर्ष था।

आखिरकार अंग्रेजी खुफिया तंत्र उनके पीछे पहुँच गया। कई बार गिरफ्तारी के प्रयास हुए, लेकिन वे बच निकलते रहे। अंततः 1943 में भरतमिलाप के दिन भागलपुर के मिरजानहाट से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। संयोग देखिए कि उसी दिन उनकी दूसरी पुत्री सुलोचना का जन्म हुआ। एक ओर पिता जेल जा रहा था, दूसरी ओर घर में नई जिंदगी ने जन्म लिया। मानो निजी जीवन और राष्ट्रीय दायित्व एक ही क्षण में आमने-सामने खड़े हों। शुभकरण बाबू ने बिना किसी द्वंद्व के राष्ट्र को प्राथमिकता दी। यही उस पीढ़ी का नैतिक साहस था, जिसे आज की राजनीति शायद समझ भी नहीं सकती।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि जिस नैतिक ऊर्जा ने आजादी की लड़ाई को संभव बनाया, उसका आगे क्या होगा? दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के साथ ही राजनीति का चरित्र बदलने लगा। संघर्ष की जगह सत्ता ने लेनी शुरू की और त्याग की जगह पद की आकांक्षा ने। ऐसे समय में शुभकरण बाबू उन विरले गांधीवादियों में थे जिन्होंने यह मानने से इनकार कर दिया कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल शासन परिवर्तन है। उनके लिए असली लड़ाई अब शुरू हुई थी—गरीबी, अशिक्षा, अस्पृश्यता, सामाजिक विषमता और नैतिक पतन के विरुद्ध।

यही कारण था कि स्वतंत्रता के बाद उन्होंने कभी चुनावी राजनीति को अपना लक्ष्य नहीं बनाया। कांग्रेस ने 1957 के आम चुनाव में उन्हें उम्मीदवार बनाना चाहा, लेकिन उन्होंने स्पष्ट इनकार कर दिया। जिस दौर में स्वतंत्रता सेनानी सत्ता के केंद्र में पहुँच रहे थे, उस समय उनका यह निर्णय गांधी की उस सीख का विस्तार था कि सत्ता नहीं, समाज सबसे बड़ा क्षेत्र है। उन्होंने पद के बजाय सेवा को चुना और अंत तक उसी पर अडिग रहे।

1946 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान जब समाज नफरत की आग में जल रहा था, तब शुभकरण बाबू शांति और सद्भाव के लिए सक्रिय रहे। उनके लिए धर्म मनुष्य को जोड़ने का माध्यम था, बाँटने का नहीं। बाद के वर्षों में जब देवघर मंदिर प्रवेश आंदोलन के दौरान विनोबा भावे, निर्मला देशपांडे और विमला ठकार पर हमला हुआ, तब उन्होंने उन्हें भागलपुर लाकर उपचार की व्यवस्था की। यह केवल आतिथ्य नहीं था; सामाजिक न्याय के पक्ष में खड़े होने का साहस था।

विनोबा भावे के भूदान आंदोलन ने उन्हें गहरे स्तर पर प्रभावित किया। जब विनोबा भागलपुर आए, तब शुभकरण बाबू ने अपनी उपजाऊ कटोरिया की भूमि भूमिहीनों के नाम दान कर दी। उस समय भूमि केवल संपत्ति नहीं थी; परिवार की आर्थिक सुरक्षा का आधार थी। ऐसे में अपनी उपजाऊ जमीन दान कर देना गांधीवादी 'ट्रस्टीशिप' के विचार को व्यवहार में उतारना था। उनके लिए संपत्ति पर अधिकार से अधिक उसका सामाजिक दायित्व महत्वपूर्ण था।

शुभकरण बाबू का व्यक्तित्व केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं था। वे संस्थाओं के निर्माता थे। उनका विश्वास था कि आंदोलन इतिहास बनाते हैं, लेकिन संस्थाएँ भविष्य बनाती हैं। भागलपुर के मिरजानहाट हाई स्कूल की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1925 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद और स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रणी नेताओं के सहयोग से स्थापित रामानंदी देवी हिंदू अनाथालय से वे आजीवन जुड़े रहे और 1979 से मृत्यु तक उसके अध्यक्ष रहे। अनाथ बच्चों की सेवा को उन्होंने राष्ट्रसेवा का ही विस्तार माना।

महात्मा गांधी की प्रेरणा से नवकुष्ठ आश्रम की स्थापना, केएम होमियोपैथिक मेडिकल कॉलेज के विकास में सहयोग, सहकारिता आंदोलन में सक्रिय भूमिका और भागलपुर कोऑपरेटिव मिल्क यूनियन की स्थापना जैसे अनेक कार्य उनके सामाजिक दृष्टिकोण के प्रमाण हैं। वे जानते थे कि आत्मनिर्भर समाज केवल भाषणों से नहीं बनता; उसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सहकारिता और सामुदायिक संस्थाओं का मजबूत होना आवश्यक है।

उनका घर भी एक संस्था था। वहाँ स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, विद्यार्थी, किसान और जरूरतमंद सभी के लिए दरवाजा खुला रहता था। आर्थिक तंगी से जूझ रहे विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिए वे चुपचाप सहायता करते थे। अनेक परिवारों ने बाद में स्वीकार किया कि यदि शुभकरण बाबू का सहयोग न मिला होता तो उनके बच्चे शिक्षा पूरी नहीं कर पाते। उन्होंने कभी इन कार्यों का प्रचार नहीं किया, क्योंकि गांधी की तरह उनका विश्वास था कि सेवा जितनी निस्पृह होगी, उसका प्रभाव उतना ही गहरा होगा।

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1972 में स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया। लेकिन जिन्होंने उन्हें निकट से देखा, वे जानते थे कि उनके लिए यह सम्मान भी किसी निजी उपलब्धि का विषय नहीं था। वे उसी सादगी से खादी पहनते रहे, उसी सहजता से लोगों के बीच बैठते रहे और उसी विनम्रता से समाज के कामों में लगे रहे।

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बिहार के 1966-67 के भीषण अकाल ने एक बार फिर उनकी सेवा-भावना की परीक्षा ली। भूख और अभाव से जूझते लाखों लोगों की सहायता के लिए लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने बिहार रिलीफ सोसायटी का गठन किया। जब जयप्रकाश नारायण भागलपुर आए तो वे शुभकरण बाबू के यहाँ ही ठहरे। शुभकरण बाबू ने राहत कार्यों को केवल सहयोग नहीं दिया, बल्कि स्वयं उसके अग्रिम मोर्चे पर उतर गए। उन्होंने राहत शिविरों के संचालन में सक्रिय भूमिका निभाई और हजारों जरूरतमंदों तक खिचड़ी, दलिया तथा अन्य खाद्य सामग्री पहुँचाने की व्यवस्था की। उनके लिए सेवा किसी विचारधारा का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मनुष्य के प्रति नैतिक दायित्व थी।

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लोकनायक जयप्रकाश नारायण का उनसे संबंध केवल व्यक्तिगत आत्मीयता का नहीं था; वह साझा गांधीवादी संस्कारों का संबंध था। गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण—इन चारों धाराओं को यदि किसी व्यक्ति ने अपने जीवन में एक साथ साधा, तो उनमें शुभकरण बाबू भी थे। इसलिए जब 1974 में जयप्रकाश नारायण ने 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान किया, तब शुभकरण बाबू ने उसे केवल राजनीतिक आंदोलन के रूप में नहीं, बल्कि समाज की नैतिक पुनर्रचना के अभियान के रूप में देखा। उनके पुत्र रामरतन चूड़ीवाला इस आंदोलन में सक्रिय रहे, जबकि शुभकरण बाबू स्वयं युवाओं का मार्गदर्शन करते रहे। उनके लिए हर पीढ़ी का सबसे बड़ा दायित्व सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण था।

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उन्होंने हर पीढ़ी को यह विश्वास दिलाया कि परिवर्तन केवल सत्ता बदलने से नहीं आता; उसके लिए समाज के भीतर नैतिक चेतना का जागना आवश्यक है। 21 अगस्त 2001 को 103 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। एक लंबी शताब्दी का अंत हुआ, लेकिन एक विचार की यात्रा समाप्त नहीं हुई। आज भी जब सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी संकट में है, राजनीति सेवा के बजाय करियर बनती जा रही है और सामाजिक संस्थाएँ बाजार तथा सत्ता के दबाव में कमजोर पड़ रही हैं, तब शुभकरण बाबू का जीवन असाधारण प्रासंगिकता के साथ हमारे सामने खड़ा दिखाई देता है।

दरअसल, शुभकरण बाबू को केवल एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद करना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे गांधी के 'रचनात्मक कार्यक्रम' की जीवित व्याख्या थे। उन्होंने सिद्ध किया कि राष्ट्र केवल संसदों और सरकारों से नहीं बनता; वह उन लोगों के श्रम, त्याग और नैतिक प्रतिबद्धता से बनता है जो बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के समाज के लिए जीते हैं।

आज जब स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियाँ धीरे-धीरे औपचारिक आयोजनों तक सिमटती जा रही हैं, तब शुभकरण बाबू जैसे व्यक्तित्वों को याद करना इतिहास का सम्मान भर नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता भी है। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसके ऐसे ही मौन कर्मयोगियों में निहित होती है, जिनके लिए राष्ट्र पहले होता है और स्वयं बाद में।

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