नए भारत की राजनीति: "रिकॉर्ड पर तालियाँ, अधूरे वादों पर खामोशी, समस्याएं चर्चा से गायब, चुनावी राजनीति जनहित पर भारी"

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिकॉर्ड कार्यकाल पर हो रहे उत्सव के बीच यह लेख महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, किसान संकट, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों पर गंभीर सवाल उठाता है। क्या राजनीतिक उपलब्धियों का जश्न जनता की वास्तविक समस्याओं पर भारी पड़ रहा है? पढ़ें एक तीखा और विचारोत्तेजक विश्लेषण।

नए भारत की राजनीति: "रिकॉर्ड पर तालियाँ, अधूरे वादों पर खामोशी, समस्याएं चर्चा से गायब, चुनावी राजनीति जनहित पर भारी"

By- Sudhir Taliyan

Chaudhary- Talan Khap

रिकॉर्ड का उत्सव या असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की राजनीति?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले प्रधानमंत्रियों में शामिल हो चुके हैं। लोकतंत्र में किसी भी निर्वाचित नेता का लंबे समय तक जनता का विश्वास बनाए रखना निश्चित रूप से एक राजनीतिक उपलब्धि है। इसके लिए उन्हें बधाई दी जानी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह उपलब्धि पूरे देश को उत्सव के माहौल में झोंक देने का कारण बन सकती है? क्या यह ऐसा ऐतिहासिक क्षण है जिससे आम नागरिक की जिंदगी में कोई ठोस बदलाव आने वाला है? क्या इससे महंगाई कम होगी, बेरोजगारी घटेगी, किसानों का कर्ज माफ होगा, मजदूरों की आय बढ़ेगी या शिक्षा और स्वास्थ्य आम लोगों की पहुंच में आएंगे?

यही वह प्रश्न हैं जिनसे आज की राजनीति बचती हुई दिखाई देती है।

लोकतंत्र में सरकारें रिकॉर्ड बनाने के लिए नहीं चुनी जातीं, समस्याएं हल करने के लिए चुनी जाती हैं। यदि किसी नेता की पार्टी को चुनाव में बहुमत मिला है और वह वर्षों तक सत्ता में बना रहता है, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सामान्य परिणाम है। इसे ऐसे प्रस्तुत करना मानो देश ने कोई असाधारण उपलब्धि हासिल कर ली हो, एक राजनीतिक रणनीति हो सकती है, लेकिन इसे राष्ट्रीय उपलब्धि बताना कठिन है।

देश का नागरिक आज यह पूछ रहा है कि आखिर इस उत्सव से उसे क्या मिलने वाला है?

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जब रसोई गैस, खाद्य पदार्थों, बिजली, शिक्षा और चिकित्सा की लागत लगातार बढ़ रही हो, तब रिकॉर्ड के जश्न की प्राथमिकता क्यों? जब लाखों युवा रोजगार की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाओं के चक्कर काट रहे हों, तब राजनीतिक प्रचार अभियानों पर इतनी ऊर्जा और संसाधन क्यों खर्च किए जा रहे हैं? जब ग्रामीण अर्थव्यवस्था संघर्ष कर रही हो, तब उपलब्धियों की चमकदार प्रस्तुति के पीछे वास्तविक तस्वीर क्यों छिपाई जा रही है?

सरकार समर्थक अक्सर कहते हैं कि देश दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो रहा है। यह सही हो सकता है। लेकिन आम नागरिक यह पूछने का अधिकार रखता है कि उस आर्थिक विकास का लाभ आखिर किसे मिल रहा है? यदि अर्थव्यवस्था बढ़ रही है और साथ ही आर्थिक असमानता भी बढ़ रही है, तो विकास का मॉडल गंभीर सवालों के घेरे में आता है। कुछ लोगों की संपत्ति में अभूतपूर्व वृद्धि और दूसरी तरफ करोड़ों लोगों का रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष, किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है।

नरेंद्र मोदी ने 2014 में जनता के सामने कई बड़े वादे रखे थे। भ्रष्टाचार पर निर्णायक प्रहार, काले धन की वापसी, करोड़ों रोजगार, किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि, प्रशासनिक जवाबदेही और सुशासन जैसे अनेक वादे किए गए थे। एक दशक से अधिक समय बीतने के बाद जनता का यह पूछना पूरी तरह जायज है कि उन वादों का क्या हुआ? लोकतंत्र में सवाल पूछना देशद्रोह नहीं बल्कि नागरिक कर्तव्य है।

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महंगाई आज भी आम परिवार की सबसे बड़ी चिंता है। मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग दोनों की आय पर दबाव बढ़ा है। घर चलाने की लागत बढ़ी है। बच्चों की पढ़ाई महंगी हुई है। चिकित्सा खर्च बढ़े हैं। लेकिन राजनीतिक विमर्श का बड़ा हिस्सा भावनात्मक और प्रतीकात्मक मुद्दों में उलझा रहता है। ऐसा लगता है कि वास्तविक आर्थिक प्रश्नों को जानबूझकर पीछे धकेल दिया गया है।

बेरोजगारी का प्रश्न और भी गंभीर है। लाखों शिक्षित युवा डिग्रियां लेकर नौकरी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है। निजी क्षेत्र में स्थायी और गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी की शिकायत लगातार सुनाई देती है। प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक की घटनाएं और भर्ती प्रक्रियाओं की जटिलता युवाओं में निराशा पैदा करती हैं। लेकिन राजनीतिक मंचों पर इन मुद्दों की चर्चा अक्सर उतनी प्रमुखता नहीं पाती जितनी किसी चुनावी नारे या प्रचार अभियान को मिलती है।

किसान आज भी कर्ज, लागत और बाजार की अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। खेती की लागत बढ़ रही है, लेकिन आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। मौसम की अनिश्चितता, सिंचाई की समस्याएं और बाजार तक पहुंच की चुनौतियां अलग हैं। सरकारें योजनाओं की लंबी सूची गिनाती हैं, लेकिन जमीन पर किसान की चिंता अभी भी खत्म नहीं हुई है। यही कारण है कि कृषि संकट का विषय बार-बार राष्ट्रीय बहस में लौट आता है।

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मजदूर वर्ग की स्थिति भी चिंता का विषय है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोग आज भी सामाजिक सुरक्षा के मजबूत ढांचे से वंचित हैं। रोजगार की अनिश्चितता, कम आय और बढ़ती जीवन-यापन लागत उनके सामने बड़ी चुनौती है। लेकिन राजनीतिक विमर्श में उनकी आवाज अक्सर सबसे कमजोर सुनाई देती है।

शिक्षा का क्षेत्र भी गंभीर सवालों के घेरे में है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तेजी से महंगी होती जा रही है। निजी संस्थानों की फीस आम परिवारों की क्षमता से बाहर होती जा रही है। शिक्षा, जो सामाजिक समानता का सबसे बड़ा माध्यम हो सकती थी, धीरे-धीरे आर्थिक क्षमता पर निर्भर होती जा रही है। गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए उच्च शिक्षा एक सपना बनती जा रही है।

स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भी बड़े दावे किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर सरकारी अस्पतालों की स्थिति और चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता अभी भी अनेक क्षेत्रों में चुनौती बनी हुई है। लाखों परिवार गंभीर बीमारी की स्थिति में आर्थिक संकट में फंस जाते हैं। यदि किसी देश की जनता इलाज के डर से अपनी बचत खोने लगे, तो केवल रिकॉर्ड और उत्सव उसकी समस्या का समाधान नहीं कर सकते।

एक और महत्वपूर्ण प्रश्न प्रशासनिक जवाबदेही का है। आम नागरिक को सरकारी कार्यालयों में अपने कार्यों के लिए लंबी प्रक्रिया और देरी का सामना करना पड़ता है। शिकायतों के निस्तारण की स्पष्ट समय-सीमा और जवाबदेही की संस्कृति अभी भी मजबूत नहीं हो सकी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म बने हैं, लेकिन नागरिक अनुभव हमेशा उतना सरल नहीं हुआ जितना विज्ञापनों में दिखाई देता है।

केन्द्रीयकरण की राजनीति भी चर्चा का विषय है। आलोचकों का मानना है कि निर्णय लेने की शक्ति कुछ हाथों में अधिक केंद्रित होती जा रही है। लोकतंत्र की वास्तविक ताकत संस्थाओं की स्वतंत्रता, विविध मतों के सम्मान और विकेंद्रीकरण में होती है। यदि सारी राजनीति केवल एक चेहरे के इर्द-गिर्द घूमने लगे, तो लोकतांत्रिक संतुलन कमजोर पड़ सकता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे जनहित से हटकर चुनावी प्रबंधन और छवि निर्माण की ओर खिसकता हुआ दिखाई देता है। मीडिया का बड़ा हिस्सा भी अक्सर वास्तविक समस्याओं की जगह प्रचार अभियानों को अधिक महत्व देता नजर आता है। परिणाम यह होता है कि नागरिकों के जीवन से जुड़े कठिन प्रश्न राष्ट्रीय बहस के हाशिए पर चले जाते हैं।

ध्रुवीकरण की राजनीति ने भी लोकतांत्रिक संवाद को नुकसान पहुंचाया है। आज किसी भी सरकारी नीति की आलोचना करने वाला व्यक्ति तुरंत किसी खांचे में डाल दिया जाता है। लोकतंत्र में असहमति लोकतंत्र की ताकत होती है, कमजोरी नहीं। लेकिन जब आलोचना को शत्रुता और प्रश्नों को अपराध की तरह प्रस्तुत किया जाने लगे, तब लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

प्रधानमंत्री मोदी का रिकॉर्ड अपने आप में एक राजनीतिक उपलब्धि हो सकता है। लेकिन किसी भी नेता का वास्तविक मूल्यांकन उसके पद पर बिताए गए दिनों से नहीं, बल्कि उन दिनों में आम नागरिक के जीवन में आए सुधार से किया जाना चाहिए। इतिहास यह नहीं पूछेगा कि किसी नेता ने कितने दिन शासन किया। इतिहास यह पूछेगा कि उन दिनों में किसानों की हालत कैसी हुई, युवाओं को रोजगार मिला या नहीं, शिक्षा और स्वास्थ्य कितने सुलभ हुए, भ्रष्टाचार कितना घटा, और लोकतांत्रिक संस्थाएं कितनी मजबूत हुईं।

आज देश को उत्सव से अधिक आत्ममंथन की जरूरत है।

यह समय रिकॉर्ड गिनने का नहीं, अधूरे वादों का हिसाब देने का है।

यह समय प्रचार का नहीं, जवाबदेही का है।

यह समय राजनीतिक ब्रांडिंग का नहीं, जनता की वास्तविक समस्याओं के समाधान का है।

जब तक महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ती रहेगी, बेरोजगारी युवाओं के सपनों को कुचलती रहेगी, किसान कर्ज में डूबा रहेगा, मजदूर असुरक्षित रहेगा, शिक्षा और स्वास्थ्य महंगे बने रहेंगे और प्रशासन जवाबदेही से दूर रहेगा, तब तक किसी भी रिकॉर्ड का उत्सव अधूरा ही माना जाएगा।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा रिकॉर्ड सत्ता में बने रहना नहीं, बल्कि जनता के जीवन को बेहतर बनाना होता है।

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