बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की अगली परीक्षा

बिहार सरकार ने जिला अस्पतालों में गंभीर मरीजों के अनावश्यक रेफरल पर रोक लगाने का निर्णय लिया है। यह लेख स्वास्थ्य अवसंरचना, डॉक्टरों की कमी, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं, जवाबदेही, तकनीक और सार्वजनिक विश्वास के संदर्भ में बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियों और संभावनाओं का संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की अगली परीक्षा

कुमार कृष्णन

किसी भी लोकतांत्रिक समाज में स्वास्थ्य केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा का प्रश्न भी है। किसी राज्य की विकास यात्रा का मूल्यांकन केवल सड़कों, पुलों और सरकारी इमारतों से नहीं किया जा सकता। उसकी वास्तविक कसौटी यह है कि बीमारी की स्थिति में एक गरीब, किसान, मजदूर या दूरदराज़ गांव में रहने वाले नागरिक को समय पर, सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल पाता है या नहीं। यदि इलाज के लिए मरीज को अपने जिले से बाहर भटकना पड़े, निजी अस्पतालों का कर्ज उठाना पड़े या केवल व्यवस्था की कमजोरी के कारण जीवन संकट में पड़ जाए, तो विकास के बड़े-बड़े दावे अधूरे रह जाते हैं।

इसी संदर्भ में बिहार सरकार का हालिया निर्णय महत्वपूर्ण है। सरकार ने निर्देश दिया है कि जिला अस्पतालों में भर्ती गंभीर मरीजों को सामान्य परिस्थितियों में मेडिकल कॉलेजों या बड़े अस्पतालों में रेफर नहीं किया जाएगा। जिला अस्पतालों के आईसीयू और इमरजेंसी सेवाओं को चौबीसों घंटे सक्रिय रखने तथा कम-से-कम सात दिनों तक मरीजों का उपचार वहीं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। रेफरल केवल उन्हीं मामलों में होगा, जहाँ संबंधित अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक, आवश्यक उपकरण या विशेष उपचार की सुविधा उपलब्ध न हो। इस निर्णय का उद्देश्य स्पष्ट है—जिला अस्पतालों को वास्तविक उपचार केंद्र बनाना, मेडिकल कॉलेजों पर अनावश्यक दबाव कम करना और मरीजों को अपने ही जिले में बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना।

यह पहल ऐसे समय सामने आई है, जब बिहार सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े निवेश और आधारभूत ढाँचे के विस्तार का दावा कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य में कई नए मेडिकल कॉलेज स्थापित हुए हैं, जिला अस्पतालों का विस्तार किया गया है, स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों की संख्या बढ़ी है और वर्ष 2026-27 के बजट में स्वास्थ्य विभाग के लिए 21 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया है। मुफ्त दवा वितरण, जांच सुविधाओं के विस्तार और डिजिटल दवा आपूर्ति प्रणाली को भी सरकार अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अब सरकारी अस्पतालों में पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रकार की दवाएं निःशुल्क उपलब्ध कराई जा रही हैं। दवाओं की खरीद, भंडारण और वितरण को डिजिटल प्रणाली से जोड़ा गया है, जिससे आपूर्ति व्यवस्था अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित होने का दावा किया जा रहा है। कई जिला अस्पतालों में आधुनिक जांच उपकरण लगाए गए हैं तथा आईसीयू और आपातकालीन सेवाओं का भी विस्तार किया गया है। निस्संदेह, ये ऐसे प्रयास हैं जिन्हें केव

यही कारण है कि जिला अस्पतालों को रेफरल रोकने का निर्देश तभी सफल होगा, जब वहाँ आवश्यक संसाधन वास्तव में उपलब्ध हों। आईसीयू, ऑक्सीजन, ब्लड बैंक, आधुनिक जांच सुविधाएँ, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, विशेषज्ञ चिकित्सक और तकनीशियन—इन सबकी पर्याप्त उपलब्धता के बिना केवल प्रशासनिक आदेश से व्यवस्था नहीं बदल सकती। यदि क्षमता बढ़ाए बिना रेफरल कम करने का दबाव बनाया गया, तो इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव मरीजों पर ही पड़ेगा। इसलिए इस निर्णय की सफलता संसाधनों के वास्तविक सुदृढ़ीकरण पर निर्भर करेगी।

ग्रामीण बिहार की स्थिति इस चुनौती को और स्पष्ट करती है। आज भी अनेक गाँवों में लोग प्राथमिक उपचार के लिए तथाकथित झोलाछाप चिकित्सकों पर निर्भर हैं। इसका कारण केवल जागरूकता की कमी नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं तक समय पर पहुँच और उन पर भरोसे की कमी भी है। जब अस्पतालों में डॉक्टर अनुपस्थित मिलते हैं, आवश्यक दवाएँ उपलब्ध नहीं होतीं या साधारण जांच के लिए भी मरीजों को निजी केंद्रों का सहारा लेना पड़ता है, तब वे मजबूरी में स्थानीय विकल्प तलाशते हैं। इसलिए झोलाछाप चिकित्सा पर रोक लगाने का सबसे प्रभावी उपाय दंडात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि ऐसी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का निर्माण है जिस पर नागरिक स्वाभाविक रूप से विश्वास कर सके।

जिला अस्पतालों को मजबूत बनाने का निर्णय तभी प्रभावी होगा, जब वहाँ विशेषज्ञ चिकित्सक, पर्याप्त नर्सिंग स्टाफ, प्रशिक्षित तकनीशियन, दवाएँ, ऑक्सीजन, आईसीयू बेड और आवश्यक उपकरण वास्तव में उपलब्ध हों। यदि संसाधन अधूरे होंगे, तो रेफरल रोकने का आदेश मरीजों के लिए राहत के बजाय नई मुश्किलें भी पैदा कर सकता है। इसलिए प्रशासनिक निर्देशों के साथ-साथ क्षमता निर्माण पर समान रूप से ध्यान देना होगा।

ग्रामीण बिहार की वास्तविकता इस चुनौती को और स्पष्ट करती है। आज भी अनेक गाँवों में लोग प्राथमिक उपचार के लिए झोलाछाप चिकित्सकों पर निर्भर हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियों का भी संकेत है। जब सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर समय पर उपलब्ध नहीं होते, आवश्यक जाँच नहीं हो पाती या दवाएँ बाहर से खरीदनी पड़ती हैं, तब लोग मजबूरी में वैकल्पिक और कई बार जोखिमपूर्ण उपचार का सहारा लेते हैं। इसलिए झोलाछाप चिकित्सकों पर निर्भरता समाप्त करने का सबसे प्रभावी उपाय केवल दंडात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि ऐसी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का निर्माण है जिस पर आम नागरिक सहज विश्वास कर सके।

यही वह क्षेत्र है जहाँ बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को अभी लंबी दूरी तय करनी है। पिछले वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। कई जिलों में औचक निरीक्षण के दौरान डॉक्टर और विशेषज्ञ चिकित्सक अपनी ड्यूटी से अनुपस्थित पाए गए। कुछ अस्पतालों में सुरक्षा गार्ड या गैर-चिकित्सकीय कर्मचारियों द्वारा मरीजों के घाव सिलने जैसी घटनाएँ भी सामने आईं, जिसने व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर किया। समय पर उपचार न मिलने, गलत दवा या लापरवाही के कारण मरीजों की मौत पर परिजनों के विरोध और हंगामे की घटनाएँ भी समय-समय पर होती रही हैं। सरकारी चिकित्सकों के ड्यूटी के दौरान निजी क्लीनिकों में प्रैक्टिस करने के आरोप भी लगातार सामने आते रहे हैं। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि केवल भवन निर्माण या उपकरण खरीद लेना पर्याप्त नहीं है; स्वास्थ्य व्यवस्था की आत्मा उसकी कार्यसंस्कृति और जवाबदेही में निहित होती है।

स्वास्थ्य व्यवस्था में विश्वास छोटे-छोटे अनुभवों से बनता है। मरीज अस्पताल पहुँचे और उसे बिना भटकाव के डॉक्टर मिल जाए, आवश्यक जाँच समय पर हो जाए, दवा अस्पताल से ही मिल जाए और जरूरत पड़ने पर आईसीयू या इमरजेंसी सेवा तत्काल उपलब्ध हो—यही किसी सरकारी अस्पताल की सबसे बड़ी सफलता है। यदि जिला अस्पताल इस भरोसे को स्थापित कर पाते हैं, तो नए रेफरल नियम का सकारात्मक प्रभाव निश्चित रूप से दिखाई देगा।

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लेकिन केवल जिला अस्पतालों को मजबूत करना पर्याप्त नहीं होगा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) को भी उपचार के सक्षम संस्थानों में बदलना होगा। आज भी साधारण बुखार, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं और छोटी दुर्घटनाओं के मरीज सीधे जिला अस्पतालों या मेडिकल कॉलेजों की ओर रुख करते हैं। इसका कारण केवल बीमारी की गंभीरता नहीं, बल्कि स्थानीय स्वास्थ्य संस्थानों पर विश्वास की कमी भी है। यदि गाँव और प्रखंड स्तर पर गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपलब्ध हो, तो जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों पर अनावश्यक दबाव स्वतः कम हो जाएगा।

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सरकार ने चिकित्सकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बायोमीट्रिक व्यवस्था लागू की है और निजी प्रैक्टिस पर नियंत्रण के प्रयास भी किए हैं। लेकिन केवल प्रशासनिक सख्ती पर्याप्त नहीं होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकों के लिए सुरक्षित आवास, आधुनिक उपकरण, पर्याप्त सहायक स्टाफ, बच्चों की शिक्षा तथा सम्मानजनक कार्य-परिस्थितियाँ उपलब्ध करानी होंगी। डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की समस्याओं को समझे बिना उनसे उत्कृष्ट सेवा की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार केवल अनुशासन से नहीं, बल्कि प्रेरणा और सुविधाओं के संतुलन से संभव होता है।

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यह भी स्वीकार करना चाहिए कि बिहार में स्वास्थ्य क्षेत्र में कई सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं। आशा कार्यकर्ताओं के व्यापक नेटवर्क, संस्थागत प्रसव में वृद्धि, टीकाकरण अभियानों और मातृ-शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों ने उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। इन पहलों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य के कई महत्वपूर्ण संकेतकों में सुधार किया है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि राज्य में कोई बदलाव नहीं हुआ। वास्तविकता यह है कि बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था एक संक्रमणकाल से गुजर रही है, जहाँ आधारभूत ढाँचे का विस्तार हुआ है, लेकिन सेवा की गुणवत्ता और मानव संसाधन को उसी गति से मजबूत करना अभी बाकी है।

स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार का अर्थ केवल नए अस्पताल खोलना या बजट बढ़ाना नहीं है। उसका वास्तविक उद्देश्य यह होना चाहिए कि नागरिक को इलाज के लिए अपने जिले से बाहर जाने की मजबूरी कम हो। यदि जिला अस्पताल अधिकांश गंभीर मामलों का सफलतापूर्वक उपचार करने लगें, तो मरीजों और उनके परिजनों पर पड़ने वाला आर्थिक तथा मानसिक बोझ स्वतः घट जाएगा। बार-बार रेफरल की प्रक्रिया न केवल समय नष्ट करती है, बल्कि कई बार गंभीर मरीजों के लिए जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर भी बन जाती है।

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साथ ही, स्वास्थ्य सेवा को केवल इलाज तक सीमित नहीं रखा जा सकता। स्वच्छ पेयजल, पोषण, टीकाकरण, जन-जागरूकता, रोगों की समय पर पहचान और प्राथमिक स्तर पर प्रभावी उपचार जैसी व्यवस्थाएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। यदि बीमारियों की रोकथाम पर पर्याप्त ध्यान दिया जाए, तो अस्पतालों पर बढ़ता दबाव काफी हद तक कम किया जा सकता है। यही आधुनिक सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का मूल सिद्धांत भी है।

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डिजिटल स्वास्थ्य सेवाएँ, टेलीमेडिसिन और ई-हेल्थ रिकॉर्ड जैसी व्यवस्थाएँ भी बिहार के लिए नई संभावनाएँ खोल सकती हैं। दूरदराज़ क्षेत्रों में बैठे मरीजों को विशेषज्ञ चिकित्सकों से परामर्श उपलब्ध कराना, जाँच रिपोर्टों का डिजिटल प्रबंधन और रेफरल की पारदर्शी व्यवस्था स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बना सकती है। तकनीक तभी सार्थक होगी, जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और वह केवल शहरी अस्पतालों तक सीमित न रह जाए।

अंततः, किसी भी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि वही मानी जाती है, जब आम नागरिक को यह भरोसा हो कि संकट की घड़ी में राज्य उसके साथ खड़ा है। स्वास्थ्य सेवाओं में विश्वास पैदा करना केवल चिकित्सा व्यवस्था का लक्ष्य नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की नैतिक जिम्मेदारी भी है। बिहार ने स्वास्थ्य अवसंरचना के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। अब अगली चुनौती इन इमारतों को जीवंत संस्थानों में बदलने की है, जहाँ संसाधन, संवेदनशीलता और गुणवत्ता—तीनों का संतुलन दिखाई दे।

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यदि सरकार अपने इस नए संकल्प को प्रभावी ढंग से लागू कर पाती है, तो यह केवल रेफरल व्यवस्था में सुधार नहीं होगा, बल्कि बिहार की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में गुणात्मक परिवर्तन का आधार बनेगा। विकास का अर्थ केवल नई इमारतें नहीं, बल्कि उन इमारतों के भीतर मिलने वाला भरोसेमंद उपचार भी है। आखिरकार, किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता यही है कि मरीज अस्पताल से यह विश्वास लेकर लौटे कि उसे समय पर, सम्मानपूर्वक और गुणवत्तापूर्ण इलाज मिला। यही विश्वास बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की अगली और सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा भी है।

ल राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार की दिशा में सकारात्मक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए।

लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक सफलता का आकलन सरकारी प्रस्तुतियों या बजट के आकार से नहीं होता। इसकी असली परीक्षा उस मरीज के अनुभव से होती है, जो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या जिला अस्पताल के दरवाजे तक पहुँचता है। यदि उसे समय पर डॉक्टर न मिले, जांच के लिए कई दिन प्रतीक्षा करनी पड़े, दवा बाहर से खरीदनी पड़े या मामूली कारणों से दूसरे अस्पताल भेज दिया जाए, तो करोड़ों रुपये का निवेश भी नागरिक के लिए अर्थहीन हो जाता है।

यही वह बिंदु है जहाँ बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था अब भी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। राज्य में डॉक्टरों, विशेषज्ञ चिकित्सकों, नर्सों और पैरामेडिकल कर्मचारियों की कमी लंबे समय से बनी हुई है। अनेक जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्वीकृत पदों की तुलना में काफी कम चिकित्सक कार्यरत हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और अधिक कठिन है, जहाँ कई बार एक ही चिकित्सक को अनेक जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं। नई इमारतें और आधुनिक मशीनें उपलब्ध होने के बावजूद प्रशिक्षित मानव संसाधन के अभाव में उनकी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं हो पाता।

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