70 साल, 70 बहाने: सरकार का सिद्धांत-"हर नाकामी का दोष इतिहास पर, हर सफलता का श्रेय खुद को!"
"क्या हर समस्या के लिए इतिहास को दोष देना और हर सफलता का श्रेय खुद लेना लोकतंत्र को कमजोर करता है? जवाबदेही, ध्रुवीकरण और राजनीति पर एक विचार।"
केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि ताइवान और कोरिया का मार्किट कैप भारत से ज्यादा हुआ यह कांग्रेस की गलती है.
भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है जवाबदेही, सत्यनिष्ठा और जनता के प्रति ईमानदारी। जब कोई व्यक्ति सरकार में मंत्री बनता है, तो वह केवल किसी राजनीतिक दल का प्रतिनिधि नहीं रह जाता, बल्कि वह पूरे देश की जनता का प्रतिनिधि बन जाता है। उसके शब्द केवल राजनीतिक बयान नहीं होते, बल्कि वे शासन की सोच और दृष्टिकोण का प्रतिबिंब बन जाते हैं।
यही कारण है कि जब कोई मंत्री हर समस्या का दोष अतीत की सरकारों पर डालने लगे, हर असफलता के लिए इतिहास को जिम्मेदार ठहराने लगे और हर उपलब्धि का श्रेय केवल वर्तमान सत्ता को देने लगे, तब यह केवल एक राजनीतिक रणनीति नहीं रह जाती। यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक गंभीर चुनौती बन जाती है।
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आज भारत में एक खतरनाक प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। यह प्रवृत्ति है—अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेने के बजाय किसी और को दोषी ठहराना। यदि बेरोजगारी है तो उसकी वजह अतीत है। यदि आर्थिक चुनौतियाँ हैं तो उसकी वजह अतीत है। यदि कोई नीतिगत विफलता सामने आती है तो उसका कारण भी अतीत है। लेकिन जब कोई उपलब्धि होती है, तब उसका पूरा श्रेय वर्तमान नेतृत्व को दे दिया जाता है।
यह मानसिकता केवल राजनीति की समस्या नहीं है। यह एक सामाजिक समस्या है। जब समाज का नेतृत्व करने वाले लोग अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए हमेशा किसी और को दोषी ठहराते हैं, तब वे आने वाली पीढ़ियों को भी यही संदेश देते हैं कि असफलता के लिए स्वयं को नहीं, बल्कि किसी और को जिम्मेदार ठहराना चाहिए।
एक स्वस्थ लोकतंत्र में सरकारें इतिहास का अध्ययन करती हैं, उससे सीखती हैं और आगे बढ़ती हैं। लेकिन यदि इतिहास केवल राजनीतिक हथियार बन जाए, तो फिर वर्तमान की समीक्षा कौन करेगा?
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यदि 1950 से 1990 तक की नीतियों की आलोचना की जा सकती है, तो 2014 के बाद की नीतियों की भी समीक्षा होनी चाहिए। यदि पुराने नेताओं से प्रश्न पूछे जा सकते हैं, तो वर्तमान नेताओं से भी प्रश्न पूछे जाने चाहिए। लोकतंत्र का अर्थ ही यही है कि सत्ता में बैठे लोगों से कठिन प्रश्न पूछे जाएँ।
दुर्भाग्य से आज प्रश्न पूछना ही कई बार अपराध जैसा बना दिया जाता है। सरकार से सवाल पूछने वाले को राष्ट्रविरोधी, विकास-विरोधी या किसी राजनीतिक दल का समर्थक घोषित कर देना आसान तरीका बन गया है। इससे लोकतंत्र मजबूत नहीं होता, बल्कि कमजोर होता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता की जागरूकता होती है। यदि जनता केवल प्रचार सुनने लगे और वास्तविक परिस्थितियों को देखना बंद कर दे, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है।
आज आम नागरिक के जीवन में कई चुनौतियाँ मौजूद हैं। रोजगार का प्रश्न है। महंगाई का प्रश्न है। शिक्षा और स्वास्थ्य की पहुँच का प्रश्न है। आर्थिक असमानता का प्रश्न है। इन समस्याओं पर गंभीर चर्चा करने के बजाय यदि राजनीतिक विमर्श केवल अतीत को दोष देने तक सीमित हो जाए, तो समाधान कभी नहीं निकल सकता।
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भारत जैसे विशाल देश में विकास का मूल्यांकन केवल भाषणों से नहीं किया जा सकता। विकास का वास्तविक पैमाना यह है कि आम नागरिक का जीवन कितना बेहतर हुआ। क्या युवा को सम्मानजनक रोजगार मिला? क्या किसान की आय में वास्तविक सुधार हुआ? क्या छोटे व्यवसायों के लिए परिस्थितियाँ बेहतर हुईं? क्या गरीब और मध्यम वर्ग का जीवन आसान हुआ?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर संतोषजनक नहीं हैं, तो केवल प्रचार और राजनीतिक भाषण वास्तविकता को नहीं बदल सकते।
एक और चिंताजनक प्रवृत्ति है—ध्रुवीकरण।
ध्रुवीकरण सत्ता के लिए लाभदायक हो सकता है, लेकिन समाज के लिए विनाशकारी होता है। जब जनता को विभिन्न समूहों में बाँट दिया जाता है, तब वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। बेरोजगारी की चर्चा कम होने लगती है। शिक्षा की गुणवत्ता पर बहस कम होने लगती है। स्वास्थ्य व्यवस्था पर प्रश्न कम होने लगते हैं। ध्यान उन विषयों पर केंद्रित कर दिया जाता है जो लोगों को भावनात्मक रूप से विभाजित कर सकें।
विभाजित समाज में सत्ता को कम जवाब देना पड़ता है, क्योंकि लोग एक-दूसरे से लड़ने में व्यस्त रहते हैं।
यही कारण है कि ध्रुवीकरण किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक होता है। यह नागरिकों को प्रतिद्वंद्वी बना देता है जबकि लोकतंत्र का उद्देश्य नागरिकों को सहभागी बनाना होता है।
सच्चा राष्ट्रनिर्माण लोगों को जोड़ने से होता है, बाँटने से नहीं।
एक राष्ट्र तब महान बनता है जब उसके नागरिक सत्य को महत्व देते हैं। जब वे नेताओं की बातों को आँख बंद करके स्वीकार नहीं करते, बल्कि उनकी समीक्षा करते हैं। जब वे प्रश्न पूछते हैं। जब वे तर्क और प्रमाण को महत्व देते हैं।
दुर्भाग्य से आज राजनीतिक संस्कृति में एक नया चलन दिखाई देता है—सफलता का निजीकरण और असफलता का राष्ट्रीयकरण।
यदि कुछ अच्छा हुआ तो उसका श्रेय नेतृत्व को दिया जाएगा। यदि कुछ गलत हुआ तो उसकी जिम्मेदारी इतिहास, विपक्ष, वैश्विक परिस्थितियों या किसी अन्य बाहरी कारण पर डाल दी जाएगी।
यह नेतृत्व नहीं है।
नेतृत्व का अर्थ है उपलब्धियों का श्रेय टीम को देना और असफलताओं की जिम्मेदारी स्वयं लेना।
जो नेतृत्व केवल श्रेय लेना जानता हो और जिम्मेदारी लेना न जानता हो, वह लोकतांत्रिक नेतृत्व नहीं बल्कि प्रचार आधारित नेतृत्व बन जाता है।
भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम किस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति को स्वीकार करते हैं। क्या हम ऐसी संस्कृति चाहते हैं जिसमें हर सरकार अपने पूर्ववर्तियों को दोष देती रहे? या हम ऐसी संस्कृति चाहते हैं जिसमें वर्तमान सरकार अपनी नीतियों और निर्णयों की जिम्मेदारी स्वीकार करे?
राष्ट्र निर्माण दोषारोपण से नहीं होता। राष्ट्र निर्माण उत्तरदायित्व से होता है।
किसी भी लोकतंत्र में जनता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। जनता को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल वोट डालने तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है लगातार निगरानी करना, प्रश्न पूछना और सत्ता को जवाबदेह बनाए रखना।
नेताओं का सम्मान होना चाहिए, लेकिन अंध-समर्थन नहीं। सरकार का समर्थन किया जा सकता है, लेकिन आलोचना का अधिकार भी सुरक्षित रहना चाहिए। राष्ट्रप्रेम का अर्थ सरकारप्रेम नहीं होता। राष्ट्र सरकार से बड़ा होता है और जनता दोनों से बड़ी होती है।
जब कोई मंत्री या नेता जनता को केवल आधी सच्चाई बताता है, जब वह तथ्यों को राजनीतिक सुविधा के अनुसार प्रस्तुत करता है, तब वह केवल अपने विरोधियों को नुकसान नहीं पहुँचाता। वह जनता के विश्वास को नुकसान पहुँचाता है।
और लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूँजी जनता का विश्वास ही होता है।
यदि राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना और उसे बनाए रखना बन जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे अपने नैतिक आधार खो देता है। इसलिए आवश्यक है कि समाज ऐसी राजनीति को प्रोत्साहित करे जो सत्य, जवाबदेही और सामाजिक एकता पर आधारित हो।
भारत को इतिहास से लड़ने की नहीं, इतिहास से सीखने की आवश्यकता है।
भारत को दोषारोपण की नहीं, समाधान की आवश्यकता है।
भारत को ध्रुवीकरण की नहीं, संवाद की आवश्यकता है।
और सबसे बढ़कर, भारत को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो अपनी गलतियों को स्वीकार करने का साहस रखता हो, क्योंकि अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करना ही लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहली पहचान है।
एक राष्ट्र तब मजबूत नहीं बनता जब उसके नागरिक केवल सरकार की प्रशंसा करें। एक राष्ट्र तब मजबूत बनता है जब उसके नागरिक सच बोलने का साहस रखें और सत्ता सच सुनने का साहस रखे।
लोकतंत्र की आत्मा इसी साहस में जीवित रहती है।
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