बीज से ज़हर तक: कैसे बढ़ी किसान की निर्भरता,किसान नहीं, व्यवस्था दोषी है

भारत की कृषि नीति में बीज, पेस्टिसाइड्स और बढ़ती लागत के बीच फँसे किसान की चुनौतियों का गहन विश्लेषण। जानिए कृषि संकट का वास्तविक सच।

बीज से ज़हर तक: कैसे बढ़ी किसान की निर्भरता,किसान नहीं, व्यवस्था दोषी है

Writer- Sudhir Taliyan

Chaudhary- Talan Khap

बीमार बीज, ज़हरीली दवा और दोषी किसान: भारतीय कृषि नीति का उल्टा सच

भारत को लंबे समय से कृषि प्रधान देश कहा जाता है। आज भी देश की लगभग आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण समाज की आधारशिला है। इसके बावजूद भारतीय किसान लगातार बढ़ती लागत, घटती आय, जलवायु संकट, कर्ज़ और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहा है। विडंबना यह है कि इन समस्याओं के लिए अक्सर उसी किसान को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, जो स्वयं इस व्यवस्था का सबसे बड़ा पीड़ित है।

बीते कुछ दशकों में भारतीय कृषि नीति का केंद्र धीरे-धीरे किसान और स्थानीय कृषि ज्ञान से हटकर बीज, रसायन और बाजार आधारित उत्पादन मॉडल की ओर स्थानांतरित हुआ है। इस मॉडल का दावा था कि आधुनिक बीज, रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक कृषि उत्पादकता बढ़ाएंगे तथा किसानों की आय में सुधार करेंगे। कुछ क्षेत्रों में उत्पादन अवश्य बढ़ा, लेकिन इसके साथ कई नई समस्याएँ भी पैदा हुईं, जिनका भार अंततः किसान के कंधों पर आ गया।

बीज से शुरू होता है संकट

किसी भी कृषि व्यवस्था की नींव बीज होता है। स्वस्थ, स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल और रोग-प्रतिरोधी बीज किसी भी सफल खेती की पहली शर्त है। लेकिन पिछले कई वर्षों में कृषि व्यवस्था में ऐसे बीजों का विस्तार हुआ है जिनकी सफलता अक्सर अधिक सिंचाई, अधिक उर्वरक और अधिक रासायनिक सुरक्षा पर निर्भर करती है।

भारत में पारंपरिक रूप से किसान स्वयं बीज संरक्षित करते थे। विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय जलवायु, मिट्टी और रोगों के अनुसार विकसित देसी किस्में मौजूद थीं। इन किस्मों में उत्पादन भले कुछ कम होता था, लेकिन वे स्थानीय परिस्थितियों के प्रति अधिक अनुकूल और अपेक्षाकृत टिकाऊ होती थीं।

आधुनिक कृषि मॉडल में हाइब्रिड बीजों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। इन बीजों से कई बार अधिक उत्पादन प्राप्त होता है, लेकिन किसान इनके बीज को अगले वर्ष पुनः उपयोग नहीं कर सकता। परिणामस्वरूप उसे हर मौसम में नया बीज खरीदना पड़ता है। इससे खेती की लागत बढ़ती है और किसान बाजार पर अधिक निर्भर हो जाता है।

कई कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जब खेती एक ही प्रकार की सीमित किस्मों पर निर्भर होने लगती है, तब रोग और कीटों का खतरा भी बढ़ जाता है। जैव विविधता में कमी आने से फसलों की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ती है। ऐसे में रोग नियंत्रण के लिए रासायनिक हस्तक्षेप की आवश्यकता बढ़ जाती है।

कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरता

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) तथा विभिन्न राष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार कीट, रोग और खरपतवार फसल उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। भारत में अनुमान लगाया जाता है कि फसलों को होने वाले कुल नुकसान का महत्वपूर्ण हिस्सा कीटों और रोगों के कारण होता है।

इसी चुनौती से निपटने के लिए कीटनाशकों का उपयोग बढ़ा। प्रारंभिक उद्देश्य फसलों की रक्षा करना था, लेकिन समय के साथ कई क्षेत्रों में यह उपयोग आवश्यकता से अधिक होने लगा। आज अनेक किसान ऐसे उत्पादन मॉडल में फँस चुके हैं जहाँ रसायनों का प्रयोग विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी जैसा प्रतीत होता है।

समस्या केवल कीटनाशकों के उपयोग की नहीं है, बल्कि उस संरचना की है जो उन्हें अपरिहार्य बना देती है। यदि फसल रोगों और कीटों के प्रति अधिक संवेदनशील है, यदि एक ही क्षेत्र में लगातार एक जैसी फसलें उगाई जा रही हैं, यदि मिट्टी की जैविक गुणवत्ता कमजोर हो रही है, तो रसायनों पर निर्भरता स्वाभाविक रूप से बढ़ती है।

कई बार किसान सलाह, विज्ञापन या बाजार के दबाव में अनुशंसित मात्रा से अधिक रसायनों का प्रयोग भी करने लगते हैं। यह स्थिति केवल किसान की गलती नहीं, बल्कि कृषि विस्तार सेवाओं, प्रशिक्षण व्यवस्था और नीति ढांचे की कमजोरी को भी दर्शाती है।

स्वास्थ्य पर पड़ता गंभीर प्रभाव

कीटनाशकों का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव किसानों और खेत मजदूरों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) लंबे समय से कृषि रसायनों के सुरक्षित उपयोग पर जोर देते रहे हैं।

भारत के अनेक राज्यों—जैसे पंजाब, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल—में किए गए विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि लंबे समय तक रसायनों के संपर्क में रहने वाले किसानों में त्वचा संबंधी समस्याएँ, श्वसन रोग, तंत्रिका तंत्र संबंधी विकार और अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ अपेक्षाकृत अधिक देखी गई हैं।

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ग्रामीण क्षेत्रों में एक बड़ी समस्या यह भी है कि अधिकांश किसानों के पास पर्याप्त सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं होते। दस्ताने, मास्क, सुरक्षात्मक कपड़े और सुरक्षित छिड़काव उपकरणों का उपयोग सीमित है। कई बार किसान बिना किसी सुरक्षा के रसायनों का छिड़काव करते हैं, जिससे विषाक्तता का खतरा बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि नीति पर चर्चा करते समय केवल उत्पादन और उत्पादकता को नहीं, बल्कि किसान के स्वास्थ्य को भी केंद्रीय स्थान मिलना चाहिए। आखिर जिस व्यक्ति पर देश की खाद्य सुरक्षा टिकी है, उसके स्वास्थ्य की उपेक्षा किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

मिट्टी और पर्यावरण पर प्रभाव

कृषि रसायनों का प्रभाव केवल मानव स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। लगातार रासायनिक दबाव मिट्टी की जैविक संरचना को भी प्रभावित कर सकता है। मिट्टी में मौजूद अनेक सूक्ष्मजीव पौधों की वृद्धि, पोषक तत्वों के चक्र और भूमि की उर्वरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जब खेती अत्यधिक रसायन-निर्भर हो जाती है, तब मिट्टी की प्राकृतिक जैविक गतिविधियों में कमी आने का खतरा बढ़ता है। इससे किसान को अधिक उर्वरक और अधिक बाहरी निवेश की आवश्यकता पड़ सकती है। परिणामस्वरूप लागत का चक्र लगातार बढ़ता जाता है।

इसके अतिरिक्त जल स्रोतों में रासायनिक अवशेष पहुँचने, जैव विविधता प्रभावित होने और लाभकारी कीटों की संख्या घटने जैसी चिंताएँ भी वैज्ञानिक समुदाय द्वारा लगातार उठाई जाती रही हैं।

दोषी कौन: किसान या व्यवस्था?

भारतीय कृषि विमर्श का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि समस्याओं की जिम्मेदारी अक्सर किसान पर डाल दी जाती है।

जब मिट्टी की गुणवत्ता घटती है तो कहा जाता है कि किसान गलत तरीके से खेती कर रहा है। जब रसायनों का उपयोग बढ़ता है तो कहा जाता है कि किसान जागरूक नहीं है। जब फसल विफल होती है तो कहा जाता है कि किसान आधुनिक तकनीक नहीं समझता।

लेकिन बहुत कम लोग यह पूछते हैं कि किसान जिन परिस्थितियों में निर्णय ले रहा है, वे परिस्थितियाँ किसने बनाई हैं?

यदि किसान को ऐसा बीज उपलब्ध कराया जाता है जो बाजार पर निर्भर है, यदि कृषि सलाह मुख्यतः रासायनिक समाधान पर आधारित है, यदि वैकल्पिक कृषि पद्धतियों को पर्याप्त संस्थागत समर्थन नहीं मिलता, तो किसान के पास विकल्प कितने बचते हैं?

किसान अक्सर जोखिम कम करने के लिए वही करता है जो उसे सबसे सुरक्षित लगता है। यदि उसे लगता है कि अतिरिक्त कीटनाशक डालने से फसल बच सकती है, तो वह ऐसा करेगा क्योंकि उसके लिए फसल का नुकसान आर्थिक आपदा बन सकता है।

इसलिए समस्या को केवल किसान की जागरूकता का प्रश्न मानना वास्तविकता को अत्यधिक सरल बना देना होगा।

कर्ज़, लागत और मानसिक दबाव

राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आँकड़े लगातार यह संकेत देते हैं कि खेती की लागत बढ़ रही है। बीज, उर्वरक, कीटनाशक, डीज़ल, बिजली, सिंचाई और मजदूरी—सभी खर्चों में वृद्धि हुई है।

दूसरी ओर बाजार मूल्य, मौसम की अनिश्चितता और फसल नुकसान का जोखिम बना रहता है। जब लागत बढ़ती है और आय अनिश्चित रहती है, तब किसान कर्ज़ लेने के लिए मजबूर होता है।

कई अध्ययनों ने दर्शाया है कि कृषि संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य का भी संकट है। फसल विफलता, कर्ज़ का दबाव, स्वास्थ्य समस्याएँ और आय की अस्थिरता किसानों पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालती हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़े वर्षों से कृषि समुदाय के भीतर गंभीर तनाव और संकट की ओर संकेत करते रहे हैं। यद्यपि आत्महत्या जैसे जटिल मुद्दों के पीछे अनेक कारण होते हैं, लेकिन आर्थिक असुरक्षा और कृषि जोखिम महत्वपूर्ण कारकों में शामिल माने जाते हैं।

क्या विकल्प मौजूद हैं?

इस स्थिति का समाधान केवल रसायनों पर प्रतिबंध लगाने या आधुनिक तकनीक को पूरी तरह अस्वीकार करने में नहीं है। आवश्यकता संतुलित और किसान-केंद्रित कृषि नीति की है।

सबसे पहले, स्थानीय और जलवायु-अनुकूल बीजों के संरक्षण तथा विकास को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। कृषि अनुसंधान संस्थानों को ऐसी किस्मों पर अधिक निवेश करना चाहिए जो रोग-प्रतिरोधी हों और कम बाहरी निवेश में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।

दूसरा, समेकित कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management) को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यह पद्धति रासायनिक नियंत्रण के साथ-साथ जैविक, यांत्रिक और पारिस्थितिक उपायों का उपयोग करती है, जिससे कीटनाशकों पर निर्भरता कम हो सकती है।

तीसरा, किसानों को सुरक्षित रसायन उपयोग, सुरक्षात्मक उपकरण और वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध कराई जानी चाहिए। यदि रसायनों का उपयोग हो भी, तो वह न्यूनतम और सुरक्षित स्तर पर हो।

चौथा, जैविक और प्राकृतिक खेती को केवल नारे के रूप में नहीं, बल्कि अनुसंधान, बाजार, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता के माध्यम से वास्तविक समर्थन दिया जाना चाहिए।

पाँचवाँ, बीज या कृषि रसायनों की गुणवत्ता से संबंधित शिकायतों के लिए प्रभावी और पारदर्शी मुआवज़ा तंत्र विकसित किया जाना चाहिए। यदि किसी किसान को दोषपूर्ण उत्पाद के कारण नुकसान होता है, तो उसे न्याय पाने के लिए वर्षों तक संघर्ष न करना पड़े।

किसान को समस्या नहीं, समाधान मानना होगा

भारत की खाद्य सुरक्षा का आधार किसान है। यदि किसान आर्थिक रूप से कमजोर, स्वास्थ्य की दृष्टि से असुरक्षित और नीति स्तर पर उपेक्षित रहेगा, तो कृषि का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रह सकता।

किसान को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि कृषि तंत्र का केंद्रीय भागीदार माना जाना चाहिए। उसकी स्थानीय जानकारी, अनुभव और आवश्यकताओं को नीति निर्माण में स्थान मिलना चाहिए।

एक स्वस्थ कृषि व्यवस्था वह होगी जिसमें बीज किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप हों, खेती मिट्टी और पर्यावरण के अनुकूल हो, रसायनों का उपयोग विवेकपूर्ण और सीमित हो, तथा किसान को जोखिमों का पूरा बोझ अकेले न उठाना पड़े।

निष्कर्ष

भारतीय कृषि का संकट केवल मौसम, बाजार या उत्पादन का संकट नहीं है। यह उस विकास मॉडल पर पुनर्विचार का अवसर भी है जिसमें बीज, रसायन और बाजार के बीच किसान की भूमिका लगातार कमजोर होती गई है।

किसानों को दोष देने से समस्याएँ हल नहीं होंगी। आवश्यक यह है कि कृषि नीति बीज से लेकर बाजार तक पूरे तंत्र का पुनर्मूल्यांकन करे। स्वस्थ बीज, टिकाऊ खेती, सुरक्षित कृषि पद्धतियाँ, उचित मूल्य, स्वास्थ्य सुरक्षा और प्रभावी मुआवज़ा व्यवस्था—ये सभी किसान कल्याण के अनिवार्य स्तंभ हैं।

यदि भारत को वास्तव में कृषि और खाद्य सुरक्षा का मजबूत भविष्य बनाना है, तो उसे किसान को समस्या के रूप में नहीं, बल्कि समाधान के रूप में देखना होगा। क्योंकि जब किसान मजबूत होगा, तभी खेत मजबूत होंगे, और जब खेत मजबूत होंगे, तभी देश की खाद्य सुरक्षा भी स्थायी और सुरक्षित रह सकेगी।

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