टैक्स दो, फिर भी सब कुछ खुद खरीदो? सरकारी स्कूल, अस्पताल और व्यवस्था पर टूटते भरोसे की पूरी पड़ताल

क्या भारत में टैक्स के बदले नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण सरकारी सेवाएँ मिल रही हैं? सरकारी स्कूल, अस्पताल, न्यायपालिका, पुलिस, सड़क, नगर सेवाओं और जवाबदेही की शोध-आधारित पड़ताल। जानिए क्यों बढ़ रहा है करदाताओं का असंतोष और क्या हैं सुधार के वास्तविक रास्ते।

टैक्स दो, फिर भी सब कुछ खुद खरीदो? सरकारी स्कूल, अस्पताल और व्यवस्था पर टूटते भरोसे की पूरी पड़ताल

करदाता का सवाल: टैक्स के बदले सेवा कहाँ है?

Writer-  Ch.Sudhir Taliyan

लेखक की टिप्पणी:
यह लेख किसी सरकार, दल या व्यक्ति के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीतियों, उपलब्ध आँकड़ों और नागरिक अनुभवों के आधार पर लिखा गया विश्लेषणात्मक ब्लॉग है। उद्देश्य यह समझना है कि क्या भारत में करदाता को उसके टैक्स के बदले अपेक्षित सार्वजनिक सेवाएँ मिल रही हैं, और यदि नहीं, तो इसके कारण क्या हैं।


"अगर मेरे बच्चे को निजी स्कूल भेजना है, इलाज निजी अस्पताल में कराना है, सुरक्षा के लिए निजी गार्ड रखने हैं और सड़क पर चलने के लिए भी टोल देना है, तो फिर मैं टैक्स किस बात का दे रहा हूँ?"

यह सवाल आज केवल सोशल मीडिया की बहस नहीं है। यह भारत के तेजी से बढ़ते मध्यम वर्ग, उद्यमियों, वेतनभोगी कर्मचारियों और छोटे व्यापारियों के मन में लगातार गहराता जा रहा प्रश्न है। हाल ही में एक भारतीय उद्यमी की इसी तरह की टिप्पणी ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी। उन्होंने लिखा कि भारत में करदाता को अपनी लगभग हर आवश्यक सेवा निजी क्षेत्र से खरीदनी पड़ती है, जबकि सरकार को भारी कर भी देना पड़ता है।

पहली नज़र में यह टिप्पणी अतिशयोक्ति लग सकती है। लेकिन यदि इस प्रश्न की तह में जाएँ, तो यह केवल एक व्यक्ति की नाराज़गी नहीं, बल्कि भारतीय सार्वजनिक व्यवस्था (Public Governance) के सामने खड़ा सबसे बड़ा भरोसे का संकट (Trust Deficit) है।

आज भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है। करोड़ों लोग आयकर (Income Tax), जीएसटी (GST), उत्पाद शुल्क, स्टाम्प शुल्क, वाहन कर, संपत्ति कर और दर्जनों प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से सरकार के खजाने में योगदान करते हैं। इसके बावजूद यदि एक सामान्य नागरिक अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए निजी संस्थानों पर निर्भर होता जा रहा है, तो यह केवल व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं रह जाता, बल्कि शासन की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न बन जाता है।


टैक्स केवल पैसा नहीं, लोकतंत्र का सामाजिक अनुबंध है

किसी भी आधुनिक लोकतंत्र में कर (Tax) केवल राजस्व संग्रह का साधन नहीं होता। यह नागरिक और राज्य के बीच एक सामाजिक अनुबंध (Social Contract) है। नागरिक सरकार को कर देता है, बदले में सरकार उसे सुरक्षा, न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, परिवहन, आधारभूत ढाँचा और अवसर उपलब्ध कराती है।

यही कारण है कि विकसित देशों में कर की दरें अधिक होने के बावजूद नागरिकों में असंतोष अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके कर का उपयोग प्रत्यक्ष रूप से उनके जीवन की गुणवत्ता सुधारने में हो रहा है।

भारत में समस्या कर की दर नहीं, बल्कि "कर के बदले मिलने वाली सेवाओं की गुणवत्ता" है।


भारत में टैक्स का बोझ वास्तव में कितना है?

अक्सर यह कहा जाता है कि भारत में बहुत कम लोग आयकर देते हैं, इसलिए करदाता शिकायत क्यों करें? यह तर्क अधूरा है।

भारत में केवल आयकर ही टैक्स नहीं है।

एक सामान्य नागरिक जब—

  • मोबाइल रिचार्ज कराता है,
  • साबुन खरीदता है,
  • पेट्रोल भरवाता है,
  • बिजली का बिल देता है,
  • घर खरीदता है,
  • वाहन खरीदता है,
  • होटल में खाना खाता है,

तो वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कर चुका रहा होता है।

जीएसटी ने लगभग हर उपभोक्ता को करदाता बना दिया है।

यानी भारत में शायद ही कोई ऐसा नागरिक हो जो किसी न किसी रूप में सरकार के राजस्व में योगदान न करता हो।

इसीलिए यह प्रश्न केवल वेतनभोगी कर्मचारियों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है।


सरकारी स्कूल: सबसे बड़ा भरोसे का संकट

यदि किसी राष्ट्र की सार्वजनिक व्यवस्था की गुणवत्ता मापनी हो, तो सबसे पहले उसके सरकारी विद्यालयों को देखना चाहिए।

क्योंकि शिक्षा ही वह क्षेत्र है जहाँ सरकार भविष्य गढ़ती है।

भारत में लाखों सरकारी विद्यालय हैं।

सरकार हर वर्ष शिक्षा पर लाखों करोड़ रुपये खर्च करती है।

मिड-डे मील, मुफ्त पुस्तकें, छात्रवृत्ति, यूनिफॉर्म, डिजिटल शिक्षा, पीएम श्री विद्यालय, समग्र शिक्षा जैसी अनेक योजनाएँ चल रही हैं।

फिर भी प्रश्न वही है—

क्या सरकारी स्कूल अधिकांश मध्यम वर्ग की पहली पसंद हैं?

उत्तर अधिकांश मामलों में "नहीं" है।


सरकारी स्कूल से निजी स्कूल की ओर पलायन क्यों?

यदि किसी शहर में रहने वाले माता-पिता से पूछा जाए कि वे अपने बच्चे को कहाँ पढ़ाना चाहते हैं, तो अधिकांश का उत्तर निजी विद्यालय होगा।

यह प्रवृत्ति केवल महानगरों तक सीमित नहीं है।

छोटे कस्बों और गाँवों में भी निजी विद्यालयों का विस्तार इसी मानसिकता का परिणाम है।

इसका कारण केवल अंग्रेज़ी माध्यम नहीं है।

लोग मानते हैं कि—

  • निजी विद्यालयों में पढ़ाई बेहतर होती है।
  • शिक्षक नियमित आते हैं।
  • अनुशासन अधिक होता है।
  • प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी बेहतर होती है।
  • बच्चों का समग्र विकास अधिक होता है।

यह धारणा सही हो या गलत, लेकिन नीति-निर्माताओं के लिए सबसे बड़ा संकट यही है कि जनता का भरोसा सरकारी शिक्षा से हट चुका है।


समस्या भवनों की नहीं, सीखने की है

पिछले वर्षों में सरकार ने विद्यालयों के भवन, शौचालय, बिजली, पेयजल जैसी सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार किए हैं।

लेकिन शिक्षा केवल भवन से नहीं चलती।

कई स्वतंत्र शैक्षिक आकलनों ने यह दिखाया है कि बड़ी संख्या में बच्चे अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने और गणित की क्षमता विकसित नहीं कर पा रहे हैं।

यानी स्कूल में उपस्थित रहना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।

यहीं से अभिभावकों का भरोसा टूटता है।


सरकारी शिक्षक बनाम सरकारी व्यवस्था

यह कहना गलत होगा कि सभी सरकारी शिक्षक काम नहीं करते।

भारत में हजारों ऐसे शिक्षक हैं जिन्होंने सीमित संसाधनों में अद्भुत कार्य किया है।

लेकिन प्रश्न व्यक्तिगत ईमानदारी का नहीं, बल्कि व्यवस्था का है।

जब एक शिक्षक को—

  • जनगणना,
  • चुनाव,
  • सर्वेक्षण,
  • सरकारी योजनाओं के सत्यापन,
  • प्रशासनिक रिपोर्टिंग,

जैसे अनेक गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जाता है, तब पढ़ाई प्रभावित होना स्वाभाविक है।

यानी समस्या केवल शिक्षक नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्राथमिकताओं की भी है।


क्या निजी विद्यालय वास्तव में बेहतर हैं?

यह भी पूरी सच्चाई नहीं है कि हर निजी विद्यालय उत्कृष्ट शिक्षा देता है।

देश में बड़ी संख्या में ऐसे निम्न-शुल्क निजी विद्यालय हैं जहाँ—

  • प्रशिक्षित शिक्षक नहीं हैं,
  • वेतन अत्यंत कम है,
  • आधारभूत सुविधाएँ सीमित हैं,
  • शिक्षण गुणवत्ता औसत है।

फिर भी अभिभावक उन्हें चुनते हैं।

क्यों?

क्योंकि शिक्षा में गुणवत्ता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण विश्वास (Trust) भी है।

जब जनता किसी सार्वजनिक संस्था पर भरोसा खो देती है, तब वह कमज़ोर निजी विकल्प को भी बेहतर मानने लगती है।

यही स्थिति भारत के अनेक क्षेत्रों में दिखाई देती है।


सरकारी अस्पतालों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है

शिक्षा के बाद स्वास्थ्य वह क्षेत्र है जहाँ करदाता सबसे अधिक निराश दिखाई देता है।

यदि किसी मध्यमवर्गीय परिवार में गंभीर बीमारी आती है, तो उसकी पहली चिंता सरकारी अस्पताल तक पहुँचना नहीं होती।

पहली चिंता होती है—

"कौन-सा निजी अस्पताल बेहतर रहेगा?"

यह सोच अपने-आप में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर सबसे बड़ी टिप्पणी है।

विडंबना यह है कि वही परिवार टैक्स भी देता है और इलाज का पूरा खर्च भी स्वयं उठाता है।

यहीं से यह भावना जन्म लेती है कि नागरिक दोहरी कीमत चुका रहा है—

पहली बार टैक्स के रूप में और दूसरी बार निजी सेवा खरीदकर।


क्या आलोचना पूरी तरह उचित है?

यहीं पर बहस का दूसरा पक्ष भी सामने आता है।

भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली हर वर्ष करोड़ों लोगों का टीकाकरण करती है, लाखों प्रसव कराती है, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराती है, संक्रामक रोगों से लड़ती है और उन लोगों तक चिकित्सा पहुँचाती है जो निजी अस्पतालों का खर्च कभी नहीं उठा सकते।

यदि यह व्यवस्था पूरी तरह विफल होती, तो भारत जैसे विशाल देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट कहीं अधिक भयावह होता।

इसलिए समस्या यह नहीं कि सरकार कुछ कर नहीं रही।

समस्या यह है कि जो कर रही है, उस पर समाज के उस वर्ग का भरोसा नहीं बन पा रहा जो कर का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष योगदानकर्ता माना जाता है।


यहीं से शुरू होती है सबसे बड़ी बहस

यदि करदाता सरकारी स्कूल पर भरोसा नहीं करता...

यदि वह सरकारी अस्पताल पर भरोसा नहीं करता...

यदि न्याय पाने के लिए वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं...

यदि शहरों में गड्ढे, प्रदूषण, जलभराव और अव्यवस्थित यातायात उसकी रोज़मर्रा की नियति बन जाए...

तो क्या केवल यह कह देना पर्याप्त है कि "सरकार बहुत काम कर रही है"?

या फिर यह स्वीकार करने का समय आ गया है कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि सार्वजनिक संस्थानों पर घटता नागरिक विश्वास है?

अस्पताल से अदालत तक: क्या भारतीय करदाता एक ही सेवा की दो बार कीमत चुका रहा है?

पहले भाग में हमने सरकारी शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक संस्थानों पर घटते भरोसे की चर्चा की। अब सवाल उससे भी बड़ा है। यदि शिक्षा के बाद स्वास्थ्य, न्याय, पुलिस और नगर सेवाओं में भी नागरिक निजी विकल्प खोजने लगे, तो लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण आधार—सार्वजनिक संस्थाओं पर विश्वास—कमज़ोर होने लगता है।

यह लेख किसी सरकारी कर्मचारी या संस्था के खिलाफ़ नहीं है। भारत में लाखों ईमानदार डॉक्टर, शिक्षक, पुलिसकर्मी और प्रशासनिक अधिकारी सीमित संसाधनों में उत्कृष्ट काम कर रहे हैं। प्रश्न व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो अक्सर अच्छे लोगों को भी अपेक्षित परिणाम देने से रोक देती है।


जब बीमारी आती है, तो लोग सरकारी अस्पताल क्यों नहीं, निजी अस्पताल क्यों खोजते हैं?

भारत ने पिछले दो दशकों में स्वास्थ्य क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। आयुष्मान भारत, हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर, टीकाकरण अभियान, डिजिटल स्वास्थ्य मिशन और जिला अस्पतालों के विस्तार जैसे कई प्रयास हुए हैं।

फिर भी एक कठोर वास्तविकता सामने खड़ी है।

यदि किसी मध्यमवर्गीय परिवार में रात के दो बजे हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक या गंभीर दुर्घटना हो जाए, तो अधिकांश लोग सबसे पहले किसे फोन करते हैं?

सरकारी अस्पताल को?

अक्सर नहीं।

वे किसी निजी अस्पताल का नाम खोजते हैं।

यह केवल सुविधा का प्रश्न नहीं है। यह भरोसे का प्रश्न है।


सरकारी अस्पतालों की सबसे बड़ी समस्या क्या है?

समस्या यह नहीं कि वहाँ डॉक्टर नहीं हैं।

समस्या यह भी नहीं कि हर सरकारी अस्पताल खराब है।

देश के कई प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान—जैसे एम्स, पीजीआई, जिपमर या कई राज्य स्तरीय मेडिकल कॉलेज—विश्वस्तरीय सेवाएँ देते हैं।

समस्या नीचे के स्तर पर शुरू होती है।

एक जिला अस्पताल या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में अक्सर नागरिक जिन कठिनाइयों का सामना करता है, उनमें शामिल हैं—

  • अत्यधिक भीड़,
  • डॉक्टरों की कमी,
  • उपकरणों का सीमित उपयोग,
  • दवाओं की अनुपलब्धता,
  • रेफरल की लंबी प्रक्रिया,
  • समय पर जाँच न हो पाना।

इन समस्याओं के कारण मध्यम वर्ग निजी अस्पताल की ओर भागता है।


स्वास्थ्य का निजीकरण: विकल्प या मजबूरी?

भारत में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र तेज़ी से बढ़ा है।

लेकिन यह विकास केवल बाज़ार की सफलता नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था की सीमाओं का भी संकेत है।

आज लाखों परिवार स्वास्थ्य बीमा इसलिए नहीं खरीदते कि वे बेहतर सेवा चाहते हैं, बल्कि इसलिए खरीदते हैं कि सरकारी व्यवस्था पर उन्हें भरोसा नहीं है।

और जिनके पास बीमा नहीं है, वे अक्सर इलाज के लिए अपनी बचत, ज़मीन, गहने या ऋण का सहारा लेते हैं।

यानी टैक्स देने के बाद भी स्वास्थ्य सुरक्षा का आर्थिक बोझ पूरी तरह समाप्त नहीं होता।


क्या सरकार कुछ नहीं कर रही?

ऐसा कहना भी तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।

भारत का सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम दुनिया के सबसे बड़े अभियानों में से एक है।

कोविड महामारी के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र ने अनेक कमियों के बावजूद बड़े पैमाने पर टीकाकरण और निगरानी का कार्य किया।

आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने करोड़ों गरीब परिवारों को आर्थिक सुरक्षा देने का प्रयास किया।

यानी समस्या "शून्य प्रयास" की नहीं है।

समस्या यह है कि सेवाओं की गुणवत्ता पूरे देश में समान नहीं है।

जहाँ सेवा की गुणवत्ता असमान होती है, वहाँ भरोसा भी असमान हो जाता है।


न्यायपालिका: क्या न्याय केवल धैर्यवान लोगों के लिए है?

अब आइए उस संस्था की ओर, जिसे लोकतंत्र का अंतिम प्रहरी कहा जाता है।

भारतीय न्यायपालिका पर जनता का विश्वास आज भी बहुत ऊँचा है।

लेकिन न्यायपालिका की सबसे बड़ी चुनौती न्याय की गुणवत्ता नहीं, बल्कि न्याय मिलने में लगने वाला समय है।

एक आम नागरिक यदि किसी भूमि विवाद, पारिवारिक विवाद, व्यावसायिक विवाद या आपराधिक मामले में अदालत पहुँचता है, तो उसे अक्सर वर्षों तक मुकदमे का सामना करना पड़ता है।

कई मामलों में पीढ़ियाँ बदल जाती हैं, लेकिन फैसला नहीं आता।

प्रसिद्ध उक्ति है—

"Justice delayed is justice denied."

यानी देर से मिला न्याय भी कई बार अन्याय बन जाता है।


लंबित मुकदमे केवल कानूनी समस्या नहीं हैं

जब कोई उद्योगपति किसी व्यावसायिक विवाद में वर्षों तक फँसा रहता है—

निवेश रुकता है।

जब किसान भूमि विवाद में फँसता है—

खेती प्रभावित होती है।

जब परिवार संपत्ति विवाद में फँसता है—

सामाजिक तनाव बढ़ता है।

जब अपराधी वर्षों तक दोष सिद्ध होने की प्रतीक्षा करता है—

पीड़ित का विश्वास कमज़ोर होता है।

इसलिए न्यायिक देरी केवल अदालत की समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की भी समस्या है।


पुलिस: डर की संस्था या भरोसे की?

हर लोकतंत्र में पुलिस का उद्देश्य नागरिक की सुरक्षा है।

भारत में पुलिस बल अत्यंत कठिन परिस्थितियों में कार्य करता है।

त्योहार हो, चुनाव हो, दंगा हो, प्राकृतिक आपदा हो या आतंकवादी हमला—सबसे पहले पुलिस ही मैदान में उतरती है।

लेकिन यही पूरी तस्वीर नहीं है।

सामान्य नागरिक के मन में पुलिस को लेकर जो धारणा है, वह अक्सर सकारात्मक नहीं होती।

क्यों?

क्योंकि—

  • एफआईआर दर्ज कराने में कठिनाई,
  • लंबी जाँच,
  • राजनीतिक दबाव,
  • संसाधनों की कमी,
  • कर्मियों पर अत्यधिक कार्यभार,

जैसी समस्याएँ पुलिस व्यवस्था को प्रभावित करती हैं।

जब नागरिक सुरक्षा के लिए सीसीटीवी, निजी गार्ड और गेटेड सोसायटी पर निर्भर होने लगे, तो यह संकेत है कि सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास नहीं बन पाया है।


सड़कें: चमकते एक्सप्रेसवे और टूटी हुई शहर की गलियाँ

यदि पिछले दस वर्षों में किसी क्षेत्र में सबसे अधिक परिवर्तन दिखाई देता है, तो वह है राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेसवे।

नई सड़कें बनी हैं।

लॉजिस्टिक्स बेहतर हुआ है।

यात्रा का समय कम हुआ है।

यह सार्वजनिक निवेश का सकारात्मक उदाहरण है।

लेकिन तस्वीर यहीं समाप्त नहीं होती।

एक्सप्रेसवे से उतरते ही कई शहरों में नागरिक जिन समस्याओं का सामना करता है, वे हैं—

  • गड्ढों से भरी सड़कें,
  • बरसात में जलभराव,
  • टूटी हुई नालियाँ,
  • अवैध अतिक्रमण,
  • अव्यवस्थित पार्किंग,
  • पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्तों का अभाव।

यानी राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्टता और स्थानीय स्तर पर अव्यवस्था—दोनों एक साथ दिखाई देते हैं।


नगर सेवाएँ: सबसे अधिक टैक्स, सबसे अधिक शिकायतें

भारत के बड़े शहरों में रहने वाला नागरिक—

संपत्ति कर देता है।

जीएसटी देता है।

वाहन कर देता है।

ईंधन पर कर देता है।

फिर भी उसे अक्सर जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है—

  • कूड़ा समय पर नहीं उठता।
  • बारिश में सड़कें डूब जाती हैं।
  • प्रदूषण बढ़ता है।
  • पीने का पानी शुद्ध नहीं मिलता।
  • पार्क और फुटपाथ अतिक्रमण से घिरे रहते हैं।

यानी नागरिक कर भी देता है और फिर उन्हीं सेवाओं के लिए निजी समाधान भी खरीदता है—

  • आरओ मशीन,
  • निजी टैंकर,
  • निजी सुरक्षा,
  • इन्वर्टर,
  • एयर प्यूरीफायर,
  • जेनरेटर।

यहीं से वह प्रश्न जन्म लेता है—

क्या मैं एक ही सुविधा के लिए दो बार भुगतान कर रहा हूँ?


प्रदूषण: विकास की वह कीमत जिसे नागरिक रोज़ चुका रहा है

भारत के अनेक शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में आते रहे हैं।

दिल्ली, एनसीआर, कई औद्योगिक शहर और तेज़ी से बढ़ते महानगर वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और जल प्रदूषण से जूझ रहे हैं।

प्रदूषण केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है।

यह आर्थिक मुद्दा भी है।

लोग एयर प्यूरीफायर खरीदते हैं।

महँगे मास्क खरीदते हैं।

स्वास्थ्य पर अतिरिक्त खर्च करते हैं।

यानी सार्वजनिक पर्यावरणीय विफलता का आर्थिक बोझ भी अंततः नागरिक ही उठाता है।


यही वह बिंदु है जहाँ बहस सबसे तीखी हो जाती है

जब नागरिक कहता है—

  • मैं निजी स्कूल की फीस भी दूँ,
  • निजी अस्पताल का बिल भी भरूँ,
  • निजी सुरक्षा भी रखूँ,
  • आरओ भी खरीदूँ,
  • एयर प्यूरीफायर भी लगाऊँ,
  • इन्वर्टर भी खरीदूँ,

और इसके बाद भी सरकार को नियमित टैक्स दूँ...

तो उसका प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक भी हो जाता है।

क्या राज्य अपनी मूल जिम्मेदारियों को उस गुणवत्ता के साथ निभा पा रहा है जिसकी अपेक्षा करदाता करता है?

यही वह प्रश्न है जिससे कोई भी लोकतांत्रिक सरकार लंबे समय तक बच नहीं सकती।

टैक्स का पैसा आखिर जाता कहाँ है? समस्या कमाई की नहीं, प्राथमिकताओं और जवाबदेही की है

अब तक की चर्चा के बाद एक स्वाभाविक प्रश्न सामने आता है—

क्या सरकार जनता का टैक्स खर्च ही नहीं करती?

उत्तर है—करती है, और बहुत बड़े पैमाने पर करती है।

फिर दूसरा प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है—

यदि हजारों करोड़ रुपये शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, नगर विकास और कल्याण योजनाओं पर खर्च हो रहे हैं, तो आम नागरिक को व्यवस्था से असंतोष क्यों है?

यही वह बिंदु है जहाँ केवल राजनीति नहीं, बल्कि सार्वजनिक प्रशासन (Public Administration), अर्थशास्त्र (Economics) और सुशासन (Good Governance) की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।


भारत में समस्या टैक्स संग्रह की नहीं, टैक्स के परिणामों की है

हर वर्ष केंद्र और राज्य सरकारें लाखों करोड़ रुपये का बजट प्रस्तुत करती हैं।

कर संग्रह लगातार बढ़ रहा है।

जीएसटी संग्रह नए रिकॉर्ड बना रहा है।

आयकर संग्रह भी बढ़ रहा है।

लेकिन नागरिक का मूल्यांकन सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं होता।

वह अपने दैनिक अनुभव से निर्णय करता है।

यदि—

  • सड़क टूटी है,
  • अस्पताल में डॉक्टर नहीं है,
  • स्कूल में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई नहीं है,
  • अदालत में वर्षों तक फैसला नहीं आता,

तो उसके लिए बजट की बड़ी घोषणाओं का महत्व कम हो जाता है।

लोकतंत्र में नागरिक परिणाम देखता है, केवल आवंटन (Allocation) नहीं।


भारत की सबसे बड़ी प्रशासनिक बीमारी: इनपुट पर ज़ोर, आउटपुट पर नहीं

भारत की सरकारी व्यवस्था दशकों से एक गंभीर समस्या से जूझ रही है।

हम अक्सर यह गिनते हैं कि—

  • कितने करोड़ रुपये खर्च हुए।
  • कितनी इमारतें बनीं।
  • कितनी योजनाएँ शुरू हुईं।
  • कितने लाभार्थी पंजीकृत हुए।

लेकिन बहुत कम पूछा जाता है—

इन खर्चों से नागरिक के जीवन में कितना वास्तविक परिवर्तन आया?

यही अंतर विकसित प्रशासन और पारंपरिक प्रशासन के बीच होता है।

उदाहरण के लिए—

यदि किसी विद्यालय में दस स्मार्ट क्लास लगा दिए जाएँ लेकिन पाँचवीं कक्षा का बच्चा दूसरी कक्षा की किताब न पढ़ सके, तो क्या वह निवेश सफल माना जाएगा?

यदि अस्पताल में नई मशीन खरीद ली जाए लेकिन उसे चलाने वाला विशेषज्ञ न हो, तो क्या वह खर्च प्रभावी कहलाएगा?

यदि सड़क एक वर्ष में तीन बार बनती और टूटती रहे, तो क्या विकास केवल टेंडर का नाम है?

यहीं से जवाबदेही (Accountability) का प्रश्न उठता है।


क्या भ्रष्टाचार ही सबसे बड़ी समस्या है?

सामान्य धारणा यही है।

लेकिन वास्तविकता इससे अधिक जटिल है।

भ्रष्टाचार निश्चित रूप से सार्वजनिक संसाधनों को नुकसान पहुँचाता है।

लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की एक और बड़ी समस्या है—

अकुशलता (Inefficiency)।

यानी—

  • योजना बन गई,
  • पैसा स्वीकृत हो गया,
  • काम भी हो गया,

लेकिन परिणाम अपेक्षित नहीं आया।

इसे ही अर्थशास्त्र की भाषा में "कम दक्षता वाला सार्वजनिक व्यय" कहा जाता है।


फाइलों में विकास, ज़मीन पर संघर्ष

भारत में विकास की एक विचित्र संस्कृति विकसित हुई है।

सरकारी रिपोर्टों में—

सब कुछ प्रगति पर दिखाई देता है।

लेकिन ज़मीन पर नागरिक का अनुभव कई बार अलग होता है।

यही कारण है कि आज सोशल मीडिया पर किसी सरकारी योजना का प्रचार और उसी योजना की स्थानीय शिकायत—दोनों एक साथ दिखाई देते हैं।

लोकतंत्र में यह विरोधाभास खतरनाक संकेत है।

क्योंकि आँकड़े और अनुभव जब अलग-अलग कहानी कहने लगें, तब विश्वास कम होने लगता है।


क्या मुफ्त योजनाएँ समाधान हैं?

भारत में पिछले वर्षों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT), मुफ्त राशन, गैस कनेक्शन, आवास, छात्रवृत्ति, पेंशन और अनेक सामाजिक योजनाओं का विस्तार हुआ है।

इन योजनाओं ने करोड़ों गरीब परिवारों को राहत भी दी है।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—

क्या कल्याणकारी योजनाएँ (Welfare) और गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाएँ (Public Services) एक-दूसरे का विकल्प हैं?

उत्तर है—नहीं।

यदि किसी परिवार को मुफ्त राशन मिल जाए लेकिन उसके बच्चे को अच्छी शिक्षा न मिले, तो गरीबी का चक्र पूरी तरह नहीं टूटता।

यदि इलाज मुफ्त हो लेकिन अस्पताल तक पहुँचने में घंटों लग जाएँ, तो योजना का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

यानी सहायता आवश्यक है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं।

स्थायी समाधान है—

मजबूत सार्वजनिक संस्थाएँ।


क्यों सफल देशों में सरकारी स्कूल भी सम्मानित होते हैं?

जब लोग सिंगापुर, फिनलैंड, जापान, जर्मनी या दक्षिण कोरिया की चर्चा करते हैं, तो अक्सर केवल उनकी आर्थिक सफलता देखते हैं।

लेकिन उनकी वास्तविक शक्ति कहीं और है।

https://politicsinsightindia.com/new/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

वहाँ—

  • सरकारी स्कूलों पर भरोसा है।
  • सार्वजनिक परिवहन सम्मानजनक है।
  • सरकारी अस्पतालों में गुणवत्ता है।
  • स्थानीय प्रशासन जवाबदेह है।

यानी वहाँ निजी विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन सरकारी विकल्प भी सम्मानजनक हैं।

भारत में समस्या यह नहीं कि निजी क्षेत्र अच्छा है।

समस्या यह है कि कई क्षेत्रों में नागरिक सरकारी विकल्प को अंतिम विकल्प मानने लगा है।

यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।

https://politicsinsightindia.com/new/pranab-doley-nsa-assam-jairam-ramesh-land-rights-kaziranga-analysis


क्या भारत की तुलना छोटे देशों से करना उचित है?

यह तर्क भी अक्सर दिया जाता है।

कहा जाता है—

भारत की आबादी 140 करोड़ से अधिक है।

विविधता बहुत अधिक है।

गरीबी अधिक है।

इसलिए तुलना उचित नहीं।

इस तर्क में तथ्य हैं।

लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है।

https://politicsinsightindia.com/new/digital-politics-troll-army-gundagardi-democracy-genz

यदि भारत स्वयं को पाँच ट्रिलियन डॉलर और फिर विकसित अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखता है, तो नागरिक भी वैश्विक मानकों पर सार्वजनिक सेवाओं का मूल्यांकन करेंगे।

वैश्वीकरण के युग में तुलना को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता।

आज भारतीय नागरिक दुनिया देख रहा है।

वह केवल अपने शहर की सड़क नहीं, बल्कि सियोल, सिंगापुर और टोक्यो की मेट्रो भी देख रहा है।

वह केवल स्थानीय स्कूल नहीं, बल्कि वैश्विक शिक्षा मॉडल भी देख रहा है।

इसलिए अपेक्षाएँ बढ़ना स्वाभाविक है।


लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा चुनाव नहीं, संस्थाएँ होती हैं

भारत नियमित चुनाव कराता है।

यह उसकी सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति है।

लेकिन लोकतंत्र केवल मतदान नहीं होता।

लोकतंत्र का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि—

https://politicsinsightindia.com/new/gen-z-rss-mohan-bhagwat-blind-obedience-democracy-analysis

एक साधारण नागरिक बिना किसी पहचान या प्रभाव के—

  • थाने जाए,
  • अस्पताल जाए,
  • स्कूल जाए,
  • नगर निगम जाए,
  • अदालत जाए,

तो क्या उसे सम्मान, सुविधा और समय पर सेवा मिलती है?

यदि उत्तर "हाँ" है—

तो लोकतंत्र मजबूत है।

यदि उत्तर "नहीं" है—

तो केवल चुनाव पर्याप्त नहीं हैं।


क्या भारत में 'वीआईपी संस्कृति' अभी भी समाप्त नहीं हुई?

भारतीय प्रशासन पर सबसे गंभीर आरोपों में से एक यह भी है कि व्यवस्था अभी भी नागरिक-केंद्रित (Citizen-Centric) होने के बजाय प्रक्रिया-केंद्रित (Process-Centric) और कई बार प्रभाव-केंद्रित (Influence-Centric) बनी हुई है।

एक सामान्य नागरिक को अक्सर लगता है कि—

https://politicsinsightindia.com/new/jab-janta-rajnitik-dalon-se-aage-nikalne-lage-loktantra-ka-naya-sawal

  • पहचान हो तो काम जल्दी होता है।
  • सिफारिश हो तो प्रक्रिया आसान हो जाती है।
  • प्रभावशाली व्यक्ति के लिए नियम अलग दिखाई देते हैं।

भले ही यह अनुभव हर जगह सही न हो, लेकिन यदि बड़ी संख्या में नागरिक ऐसा महसूस करते हैं, तो यह स्वयं शासन के लिए चेतावनी है।

किसी भी लोकतंत्र में विश्वास की धारणा (Perception of Fairness) उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी वास्तविक निष्पक्षता।


भारत की सबसे बड़ी कमी संसाधनों की नहीं, जवाबदेही की है

यदि किसी सड़क का निर्माण छह महीने में टूट जाता है—

तो केवल ठेकेदार जिम्मेदार नहीं होना चाहिए।

यदि किसी सरकारी स्कूल के परिणाम लगातार खराब हैं—

तो केवल शिक्षक ही जिम्मेदार नहीं होना चाहिए।

यदि किसी अस्पताल में वर्षों तक डॉक्टरों के पद खाली हैं—

तो केवल डॉक्टरों की कमी कह देना पर्याप्त नहीं है।

लोकतंत्र में करदाता केवल सेवा नहीं खरीदता।

वह जवाबदेही भी खरीदता है।

https://politicsinsightindia.com/new/loktantra-ka-naya-architecture-delimitation-debate

और यही वह क्षेत्र है जहाँ भारत को सबसे अधिक सुधार की आवश्यकता है।


करदाता आखिर चाहता क्या है?

करदाता यह नहीं कहता कि सरकार उसके घर आकर हर समस्या हल कर दे।

वह केवल इतना चाहता है—

  • उसके बच्चे को सरकारी स्कूल में भी सम्मानजनक शिक्षा मिले।
  • सरकारी अस्पताल अंतिम विकल्प नहीं, भरोसेमंद विकल्प बने।
  • सड़क बनने के बाद बार-बार न टूटे।
  • थाने में उसकी शिकायत सुनी जाए।
  • अदालत में न्याय पीढ़ियों तक लंबित न रहे।
  • नगर निगम उसके टैक्स का हिसाब परिणामों से दे।

यानी करदाता सुविधाओं की विलासिता नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता चाहता है।

और किसी भी विकसित राष्ट्र की पहचान भी यही होती है।

टैक्स कम करने की नहीं, सरकार को बेहतर बनाने की ज़रूरत है — विकसित भारत का रास्ता भाषणों से नहीं, भरोसे से निकलेगा

भारत आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में उसका नाम लिया जाता है। दूसरी ओर, आम नागरिक के मन में एक प्रश्न लगातार गूंज रहा है—

"क्या मेरा टैक्स मेरे जीवन को बेहतर बना रहा है?"

यह प्रश्न सरकार विरोधी नहीं है।

यह लोकतंत्र समर्थक प्रश्न है।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा निवेशक जनता होती है।

जनता केवल वोट नहीं देती।

वह टैक्स भी देती है।

और किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि वह जनता के धन को जनता के जीवन में कितना बदल पाती है।


सबसे बड़ा संकट राजस्व का नहीं, विश्वास का है

सरकारें बदलती रहती हैं।

बजट बढ़ते रहते हैं।

नई योजनाएँ आती रहती हैं।

नई घोषणाएँ होती रहती हैं।

लेकिन यदि नागरिक का विश्वास लगातार कम होता जाए, तो किसी भी विकास मॉडल की सफलता अधूरी रह जाती है।

विश्वास केवल विज्ञापनों से नहीं बनता।

विश्वास तब बनता है जब—

  • सरकारी स्कूल में पढ़ा बच्चा भी आईआईटी पहुँचता है।
  • सरकारी अस्पताल में इलाज कराने वाला मरीज सम्मान के साथ घर लौटता है।
  • नगर निगम समय पर कचरा उठाता है।
  • सड़क पाँच वर्ष तक नहीं टूटती।
  • पुलिस राजनीतिक फोन नहीं, कानून की भाषा समझती है।
  • अदालत में फैसला पीढ़ियों तक लंबित नहीं रहता।

यही विकसित राष्ट्र की पहचान होती है।


भारत में सरकार बड़ी होती गई, लेकिन क्या शासन बेहतर हुआ?

पिछले कई दशकों में सरकार की भूमिका लगातार बढ़ी है।

नई योजनाएँ।

नई एजेंसियाँ।

नए विभाग।

नए पोर्टल।

नई घोषणाएँ।

लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछना आवश्यक है—

क्या संस्थाएँ भी उतनी ही मज़बूत हुईं?

अक्सर ऐसा लगता है कि हमने व्यवस्था को सरल बनाने के बजाय अधिक जटिल बना दिया है।

नियम बढ़ते गए।

अनुमतियाँ बढ़ती गईं।

कागज़ी प्रक्रियाएँ बदलकर डिजिटल प्रक्रियाएँ बनीं, लेकिन कई बार मानसिकता वही रही।

डिजिटल पोर्टल बना देना प्रशासनिक सुधार नहीं होता।

सुधार तब होता है जब नागरिक को कम चक्कर लगाने पड़ें।


भारत में सबसे बड़ा सुधार कहाँ होना चाहिए?

1. सरकारी स्कूलों में प्रतियोगिता नहीं, गुणवत्ता की क्रांति

सरकारी विद्यालयों की सफलता भवनों से नहीं मापी जानी चाहिए।

उसे इस आधार पर मापा जाना चाहिए—

  • पाँचवीं का बच्चा कितना पढ़ सकता है?
  • आठवीं का छात्र कितना समझ सकता है?
  • दसवीं के बाद कितने बच्चे रोजगार योग्य कौशल लेकर निकलते हैं?

यदि सरकारी स्कूल गुणवत्तापूर्ण बन जाएँ, तो शिक्षा में असमानता अपने-आप कम होने लगेगी।


2. सरकारी अस्पतालों को गरीबों का नहीं, देश का अस्पताल बनाना होगा

जब तक मध्यम वर्ग सरकारी अस्पताल पर भरोसा नहीं करेगा, तब तक राजनीतिक दबाव भी सीमित रहेगा।

दुनिया के कई देशों में मंत्री, अधिकारी और आम नागरिक एक ही सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का उपयोग करते हैं।

यहीं से गुणवत्ता पर दबाव बनता है।

भारत में भी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल गरीबों की व्यवस्था समझने की मानसिकता बदलनी होगी।


3. न्यायपालिका में समयबद्ध न्याय

भारत को अदालतों की संख्या से अधिक—

न्याय की गति

पर ध्यान देना होगा।

तकनीक, ई-कोर्ट, वैकल्पिक विवाद समाधान और न्यायिक रिक्तियों की शीघ्र नियुक्ति जैसे कदम केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि आर्थिक सुधार भी हैं।

धीमा न्याय निवेश को भी प्रभावित करता है।


4. नगर निकायों को वास्तविक शक्ति

भारत के अधिकांश नागरिक का रोज़ का सामना संसद से नहीं, बल्कि नगर निगम, पंचायत और स्थानीय प्रशासन से होता है।

यदि शहर गंदा है।

सड़क टूटी है।

नाली जाम है।

तो नागरिक दिल्ली या राज्य सचिवालय को दोष नहीं देता।

वह पूरी सरकार को दोष देता है।

इसलिए स्थानीय निकायों को वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता देना विकास का सबसे बड़ा सुधार हो सकता है।


जवाबदेही का नया मॉडल क्यों जरूरी है?

आज अधिकांश सरकारी विभाग यह बताते हैं कि उन्होंने कितना खर्च किया।

लेकिन नागरिक यह जानना चाहता है—

उस खर्च से बदला क्या?

यदि किसी जिले में—

  • शिक्षा पर 500 करोड़ खर्च हुए,

तो अगले वर्ष उस जिले के सीखने के परिणाम कितने सुधरे?

यदि स्वास्थ्य पर 1000 करोड़ खर्च हुए,

तो मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर और इलाज की गुणवत्ता में कितना सुधार आया?

यदि नगर विकास पर हजारों करोड़ खर्च हुए,

तो प्रदूषण कितना घटा?

जलभराव कितना कम हुआ?

यानी अब भारत को "इनपुट आधारित शासन" से "परिणाम आधारित शासन" (Outcome-Based Governance) की ओर बढ़ना होगा।


सरकारी कर्मचारी नहीं, व्यवस्था बदलने की ज़रूरत है

अक्सर पूरी बहस सरकारी कर्मचारियों को दोष देने पर समाप्त हो जाती है।

यह उचित नहीं है।

भारत में लाखों शिक्षक, डॉक्टर, नर्स, पुलिसकर्मी और प्रशासनिक अधिकारी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं।

लेकिन यदि प्रणाली ही ऐसी हो जिसमें—

  • अच्छे काम का विशेष पुरस्कार नहीं,
  • खराब प्रदर्शन की स्पष्ट जवाबदेही नहीं,
  • निर्णय लेने का अधिकार सीमित हो,

तो उत्कृष्ट परिणामों की अपेक्षा करना भी कठिन है।

सुधार व्यक्ति नहीं, प्रणाली का होना चाहिए।


क्या टैक्स कम होना चाहिए?

यह लोकप्रिय नारा हो सकता है।

लेकिन समाधान नहीं।

यदि भारत को—

  • आधुनिक सेना,
  • विश्वस्तरीय आधारभूत संरचना,
  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य,
  • वैज्ञानिक अनुसंधान,
  • सामाजिक सुरक्षा,

चाहिए, तो सरकार के पास पर्याप्त संसाधन भी होने चाहिए।

इसलिए असली बहस टैक्स की मात्रा नहीं, बल्कि टैक्स के उपयोग की गुणवत्ता होनी चाहिए।

कम टैक्स से नहीं, बेहतर शासन से नागरिक संतुष्ट होगा।


2047 का विकसित भारत: केवल GDP से नहीं बनेगा

सरकार का लक्ष्य 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है।

लेकिन विकसित राष्ट्र की पहचान केवल GDP नहीं होती।

विकसित राष्ट्र वह है—

जहाँ एक सामान्य नागरिक को यह चिंता न करनी पड़े कि—

  • बच्चे को अच्छी शिक्षा कहाँ मिलेगी?
  • इलाज के लिए घर बेचना पड़ेगा या नहीं?
  • न्याय मिलने में कितने दशक लगेंगे?
  • बारिश में सड़क डूबेगी या नहीं?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक नहीं हैं, तो केवल आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी।


करदाता की नाराज़गी को राष्ट्र-विरोध नहीं समझना चाहिए

लोकतंत्र में आलोचना दुश्मनी नहीं होती।

जब नागरिक प्रश्न पूछता है—

"मेरा टैक्स कहाँ खर्च हो रहा है?"

तो वह संविधान द्वारा प्रदत्त अपने अधिकार का प्रयोग कर रहा होता है।

वास्तव में सरकार के लिए सबसे खतरनाक स्थिति आलोचना नहीं होती।

सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब नागरिक प्रश्न पूछना ही छोड़ दे।

क्योंकि प्रश्न पूछने वाला नागरिक लोकतंत्र को मजबूत करता है।

मौन नागरिक लोकतंत्र को कमजोर करता है।


अंतिम सवाल: क्या भारत सरकारी संस्थाओं पर फिर से भरोसा बना सकता है?

उत्तर है—

हाँ।

लेकिन इसके लिए केवल नई योजनाएँ पर्याप्त नहीं होंगी।

जरूरत होगी—

  • पारदर्शिता की,
  • जवाबदेही की,
  • संस्थागत सुधारों की,
  • डेटा आधारित निर्णयों की,
  • और सबसे बढ़कर नागरिक-केंद्रित शासन की।

जिस दिन मध्यम वर्ग बिना झिझक अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में भेजेगा...

जिस दिन सरकारी अस्पताल में इलाज कराना सम्मान की बात होगी...

जिस दिन नागरिक नगर निगम के काम की तारीफ करेगा...

जिस दिन सड़क बनने के बाद पाँच साल तक नहीं टूटेगी...

उसी दिन करदाता का सबसे बड़ा प्रश्न अपने-आप समाप्त हो जाएगा।

उसे फिर यह नहीं पूछना पड़ेगा—

"मैं टैक्स क्यों दूँ?"

वह गर्व से कहेगा—

"मैं टैक्स देता हूँ, क्योंकि मेरा देश मुझे उसके बदले एक भरोसेमंद व्यवस्था देता है।"


निष्कर्ष

भारत की सबसे बड़ी चुनौती कर संग्रह नहीं है।

सबसे बड़ी चुनौती है—

जनता के विश्वास का पुनर्निर्माण।

आज यदि कोई भारतीय उद्यमी, कर्मचारी, किसान, व्यापारी या युवा यह पूछ रहा है कि "मेरे टैक्स का मूल्य क्या है?", तो इस प्रश्न को असंतोष नहीं, बल्कि सुधार का अवसर समझना चाहिए।

सरकारें आएँगी और जाएँगी।

नीतियाँ बदलेंगी।

बजट बदलेंगे।

लेकिन यदि भारत को वास्तव में 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे ऐसी सार्वजनिक संस्थाएँ बनानी होंगी जिन पर गरीब मजबूरी में नहीं, बल्कि अमीर भी विश्वास से निर्भर हो।

यही किसी महान लोकतंत्र की अंतिम पहचान है।

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