“भाजपा के दिग्गज ने ही मोदी सरकार को दिखाया आईना! मुरली मनोहर जोशी बोले—‘कसूर सरकार का है, लोगों का नहीं’”

मुरली मनोहर जोशी ने 26 अगस्त 2026 के अमर उजाला इंटरव्यू में मोदी सरकार की शिक्षा नीति, पेपर लीक, भ्रष्टाचार, शिक्षा बजट, निजीकरण, AI और ‘विश्वगुरु’ के दावे पर कई गंभीर सवाल उठाए।

“भाजपा के दिग्गज ने ही मोदी सरकार को दिखाया आईना! मुरली मनोहर जोशी बोले—‘कसूर सरकार का है, लोगों का नहीं’”

मोदी सरकार से पूछे कई असहज सवाल

By- Ch. Sudhir Taliyan

भारत में सत्ता की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसका बहुमत नहीं होती। सत्ता की असली ताकत तब होती है जब उसके भीतर बैठे लोग भी सवाल पूछना बंद कर दें। जब आलोचना को देशविरोध, असहमति को अनुशासनहीनता और सवालों को राजनीतिक षड्यंत्र बताकर किनारे कर दिया जाए, तब लोकतंत्र का सबसे जरूरी औजार—सत्ता से सवाल—कमजोर पड़ने लगता है।

ऐसे माहौल में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी का 26 अगस्त 2026 को अमर उजाला को दिया गया इंटरव्यू इसलिए असाधारण महत्व रखता है क्योंकि इसमें उन्होंने विपक्षी नेता की तरह नहीं, बल्कि उस राजनीतिक परंपरा के वरिष्ठ व्यक्ति के रूप में सवाल उठाए हैं जिसका केंद्र आज की भाजपा सरकार है।

और सवाल छोटे नहीं हैं।

शिक्षा सरकार की प्राथमिकता क्यों नहीं है?

पेपर लीक और नकल की सामाजिक जड़ क्या है?

क्या भ्रष्ट व्यवस्था युवाओं को ईमानदार रहने का नैतिक अधिकार देती है?

क्या शिक्षा को बाजार के हवाले किया जा सकता है?

क्या AI के नारे से पहले हमारे पास पर्याप्त बिजली, पानी, तकनीकी क्षमता और मजबूत शिक्षा व्यवस्था है?

और सबसे असहज सवाल—जब भारत खुद को विश्वगुरु कहता है, तो वास्तविक विकास के पैमानों पर हम कहां खड़े हैं?

जोशी ने इन सवालों को घुमाकर नहीं पूछा। उन्होंने सीधे व्यवस्था पर उंगली रखी। अमर उजाला के इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि शिक्षा अब सरकार की प्राथमिकता नहीं है, पेपर लीक और नकल की सामाजिक स्वीकार्यता को उन्होंने भ्रष्टाचार और घूसखोरी से जोड़ा और साफ शब्दों में कहा—“कसूर सरकार का है, लोगों का नहीं।”

यह बयान सिर्फ एक बुजुर्ग नेता की नाराजगी नहीं है। यह उस व्यवस्था के लिए आईना है जो वर्षों से युवाओं को परीक्षा, भर्ती, नौकरी और भविष्य के नाम पर दौड़ाती रही है।


सबसे बड़ा सवाल: शिक्षा आखिर सरकार की प्राथमिकता क्यों नहीं?

जोशी का सबसे सीधा हमला शिक्षा बजट और सरकारी प्राथमिकताओं पर है।

उनका कहना है कि शिक्षा अब सरकार की प्राथमिकता नहीं रही। उनके मुताबिक सड़क परिवहन का बजट बढ़ रहा है, निजी औद्योगिकीकरण को प्राथमिकता मिल रही है और उसी के कारण संसाधनों का बड़ा हिस्सा वहां जा रहा है। लेकिन वे सवाल करते हैं कि सड़क और पुल बनाने के लिए इंजीनियर कहां से आएंगे? वैज्ञानिक कहां से आएंगे? डॉक्टर, शिक्षक, तकनीशियन और शोधकर्ता कहां से आएंगे?

यह सवाल सरकार को असहज कर सकता है, लेकिन इसे खारिज करना आसान नहीं है।

क्योंकि कोई भी देश केवल एक्सप्रेसवे से विकसित नहीं होता।

सड़कें जरूरी हैं। पुल जरूरी हैं। औद्योगिक निवेश जरूरी है। डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है। लेकिन इन सबके पीछे मनुष्य है।

अगर शिक्षा कमजोर है तो सड़क पर दौड़ती गाड़ी किसके ज्ञान से बनेगी?

अगर विश्वविद्यालय कमजोर हैं तो उद्योग के लिए शोध कौन करेगा?

अगर सरकारी स्कूल कमजोर हैं तो गरीब परिवार का बच्चा आगे कैसे आएगा?

अगर शिक्षक भर्ती ही विवादों में घिरी है तो अगली पीढ़ी को कौन पढ़ाएगा?

सरकारें पुलों का उद्घाटन कर सकती हैं, सड़कों पर रिबन काट सकती हैं और बड़े-बड़े निवेश सम्मेलन कर सकती हैं। लेकिन ज्ञान की अर्थव्यवस्था घोषणाओं से नहीं बनती।

और यहीं जोशी का सवाल सरकार की विकास नीति के मूल में चोट करता है।


पेपर लीक को सिर्फ “माफिया” कहकर बच नहीं सकते

भारत के करोड़ों युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षा सिर्फ परीक्षा नहीं है।

वह उनके जीवन की सबसे बड़ी उम्मीद है।

किसी किसान का बेटा वर्षों तक पढ़ता है।

किसी मजदूर की बेटी कोचिंग की फीस बचाकर किताब खरीदती है।

कोई बेरोजगार युवा सुबह चार बजे उठकर तैयारी करता है।

कोई परिवार अपनी छोटी-सी आय में बच्चे को शहर भेजता है।

फिर परीक्षा होती है।

और खबर आती है—पेपर लीक हो गया।

फिर परीक्षा रद्द।

फिर तारीख बदलती है।

फिर नई तैयारी।

फिर नई फीस।

फिर नया इंतजार।

और कभी-कभी फिर वही कहानी।

ऐसे में सरकारें अक्सर जवाब देती हैं—माफिया पर कार्रवाई होगी, दोषियों को जेल भेजा जाएगा, कड़ी सजा दी जाएगी।

कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जोशी का सवाल इससे कहीं गहरा है।

उनका कहना है कि शिक्षा रोजगार से जुड़ी है। जब समाज में लोगों को यह दिखाई देता है कि नियुक्तियों में घूस चलती है, भ्रष्टाचार है और “हर जगह पैसे का बोलबाला” है, तो नकल और पेपर लीक को लेकर भी सामाजिक नैतिकता कमजोर होती है।

और फिर उन्होंने कहा—

“कसूर सरकार का है, लोगों का नहीं।”

यह एक वाक्य पूरी सरकारी जवाबदेही की दिशा बदल देता है।


युवाओं से ईमानदारी मांगने से पहले व्यवस्था ईमानदार हो

युवा से कहा जाता है—मेहनत करो।

ईमानदारी से परीक्षा दो।

नकल मत करो।

गलत रास्ता मत अपनाओ।

लेकिन युवा पूछ सकता है:

“मैं ईमानदारी से परीक्षा दूंगा, क्या व्यवस्था भी ईमानदारी से मेरा मूल्यांकन करेगी?”

मैं मेहनत करूंगा, क्या मेरा पेपर सुरक्षित रहेगा?

मैं परीक्षा दूंगा, क्या परिणाम समय पर आएगा?

मैं मेरिट में आऊंगा, क्या नियुक्ति बिना पैसे होगी?

मैं चयनित हो जाऊंगा, क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में मेरा अधिकार छीना नहीं जाएगा?

यही वह सवाल है जिसकी तरफ जोशी इशारा कर रहे हैं।

सरकार यदि नागरिकों से नैतिकता चाहती है तो उसे पहले राज्य की संस्थाओं में पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करनी होगी।

नैतिकता ऊपर से नीचे आती है।

अगर व्यवस्था का संदेश यह हो कि पैसा, पहुंच और प्रभाव महत्वपूर्ण हैं, तो फिर केवल छात्रों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना पाखंड बन सकता है।


शिक्षा नीति भी राजनीतिक बदले का मैदान नहीं होनी चाहिए

जोशी ने मौजूदा शिक्षा नीति पर भी एक महत्वपूर्ण बात कही।

उनका कहना है कि केवल इसलिए शिक्षा नीति बदलना उचित नहीं है क्योंकि वह पिछली सरकार ने बनाई थी। वाजपेयी सरकार के समय उन्होंने पुरानी शिक्षा नीति का अध्ययन किया और जहां जरूरी लगा, वहीं सुधार किया।

यह बात किसी भी सरकार के लिए गंभीर सबक है।

भारत में एक बीमारी लगातार दिखाई देती है—सरकार बदलती है तो नीतियां बदलती हैं।

राजनीतिक दल सत्ता में आते हैं और अपने पूर्ववर्तियों की योजनाओं से दूरी बनाने लगते हैं।

लेकिन शिक्षा कोई पांच साल का चुनावी प्रोजेक्ट नहीं है।

एक बच्चा पहली कक्षा में प्रवेश करता है तो उसके सामने 15-20 वर्षों की शिक्षा यात्रा होती है।

अगर हर सरकार अपने राजनीतिक रंग के अनुसार शिक्षा की दिशा बदलती रही तो विद्यार्थी प्रयोगशाला की वस्तु बन जाएगा।

जोशी का तर्क इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह कहता है:

अच्छी नीति को केवल इसलिए मत हटाइए क्योंकि उसे पिछली सरकार लाई थी।

नीति की गुणवत्ता देखिए।

जहां सुधार चाहिए, सुधार कीजिए।

जहां बदलाव जरूरी है, बदलाव कीजिए।

लेकिन शिक्षा को राजनीतिक अहंकार का मैदान मत बनाइए।


शिक्षा का मतलब सिर्फ नौकरी नहीं

यह जोशी के इंटरव्यू का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक हिस्सा है।

आज शिक्षा को अक्सर रोजगार, स्किल और नौकरी के आंकड़ों से जोड़ा जाता है।

यह जरूरी है।

लेकिन जोशी कहते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य केवल कामगार पैदा करना नहीं है। शिक्षा का संबंध समाज, इतिहास, मूल्य, संस्कृति, सभ्यता और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से भी है।

यहां उनका सवाल आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद से है।

अगर विश्वविद्यालय केवल नौकरी के लिए मशीन तैयार करेंगे तो नागरिक कौन बनाएगा?

अगर स्कूल केवल परीक्षा पास कराने वाले केंद्र बन जाएंगे तो चरित्र निर्माण कौन करेगा?

अगर बच्चे केवल प्रतियोगिता सीखेंगे तो सहयोग कौन सिखाएगा?

अगर शिक्षा केवल “कमाई” का साधन बन जाएगी तो समाज के प्रति जिम्मेदारी कहां से आएगी?

शिक्षा बाजार की वस्तु नहीं, सामाजिक पूंजी है।

यही जोशी की मूल चिंता दिखाई देती है।


निजीकरण पर जोशी का रुख—न पूरी तरह विरोध, न खुली छूट

जोशी शिक्षा में निजी क्षेत्र के प्रवेश को पूरी तरह खारिज नहीं करते।

उनका कहना है कि निजी क्षेत्र शिक्षा में आए, पैसा कमाए, लेकिन उसकी कमाई का एक निश्चित अनुपात शिक्षा के विकास में वापस लगाया जाए। शिक्षा और चिकित्सा केवल पैसा बनाने के क्षेत्र नहीं होने चाहिए।

यह बात मौजूदा शिक्षा बाजार पर बड़ा सवाल है।

अगर शिक्षा में निवेश का उद्देश्य सिर्फ मुनाफा है, तो गरीब बच्चा कहां जाएगा?

अगर अच्छी शिक्षा केवल महंगे स्कूल और महंगी कोचिंग में मिलेगी, तो समान अवसर का संवैधानिक सपना किसके लिए है?

अगर उच्च शिक्षा की फीस इतनी बढ़ जाए कि सामान्य परिवार का बच्चा कर्ज लेकर पढ़े, तो शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का माध्यम रहेगी या आर्थिक छंटाई का?

जोशी शिक्षा को सार्वजनिक हित से जोड़ते हैं।

यह सरकार के लिए चुनौती है कि वह निजी भागीदारी और सार्वजनिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे स्थापित करती है।


“हर बच्चा अपने पड़ोस के स्कूल में मुफ्त पढ़े”—कितनी बड़ी बात है!

जोशी ने करीब 10,000 केंद्रीय विद्यालय खोलने का विचार बताया और यह भी कहा कि संविधान में ऐसा संशोधन होना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति अपने पड़ोस के स्कूल में मुफ्त शिक्षा पा सके।

सोचिए, यदि भारत में गरीब और अमीर के बच्चे एक ही गुणवत्तापूर्ण पड़ोस के स्कूल में पढ़ें तो शिक्षा का सामाजिक चरित्र कितना बदल सकता है।

आज समस्या सिर्फ स्कूल की संख्या की नहीं है।

समस्या गुणवत्ता की असमानता की है।

एक बच्चा महंगे निजी स्कूल में जाता है।

दूसरा जर्जर सरकारी स्कूल में।

एक के पास डिजिटल बोर्ड, लैब और प्रशिक्षित शिक्षक हैं।

दूसरे के स्कूल में शिक्षक ही पर्याप्त नहीं।

एक के माता-पिता लाखों रुपये फीस दे सकते हैं।

दूसरे के माता-पिता के पास किताब खरीदने के लिए भी संघर्ष है।

ऐसी व्यवस्था में हम समान अवसर की बात कैसे कर सकते हैं?


AI के नारे से पहले बिजली और पानी तो दीजिए

भारत आज Artificial Intelligence की महाशक्ति बनने की बात कर रहा है।

AI विश्वविद्यालय।

AI मिशन।

AI स्टार्टअप।

AI भविष्य।

लेकिन जोशी ने इसी उत्साह पर जमीन का सवाल रख दिया।

उनका कहना है कि AI के लिए जरूरी बुनियादी तत्व ही पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने तकनीक के लिए चीन और अमेरिका पर निर्भरता तथा बिजली और पानी की अपर्याप्तता का मुद्दा उठाया।

यह आलोचना महत्वपूर्ण है।

क्योंकि AI सिर्फ भाषण से नहीं चलता।

AI के लिए चाहिए:

  • विशाल कंप्यूटिंग क्षमता,
  • डेटा सेंटर,
  • बिजली,
  • पानी,
  • शोधकर्ता,
  • इंजीनियर,
  • मजबूत विश्वविद्यालय,
  • तकनीकी शोध,
  • सेमीकंडक्टर क्षमता,
  • और दीर्घकालीन निवेश।

यदि बुनियादी शिक्षा कमजोर है तो AI के लिए प्रतिभा कहां से आएगी?

अगर विश्वविद्यालयों में शोध कमजोर है तो नई तकनीक कौन बनाएगा?

अगर ऊर्जा की उपलब्धता असमान है तो बड़े डेटा सेंटर कैसे चलेंगे?

AI का भविष्य स्कूल की कक्षा से शुरू होता है।

जो सरकार कक्षा को कमजोर करके कंप्यूटिंग की दुनिया में छलांग लगाने की कल्पना करेगी, वह अपनी ही बुनियाद काटेगी।


“विश्वगुरु” बनने की इच्छा अच्छी है, लेकिन आईना भी देखिए

यह शायद इंटरव्यू का सबसे राजनीतिक हिस्सा है।

जोशी ने कहा कि भारत विश्वगुरु बनना चाहता है, लेकिन विकसित देश हमसे बहुत आगे हैं।

यह बात उन राजनीतिक नारों पर गंभीर सवाल है जिनमें भारत को वैश्विक नेतृत्व की स्थिति में बताया जाता है।

आकांक्षा गलत नहीं है।

भारत को विश्वगुरु बनना चाहिए—क्यों नहीं?

लेकिन सवाल यह है कि विश्वगुरु बनने का आधार क्या होगा?

क्या वह सिर्फ सभ्यता का गौरव होगा?

क्या वह भाषण होगा?

क्या वह सोशल मीडिया का ट्रेंड होगा?

क्या वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बड़े दावे होंगे?

या फिर:

अच्छे सरकारी स्कूल?

विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय?

वैज्ञानिक शोध?

न्यायपूर्ण रोजगार?

कम असमानता?

स्वस्थ नागरिक?

तकनीकी आत्मनिर्भरता?

सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा?

मजबूत संस्थान?

अगर विश्वगुरु का सपना है तो पहले विश्वस्तरीय शिक्षा व्यवस्था बनानी होगी।


जोशी की बात सिर्फ मोदी सरकार की आलोचना नहीं, भाजपा की आत्मालोचना भी है

मुरली मनोहर जोशी भाजपा के बाहर से आए आलोचक नहीं हैं।

उन्होंने भाजपा की राजनीति को दशकों तक आकार दिया। वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री रहे।

इसलिए जब वह कहते हैं कि शिक्षा सरकार की प्राथमिकता नहीं है, तो सवाल केवल नरेंद्र मोदी सरकार से नहीं बल्कि भाजपा के राजनीतिक मॉडल से भी पूछा जा रहा है।

जब वह शिक्षा के व्यवसायीकरण का विरोध करते हैं, तो यह वर्तमान आर्थिक नीति से टकराने वाला विचार है।

जब वह पेपर लीक के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं, तो यह सरकारी जवाबदेही का सवाल है।

जब वह “विश्वगुरु” के दावे के साथ वास्तविक विकास अंतर की बात करते हैं, तो वह राजनीतिक नारों के बजाय परिणामों की कसौटी सामने रखते हैं।


यह वही जोशी हैं जिन्होंने पहले भी सवाल उठाए हैं

इस इंटरव्यू को अकेली घटना समझना भूल होगी।

2018 में मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर जोशी से सरकार के प्रदर्शन को नंबर देने के लिए पूछा गया था। उन्होंने “कॉपी” के संदर्भ में ऐसी टिप्पणी की थी जिसे सरकार के प्रदर्शन पर उनकी तीखी असहमति के रूप में देखा गया।

2019 में उन्होंने पार्टी नेतृत्व में ऐसी आवाजों की जरूरत पर जोर दिया था जो प्रधानमंत्री के सामने निडर होकर बहस कर सकें।

2025 में उन्होंने आर्थिक विकास को केवल GDP से मापने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए और असमानता तथा प्रति व्यक्ति आय जैसे मुद्दों पर चिंता जताई।

और जुलाई 2026 में छात्रों के आंदोलन के दौरान उन्होंने बल प्रयोग के बजाय छात्रों की चिंताओं को समझने की जरूरत पर जोर दिया।

अब अगस्त 2026 में उन्होंने पेपर लीक, शिक्षा बजट, निजीकरण, AI और विश्वगुरु के दावे पर सवाल उठा दिए।

इसलिए यह किसी एक दिन की नाराजगी नहीं दिखती।

यह एक लगातार चल रही वैचारिक असहमति की कहानी है।


सरकार को सबसे कठिन सवाल विपक्ष नहीं, कभी-कभी अपने लोग पूछते हैं

लोकतंत्र में विपक्ष का काम सवाल पूछना है।

लेकिन जब सत्ता के भीतर से सवाल आते हैं तो उनका महत्व अलग होता है।

क्योंकि सत्ता का अपना आदमी जब कहता है कि शिक्षा प्राथमिकता नहीं रही, तो सरकार को केवल राजनीतिक जवाब नहीं देना चाहिए।

उसे आंकड़े देने चाहिए।

उसे बताना चाहिए कि शिक्षा पर कुल सार्वजनिक खर्च कितना है।

सरकारी स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात क्या है।

कितने पद खाली हैं।

कितने विश्वविद्यालयों में स्थायी शिक्षक नहीं हैं।

पेपर लीक रोकने के लिए कितनी परीक्षाओं में सुरक्षा व्यवस्था बदली गई।

कितने मामलों में दोषियों को सजा हुई।

भर्ती परीक्षाओं में कितने युवाओं का समय और पैसा बर्बाद हुआ।

निजीकरण के बाद शिक्षा की लागत कितनी बढ़ी।

AI के लिए भारत की अपनी कंप्यूटिंग क्षमता कितनी है।

विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों की संख्या कितनी है।

यही असली जवाब होगा।

नारे का जवाब आंकड़े से दीजिए।


युवाओं से माफी नहीं, भरोसा चाहिए

आज भारत की सबसे बड़ी संपत्ति उसका युवा है।

लेकिन युवा केवल जनसंख्या का आंकड़ा नहीं है।

वह उम्मीद है।

वह परिवार का निवेश है।

वह किसान का बेटा है।

वह मजदूर की बेटी है।

वह छोटे दुकानदार का बच्चा है।

वह उस मां की उम्मीद है जिसने अपने बेटे को पढ़ाने के लिए अपने गहने तक बेच दिए।

अगर परीक्षा व्यवस्था बार-बार टूटती है, भर्ती प्रक्रिया विवादित होती है, पेपर लीक होते हैं, परिणाम वर्षों तक अटकते हैं और शिक्षा महंगी होती जाती है, तो सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ एक परीक्षा का नहीं होता।

नुकसान व्यवस्था पर विश्वास का होता है।

और जिस दिन युवा को व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहेगा, उस दिन विकास के बड़े-बड़े नारे भी खोखले लगने लगेंगे।


सरकार को जोशी से लड़ने के बजाय उनके सवालों का जवाब देना चाहिए

मुरली मनोहर जोशी के विचारों से असहमति हो सकती है।

उनकी आर्थिक सोच से असहमति हो सकती है।

उनके शिक्षा मॉडल से असहमति हो सकती है।

लेकिन उनके सवालों को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं।

सरकार को जवाब देना चाहिए:

क्या शिक्षा वास्तव में प्राथमिकता है?

अगर है तो बजट और परिणाम क्या कहते हैं?

https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra

पेपर लीक रोकने में सरकार कितनी सफल रही?

क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल भाषण है या भर्ती व्यवस्था तक पहुंची है?

क्या निजीकरण के साथ सार्वजनिक शिक्षा की जिम्मेदारी भी बढ़ रही है?

क्या AI के लिए हमारी बुनियादी क्षमता पर्याप्त है?

और विश्वगुरु बनने के रास्ते पर हमारे वास्तविक शैक्षिक और मानव विकास संकेतक क्या हैं?

इन सवालों के जवाब देने से सरकार कमजोर नहीं होगी।

बल्कि मजबूत होगी।


अंतिम सवाल: देश को नारे चाहिए या मजबूत नींव?

भारत को बड़े सपने देखने चाहिए।

विश्वगुरु बनने का सपना भी देखना चाहिए।

https://politicsinsightindia.com/bharat-ka-bazaar-kiske-kabze-mein-corporate-varchasv-ghatti-pratispardha

AI में नेतृत्व का सपना भी देखना चाहिए।

दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना भी देखना चाहिए।

लेकिन हर सपने की एक कीमत होती है—बुनियाद।

और बुनियाद स्कूल में बनती है।

बुनियाद शिक्षक बनाता है।

बुनियाद विश्वविद्यालय बनाता है।

बुनियाद शोध प्रयोगशाला बनाती है।

https://politicsinsightindia.com/education-cess-ka-hisab-government-schools-badhaal

बुनियाद ईमानदार भर्ती व्यवस्था बनाती है।

बुनियाद उस परीक्षा केंद्र में बनती है जहां प्रश्नपत्र सुरक्षित रहता है।

बुनियाद उस सरकारी स्कूल में बनती है जहां गरीब और अमीर दोनों का बच्चा समान सम्मान से पढ़ सके।

मुरली मनोहर जोशी के 26 अगस्त के इंटरव्यू का सबसे बड़ा संदेश यही है।

भारत को केवल ऊंची इमारतों की जरूरत नहीं है; उसे मजबूत नींव की जरूरत है।

सड़कें बनाइए—लेकिन स्कूल मत भूलिए।

AI बनाइए—लेकिन शिक्षक मत भूलिए।

https://politicsinsightindia.com/beej-khad-dawa-kisan-hi-jahar-ka-doshi-kyon

उद्योग लगाइए—लेकिन विश्वविद्यालय मत भूलिए।

विश्वगुरु बनने का सपना देखिए—लेकिन आंकड़ों से अपनी स्थिति देखने का साहस भी रखिए।

और सबसे बढ़कर—

https://politicsinsightindia.com/garib-bachchon-ke-school-badhaal-viksit-bharat-par-sawal

युवा से ईमानदारी मांगने से पहले व्यवस्था को ईमानदार बनाइए।

क्योंकि जिस देश का युवा मेहनत करके परीक्षा देता है, लेकिन उसे पेपर लीक का डर रहता है, जिस परिवार का बच्चा वर्षों पढ़ता है लेकिन भर्ती की पारदर्शिता पर भरोसा नहीं कर पाता, जिस समाज में शिक्षा लगातार बाजार के दबाव में जाती है—उस देश के सामने सबसे बड़ा संकट बेरोजगारी या परीक्षा नहीं, विश्वास का संकट है।

और अगर भाजपा सरकार वास्तव में “विकसित भारत” बनाना चाहती है, तो उसे मुरली मनोहर जोशी जैसे अपने वरिष्ठ नेता के सवालों को आलोचना समझकर टालने के बजाय नीति की कसौटी समझना चाहिए।

https://politicsinsightindia.com/gdp-badh-rahi-hai-phir-janta-kyon-pareshan-viksit-bharat-ki-badi-chunauti

क्योंकि विपक्ष के सवालों का राजनीतिक जवाब दिया जा सकता है।

लेकिन अपने ही घर के वरिष्ठ व्यक्ति द्वारा उठाए गए बुनियादी सवालों का जवाब अंततः काम से ही देना पड़ता है।

Was this article useful?

Get every story on your phone

Join our channel and never miss an update.

Join on WhatsApp Join on Telegram

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow