“युवा नौकरी मांग रहा था, जवाब मिला ‘कुत्ते भौंकते हैं’! BPSC विवाद ने खोल दी सत्ता के अहंकार की पोल”
BPSC के “कुत्ते भौंकते हैं हजार” विवाद ने बिहार की भर्ती व्यवस्था, युवाओं के आक्रोश और प्रशासनिक अहंकार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर नौकरी मांगने वाले युवाओं की आवाज को अपमानित करने वाली मानसिकता कब बदलेगी?
सत्ता की अहंकारी मानसिकता
By- Ch. Sudhir Taliyan
जब नौकरी की उम्र निकल रही हो, वर्षों की तैयारी दांव पर लगी हो और परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हों, तब युवाओं को “भौंकने वाला” बताना केवल एक असंवेदनशील टिप्पणी नहीं—यह उस मानसिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन है जो नागरिक को जवाबदेह शासन का साझेदार नहीं, अपनी सत्ता के सामने खड़ा एक परेशान करने वाला शोर समझती है।
बिहार में BPSC को लेकर उठा ताजा विवाद महज एक अधिकारी के एक वाक्य का विवाद नहीं है। यह उस गहरी प्रशासनिक मानसिकता का आईना है जिसमें कुर्सी पर बैठा व्यक्ति खुद को व्यवस्था समझने लगता है और व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले नागरिक को व्यवधान।
24 अगस्त 2026 को बिहार लोक सेवा आयोग के परीक्षा नियंत्रक राजेश कुमार सिंह ने प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों के संदर्भ में “हाथी चले बाजार, कुत्ते भौंके हजार” कहावत का इस्तेमाल किया। बाद में उन्होंने कहा कि कहावत को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत किया गया और किसी व्यक्ति या समूह को ठेस पहुंचाना उनका उद्देश्य नहीं था। इसके बावजूद बिहार सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया। (indianexpress.com)
लेकिन सवाल यह है कि कहावत किसने कही, यह सवाल छोटा है; सवाल यह है कि ऐसी मानसिकता पैदा कैसे होती है?
यह सिर्फ एक कहावत नहीं, सत्ता के अहंकार का आईना है
किसी सामान्य बातचीत में कोई व्यक्ति यह कहावत बोल दे तो उसका सांस्कृतिक अर्थ अलग हो सकता है। लेकिन लोकतांत्रिक शासन में शब्दों का अर्थ केवल शब्दकोश तय नहीं करता, संदर्भ भी तय करता है।
यहां संदर्भ क्या था?
सड़क पर बैठे वे अभ्यर्थी थे जिन्होंने सरकारी नौकरी की परीक्षा दी है या देने की तैयारी कर रहे हैं।
उनकी मांगें थीं।
उनके सवाल थे।
उनकी शिकायतें थीं।
और उनके सामने था एक ऐसा संस्थागत तंत्र जिसके पास उनकी मेहनत, उनकी परीक्षा, उनका परिणाम और अंततः उनके भविष्य को प्रभावित करने की शक्ति है।
ऐसे समय में आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी का “हाथी” और “कुत्ते” वाला उदाहरण देना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
लोकतंत्र में सरकार हाथी नहीं होती और जनता भौंकने वाले कुत्ते नहीं होती।
सरकार जनता की सेवक है।
आयोग जनता के पैसे से चलने वाली सार्वजनिक संस्था है।
और प्रतियोगी परीक्षा देने वाला युवा कोई भीख मांगने नहीं आता। वह अपने ज्ञान, मेहनत और योग्यता के आधार पर संवैधानिक रूप से उपलब्ध रोजगार के अवसर के लिए प्रतिस्पर्धा करता है।
जिस युवा को “भौंकने वाला” कहा जा रहा है, वही कल राज्य चलाएगा
इस पूरे विवाद की सबसे कड़वी विडंबना यही है।
आज जो युवा BPSC के सामने सवाल पूछ रहा है, वही कल प्रशासनिक अधिकारी बन सकता है।
आज जो अभ्यर्थी परीक्षा की पारदर्शिता मांग रहा है, वही कल किसी जिले में जनता की शिकायत सुन सकता है।
आज जो छात्र अपने अधिकार के लिए धरने पर बैठा है, वही कल किसी सरकारी कार्यालय में नागरिक की फाइल पर निर्णय कर सकता है।
फिर उसे आज यह संदेश क्यों दिया जाए कि—
“तुम सवाल मत पूछो।”
“तुम्हारी शिकायत शोर है।”
“तुम्हारा विरोध भौंकना है।”
यही मानसिकता सबसे खतरनाक है।
क्योंकि लोकतंत्र का पहला पाठ यही है कि सत्ता से सवाल करना अपराध नहीं है।
BPSC का विवाद केवल “कुत्ते” वाली टिप्पणी तक सीमित नहीं
अगर इस पूरे प्रकरण को केवल एक विवादित बयान तक सीमित कर दिया गया तो असली मुद्दा फिर गायब हो जाएगा।
पटना में अभ्यर्थी 70वीं BPSC परीक्षा को लेकर कथित अनियमितताओं और परीक्षा की निष्पक्षता से जुड़े सवाल उठा रहे हैं। साथ ही TRE-4 की परीक्षा प्रणाली को लेकर भी विरोध चल रहा है। BPSC ने स्पष्ट किया है कि objective examinations में negative marking जारी रहेगी और परीक्षाएं कम-से-कम दो चरणों में आयोजित की जाएंगी। (indianexpress.com)
25 अगस्त को आंदोलन और तेज हुआ। अभ्यर्थियों ने गांधी मैदान से राजभवन की ओर मार्च किया, बैरिकेडिंग तोड़ी और पुलिस से टकराव की स्थिति बनी। पुलिस ने पानी की बौछार और हल्का लाठीचार्ज किया; Indian Express के अनुसार करीब 25 छात्रों को हिरासत में लिया गया और बाद में छोड़ा गया। (indianexpress.com)
यानी मामला अब सिर्फ एक कहावत का नहीं रहा।
यह भर्ती व्यवस्था पर भरोसे का संकट बन चुका है।
सरकार को युवाओं से डरना नहीं चाहिए
एक लोकतांत्रिक सरकार के लिए प्रदर्शन कोई अपमान नहीं है।
प्रदर्शन लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
यदि कोई समूह कानून तोड़ता है तो कानून अपना काम करे।
यदि किसी प्रदर्शन में हिंसा होती है तो उसकी जिम्मेदारी तय हो।
यदि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचता है तो कार्रवाई हो।
लेकिन इन सबके बावजूद एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए—
प्रशासनिक असहमति को प्रशासनिक दुश्मनी में नहीं बदला जा सकता।
पटना में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की खबरें सामने आईं। यह भी बताया गया कि एक प्रदर्शन के दौरान दो पुलिसकर्मी घायल हुए और लगभग 25 छात्रों को हिरासत में लिया गया। (indianexpress.com)
इसलिए दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है।
छात्रों का आंदोलन शांतिपूर्ण रहना चाहिए।
लेकिन प्रशासन का रवैया भी संवेदनशील और जवाबदेह होना चाहिए।
बैरिकेड लोकतंत्र की स्थायी भाषा नहीं हो सकते।
“कोर्ट चले जाइए” जवाब नहीं, जिम्मेदारी से बचने का रास्ता है
परीक्षा नियंत्रक की ओर से यह बात सामने आई कि जिन छात्रों के पास आरोपों के समर्थन में तथ्य हैं, वे अदालत जा सकते हैं। (indiatoday.in)
कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करना निश्चित रूप से नागरिक का अधिकार है।
लेकिन एक सवाल है—
क्या हर शिकायत का पहला जवाब यही होगा कि अदालत चले जाओ?
यदि किसी परीक्षा संस्था के पास हजारों अभ्यर्थियों की शिकायतें हैं, तो उसकी अपनी आंतरिक जवाबदेही व्यवस्था क्या है?
क्या आयोग को खुद जांच नहीं करनी चाहिए?
क्या शिकायतों का स्वतंत्र परीक्षण नहीं होना चाहिए?
क्या परीक्षा प्रक्रिया पर उठे सवालों का बिंदुवार जवाब सार्वजनिक नहीं होना चाहिए?
लोकतांत्रिक संस्थाएं अदालत को जिम्मेदारी हस्तांतरित करके मुक्त नहीं हो सकतीं।
अदालत न्याय का अंतिम संवैधानिक मंच है; वह प्रशासनिक जवाबदेही का विकल्प नहीं है।
युवाओं की जिंदगी कोई प्रयोगशाला नहीं
एक प्रतियोगी परीक्षा केवल प्रश्नपत्र नहीं होती।
उसके पीछे किसी गरीब परिवार की बचत होती है।
किसी किसान का बेटा होता है।
किसी मजदूर की बेटी होती है।
किसी छोटे दुकानदार का परिवार होता है।
किसी छात्र के पांच साल होते हैं।
किसी की उम्र सीमा होती है।
किसी की शादी टलती है।
किसी ने नौकरी छोड़कर तैयारी की होती है।
किसी ने शहर में कमरा लेकर वर्षों गुजारे होते हैं।
किसी ने माता-पिता से पैसे उधार लिए होते हैं।
और किसी ने अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उम्मीद इसी परीक्षा में लगा रखी होती है।
इसलिए परीक्षा में पारदर्शिता की मांग को “शोर” समझना युवाओं के संघर्ष का अपमान है।
सरकारी भर्ती कोई प्रशासनिक फाइल नहीं है जिसे एक मेज से दूसरी मेज पर धकेल दिया जाए। यह हजारों परिवारों के भविष्य का प्रश्न है।
BPSC को एक बात समझनी होगी: अभ्यर्थी ग्राहक नहीं, नागरिक हैं
यहां समस्या की जड़ शायद यही है।
सरकारी संस्थाओं में अक्सर नागरिक को “आवेदक”, “अभ्यर्थी”, “शिकायतकर्ता” या “केस नंबर” बना दिया जाता है।
लेकिन उसके पीछे एक इंसान है।
उसकी उम्मीद है।
उसका अधिकार है।
उसका समय है।
उसकी मेहनत है।
और उसकी गरिमा है।
BPSC का काम केवल परीक्षा आयोजित करना नहीं है।
उसका काम विश्वास पैदा करना भी है।
यदि परीक्षा निष्पक्ष है तो संस्था को इतना आत्मविश्वास होना चाहिए कि वह हर सवाल का जवाब दस्तावेजों के साथ दे सके।
यदि आरोप गलत हैं तो उन्हें प्रमाण के साथ खारिज किया जाए।
यदि कहीं गलती हुई है तो जिम्मेदारी तय हो।
और यदि किसी अधिकारी से गलती हुई है तो उसे छिपाने की बजाय स्वीकार किया जाए।
निलंबन हुआ, लेकिन क्या मानसिकता भी बदलेगी?
सरकार द्वारा राजेश कुमार सिंह को निलंबित करना तत्काल प्रशासनिक कार्रवाई है। (timesofindia.indiatimes.com)
लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है।
क्योंकि किसी एक अधिकारी को निलंबित कर देना आसान है।
संस्थागत संस्कृति बदलना कठिन है।
अगर कल कोई दूसरा अधिकारी इसी मानसिकता के साथ किसी किसान, मजदूर, छात्र, शिक्षक या बेरोजगार से बात करता है तो?
क्या हर बार वीडियो वायरल होने का इंतजार किया जाएगा?
क्या हर बार सोशल मीडिया पर आक्रोश के बाद कार्रवाई होगी?
क्या नागरिकों की गरिमा की रक्षा के लिए कोई स्थायी प्रशासनिक आचार-संहिता नहीं होनी चाहिए?
यह सवाल केवल BPSC का नहीं है।
यह पूरे प्रशासनिक तंत्र का सवाल है।
“हाथी” कौन है? जनता तय करेगी
विवादित कहावत में हाथी कौन है और कुत्ते कौन—इसका राजनीतिक अर्थ निकालना आसान है।
लेकिन लोकतंत्र में असली हाथी कोई अधिकारी नहीं होता।
न कोई आयोग।
न कोई मंत्री।
न कोई सरकार।
सर्वोच्च शक्ति जनता है।
सरकारी संस्थाओं की पूरी वैधता जनता से आती है।
अधिकारी जनता के कर से वेतन पाते हैं।
सरकारी संस्थाएं जनता के पैसे से चलती हैं।
और संविधान नागरिक को अभिव्यक्ति तथा शांतिपूर्ण सभा जैसे अधिकार देता है।
इसलिए किसी अधिकारी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि सरकारी कुर्सी उसे नागरिकों से ऊपर उठा देती है।
कुर्सी बड़ी हो सकती है, संविधान उससे बड़ा है।
युवा सवाल पूछेंगे—और पूछने चाहिए
आज बिहार है।
कल कोई दूसरा राज्य होगा।
कहीं UPSC होगा।
कहीं SSC।
कहीं शिक्षक भर्ती।
कहीं पुलिस भर्ती।
कहीं विश्वविद्यालय परीक्षा।
हर जगह यदि परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठाने वाले युवाओं को “उपद्रवी”, “शोर करने वाला”, “भौंकने वाला” या किसी अन्य अपमानजनक श्रेणी में डाल दिया गया, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे संवाद खो देगा।
और जब संवाद समाप्त होता है, तो अविश्वास शुरू होता है।
युवा चुप नहीं होंगे। उन्हें चुप कराने की कोशिश भी नहीं होनी चाहिए।
उन्हें जवाब चाहिए।
और जवाब देने की जिम्मेदारी उसी संस्था की है जिसके हाथ में परीक्षा और भर्ती की शक्ति है।
सरकार ने “विद्यार्थी सहयोग शिविर” घोषित किए—अब असली परीक्षा इसकी है
बिहार सरकार ने छात्रों की शिकायतों के समाधान के लिए “विद्यार्थी सहयोग शिविर” शुरू करने और ऑनलाइन शिकायत व्यवस्था तथा 1100 हेल्पलाइन की घोषणा की है। (ndtv.com)
यह पहल तभी सार्थक होगी जब यह केवल सरकारी घोषणा बनकर न रह जाए।
हर शिकायत को:
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शिकायत संख्या मिले,
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समयसीमा मिले,
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जिम्मेदार अधिकारी तय हो,
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कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक हो,
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अंतिम निर्णय का कारण बताया जाए।
शिकायत पेटी लोकतंत्र नहीं है; शिकायत का समाधान लोकतंत्र है।
यदि छात्र फिर वही प्रश्न लेकर महीनों सड़क पर बैठा रहे और सरकारी पोर्टल पर शिकायत “under process” बनी रहे, तो ऐसी व्यवस्था केवल डिजिटल सजावट होगी।
BPSC को डरने की नहीं, पारदर्शी होने की जरूरत है
यदि आयोग अपने काम को लेकर आश्वस्त है तो उसे छात्रों के सवालों से घबराने की जरूरत नहीं।
एक मजबूत संस्था आलोचना से नहीं टूटती।
वह आलोचना का उत्तर देती है।
वह दस्तावेज सामने रखती है।
वह जांच कराती है।
वह गलती होने पर स्वीकार करती है।
और वह सही होने पर तथ्य प्रस्तुत करती है।
जिस संस्था को अपने निर्णय पर विश्वास है, वह नागरिक के प्रश्न से नहीं डरती।
इसलिए BPSC के लिए यह संकट अवसर भी है।
वह चाहे तो इस पूरे प्रकरण के बाद भारत की सबसे पारदर्शी भर्ती संस्थाओं में से एक बनने की दिशा में कदम उठा सकता है।
लेकिन इसके लिए भाषण नहीं, सुधार चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल: क्या सत्ता नागरिक को सम्मान से देखती है?
BPSC का यह प्रकरण अंततः परीक्षा से बड़ा सवाल खड़ा करता है।
क्या हमारा प्रशासन नागरिक को सम्मान देता है?
क्या बेरोजगार युवा को सम्मान मिलता है?
क्या किसान को सम्मान मिलता है?
क्या शिक्षक को सम्मान मिलता है?
https://politicsinsightindia.com/sarkar-maafi-jawabdehi-loktantra
क्या आंदोलनकारी को सम्मान मिलता है?
क्या असहमति रखने वाले नागरिक को सम्मान मिलता है?
या फिर जैसे ही कोई नागरिक सरकार से सवाल करता है, सत्ता की भाषा बदल जाती है?
यही वह मानसिकता है जिस पर कठोर प्रहार जरूरी है।
लोकतंत्र में नागरिक को “भौंकने वाला” कहकर उसकी आवाज नहीं दबाई जा सकती।
आवाज को अपमानित करने से सवाल खत्म नहीं होते।
बल्कि सवाल और गहरे हो जाते हैं।
निष्कर्ष: कुत्ते नहीं, लोकतंत्र के नागरिक हैं ये युवा
BPSC विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सबक यही है कि सरकारी पद किसी व्यक्ति को नागरिकों से ऊपर नहीं उठाता।
अधिकारी की कुर्सी उसे अधिकार देती है, लेकिन साथ ही जिम्मेदारी भी देती है।
और जितना बड़ा पद, उतनी बड़ी भाषा की जिम्मेदारी।
पटना की सड़कों पर बैठे युवा केवल नौकरी की मांग नहीं कर रहे।
वे कह रहे हैं—
हमारी परीक्षा निष्पक्ष हो।
हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो।
हमारे सवालों का जवाब मिले।
https://politicsinsightindia.com/education-cess-ka-hisab-government-schools-badhaal
भर्ती समय पर हो।
नियम पारदर्शी हों।
गलती हो तो जिम्मेदारी तय हो।
क्या ये मांगें इतनी असहनीय हैं कि जवाब में उन्हें “भौंकने” वाला बता दिया जाए?
नहीं।
बल्कि लोकतंत्र में यही आवाज व्यवस्था को जीवित रखती है।
इसलिए इस पूरे विवाद को किसी अधिकारी की जुबान की फिसलन कहकर समाप्त कर देना बहुत आसान होगा।
https://politicsinsightindia.com/beej-khad-dawa-kisan-hi-jahar-ka-doshi-kyon
मुश्किल काम है उस मानसिकता को पहचानना जो ऐसी भाषा को संभव बनाती है।
वह मानसिकता जिसमें सत्ता खुद को “हाथी” और जनता को “कुत्ता” समझने लगती है।
यही मानसिकता लोकतंत्र के लिए असली खतरा है।
और इसका जवाब किसी एक अधिकारी का निलंबन नहीं है।
इसका जवाब है—
जवाबदेह प्रशासन।
पारदर्शी परीक्षा।
https://politicsinsightindia.com/garib-bachchon-ke-school-badhaal-viksit-bharat-par-sawal
समयबद्ध भर्ती।
स्वतंत्र जांच।
नागरिकों के प्रति सम्मान।
और सबसे बढ़कर—
सवाल पूछने वाले युवा को दुश्मन नहीं, लोकतंत्र की चेतावनी समझना।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता का सवाल “भौंकना” नहीं होता।
वह सत्ता को याद दिलाने वाली आवाज होती है कि कुर्सी स्थायी नहीं है—जनता स्थायी है।
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