जनता सवाल पूछे तो ड्रामा, आंदोलन करे तो साजिश! क्या BJP सरकार में लोकतंत्र सिर्फ वोट देने तक सीमित रह गया है?
जनता सवाल पूछे तो ड्रामा और आंदोलन करे तो साजिश! जेपी नड्डा के बयान के बहाने जानिए लोकतंत्र, विरोध के अधिकार, BJP सरकार की जवाबदेही और जनता की आवाज दबाने की राजनीति का पूरा विश्लेषण।
आन्दोलन पसंद नहीं है तो समयबद्ध जनहितकारी वैकल्पिक व्यवस्था दीजिये
संपादकीय | लोकतंत्र, जन अधिकार और सत्ता की जवाबदेही
By- Chaudhary Sudhir Talyan
भारत में लोकतंत्र की परिभाषा क्या अब इतनी बदल दी गई है कि जनता केवल वोट देने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन सरकार से सवाल पूछने, नीतियों का विरोध करने और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही मांगने का अधिकार उसके पास नहीं है? क्या चुनाव जीत लेना सरकार को जनता के प्रत्येक सवाल से ऊपर कर देता है? क्या बहुमत का मतलब यह है कि सत्ता में बैठे लोग अपनी मर्जी से निर्णय लें और नागरिकों को पांच साल तक चुपचाप उनका परिणाम भुगतने के लिए छोड़ दिया जाए?
दिल्ली के रामलीला मैदान में INDIA गठबंधन की रैली को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा की टिप्पणियां इसी गंभीर बहस को जन्म देती हैं। उन्होंने विपक्ष की रैली को 'Foolish and Designed Drama' यानी मूर्खतापूर्ण और सुनियोजित नाटक बताया। इसके साथ ही आंदोलन को अराजकता फैलाने, दंगे कराने, व्यापारियों को नुकसान पहुंचाने और निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने की कथित साजिश से जोड़ दिया।
लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या इस प्रकार के राजनीतिक आरोप लगा देने से किसी आंदोलन की वैधता समाप्त हो जाती है? क्या आंदोलन में उठाए गए सवालों का जवाब दिए बिना उसे नाटक, साजिश और अराजकता बताकर खारिज किया जा सकता है?
लोकतंत्र में यह कैसी राजनीतिक संस्कृति विकसित की जा रही है, जहां जनता के सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों की नीयत पर मुकदमा चलाया जाने लगता है?
1. जनता के सवालों को ड्रामा बताना जवाबदेही से बचने का रास्ता नहीं
विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए हैं।
इन सवालों से सहमत होना या असहमत होना अलग विषय है। इनकी सत्यता का निर्धारण प्रमाणों, आंकड़ों और निष्पक्ष जांच से होना चाहिए। लेकिन सवाल उठाने वालों को मूर्ख, षड्यंत्रकारी या अराजक घोषित कर देना किसी समस्या का समाधान नहीं है।
जे.पी. नड्डा जैसे वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं से अपेक्षा होती है कि वे संवैधानिक और लोकतांत्रिक बहस का स्तर ऊंचा रखें। यदि विपक्ष के आरोप निराधार हैं तो सरकार और चुनाव आयोग को दस्तावेजों के साथ उनका खंडन करना चाहिए। यदि मतदाता सूची में कोई गलती नहीं हुई है तो उसके प्रमाण सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
लेकिन जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि जब मतदाता सूची से करोड़ों नाम बाहर हुए तो उनमें कितने मृत, कितने स्थानांतरित, कितने दोहरी प्रविष्टि वाले और कितने वास्तविक पात्र मतदाता थे?
Indian Express की 5 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, SIR के बाद लगभग 13 करोड़ नाम प्रारूप मतदाता सूचियों से बाहर हुए थे। चुनाव आयोग ने इसके बाद 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में छूट गए मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया।
यह तथ्य अपने आप में वोट चोरी साबित नहीं करता, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर नामों का बाहर होना पारदर्शिता और प्रभावी शिकायत निवारण की मांग अवश्य करता है।
तेरह करोड़ नामों का सवाल केवल राजनीतिक दलों का सवाल नहीं है। यह करोड़ों नागरिकों के मताधिकार से जुड़ा सार्वजनिक महत्व का विषय है।
2. क्या हर आंदोलन को अराजकता और साजिश बताना जरूरी है?
भाजपा नेताओं की राजनीतिक प्रतिक्रिया में आंदोलन को दंगे, अराजकता, आर्थिक नुकसान और सरकार गिराने की कथित साजिश से जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।
सवाल यह है कि क्या किसी आंदोलन को गलत साबित करने के लिए उसके खिलाफ इतने गंभीर आरोप लगा देना पर्याप्त है?
यदि किसी आंदोलन में हिंसा होती है तो कानून अपना काम करे। यदि कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो। यदि किसी राजनीतिक दल ने हिंसा की साजिश रची है तो उसके प्रमाण सामने रखे जाएं।
लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन को बिना प्रमाण दंगा कराने की साजिश बताना लोकतांत्रिक विरोध की विश्वसनीयता पर अनावश्यक संदेह पैदा करता है।
भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्ण तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर उचित संवैधानिक प्रतिबंध भी लागू होते हैं।
इसका अर्थ साफ है: विरोध करना नागरिक का अधिकार है, जबकि हिंसा और कानून का उल्लंघन अलग विषय हैं।
सत्ता में बैठे लोगों को यह समझना होगा कि सरकार के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज सरकार को गिराने की साजिश नहीं होती। कभी-कभी वह सरकार को उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाने का लोकतांत्रिक माध्यम होती है।
3. जनता के नाम पर जनता के सवालों को अनुचित बताना भावनात्मक दबाव की राजनीति है
नड्डा ने रैली के कारण दिल्ली के व्यापारियों को आर्थिक नुकसान होने का दावा किया। उन्होंने 1984 की सिख विरोधी हिंसा की बरसी पर रैली आयोजित करने को लेकर भी कांग्रेस और राहुल गांधी की आलोचना की।
1984 की हिंसा भारत के इतिहास का गंभीर और पीड़ादायक अध्याय है। पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदनशीलता और न्याय की मांग हर राजनीतिक दल की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
लेकिन क्या किसी ऐतिहासिक त्रासदी का उल्लेख करके वर्तमान के चुनावी सवालों को अप्रासंगिक बनाया जा सकता है?
इसी प्रकार व्यापारियों की आजीविका महत्वपूर्ण है। लेकिन व्यापारियों के संभावित नुकसान का हवाला देकर मतदाता अधिकारों से जुड़े सवालों को दबाना भी उचित नहीं है।
यदि किसी आंदोलन से यातायात या कारोबार प्रभावित होने की आशंका है तो प्रशासन बेहतर व्यवस्था करे। आयोजकों से संवाद करे, वैकल्पिक मार्ग निर्धारित करे और नागरिकों की परेशानी कम करे।
सरकार का काम केवल विरोध करने वालों की आलोचना करना नहीं, बल्कि विरोध और सामान्य जनजीवन के बीच संतुलन स्थापित करना भी है।
जनता के नाम पर जनता के सवालों को अनुचित बताना एक प्रकार की भावनात्मक दबाव की राजनीति बन सकती है। इसमें असली मुद्दा पीछे छूट जाता है और बहस इस बात पर केंद्रित हो जाती है कि आंदोलन करने वालों को ऐसा करने का नैतिक अधिकार था भी या नहीं।
4. सरकार सड़क पर आंदोलन नहीं चाहती तो विरोध का दूसरा प्रभावी रास्ता बनाए
यह इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
यदि सरकार वास्तव में चाहती है कि सड़कों पर प्रदर्शन न हों, यातायात बाधित न हो, व्यापारियों को परेशानी न हो और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान न पहुंचे तो उसे केवल आंदोलन रोकने की मांग नहीं करनी चाहिए। उसे जनता के विरोध और शिकायतों के निस्तारण का प्रभावी विकल्प भी विकसित करना चाहिए।
क्या देश में ऐसी कोई बाध्यकारी व्यवस्था नहीं हो सकती जिसके माध्यम से नागरिक अपनी सामूहिक शिकायत दर्ज कराएं और सरकार निर्धारित समयसीमा में उस पर कार्रवाई करे?
इसके लिए एक राष्ट्रीय जन शिकायत एवं सार्वजनिक जवाबदेही प्रणाली विकसित की जा सकती है।
इस व्यवस्था के अंतर्गत:
- नागरिकों और सामाजिक संगठनों को सामूहिक जनहित याचिका या शिकायत दर्ज कराने का अधिकार मिले।
- एक निश्चित संख्या में नागरिकों द्वारा समर्थित शिकायत को स्वतः उच्च प्राथमिकता मिले।
- प्रत्येक शिकायत पर संबंधित विभाग को 7 से 30 दिनों के भीतर प्रारंभिक जवाब देना अनिवार्य हो।
- गंभीर संवैधानिक और जनहित के मामलों में स्वतंत्र जांच की व्यवस्था हो।
- शिकायतकर्ता को कार्रवाई की स्थिति ऑनलाइन देखने की सुविधा मिले।
- समयसीमा में कार्रवाई न होने पर संबंधित अधिकारी की जवाबदेही निर्धारित हो।
- असंतोषजनक जवाब की स्थिति में स्वतंत्र अपीलीय व्यवस्था उपलब्ध हो।
- प्रत्येक मंत्रालय और राज्य सरकार के प्रदर्शन का सार्वजनिक जवाबदेही डैशबोर्ड बनाया जाए।
उदाहरण के लिए, यदि लाखों नागरिक चुनाव आयोग की किसी प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज कराते हैं तो उस शिकायत को केवल राजनीतिक विरोध बताकर समाप्त नहीं किया जाना चाहिए। आयोग को समयबद्ध तरीके से तथ्यों और दस्तावेजों के साथ जवाब देना चाहिए।
इसी प्रकार किसान, मजदूर, बेरोजगार युवा, छात्र, व्यापारी और अन्य नागरिक समूह अपनी सामूहिक समस्याओं के समाधान के लिए एक प्रभावी संवैधानिक मंच प्राप्त कर सकें।
लोकतंत्र में आंदोलन समाप्त करने का सबसे अच्छा तरीका आंदोलनकारियों को डराना नहीं, बल्कि उनकी समस्याओं का समाधान करना है।
5. बहुमत सरकार चलाने का अधिकार है, जनता को चुप कराने का लाइसेंस नहीं
चुनाव में बहुमत प्राप्त करना सरकार बनाने का संवैधानिक अधिकार देता है। यह अधिकार जनता की संप्रभुता से आता है। लेकिन इसी बहुमत को जनता की आवाज के विरुद्ध इस्तेमाल करने का अधिकार किसी सरकार को नहीं मिलता।
प्रधानमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्रियों और सत्तारूढ़ दल के प्रत्येक नेता को यह समझना होगा कि जनता सरकार की प्रजा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक मालिक है।
सरकार जनता के लिए बनाई गई व्यवस्था का संचालन करती है। वह जनता के अधिकारों की संरक्षक है, मालिक नहीं।
यदि किसान अपनी फसल का उचित मूल्य मांगता है तो उसे राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता। यदि बेरोजगार युवा रोजगार मांगता है तो उसे व्यवस्था के खिलाफ साजिशकर्ता नहीं कहा जा सकता। यदि छात्र शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाता है तो उसकी आवाज को अनुशासनहीनता बताकर खारिज नहीं किया जा सकता।
इसी तरह यदि नागरिक चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं तो उनके सवालों का जवाब देना लोकतांत्रिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
सत्ता का असली सम्मान आलोचना को सहन करने और अपनी गलतियों को सुधारने की क्षमता से स्थापित होता है, न कि आलोचकों को अपमानित करने से।
6. लोकतंत्र में जनता को केवल मतदाता नहीं, निर्णय प्रक्रिया का भागीदार बनना होगा
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को केवल चुनाव केंद्रित व्यवस्था बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। चुनाव पांच साल में एक बार होते हैं, लेकिन जनता की समस्याएं प्रतिदिन पैदा होती हैं।
इसलिए सरकार और नागरिकों के बीच जवाबदेही का स्थायी तंत्र आवश्यक है।
जनता को यह अधिकार होना चाहिए कि वह सार्वजनिक नीतियों पर सवाल पूछ सके, सरकारी निर्णयों के प्रभाव का मूल्यांकन कर सके और निर्धारित समय में समाधान की मांग कर सके।
सरकार को भी यह व्यवस्था विकसित करनी चाहिए कि नागरिकों को अपनी बात रखने के लिए बार-बार सड़कों पर उतरने की मजबूरी न हो।
लेकिन इसके लिए सबसे पहले सत्ता के भीतर यह लोकतांत्रिक स्वीकार्यता पैदा करनी होगी कि विरोध सरकार की असफलता का प्रमाण हमेशा नहीं होता; कई बार विरोध उस असफलता को सुधारने का अवसर होता है।
निष्कर्ष: लोकतंत्र में जनता की आवाज सत्ता की सुविधा की मोहताज नहीं
जे.पी. नड्डा और भाजपा के अन्य नेताओं को यह समझना होगा कि किसी आंदोलन को ड्रामा, षड्यंत्र या अराजकता कह देने से उसके पीछे उठाए गए सवाल समाप्त नहीं हो जाते।
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यदि विपक्ष गलत है तो प्रमाण दीजिए। यदि चुनाव आयोग सही है तो आंकड़ों के साथ पारदर्शिता स्थापित कीजिए। यदि मतदाता सूची में कोई पात्र नागरिक गलत तरीके से बाहर हुआ है तो उसका नाम जोड़िए। यदि आंदोलन में कोई कानून तोड़ता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई कीजिए।
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लेकिन जनता के सवालों को राजनीतिक अपमान, ऐतिहासिक भावनाओं और आर्थिक नुकसान के आरोपों में उलझाकर मूल मुद्दे से बचने का रास्ता लोकतांत्रिक जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता।
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सरकार को यह तय करना होगा कि उसे केवल ऐसी जनता चाहिए जो चुनाव के दिन वोट दे और बाकी समय चुप रहे, या ऐसी जागरूक नागरिकता चाहिए जो नीतियों पर सवाल उठाए, गलतियों की पहचान करे और शासन को जवाबदेह बनाए।
आंदोलन लोकतंत्र की समस्या नहीं है। अनसुनी जनता, अपारदर्शी व्यवस्था और जवाबदेही से बचती सत्ता लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती हैं।
सड़क पर उतरने की नौबत तभी आती है जब संवाद के दरवाजे बंद होते हैं, शिकायतें अनसुनी रहती हैं और संस्थागत जवाबदेही कमजोर पड़ती है।
यदि सरकार वास्तव में सड़कों पर आंदोलन नहीं चाहती तो जनता के विरोध को रोकने की राजनीति छोड़कर जनता की समस्याओं के समाधान की व्यवस्था बनाए।
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क्योंकि लोकतंत्र में जनता को चुप कराना शासन की सफलता नहीं और जनता के सवालों का समाधान करना ही सुशासन की असली कसौटी है।
सत्ता को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि जनता का मौन उसकी लोकप्रियता का प्रमाण है। कभी-कभी यह मौन केवल इसलिए होता है क्योंकि जनता की आवाज सुनने वाला कोई मंच बचा नहीं होता।
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